आदिग्राम उपाख्यान / पृष्ठ 1 / कुणाल सिंह

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"The time has come," the Walrus said, "To talk of many things."

- Alice in Wonderland

मलबे का मालिक कोई नहीं था।

जंगल में खूँखार जानवर रहते हैं - यह कहने की शुरुआत कब से हुई ?

रात के कोई डेढ़-पौने दो का समय रहा होगा। चाँदनी रात। बाघा से और चला नहीं जाता। थक गया था। चूर-चूर। उमर भी तो हुई। अब वह पहले-सा जोश कहाँ कि रात भर बउआता रहे और भोर होते ही एक साँस में नदी हेल जाए। आज तो ठौर-ठिकाने की थाह लेने में ही आधी रात हुई आयी और हँफनी छूट रही है। एक ताड़ के पेड़ के नीचे साफ-सुथरी ठाँव देखकर थस्स-से बैठ गया। सुस्ताने लगा। अभी इत्मीनान की दो-तीन साँसें ही भरी थीं कि याद आया, यह अगहन का महीना है। फौरन से पेश्तर बैठे-बैठे ही मेंढक की तरह कूदकर ताड़ के पेड़ से दूर जा छिटका। सिर पटककर गुहार लगायी। भूल-चूक बख्शो बाबा! फिर थोड़ी दूर पर चप्पलों को पेंदे से लगाकर बैठ गया। आराम से।

मुस्तैद रहना पड़ता है भाय! यह सब देख-सुनकर नहीं चलने से तो काम नहीं होगा! आज देवी की किरपा से ऐन समय पर उसे चंडी गुरु की बात याद आई थी। उस्ताद की सीख। अगहन मास की रात भूलकर भी किसी ताड़ के पेड़ के नीचे नहीं बैठना चाहिए। जिन्नों का वास। इस्लामी भूत के चक्कर में एक बार पड़े कि गये काम से! जिनगी भर की आफत। गोड़ पड़ता हूँ बाबा, माफ करो। धन्धा वैसे ही आजकल मन्दा चल रहा है। दो जून की रोटी का जुगाड़ ही किसी तरह से हो पाता है। कहाँ से जुटाऊँगा तुम्हारे लिए दारू-मुर्गा!

कहीं दूर उधर से एक कुकुर के भूँकने की आवाज आयी। इधर से उल्लू के डाकने की आवाज। जानवरों के बीच चिट्ठी-पत्री। टेलीफोन। उधर बार्डर पार बांग्लादेश से वो पूछा कि क्या हाल-चाल हैं, तो इधर पच्छिम बांग्ला से ये बोला सब समाचार ठीक है, अपनी सुनाओ। आइएसडी काल। फोकट में। बाघा ने टो कर देखा, पेट की निचली तरफ, नाभि के पास फूलकर बैलून हो गया है। टो कर देखते ही पेशाब महसूस हुआ। धुत्त साला! ये एकठो अलग ही बिपत है। घड़ी-घड़ी पेशाब। नलहाटी के डाक्टर को दिखाया था। परेश डाक्टर। होमीपेथी की मीठी-मीठी गोलियाँ बाँटने से ही बन गया डाक्टर। साला सिलीगुड़ी-नलहाटी लाइन में झालमूड़ी बेचने वाला भी आजकल अपने को दुकानदार कहता है। बिजिनेसमैन, चाहे सेल्समैन। दवाइयों के नाम पर छिपकली का अंडा देता है। प्राब्लेम जस का तस। लगेगा एक ही साथ गंगा-पद्मा बहा दूँगा। संसार को डुबा ही दूँगा। लेकिन बैठो तो छुल-छुल दो बूँद। एकदम पीला। जलन। खाना खाते-खाते गले में कौर अटक जाए और पानी नहीं पीने से जैसे फील होता है, ठीक वैसे ही लगता है पेट बँध गया। एक दिन हाथ में कुछ पैसा लेकर सिलीगुड़ी जाने के सिवा कोई उपाय नहीं। वहाँ के किसी अँगरेजी डाक्टर से एक्सरे करवाने से ही असली रोग पकड़ में आएगा। जैसे हराधन की हड्डी का फिरेक्चर पकड़ा गया था दन्न-से। उसी ने तो बताया था बाघा को एक्सरे के बारे में। विज्ञान की बात। एक्सरे मतलब लाइट। जैसे बीएसएफ कैम्प की सर्चलाइट। दन्न-से पकड़ लेती है रात के अँधेरे में छुपकर बार्डर पार करने वालों को। धाँय!

