आदिग्राम उपाख्यान / पृष्ठ 14 / कुणाल सिंह

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आकृतियाँ जमीन पर उतरीं और दोनों की परिक्रमा करते हुए थेई-थेई कर नाचने लगीं। बीच-बीच में नकियाते हुए 'आँ-आँ' की आवाज निकालतीं, टाँगें फेंक-फेंककर नाचती रहीं। थोड़ी देर सबकुछ इसी तरह। फिर एक-एक कर सारी आकृतियाँ जीप की तरफ बढ़ने लगीं। अन्तिम जाने वाला थोड़ा लड़खड़ाया मानो वह नशे में हो और शमसुल के पास धम्म-से गिर पड़ा। शमसुल चिहुँका, फिर उसने आँखें बन्द कर लीं। ढोढ़ाई राखाल शंकर इत्यादि झाड़ी के पीछे थे, वे भी निकल आये। जब सब जीप के पिछवाड़े लदे खाने-पीने के सामान पर झपटे तो जतिन के होश फाख्ता हो गये। वह बढ़ना चाहा, लेकिन शमसुल ने उसे बरजा, 'गाँव-देहात में जो बच्चे असमय मर जाते हैं, या किसी को अनचाहा गर्भ ठहर जाए, बच्चा हो जाए तो उस दुधमुँहे को नून चटाकर यहीं कहीं दफ्ना दिया जाता है। ये सब वही हैं।'

सुनकर जतिन जोर-जोर से बड़बड़ाने लगा - भूत पिशाच निकट नहिं आवै, महावीर जब नाम सुनावै!

अब तक सारी आकृतियाँ जीप के पास डोलती हुईं गटागट कोल्डड्रिंक पी रही थीं। कुछ को कोल्डड्रिंक से नशा हो रहा था और वे मुँह बा-बाकर डकार रहे थे। नंग-धड़ंग फटिकचन्द्र सिगरेट पी रहा था, धुएँ का छल्ला बना रहा था। नंग-धड़ंग बाब्लू दोनों हाथों से मुँह में सूखे मेवे ठूँसने के बाद जल्दी-जल्दी मुँह चला रहा था। अद्भुत दृश्य था।

जतिन को प्रतीत हो रहा था, वह एक ऐसे भयानक लोक में आ गया है जहाँ सबकुछ सम्भव था - मर्द को गन्ने की तरह चूसकर फेंक देने वाली चुड़ैलें, दाँत गड़ाकर खून सोख लेने वाले प्रेत, हवा में लाई की तरह उड़ते भुतहा पेड़। सबकुछ साँप की आँखों जैसा चित्ताकर्षक किन्तु डरावना था, जिसमें ऐसा दुर्दमनीय आर्कषण था कि मोहपाश में जकड़ा आदमी उसे तब तक देखता चला जाए जब तक उसकी रगों में जहर न उतरने लगे।

जतिन की पेशानी पर इस ठंड में भी पसीने की बूँदें चुहचुहा आयी थीं, उसके दोनों घुटने काँप रहे थे। पेड़ू में एक मरोड़-सी उठ रही थी। हलक में मानो काँटें उग आये हों और वह बार-बार थूक निगलने की कोशिश कर रहा था। धड़कनों की रफ्तार इतनी बढ़ गयी थी कि लगता था छाती के पंजरे फट पड़ेंगे।

