आदिग्राम उपाख्यान / पृष्ठ 11 / कुणाल सिंह

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घर लौटकर बाघा ने जब इस बाबत दक्खिना से बात करनी चाही तो वह बेहया की नाईं हो-हो कर हँसने लगा।

'हाँ जाता हूँ। घूमने-फिरने नहीं जाता, बिजिनेस करने जाता हूँ। दादा, आपको वहाँ के बाजार के बारे में कुछ नहीं पता। यहाँ जो चीनी सत्ताईस रुपये किलो है, वहाँ अस्सी रुपये में भी व्यापारी पलक झपकते उठा ले जाते हैं। यहाँ के साबुन, शैम्पू, सिगरेट आदि का वहाँ काफी डिमांड है।'

'लेकिन यह तो सरासर काला बाजारी है!' बाघा ने आश्चर्य जताया।

रात का समय था और दोनों खाना खा रहे थे। गुलाब एक तरफ थोड़ी आड़ लेकर पीढ़ी पर बैठी थी। आज उसने पोस्ते का दाना डालकर क्या खूब बढ़िया तरकारी बनायी थी! लड़की गुनी है, तरह-तरह के व्यंजन पकाना जानती है। लोइटे माछ तो क्या खूब राँधती है! मयना भी लौकी के डंठल और लोइटे मछली डालकर ऐसी दाल बनाती थी कि उँगलियाँ चाटने का मन करता था।

'दादा, याद है जब मैं आपसे पहली बार मिला था? लकड़ी के गोले में छोटे-छोटे नट-वॉल्व चुरा रहा था। मैंने सिर्फ एक लँगोट पहना था और अपनी खाली देह पर सरसों का तेल चुपड़ रखा था। आपने मुझे देखकर कहा था कि इस भेख में आज से पचीस-तीस साल पहले के चोर निकला करते थे। याद है?' दक्खिना ने मुँह का कौर चपड़-चपड़ चबाते हुए पूछा।

'हूँ, तो?'

'तो क्या, कुछ भी नहीं! यही कहना चाहता था कि आपने ठीक कहा था। आज जमाना बहुत बदल गया है। वैसे-वैसे ही चोरी करने का तरीका भी। पचीस साल पहले जिस तरीके से चोरी की जाती थी, आज करने निकलो तो...। दादा, और फिर अब जब दिनदहाड़े आसानी से चोरी की जा सकती है तो रात में नींद खराब करने का क्या मतलब?'

'दिनदहाड़े चोरी पहले भी होती थी दक्खिना, लेकिन उसे चोरी नहीं डकैती कहते हैं। हाँ ठीक है कि जमाना बहुत बदल गया है लेकिन आज भी चोर को चोर ही कहेंगे और चोरी करना गलत काम पहले भी था, आज भी है।' बाघा ने उठना चाहा, लेकिन गुलाब उसकी थाल में और भात परसने लगी।

'अरे नहीं नहीं, बस हो गया।' बाघा ने दुलार भरे स्वर में उसे बरजा।

'दादा, आप उनसे नाराज हो तो इसमें मेरा क्या दोष! खाना तो मैंने बनाया है न! क्या आपको ठीक नहीं लगा?'

'अरे नहीं, बहुत ही स्वादिष्टï है!'

'तो फिर?' गुलाब ने घूँघट की आड़ से पूछा तो बाघा पसीज गया। उसने अपने भीतर गुलाब के लिए एक अजीब मुलायम-सा भाव उमड़ता हुआ महसूस किया। आज अगर उसकी कोई बेटी होती तो गुलाब की ही उमर की होती। बाघा को अफसोस हुआ कि उसने एक-दो दिन पहले हराधन से गुलाब की कितनी शिकायत की थी -

उल्टे पल्ले की साड़ी पहनती है। बड़े-बूढ़ों का लिहाज नहीं करती। वेल्वेट की 'सदा सुहागन' बिन्दी और 'अमानत' पाउडर लगाती है। दो लम्बर की जाली पारटी जिसे कहते हैं, एकदम से वही है।

नहीं, बाघा को ऐसा हरगिज नहीं कहना चाहिए था, आखिर गुलाब अब उसके घर की इज्जत है!

'अच्छा लाओ, थोड़ा और भात परस दो। दाल में हींग डाली है क्या?'