घुटने पर हाथ रखकर एक मैली-सी साँस छोड़ते हुए बाघा उठा और थोड़ी दूर हटकर जा बैठा। उकड़ू। दम बन्द कर जोर डालने से हल्की एक धार। फिर बन्द। तीन-चार पछुआई हुई टप-टप। फिर वह भी बन्द। बाघा देर तक बैठा रहा। पेशाब करते हुए पेशाब के बारे में सोचते रहने से पेशाब ठीक होता है। लेकिन एक बार बन्द तो बन्द ही। बाघा ने उल्टी हथेली से नाभि पर प्रेशर डाला। नदी-नाले में डूबते हुए को बचाने के बाद उल्टा लिटाकर खूब जोर-जोर दबाने से उसके मुँह से जैसी एक मरगिल्ली-सी दो-चार कुल्ले भर की धार बहती है, वैसी ही एक बीमार-सी धारा फिर से। जलती हुई। लास्ट में दो-चार टप-टप। फिर बन्द। पूरा क्लियर अब भी नहीं हुआ। बाघा उठा और वापस आकर अपनी चप्पलों पर बैठ गया।

अगहन मास। ठंड अबकी थोड़ी कम है। लेकिन रात में, और वह भी खुले खेत-बेहार में जरा-सी हवा भी बाघा की बूढ़ी हो रहीं हड्डियों को बेतरह खटखटा जाती। बाघा ने सोचा बीड़ी पी जाए। अंटी में दोठो बीड़ी है। वो भी कल हराधन से उधार ली गयीं। घंटे भर से बीड़ी पीने की तलब रह-रहकर महसूस कर रहा था। इन्हीं दो बीड़ियों के आसरे पूरी रात निकालनी थी। अगहन की लम्बी रात। बाघा ने एक निकाली। निहारी। सूँघी। गदा छाप हरा सूता बीड़ी। जलायी और एक लम्बा कश खींचकर 'कवि-कवि' भाव से दुनिया-जगत को निरिखने लगा।

दूर-दूर तक चाँदनी में सीझती खुली जगह। चुपचाप और मीठी-मीठी। जवानी के चिकने गाल पर इधर-उधर मुँहासों की तरह खुली जमीन की देह पर इधर-उधर ताड़ के शीशम के पेड़, मेहँदी की झरबेरियों की झाड़ियाँ। पीछे कोई दस-बारह रस्सी भर दूर लकड़ी का एक गोला, दराँती कल। लकड़ी के गोले के पीछे तीन-चार फीट ऊँची चाहारदीवारी से घिरा एक लम्बा-चौड़ा अहाता है।

साढ़े तीन सौ एकड़ जमीन का यह अहाता कभी सी.पी.टी. कम्पनी का कारखाना हुआ करता था। 1976 के आसपास आदिग्राम में यह कम्पनी आयी थी। कोई डेढ़ सौ किसानों की जमीन को उन्हें यह लोभ देकर हथियाया गया था कि जब कारखाना शुरू हो जाएगा, उन्हें नौकरी दी जाएगी। खेती-बाड़ी में क्या रखा है! देखो कलकत्ते में लोग खेती-बाड़ी नहीं, नौकरी करते हैं, इसलिए बाबू हैं, अमीर हैं। कारखाना जब शुरू हुआ तो इन किसानों को ठेके पर मजदूरी मिली भी थी। लेकिन फिर जाने क्या हुआ कि कम्पनी बन्द हो गयी। जिन किसानों ने जमीन दे दी थी, वे घर के रहे न घाट के। आज की तारीख में उनकी जमीन कम्पनी के कब्जे में है और कम्पनी अब मलबे में बदल गयी है। मलबे का कोई मालिक नहीं है।