बासमती चावल की बोरी पीठ पर लादे नंग-धड़ंग निमाई सबसे पहले झाड़ी के पीछे गुम हो गया। पल भर में एक-एक कर खाने-पीने के सारे सामान लाद-लूद कर आकृतियाँ झाड़ी के पीछे बिला गयीं। जीप में पीछे की सीट पर कैलेंडरनुमा एक बड़ा कागज गोलमोल कर रखा था। जीप की तरफ बढ़ते समय जो आकृति लड़खड़ाकर गिर पड़ी थी, उसे रंग-बिरंगे चित्रों का बड़ा शौक था। उठाकर भागते हुए वह एक बार शमसुल को देखती है, शमसुल उसे ही देख रहा था। वह आकृति तुरन्त गायब हो जाती है। माना अब भी निश्चिन्त होकर जीप के टायर के पास बैठा अपने दोनों हाथों में दो किसिम की मिठाइयाँ लिये भकोस रहा था। उसके पैरों के पास कोल्डड्रिंक की खाली बोतलें, रंग-बिरंगे रैपर्स आदि पड़े हुए थे। जतिन और शमसुल उसे गौर से देख रहे थे। नहर किनारे पहुँचकर भागते हुए बच्चों को माना की याद आती है।

थोड़ी देर बाद माना को होश आया कि वह झुंड से बिछड़ चुका है। वह घबराया नहीं, मुँह से विचित्र किस्म की आवाजें निकालकर शमसुल और जतिन को डराने लगा, ताकि वे उसके पास न फटकने पाएँ। लेकिन था तो वह महज चार साल का बच्चा ही, काफी देर तक जब्त करने के बाद धीरे-धीरे वह रोने लगा।

जतिन और शमसुल धीरे-धीरे माना की तरफ बढ़ ही रहे थे कि अचानक झाड़ी के पीछे से किसी तेंदुए की तरह राना निकला। जतिन चिहुँककर पीछे की तरफ हुआ, उसके पैर रपट गये और वह मुँह की खा गया। शमसुल कुछ न समझ पाने की दशा में, कि क्या करे, तत्काल वहीं उकड़ू हो बैठ गया - सिर झुकाये, दोनों हाथ हैंड्ïस-अप की मुद्रा में उठाकर। राना ने दोनों को एक बार अंगार बरसाती आँखों से घूरा और तीर की तरह झपटकर अपने भाई माना को गोद में उठाकर पीठ पर लाद लिया। झाड़ी में गुम होता, कि पलटकर जतिन-शमसुल को फिर से देखा। दोनों अपनी जगहों पर बुत बने थे। राना चिल्लाया, 'इन्क्लाब?'

बन्दर की तरह पीठ पर लटके माना ने मिठाई से भरे मुँह से जैसे-तैसे कहा, 'जि़न्दाबाद!'

सद्दाम हुसैन को शराब पीने की लत कैसे लगी ?

जब आदिग्राम में जलियाँवाला बाग के जनरल डायर का आगमन हुआ।

सबसे अन्त में जो आकृति जीप की तरफ बढ़ी और लड़खड़ाकर गिर पड़ी थी, उसे शमसुल पहचान गया था। यह भी सच है कि सिर्फ उसी को बचाने की गरज से जतिन के समक्ष शमसुल ने यह किस्सा गढ़ा था कि ये आकृतियाँ असमय काल कवलित हो जाने वाले गाँव के बच्चों की आत्माएँ हैं। जीप के पीछे की सीट पर कैलेंडरनुमा गोलमोल कर रखे बड़े कागज को उठाकर ले जाते समय उस आकृति ने एक बार पलटकर शमसुल को देखा भी था। उस वक्त शमसुल की निगाहें उसी आकृति पर टिकी हुई थीं। वह कोई और नहीं, शमसुल का बड़ा बेटा सद्दाम हुसैन था।