बाघा ने बहुत दिनों बाद हींग का स्वाद चखा था। हाल तक गाँव में इजराइल मियाँ-इस्माइल मियाँ की मसालों की दुकान थी, लेकिन बाघा उस तरफ जाने के नाम पर भी थूकता था। उसे शक है कि मयना...।

वैसे भी हींग वगैरह अब कहाँ मिल पाती हैं? गोलमिरिच, दालचीनी, बड़ी और छोटी इलायचियाँ तो अब भी दिख जाती हैं, लेकिन रतनजोत, जावित्री या जायफल जैसे मसाले अब देखने को भी नहीं मिलते। कोई बड़ा चोर है जो यह सब चुराकर ले गया। वह दिन दूर नहीं जब कोदो, ज्वार-बाजरे की तरह जमाने से दालें भी गायब हो जाएँगी। आज की तारीख उनकी कीमत आसमान छू रही है...। भात के साथ चाउमीन सानकर खाने में कैसा तो लगेगा!

बाघा ने सिर झटका। बोला, 'तरकारी का तो जवाब नहीं!'

'जादू है इसके हाथों में!' दक्खिना उँगलियाँ चाटते हुए बोला तो गुलाब फिस्स-से हँस पड़ी।

अचानक बाघा को यह सब अच्छा नहीं लगा, दक्खिना का यों तारीफ करना और इस पर गुलाब का यों हँस देना। उसने दक्खिना को टेढ़ी निगाह से देखकर पूछा, 'और जो विद्याएँ मैंने तुम्हें सिखायी थीं, वो?'

बाघा की आवाज में अचानक आई तुर्शी को भाँपकर दक्खिना चुप ही रहा आया। बाघा जल्दी-जल्दी अपना खाना खतम कर उठा और बाहर खम्भों के पास आकर हाथ-मुँह धोने, कुल्ला करने लगा। पीछे से गुलाब आयी और पानी से भरी हुई बाल्टी रख गयी। थोड़ी देर बाद दक्खिना को भी हाथ-मुँह धोने आना था, लेकिन बाघा ने बाल्टी में बचे हुए पानी को बहा दिया।

नहीं ऐसे नहीं, यह बहुत महीन बात है। इसे यों समझना चाहिए कि जब गुलाब ने बाघा से पूछा कि और भात परसूँ तो बाघा को अच्छा लगा। वह एक लम्बे अरसे से अकेला रह रहा था और ऐसे में अचानक घूँघट की आड़ से गुलाब का यह पूछना, फिर हठपूर्वक भात परसने लग पड़ना उसे बहुत-बहुत अच्छा लगा। इसी के पुरस्कारस्वरूप वह कह गया कि बहुत ही स्वादिष्ट खाना बनाया है और कि तरकारी का तो जवाब नहीं! यह ठीक था कि व्यंजन सचमुच ही सुस्वादु था, लेकिन अगर ऐसा न भी होता तो भी बाघा को यही कहना था। यह तारीफ करना, न करना पूरी तरह से बाघा के ऊपर था। फिर जब दक्खिना ने कहा, 'जादू है इसके हाथों में!' और गुलाब फिस्स-से हँस पड़ी तो जैसे बाघा एकाएक फिर से अकेला पड़ गया। अब वहाँ बस दक्खिना और गुलाब बच रहे थे - पति-पत्नी। पोखर में एक दूसरे की देहों पर पानी उलीचते और रिक्शे पर आइसक्रीम चाभते हुए। वहाँ किसी तीसरे की उपस्थिति वांछित नहीं थी, दोनों एक दूसरे के साथ एकान्त में सम्पूर्ण हो रहे थे। एकान्त में दक्खिना एक बार सावधानीवश इधर-उधर देखता और गुलाब की छातियाँ दबा देता। गुलाब फिस्स-से हँस पड़ती। यह 'फिस्स-से' हँसना बाघा को निहायत ही अश्लील लगा। वह जल्दी-जल्दी खाना खतम करके उठा और बाहर खम्भे के पास आकर हाथ-मुँह धोने और कुल्ला करने लगा। पीछे से गुलाब भी आयी। उसके एक हाथ में लालटेन और दूसरे में पानी से भरी हुई एक बाल्टी थी। जब वह बाल्टी रख रही थी, उसका पल्लू लुढ़क गया और छाती पर दाँतों के निशान जैसा कुछ दिखा। वह चली गयी, 'अमानत' पाउडर की भीनी खुशबू से बाघा का आसपास भर गया। वह जानता था कि इस बाल्टी में सिर्फ उसी के हाथ-मुँह धोने और कुल्ला करने के लिए पानी नहीं है, अभी दक्खिना भी आता होगा। लेकिन बाघा ने बाल्टी को औंधाकर बचा हुआ पानी नीचे मलबे में बहा दिया।