कम्पनी के अहाते के ठीक सामने की जमीन पर इलाके के विधायक कामरेड रासबिहारी घोष ने पार्टी ऑफिस खोल रखा है। एक कमरा है, पार्टी ऑफिस कहिए या इलाके के लड़कों का क्लब 'नवयुवक संघ', जो भी। एक तरफ कैरम बोर्ड, शतरंज आदि रखे रहते हैं तो दूसरी तरफ पार्टी के बैनर, बिल बोर्ड्स, होर्डिंग्स, झंडे आदि। कभी-कभी रासबिहारी घोष आते हैं, दस-पन्द्रह मिनट बैठकर चले जाते हैं। घोष बाबू विधायक होने के अलावा भी बहुत कुछ हैं। वैसे विधायकी के इतर उनका सबसे बड़ा कारोबार चोकड़-खली और देसी-विदेसी खाद का है। दो साल पहले घोष बाबू ने पार्टी ऑफिस के बगल में लकड़ी का यह गोला भी बनवा लिया। दो-तीन मुंशी और एक मैनेजर गोले को चलाते हैं और हर शाम बशीरपुर जाकर घोष बाबू को हिसाब दे आते हैं। आदिग्राम के दक्खिन जो जंगल है, वहाँ अवैध रूप से पेड़ काटे जाते हैं और दूर-दूर तक लकड़ियों की सप्लाई की जाती है।

पार्टी आफिस के दाएँ आधेक मील पर नलहाटी-सिलीगुड़ी को जोड़ता हुआ हाइवे है। हाइवे के पास ही हराधन का मोदीखाना। लाइन में चलने वाली रात की लॉरियों के चीखते हॉर्न यहाँ तक सुनाई पड़ जाते हैं। दारू-चिलम की पिनक में बेतहाशा भागती लॉरियाँ, जो ऐसे ही जब मन हो हॉर्न बजा देती हैं। फिर बॉर्डर के दोनों ओर से कुकुर-सियार देर तक उस हॉर्न की माँ-बहन करते रहते हैं। इसके अलावा कहीं कुछ हिलता-जगता दिखाई नहीं देता।

रात में पृथ्वी की देह की भाषा बदल जाती है। रास्तों की गति भी। पृथ्वी का भी तो कोई नाम होना चाहिए। दिन भर तो हम ये नलहाटी वो आदिग्राम। जगदलपुर, सिलीगुड़ी, जलपाईगुड़ी और जाने क्या-क्या छोटे-छोटे नामों से पृथ्वी को बुलाते हैं। और नहीं तो ए पार बांग्ला ओ पार बांग्ला। जैसे ससुराल में औरतों को माँ-बहू-भौजी कहते हैं। और नहीं तो बंशी की चाची या दशरथ की सौतेली माँ। लेकिन नैहर में औरतों का एक ही नाम होता है। सबके लिए चम्पा या पुतुल। पारुल, झिनुक, झुम्पा। उसी तरह पूरी पृथ्वी का भी कोई एक नाम होना चाहिए। दिन में न सही, कम से कम रात में।

मयना नाम कैसा रहेगा? ...एह, देखो तो बुढ़ौती में कैसे मौका पाते ही जवानी का भालोबाशा याद आया।

ऐसी ही तो एक चाँदनी रात थी वह भी। उन दिनों बाघा की देह में जो फुर्ती थी कि पूछो मत। एकदम से माँगुर मछली। लड़ाई का जमाना था। इन्द्रा गांधी का शासन। 'जय बांग्ला' के नारे से दोनों तरफ के बंगाल हमेशा गूँजते रहते थे। धन्धा क्या ही खूब जम रहा था! ऐसे में एक रात कोई बारह-साढ़े बारह के करीब बार्डर के पास भागती-पराती वह मिली थी। बाघा के हाथ पड़ गयी। फेस कटिंग से ही लग गया, उस पार की छोकरी है। लाल पाढ़ की एक कमला साड़ी में लिपटी। बड़ी-बड़ी आँखें और ऊँची नाक। सोने के जैसा रंग, घनी बरौनियाँ और ताड़ के गुच्छे की तरह केश। हाथ और लिलार पर गोदना गुदवाये। अभी-अभी जवान हुई। यार के साथ भागकर इस पार चली आयी थी।

तब बार्डर पर एकदम ढील थी। इस पार का आदमी पेशाब लगने पर उस पार एक पेड़ की आड़ में करके चला आता था। पूछा, नाम क्या है छोकरी तेरा? बोली, मयना। मयना मतलब तो मैना नामक एक चिड़िया। धुत्त साला, बेकुफ बन गया तो! डैम फुल। अब कैसे पता चलेगा हिन्दू है कि मुसलमान? चिड़िया फूल पत्ती पृथ्वी अकास पर नाम रखने का यही तो फैदा है! खोलकर पूछने में भी लाज की बात है।