शमसुल ने सद्दाम हुसैन का नाम सद्दाम हुसैन के नाम पर रखा था। शमसुल के इस बेटे को शराब पीने की लत थी। बचपन से ही वह कुछ ऐसी त्रासदी का शिकार था कि जब वह नौ साल का हुआ, गम भुलाने के लिए उसने जाम का सहारा ले लिया। उसकी माँ एक अजीबोगरीब बीमारी का शिकार हो चुकी थी। माँ के गम में वह कोई हफ्ते भर रोता रहा, खाना-पीना लगभग त्याग दिया था। शमसुल ने साल बीतते न बीतते दूसरी शादी कर ली। सद्दाम की यह दूसरी माँ पहले-पहल तो उसे खूब मानती थी, लेकिन जैसे ही उसने एक सन्तान को जना, सद्दाम के प्रति उसका प्यार कम होते-होते अन्तत: खत्म हो गया। कुछ महीनों बाद उसने वही प्यार पड़ोस की एक लड़की के दिल में देखा, फौरन से पेश्तर वह उस पर दिलोजान से फिदा हो गया। लेकिन वह भी आखिर बेवफा सनम निकली। एक दिन सौरी भगत के खेत में उसने अपनी महबूबा को किसी पराये मर्द के साथ घुघुआ माना खेलते देख लिया। उस दिन सद्दाम का दिल चकनाचूर हो गया। तिस पर भी उसे शराब की लत न लगती, अगर उसके व्यक्तित्व में एक कमी न होती।

जब वह पाँच-साढ़े पाँच साल का था, तब पहली बार ध्यान दिया गया कि थोड़ी-थोड़ी देर के नियमित अन्तराल पर उसकी उँगली उठती है और ऊपर की तरफ बढ़ते-बढ़ते चेहरे के पास आती है, वहाँ हवा में थोड़ी देर झिझकती है और फिर धीरे से नाक के भीतर चली जाती है। उसकी आँखें आनन्दातिरेक में मुँद जातीं। सबसे पहले इस पर शमसुल की पहली बीवी, जिसने सद्दाम को जना था, ने गौर किया। वह चिन्ता में पड़ गयी। दिन-रात वह इसी फिक्र में बझी रहने लगी और ऐसे में उसका मन घर-संसार के कामों से पूरी तरह उचट गया। एक रात जब शमसुल ने उसे अपनी कसम दी, तब उसने तफसील से सद्दाम की इस बुरी आदत के बारे में बताया।

'अब तुम ही बताओ, मैं क्या करूँ! दिन-रात मैं इसी फिक्र में खोयी रहती हूँ। कहीं यह सब उसी वजह से तो नहीं हो रहा?' उसने आशंकित होते हुए शमसुल से पूछा। दरअसल शमसुल और उसकी बीवी के बारे में एक गुप्त बात यह थी कि दोनों खालाजाद भाई-बहन थे। खैर यह तो कोई बुरी बात नहीं थी, लेकिन शमसुल की माँ जब उसे दुधमुँहा छोड़ मर गयी थी, उसकी खाला ने ही उसे अपना दूध पिलाकर बड़ा किया था। खाला भी बहुत दिनों तक नहीं बचीं और शमसुल ने अपनी इस यतीम खालाजाद बहन से निकाह कर लिया था। चूँकि दोनों एक ही औरत का दूध पिये हुए थे, ऐसी शादी उनके फिरके में वर्जित थी। इसलिए शमसुल की बीवी ने सोचा कि हो न हो सद्दाम की इस बुरी आदत के पीछे यही वजह है।

तिस पर भी अपने शौहर से वह एक बात छिपा गयी थी। उसने सद्दाम को कई बार तब गौर से देखा था जब वह अपनी नाक में उँगली डाले हुए होता। उसके चेहरे पर तब ऐन वही मोहमह आनन्द की तृप्ति झलकती, जो शादी से पेश्तर उसकी देह में स्खलित होते समय शमसुल के चेहरे पर थी। उसकी जेहन में पहली बार वर्जित फल को चखते हुए शमसुल का वह एक ही साथ आशंकित और तृप्त चेहरा सदा के लिए अंकित हो चुका था। सद्दाम ने अपने अब्बा का ही नैन-नक्श पाया था, हू-ब-हू वह भी तब वैसा ही लगता।

बहरहाल, शमसुल ने उससे कहा कि वह कुछ दिन और देख ले, अगर सद्दाम की यह आदत नहीं छूटती तो वह बेझिझक उससे बात करे। अगर वह तब भी नहीं मानता तो मजबूरन शमसुल को ही कुछ करना पड़ेगा।