पुतली माई के घर में सिर्फ दो ही प्राणी थे - एक वह खुद, दूसरी उसकी पतोह काजल। काजल सान्थाली है जिससे पुतली माई के बेटे बुद्धदेव ने भालोबाशा कर ब्याह किया था। ब्याह के बखत बहुत हो-हल्ला मचा - बंगाली लड़का होकर सान्थाली को ब्याहेगा? बुद्धदेव को लोगों ने घेरा, समझाया-बुझाया, ऊँच-नीच की बातें बतायीं। चालू लड़का था बुद्धदेव, कसम खाकर बोला कि ऐसा वह हरगिज नहीं करेगा।

'लेकिन मेरी एक शर्त है कि आप लोगों में से कोई एक आगे आकर कहे कि किसी बंगालन से मेरा लगन करा देगा।'

सुनकर लोग अचकचाये। बेनीमाधव महाशय सबसे बुजुर्ग थे, सो उन्होंने ही मोर्चा सँभाला, 'क्या है रे, ये क्या बात हुई भला! ऐसा कभी सुना है कि दुनिया में किसी का चुमौना होने से बाकी रहा है? सबका हो जाता है एक-एक कर के, तेरा भी होगा।'

'लेकिन होगा कब? और कै दिन लगेगा? मैंने सब जगह ट्राई करके देख लिया है, कोई मुझसे शादी करने को राजी नहीं।' बुद्धदेव ने आगे बढ़कर बेनीमाधव महाशय को छेड़ा, 'और तो और मैंने तुम्हारी बहू से भी बात करके देख ली है बाबा।'

बेनीमाधव महाशय का बेटा लालन परदेस गया था, सो उनकी बहू गाँव भर की भौजी थी। सभी उसे छेड़ते थे, वह भी हँस-हँसकर प्रत्युत्तर देती थी। बेनीमाधव महाशय उसके इस सुभाव से दुखी रहते थे, इसलिए बुद्धदेव ने जब उन्हें छेड़ा, वे बिदक गये। बाकी लोग हँसने लगे थे। ऐसा मुँहफट और हँसोड़ छौरा था बुद्धदेव। यह सब तो ठीक है, लेकिन बहुत जिद्दी भी था। उसको लगाम में लेना मोश्किल था। ठीक दो दिन बाद काजल उसका घर लीप रही थी।

केंदा माँझी की लड़की है काजल। वही दुलू माँझी की बहन, जिसने एक बार हाडू घोष के साले भूपत को मारने के लिए दौड़ा दिया था। हाडू घोष उस अपमान को भूला नहीं। थैली भर पैसे खर्च करके दुलू को पकड़वा दिया चर्च जलाने के आरोप में। पादरी जोनाथन मारा गया, अब खून का इल्जाम दुलू पर है। कोई कहता है जिनगी भर जेल की चक्की पीसेगा, कोई बताता है आज नहीं तो कल उसे फाँसी होनी ही है।

एक तो सान्थाली, तिस पर दागी घर की लड़की से ब्याह करके पुरखों के कुल-करम को बोर दिया बुद्धदेव ने। उसका एक तरह से सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया। लेकिन बुद्धदेव को इससे कोई फर्क नहीं पड़ना था। मस्त-मलंग मानुष ठहरा वह। रसिक छैला। रंगीन बुश्शर्ट पहनता, गले में रूमाल बाँधता। बालों में चमेली का तेल लगाकर बीच से माँग काढ़ता। एक बार आधी रात भूकम्प आया था, सब अपने-अपने घर से निकल खुले खेतों की तरफ भागे थे, तब सिरीमान बुद्धदेव बाबू कंघी खोज रहे थे कि बिना बाल सँवारे घर से कैसे निकलें! अन्हरिया रात में मजाल है कि बिना टार्च के एक डेग भी रखे। बैटरी भरकर ट्रांजिस्टर पर गीत सुनता है - हो साथी कोई भूला याद आया। काम-धाम कुछ खास नहीं, नलहाटी बाजार से खरीदी एक लाल डायरी में कवित्त लिखता और गाता रहता है। धान कटाई के बाद खाली पड़े खेतों में नाटक करता, अकेले ही बेहुला और लखिन्दर दोनों का ऐसा पार्ट उतारता कि देखकर लोग दाँतों तले उँगलियाँ दाब लेते। जब जगन्नाथ का रथ खींचा जाता, वह आगे-आगे झाल-करताल बजाता स्वरचित कीर्तन गाते हुए चलता। शादी-ब्याह के टाइम जब वर पक्ष और वधू पक्ष में प्रश्नोत्तर पूछे जाते, कविता प्रतियोगिता होती, पहेलियाँ-मुकरियाँ बुझाई जातीं, तब बुद्धदेव की बहुत पूछ होती। लोग बारात में उसे स्पेशली बुला ले जाते। अपनी वाकपटुता से बुद्धदेव दूसरे पक्ष को मिनटों में चित्त कर देता।