दोनों देर तक साथ-साथ चलते आये थे इधर की तरफ। मयना ने सब बता दिया कि वह एक लड़के से भालोबाशा करती थी और कि उसी के कहने पर चार सौ टाका लेकर घर से निकल पड़ी थी। बार्डर के इस पार आकर सारे टाका लेकर वह कहीं चम्पत हो गया और कि अब उसके पास खाने को भी पैसे नहीं रह गये।

'कुछ खाएगी? एग रोल खिलाऊँगा। मेरा दोस्त है एक। फौजियों के लिए बनाता है।'

लड़की ने 'एग रोल' का कुछ दूसरा ही अर्थ लगा लिया। औरतजात। हद से ज्यादा चालाक और सतर्क। बिल्ली की मूँछ। त्योरियाँ चढ़ाती हुई बोली, 'ज्यादा एग रोल मत समझाओ। कॉफी पिया है मैंने। जिन्दगी में दोसा भी खाया है। ऐसी-वैसी नहीं हूँ। सनलाइट से साड़ी धोती हूँ।'

हालाँकि मयना की यह ऐंठ उसकी अँतड़ियों की ऐंठन के आगे बहुत देर तक नहीं टिक सकी थी। दोनों ने कैंटीन में जाकर मन भर आमलेट और नान खाया था। रात का बचा हुआ, ठंडा। मयना बोली, 'थेंक्यु!' फिर दोनों घर चले आये। कुछ ही दिनों में बाघा की कोठरी को क्या ही देखने लायक बना दिया था मयना ने!

बाघा की बातों पर खूब-खूब हँसती थी। एक लम्बर की हँसोड़ छोकरी। एक बार बाघा किसी रात कीचड़ में जा गिरा। घर लौटा तो उसकी दशा देखकर मयना पेट पर हाथ धरकर 'ही-ही' करती हुई हँसने लगी। बाघा को गुस्सा आ गया। बोला, 'ज्यादा खींसे मत निकाल!'

मुँहफट मयना बोली, 'क्यों न भला! मेरे दाँत तो देखने लायक हैं। बहुत मजे की एक बात पर आदमी को हँसना ही चाहिए। दुख की बात पर फूट-फूटकर रोना चाहिए जी। यही नियम है। ही-ही!'

एक खासियत थी कि हँसी-ठिठोली में भी बड़े पते की बात कह जाती थी मयना। हराधन ठीक ही कहता था - चतुर नार है बाघा। इसे एक ठाँव पर बाँधकर रखना मोश्किल है।

मयना मतलब तो मैना नामक एक चिड़िया। चिड़िया को उड़ना ठहरा। जभी उड़ गयी एक दिन। फुर्र!

थू!

पीछे लकड़ी गोला से 'खुट' की आवाज आयी तो बाघा चौंका। पलटकर देखा, दूर-दूर तक लकड़ी का गोला सुनसान पड़ा था। टीन के लम्बे ढलुए शेड से उजली चाँदनी दूध की तरह टप-टप चू रही थी। बाघा ने अपना भरम माना। दो-चार कश बच रह गयी बीड़ी को जल्दी-जल्दी खींचने लगा। थोड़ी देर बाद फिर से वैसी ही आवाज उसी दिशा से आयी तो बाघा को शक पड़ गया।

इतने वर्षों रात-बिरात घूमते-पराते रहने का अनुभव है कि धरती पर बजने वाली एक हल्की आहट भी सुनकर वह फौरन जान जाता है कि यह जीव-जन्तु की आहट है या मानुख-प्राणी की। कभी-कभी तो दिन भर के ताप से तायी चीजें रात होते ही आप से आप तिड़कने लगती हैं। कन्फ्यूजन हो जाता है। लेकिन ध्यान से सुनो तो फर्क का पता चल जाता है। चीजों की इन खुद की आहटों के पाँव नहीं होते। ये वहीं सुनाई पड़ती हैं जहाँ से उठती हैं। इसके उलट जीव-जन्तुओं की आहट हर तरफ से सुनाई पड़ती हैं। झिंगुर की किर्र-किर्र हर दिशा से बजती है। उल्लू की हूक और कोयल की कूक पेड़ की हर पत्ती से झड़ती है।