सद्दाम की अपनी नाक में उँगली डालने की आदत बदस्तूर जारी रही। उसकी माँ ने शमसुल के कहे अनुसार कई बार उससे इस बाबत बातचीत करने की कोशिश की, लेकिन जब भी इस खयाल से वह उसके गिर्द जाती, उसके जेहन में टँगा शमसुल का वह चेहरा उसका रास्ता रोक खड़ा हो जाता। वह एक अजीब शोर से खुद को घिरती हुई पाती - फैसला सुनाते लोगों का हुजूमी शोर, उसे नंगा कर सरेआम सूली पर चढ़ाते लोग, तानाजनी करते, पत्थर मारते। उसे लगता, एक पत्थर सनसनाता हुआ अभी उसकी पेशानी से आ लगा है और खून की एक गर्म- झिझकती-सी धारा रिस आयी है। जिन्हें कभी सूरज की रोशनी ने भी नहीं देखा, अपने उन अंगों पर वह कई अनजानी उँगलियों को रेंगती हुई पाती, मसलतीं-चिकोटियाँ काटतीं। कोई उसके नंगे सिर के बालों को बेतरह खींचे जा रहा है। अत: वह फौरन वहाँ से भाग पड़ती जहाँ सद्दाम अपनी आँखें मूँदकर नाक में उँगली डाले बैठा होता।

इस प्रकार अन्तत: उसे एक अजीबोगरीब बीमारी ने धर-दबोचा और यह सोग लिये-लिये वह इस दुनिया से कूच कर गयी। साल भर बाद शमसुल ने दूसरी शादी कर ली। सद्दाम पूर्ववत नाक में उँगली डालता, आँखें मूँदता रहा। दिन बीतते रहे, उसकी आदत पर परवान चढ़ता रहा। अब हमेशा ही उसकी नाक में उँगली डली रहती। ऐसा करते-करते जब एक हाथ की उँगलियाँ सूज जातीं तो वह दूसरे हाथ की उँगलियों का इस्तेमाल करने लग पड़ता। एक दिन उसकी दूसरी माँ ने इस पर गौर किया और जि़न्दगी में पहली बार इस वजह से उसे डाँट पड़ी। इस प्रकार उसकी दूसरी माँ दुनिया का वह पहला शख्स थी, जिसने सद्दाम पर जाहिर किया कि यह एक घिनौनी हरकत है।

उन दिनों सद्दाम की यह दूसरी माँ पेट से थी। वह अपना पेट फुलाये किसी हंसिनी की तरह सारे घर में क्वाक-क्वाक करती मटकती रहती। उसे डर था, कहीं सद्दाम की यह बुरी आदत उसके गर्भ को संक्रमित न कर दे। ऐसे में वह सद्दाम को दिन भर घर के बाहर-बाहर खदेड़े रहती। देर रात जब शमसुल ट्रक ड्राइवरी कर घर लौट आता, दोनों मियाँ-बीवी सो जाते, वह चोरों की तरह घर में प्रवेश करता। रसोई में उसके लिए रात का खाना ढँककर रखा होता, खा लेता और नाक में उँगली डाले सो पड़ रहता।

नौ महीने के बाद शमसुल की दूसरी बीवी ने भी एक बेटे को जना। कुछ दिनों बाद शमसुल की दूसरी बीवी तब हतप्रभ रह गयी, जब उसने देखा कि उसका नवजात बच्चा गुदड़ी में लिपटा आराम से सो रहा है। वह भागी-भागी शमसुल के पास गयी जो सदर दरवाजे पर खड़ा दातुन कर रहा था। खींचकर वह उसे नवजात के पास ले आयी और कहा, 'देखो।'

शमसुल ने कहा, 'देख रहा हूँ, बच्चा सो रहा है।'

'और?'