काजल बुद्धदेव से दो-तीन बरिस बड़ी ही होगी। दोनों की मुलाकात दोल मेले में हुई थी जब वामन सरकार के ठेले से अपनी कुछ सहेलियों के साथ वह टिकुली-झुमके की खरीदारी कर रही थी। काजल को एक करनफूल पसन्द आ गया था, उसे लगाकर वह छोटे-से शीशे में खुद को निहार रही थी। बुद्धदेव ने देखा तो चट से दो पंक्तियों का कवित्त गढ़ दिया, जिसमें काजल के सौन्दर्य की तारीफ थी और कहा गया था कि यदि अकेले में मिलो तो इस पिलास्टिक के करनफूल के बदले असली करनफूल गढ़ाकर पिन्हा दूँगा। काजल और उसकी सहेलियाँ हँसने लग पड़ी थीं।

दूसरे दिन जब जंगल के धुँधलके में बुद्धदेव काजल से मिला तो उसे 'मेझेन' कहकर पुकारा। गाँव के लोग सान्थाली लड़कियों को यही कहते थे। बुद्धदेव को इसका अर्थ नहीं पता था, सोचा जैसे श्रीमती, कुमारी, देवी इत्यादि, उसी तरह यह 'मेझेन' होगा। अपने लिए यह सम्बोधन सुनकर जब काजल गुस्से से आग बबूला हो गयी तो बुद्धदेव को अहसास हुआ कहीं कुछ गलत है। उसने स्वीकार किया कि उसे नहीं पता 'मेझेन' मतलब क्या होता है। काजल ने भी बताया कि इसका ठीक-ठीक अर्थ उसे भी नहीं पता, बस वह इतना जानती है कि यह तिरस्कार का सम्बोधन है। बुद्धदेव ने माफी माँगी। दोनों के बीच गहरा मौन व्याप गया। उस दिन पहली बार बुद्धदेव को अपनी और काजल की दुनिया के फर्क का पता चला।

आप गौर करेंगे, दुनिया में हर जोड़ी के बीच प्यार के शुरुआती दिनों में किस्मत की निर्णायक भूमिका होती है। आप किस्मत को न भी मानते हों, तो भी आपको लगेगा कि जब तक दो लोगों के बीच वह स्थिति न आयी हो कि प्रेम खुद-ब-खुद अपनी दिशा-गति का निर्धारण कर सके, तब तक बहुत कुछ किसी तीसरी शक्ति पर निर्भर करता है। इस तीसरी शक्ति को किस्मत न कहें, समय कह लीजिए। मसलन काफी देर तक चुप बने रहने के बाद काजल की निगाह पड़ती है बुद्धदेव के हाथों पर। चलते समय रास्ते में बैंजनी-सफेद फूलों को देखकर बुद्धदेव ने यों ही तोड़ लिया था। याद रहे, जिस प्रकार उसे 'मेझेन' का अर्थ पता नहीं था, उसी प्रकार वह सर्वथा अनभिज्ञ था कि सान्थाली समुदाय (दुनिया?) में एक दूसरे को फूल भेंट करने का क्या मतलब होता है।

'तुम ये फूल मेरे लिए लाये हो?' काजल ने चहकते हुए पूछा। बुद्धदेव ने बिना कुछ कहे फूल बढ़ा दिया।

'इसका मानी जानते हो?' काजल ने फूल लेते हुए पूछा। बुद्धदेव ने सिर हिलाया - दायें-बायें।

'मतलब अब से तुम मुझे नाम से मत पुकारना। मुझे फूल कहना। मैं भी तुम्हें फूल कहूँगी।'

'क्यों?'

'हमारे यहाँ ऐसा ही होता है। जब कोई किसी को दोस्त मानता है तो उसे फूल देता है। फिर दोनों एक दूसरे का नाम नहीं धरते, फूल कहकर ही बुलाते हैं। एक दूसरे से मन का कोई भेद भी नहीं छिपाते।'

'फूल।'

'क्या फूल?'

'तुमसे अपने मन का एक भेद कहूँ?'