बाघा को यकीन हो चला, लकड़ी गोला से आने वाली 'खुट' की आवाज के पीछे किसी मनुष्य की छिपी-छिपायी हरकतों से लगी-बझी एक अनायासी लापरवाही है। कोई चुपके से पैर दाबते हुए चलता है और उसका सारा ध्यान इस पर है कि पैरों की आहटें न उठें। अचानक किसी दूसरे अंग से टकराकर कोई चीज गिर पड़ती है और वह ठिठककर खड़ा हो जाता है। दम साध कर। सतर्क। जिस हवा में जरूरत से ज्यादा सन्नाटा हो, उस हवा में कोई आदमी ही हो सकता है।

बाघा ने कान बिछाकर सुनने की कोशिश की, मन को कन्सन्ट्रेट किया। आँखों को बन्द कर एक लम्बी साँस खींची। उस आवाज को मन ही मन याद करने लगा - 'खुट'! इतना नपा-तुला, इतना अद्भुत, इतना अचानक एक 'खुट'! लकड़ी के गोले में जरूर कोई है। सेन्ट परसेन्ट। बाघा ने बीड़ी की टोंटी फेंकी। उठा। कपड़े झाड़े। चप्पलें पहनीं और धीरे-धीरे लकड़ी के गोले की तरफ बढ़ चला।

इस चाँदनी रात में चारों तरफ खुली और पानी की तरह दूर-दूर तक पसरी पृथ्वी पर यकायक यह एक लकड़ी का गोला। कुछ पास आकर बाघा खड़ा हो गया था और विमुग्ध होकर लकड़ी का यह एक गोला देखने लगा। लकड़ी का गोला उसे इतना प्राकृतिक लग रहा था कि उसका मन हुआ वहीं बैठकर उसे देखता रहे और पेट पकड़कर हँसता रहे।

गोला के बाहर एक पेड़ का साबुत तना गाड़कर तराजू लगाया गया था छोटे-छोटे लट्ठों को तोलने के लिए। ऐसा लगता था कि दुनिया में आम का पेड़ कटहल का पेड़ की तरह यह एक तराजू का पेड़ है। तराजू प्रकृति के नियमों के खिलाफ एक अद्भुत यन्त्र है। दुनिया में कितनी तो चीजें हैं, कितने पेड़-पौधे, कितनी जगहें - कोई हिसाब नहीं। तराजू से माप-तौल किया जाता है। निष्कर्ष निकाला जाता है कि पृथ्वी पर चार किलो शहर हैं, डेढ़ किलो देश। एक क्विंटल मरद मानुख और एक मन औरतें। पाव भर दिन और तीन सौ ग्राम रात। एकाध दर्जन रुलाई और छँटाक भर हँसी। चाहे, दुख के एक लीटर के पैकेट पर सुख की एक छोटी टिकिया फ्री!

बाघा देर तक मुँह खोलकर 'हा' किये खड़ा रहता, अगर उसे चंडी गुरु की सीख याद न आई होती। उस्ताद ने कहा था कि बाघा, चाँदनी रात में कभी भी बिना आड़ खुले में मत रहियो। चाँदनी रात में मानुख देह से लाइट निकलती है। रेडियम लाइट। विज्ञान की बात। बाघा तुरन्त भागकर एक तरफ हो गया।

तराजू के पीछे लकड़ी के बड़े-बड़े गोल-चिकने कई लट्ठे रखे थे - एक पर एक। बगल में गोला का मुख्य प्रवेश द्वार। लोहे के खुले कपाट, जिनका निचला हिस्सा मिट्टी में लकड़ी के बुरादों में बुरी तरह धँसा हुआ। भीतर जीरो पावर की पीली रोशनी में लकड़ी काटने की विशालकाय आरा मशीन। बाघा निहुरे-निहुरे ही प्रवेश द्वार के भीतर ये जा वो जा! फट्-से मशीन के बड़े-बड़े फीतों की बगल में तन कर खड़ा हो गया मानो मशीन का ही पुर्जा हो।