'और सोते हुए उसकी आँखें बन्द हैं।'

'दिमाग मत खराब करो, सोते समय आँखें बन्द ही रहती हैं। कुछ और है, गौर से देखो।'

'वह मन्द-मन्द मुस्करा रहा है।'

वाकई दूसरी बीवी ने अपने बच्चे को मन्द-मन्द मुस्कराते देखा। पहली बार के देखे में यह मुस्कराहट वह देख नहीं पायी थी, या हो सकता है तब वह मुस्करा ही न रहा हो। बच्चे को मुस्कराते देख दूसरी बीवी को उस पर प्यार आ गया और उसने झुककर उसकी बलैया ले ली। उठी और अपने शौहर का कन्धा छूकर धीमे से बोली, 'और भी कुछ है जिसे अब तक तुमने नहीं देखा।'

और तब शमसुल ने देखा कि उसका बेटा सोते हुए अपना अँगूठा मुँह में लिये हुए है। सोते समय वह उसे चूस रहा होगा और अब गहरी नींद में अँगूठे पर उसके होठों की पकड़ ढीली पड़ चुकी थी, वह मुस्करा रहा था। एक छोटे बच्चे का यों अँगूठा चूसना आम बात होगी, लेकिन जब इसे इस सन्दर्भ में देखा जाए कि सद्दाम उसका बड़ा भाई है, भले सौतेला सही, तो यही प्रतीत होता है कि इसने जनमते ही अपने बड़े भाई की तर्ज पर अपनी एक नयी और निराली आदत पा ली है, जिसे वाकई एक अच्छी आदत के तौर पर तो नहीं ही लिया जा सकता।

शमसुल तत्क्षण ही गुस्से में अपना आपा खो बैठा। वह अभी का अभी सद्दाम की चमड़ी उधेड़ देना चाहता था, लेकिन उसकी दूसरी बीवी, भले चाहे उसमें और कई खामियाँ हों, मूलत: अल्ला मियाँ से डरने वाली एक नेक औरत थी। उसने शमसुल को प्यार से समझाया कि जिस तरह अभी उसने उसे प्यार से समझाया, उसी तरह वह भी सद्दाम को प्यार से ही समझाए।

और तब शमसुल ने सद्दाम की यह बुरी आदत छुड़वाने की गरज से उसे एक किस्सा सुनाया।

बहुत जमाने पहले की बात है जब बंगाल पर नवाब सिराजुद्दौला का राज था। एक गाँव में एक लड़की रहती थी जो कभी अपने माँ-बाप का कहना नहीं मानती थी। अगर उसके माँ-बाप कहते कि खिड़की से मत झाँको तो वह झाँकने लगती, दौड़ो मत तो दौड़ने लगती, हँसो मत तो बात-बात पर खींसे निकालने लगती। वह दिन चढ़े तक सोती रहती, खूब खाती, इधर-उधर थूकती और मुँह खोलकर उबासी लेती। गरज कि वह हर वो काम करती जो किसी लड़की के लिए कतई मुनासिब नहीं समझा जाता।

लड़की के इस सुभाव से उसके माँ-बाप आजिज आ गये। इसी प्रकार दिन बीते, बरस बीते, धीरे-धीरे लड़की बड़ी होने लगी। उम्र बढ़ने के साथ-साथ उसकी यह बुरी आदत भी बढ़ती गयी। पहले तो वह माँ-बाप का कहना सुनकर उल्टे काम करती, अब तो उसे सुनाई भी उल्टा पड़ने लगा। माँ-बाप, गुरुजन कहते कि सूरज पूरब से उगता है तो वह सुनती कि पच्छिम से उगता है। इसके बाद उसे दिखाई भी उल्टा देने लगा। माँ-बाप उसकी आदत से परेशान होकर रो रहे होते तो उसे दिखता, वे दिल खोलकर हँस रहे हैं।