'जानती हूँ।' काजल खिलखिला पड़ी थी। फूलों को बालों में गूँथने लगी। बुद्धदेव ने उसके हाथों से फूल ले लिया और उसके जूड़े में लगाने लगा। फूल गन्धहीन थे, काजल की देह से अलबत्त एक खुशबू आ रही थी।

'मेरे मन में तुमको देखकर खूब अरमान होता है। तुमको देखा जभी मैंने सोच लिया कि ब्याह करूँगा तो तुम्हीं से।' बुद्धदेव के हाथ काजल की देह पर फिसलने लगे। काजल की खिलखिलाहट बढ़ती गयी थी। थोड़ी देर बाद बुद्धदेव ने पूछा था, 'ऊँ?'

काजल ने सिर हिलाया था - ऊपर-नीचे।

दोनों के भीतर एक ज्वार-सा उठने लगा था।

जाड़े के छोटे दिन। साढ़े पाँच-छह तक तो अँधेरा उतर जाता है। शमसुल और जतिन जब आधे रास्ते तक पहुँचे, अँधेरा हो गया। आदिग्राम तक पहुँचने में अभी चार-पाँच घंटे और लगने थे। वे सिलीगुड़ी से लौट रहे थे। जीप में पीछे खाने-पीने का सामान लदा था। अगले दिन रानीरहाट में रासबिहारी घोष की जनसभा थी जिसके बाद खाने-पीने का भी बन्दोबस्त किया गया था। नलहाटी बाजार से हलवाई और रसोइये बुलवाये गये थे। 'स्टार' ईंट भट्ठे के मालिक नन्दलाल खटीक ने तिरपाल डालकर एक अस्थायी रसोई बनवा दी थी। सभा के लिए शामियाने, टेबुल-कुर्सी, बैनर, माइक, जेनरेटर आदि की व्यवस्था भी खटिक के ऊपर ही थी। पत्तल, मिट्टी के चुक्के, दाल-चावल-नमक की बोरियाँ, हरी सब्जी, दरी आदि का इन्तजाम नलहाटी बाजार से हो चुका था। शमसुल और जतिन विश्वास के जि़म्मे स्पेशल लोगों की खातिरदारी थी। स्पेशल लोग मतलब तीनों गाँवों के मातब्बर कोची घोष, पंचानन हाल्दार व मोहम्मद अशरफुल। नन्दलाल खटीक। गुडगाँव से प्रेम चोपड़ा भी कल सुबह, नहीं तो दोपहर तक पहुँच ही जाएगा। बैनर्जी को मिलाकर तीन-चार लोग वे खुद हो गये। और रासबिहारी घोष व उनकी तरफ से दो-एक लोग। इतने लोगों के लिए खाने और पीने का सामान लेकर जब शमसुल और जतिन लौट रहे थे तो अँधेरा हो गया।

शमसुल ड्राइव कर रहा था और उसके बगल में बैठा जतिन ऊँघ रहा था। जतिन ने इससे पहले शमसुल से उसके घर-परिवार के बारे में बातें की थीं। जब शमसुल ने उसे अपनी पत्नी की बीमारी और बच्चों के अनिश्चित भविष्य के बारे में बतलाया तो सहानुभूति दिखाते हुए जतिन ने उसे आश्वस्त किया था कि वापस कोलकाता पहुँचकर वह बड़े साहब से उसकी सिफारिश करेगा। शमसुल ने खुश होते हुए कहा कि जैसे ही उसकी नौकरी पर्मानेंट हो जाती है, वह कोलकाता ले जाकर पत्नी का इलाज करवाएगा और कि उसके बच्चे भी वहाँ जाकर पढ़-लिख सकेंगे। उसने कहा कि यहाँ कोई अच्छा स्कूल नहीं, एक मदरसा है बस जहाँ उसकी कौम के बच्चे कुरान और हदीस की तालीमात हासिल कर सकते हैं, लेकिन उसे डर है कहीं उसके बच्चे गलत संगत में न पड़ जाएँ। ऐसे में वे बड़े होकर हद से हद अपने बाप की तरह ड्राइवर बन सकते हैं जबकि वह चाहता है कि वे बड़े होकर जतिन की ही तरह इंजीनियर बनें। शमसुल जो एक बार खुल गया तो फिर बन्द होने का नाम ही नहीं ले रहा था और फिर थोड़ी ही देर में जतिन को यह बेतरह अहसास होने लगा था कि शमसुल को शह देकर उसने जैसे बर्रों के छत्ते में हाथ डाल दिया है। शमसुल बहुत बोलता था और जतिन को बहुत बोलने वालों से बहुत डर लगता था। फिलहाल उसे नींद नहीं आ रही थी, लेकिन वह शमसुल को इग्नोर करने के लिए ऊँघने का नाटक कर रहा था।