पूरे गोला के फर्श पर लकड़ी के बुरादों की गद्दीदार कालीन बिछी थी। हवा में कैसी तो एक बासी भुरभुरी गन्ध! छिपकर घात लगाने के लिए किसी बेहतर टोह में बाघा ने जरा उचककर चारों तरफ एक उड़ती-उड़ती-सी निगाह डाली। दस कदम के फासले पर लकड़ियों को भिगोने के लिए सीमेंट का एक हौज था। बाघा ने एक बार एहतियात के तौर पर मशीन से लगाकर हौज तक के फर्श पर निगाह दौड़ायी। बुरादे ही बुरादे। टेंसन की कोई बात नहीं। वह किसी बिल्ली की तरह मशीन के पीछे से निकलकर साँय-से हौज की आड़ में। उसकी फुर्ती की नकल उतारते दो-चार चूहे इस बिल से निकलकर फुर्र-से उस बिल में। इसके अलावा देर तक कहीं कोई आहट नहीं। हर जगह शान्ति।

गोला के भीतर की शान्ति बाहर खुली पृथ्वी की शान्ति की तरह नहीं। बाघा ने थोड़ा भावुक होकर सोचा कि सबसे बड़ी शान्ति तो आदमी की मृत्यु ही है। तिस पर अस्सी साल के एक दुनिया देखे-भोगे आदमी की मृत्यु और बाईस-तेईस के एक कच्चे छोकरे की मृत्यु में अन्तर तो होता ही है। दोनों के चेहरों पर चिपकी मरी हुईं रेखाओं में अन्तर होता है। बाहर पृथ्वी की शान्ति उस अस्सी साल के मरे हुए चेहरे की थिरायी हुई शान्ति है जहाँ 'कुछ भी होना बाकी नहीं' का इफरात है, जबकि गोला की शान्ति 'अभी कुछ होने वाला है' की एक प्रतीक्षित शान्ति है। बाघा ने उसी कुछ होने पर खुद को पूरी तरह एकाग्र कर दिया। होगा होगा - जरूर। बस थोड़ी देर में होगा। इतने सालों का एक्स्पीरीयंस जो कहता है - होगा!

और हुआ भी। बाघा ने देखा, गोला की परली तरफ वाली दीवार से सटकर एक काली आकृति धीरे-धीरे रेंग रही है। हाथ में जूट की एक थैली जैसा कुछ। लोहे के छोटे-छोटे जन्तरों को पेचकस से ढीला करती और खोलकर थैली में डालती जाती। छोटे-छोटे नट और वॉल्व।

बाघा ने आकृति के इर्द-गिर्द बनती हवा को सूँघकर पहचान लिया कि फील्ड का कोई नया खिलाड़ी है। जरूरत से ज्यादा सावधान। अनाड़ी एकदम। इसी तरह के डरपोक छोकरे इस लाइन को गन्दा करते हैं। पहले की कोई ट्रेनिंग नहीं, प्रैक्टिस नहीं और उतर गये सीधे लाइन में। बताओ तो भला, इन छिटपुट जन्तरों को बेंचकर कितना पैसा मिलेगा? मार्केट में लोहा वैसे भी चार रुपये किलो है, फिर चोरी का माल तो अद्धा-पौना बिकता है। साला बीस-पच्चीस रुपये के लिए घंटा दो घंटा मेहनत। ऊपर से इतना रिस्क। इससे तो बढ़िया था बांग्लादेशियों (आक् थू!) की तरह रिक्शा खींचते या नलहाटी-सिलीगुड़ी लाइन में चलने वाली बसों में मूड़ी-बादाम बेंचते।

बाघा दन्न से निकला और सीधे उस छोकरे के पास। छोकरा अकबका गया। भागने लगा। देह पर खाली एक लँगोट पहन रखा था। पूरा बदन सरसों तेल से चुपड़ा। साला इस भेष में तो आज से पच्चीस साल पहले के चोर निकला करते थे। बेकुफ एक लम्बर का। इडियट। जासूसी किताबों में चोर के इस भेष को लेकर इतना कुछ लिखा गया है कि कोई देखकर ही पहचान जाएगा, यह एक डॉक्टर है इंजीनियर वकील है की तरह एक चोर है। रुक साला भागता किधर है, बाप आया है तेरा - रोक्क!

बाघा ने लपककर उसकी गरदन दबोच ली और जमीन पर पटक दिया। इससे पहले कि वह छूट निकलता या पलटवार ही करता, बाघा उसकी छाती पर सवार होकर दनादन घूसे बरसाने लगा। कोई दस-बारह सोलिड घूसे खाकर छोकरा रोने पर उतर आया। हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगा। चुप साला। हल्ला काहे मचाता है - चोप्प!