एक दिन लड़की का सिर बेतरह दुखने लग पड़ा। मारे दर्द के वह बेहाल हो गयी। दिन भर वह तड़पती रही और साँझ होते ही उसे आश्चर्यजनक रूप से घोर निद्रा ने डँस लिया। सुबह वह उठी तो उसका सिर रूई की तरह हल्का था। वह प्रसन्न हो गयी और हिरणी की तरह कुलाँचे भरने लगी। जब उसके माँ-बाप ने उसे देखा तो उनके मुख से एक तेज चीख निकल पड़ी। लड़की को पहले तो कुछ समझ में नहीं आया, लेकिन नदी के जल में उसने जब अपना चेहरा देखा तो वहीं पछाड़ खाकर गिर पड़ी। दरअसल रात में जब वह सो रही थी तो उसकी गरदन के पास से एक नया सिर उग आया था।

गाँव-गिराँव में बात फैल गयी। लड़की को देखने के लिए उसके घर पर लोगों का ताँता लग गया। लोग घर लौटे, घरवालों को सारा किस्सा बताया। लोगों के बच्चों ने लोगों से पूछा कि लड़की के साथ ऐसा क्यों हुआ, तो लोगों ने अपने बच्चों को बताया कि लड़की के साथ ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उसने अपने माँ-बाप, गुरुजनों का कहना नहीं माना था।

किस्सा सुनकर सद्दाम डर गया। क्या अगर उसने नाक में उँगली डालने की अपनी बुरी आदत नहीं छोड़ी तो उसके भी दो सिर उग आएँगे? शमसुल ने कहा कि उससे भी बुरा हो सकता है कि न सिर्फ सिर, बल्कि हाथ और पैर भी उग आएँ।

किस्से का सद्दाम पर पड़े असर को देखकर शमसुल की बीवी बहुत खुश हुई। उसने शमसुल की किस्सागोई की तारीफ की। शमसुल यह छिपा गया कि जब वह किशोर था तो एक बार उसने अपनी खालाजाद बहन की नयी-नयी उभरती छातियाँ टटोली थीं। ऐसा करते उसकी खाला ने देख लिया था। उन्होंने तब मना किया था कि यह गुनाह है। लेकिन जवानी किसी बन्दिश को नहीं मानती। जब खाला ने शमसुल को एक दिन अपनी बेटी को चूमते हुए देखा तब उन्होंने दोनों को यह किस्सा सुनाया।

शमसुल तो नहीं, लेकिन उसकी खालाजाद बहन पर इस किस्से का इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि जब सद्दाम उसके गर्भ में था, वह हमेशा आशंकित रहती थी कि कहीं उसके होने वाले बच्चे के दो सिर न हों! यही कारण है कि जब सद्दाम की इस बुरी आदत का उसे पता चला, उसने शमसुल से यही पूछा था कि कहीं यह सब 'उस' वजह से तो नहीं?

बाइस फरवरी। जाड़े की चमकीली धूप थी। शाम की जनसभा की तैयारियाँ पूरी हो चुकी थीं। शमसुल को साथ लेकर जतिन कल दोपहर ही सिलीगुड़ी के लिए रवाना हो चुका था। जनसभा के बाद खाने-पीने का भी बन्दोबस्त किया गया था। तीनों गाँव के मातब्बरों समेत रासबिहारी घोष तथा पार्टी के अन्यान्य कुछ लोगों के लिए स्पेशल डिनर का इन्तजाम 'स्टार' ईंट भट्ïठे के मालिक नन्दलाल खटीक की तरफ से किया गया था। स्पेशल खाने-पीने का सामान लाने के लिए ही जतिन और शमसुल सिलीगुड़ी गये थे।

दोपहर के करीब बारह-सवा बारह के आसपास आदिग्राम में प्रेम चोपड़ा की आमद हुई। बैनर्जी व रंजन ने उसका खुलुसी से इस्तकबाल किया। अपने नाम के ही मुताबिक प्रेम चोपड़ा काफी दिलचस्प किस्म का आदमी मालूम हुआ। बैनर्जी से हाथ मिलाते हुए उसने अपना तआरुफ कुछ यों दिया - प्रेम नाम है मेरा, प्रेम चोपड़ा! मैं वह बला हूँ कि शीशे से पत्थर को काटता हूँ।

बैनर्जी हँसने लगा था, देखादेखी रंजन भी। तत्काल ही बैनर्जी ने रंजन को घूरा तो वह चुपा गया। समझ गया कि यह हँसी सिर्फ 'बड़ों' के लिए है। दरअसल बैनर्जी प्रोटोकॉल में माहिर है। वह भली-भाँति जानता था कि चोपड़ा उनके साथ चाहे जितनी 'यारकी' कर ले, उसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। बैनर्जी लोगों को यह हरगिज नहीं भूलना चाहिए कि उनके साथ दिल्लगी करने वाला यह वह शख्स है, जिसे स्टेट गवर्नमेंट ने खास तौर पर यहाँ बुलाया है। चोपड़ा का तकियाकलाम था - प्रेम चोपड़ा प्रॉब्लेम साल्व करता है। जिस तरह इंजीनियर का काम इमारतें खड़ी करना है, डॉक्टर इलाज करता है, उसी तरह...। इसका अर्थ यह है कि जब उसे यहाँ बुलाया गया है तो स्टेट गवर्नमेंट को इस बात का पूरा अन्देशा है कि जमीन अधिग्रहण के मामले में यहाँ निकट भविष्य में कोई गड़बड़ी हो सकती है। प्रेम चोपड़ा उसी मर्ज की अग्रिम दवा के रूप में यहाँ उपस्थित है।

प्रेम चोपड़ा इससे पूर्व हरियाणे के गुडगाँव नामक जि़ले में था। 1990 से पूर्व गुडगाँव और प्रेम चोपड़ा दोनों ही बेकार-बेरोजगार थे। यह वह समय था जब देश के कोनों-अँतरों से निकलकर हरित क्रान्ति दिल्ली को अपना ठिया बना रही थी और 'क्लीन दिल्ली ग्रीन दिल्ली' जैसे नारों का आविष्कार हुआ था। नतीजतन दिल्ली के सारे उद्योग अगल-बगल के राज्यों की ओर कूच करने को बाध्य हुए और इस तरह गुडगाँव, फरीदाबाद, नोएडा और गाजि़याबाद को नेशनल कैपिटल रीजन (एनसीआर) कहे और माने जाने की शुरुआत हुई।

इत्तेफाक कहें या जो भी, इनमें गुडगाँव ही ज्यादातर विदेशी कम्पनियों का पहला चुनाव था जो उदारीकरण और मुक्त बाजार नीति के तहत भारत में अपनी पूँजी का सीधा निवेश करने पहुँची थीं। नयी सदी के आते-आते जहाँ गुडगाँव इस क्षेत्र में 'नुमेरो उनो' बन गया, वहीं प्रेम चोपड़ा भी मोटी तन्ख्वाह के पैकेज पर होंडा कम्पनी में सीईओ मिस्टर हिरोशी का मुख्य सलाहकार नियुक्त हो गया। इससे पूर्व वह हरियाणा के ही रेवाड़ी नामक जि़ले में धारूहेड़ा के एक कपड़ा मिल में मुख्य प्रबन्धक हुआ करता था। वर्ष 1998 में कम्पनी ने जिस तरह कर्मचारियों को बिना किसी तरह का मुआवजा दिये, लॉकआउट किया, और इसमें चोपड़ा की जो भूमिका रही, कहते हैं कि उसी के पुरस्कारस्वरूप होंडा कम्पनी ने उसे अपने यहाँ ऊँचे ओहदे के साथ-साथ एक गाड़ी और पालमविहार में एक बंगला प्रदान किया।