आदिग्राम उपाख्यान / पृष्ठ 2 / कुणाल सिंह

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'नाम का बोला रे? फिर से एक बार बोल तो।' बाघा बीच-बीच में जगदलपुर के बाबू-बबुआनों की भाषा बोलता है, लेकिन कहीं-कहीं मिस खा जाता है। दोनों वहीं बैठकर बतियाने लगे थे। दक्खिना रजक नाम था छोकरे का। दक्खिना ने जब जाना कि वह जिससे मुखातिब है उस शख्स का नाम बाघा है, तो श्रद्धा से नव गया। प्रणाम स्वीकारो दादा। खूब नाम सुना है आपका। आज साच्छात दर्शन हो गये - अहो भाग्य! बाघा उसकी भाषा सुनकर एकदम से चकित हो गया। ये तो साला संस्कृत उवाचता है डायरेक्ट! पढ़ा-लिखा होकर भी चोरी करता है रे?

दक्खिना की उमर ज्यादा नहीं थी। अठारह-उन्नीस के आसपास। कद-काठ अच्छी निकल आयी थी। भूत की तरह काला था। छोटे-छोटे घुँघरीले बाल। आवाज नयी-नयी फटी थी। मूँछों की पतली रेख। बाँहों में मचलतीं तागद की मछलियाँ। उसे देखकर बाघा को अपनी जवानी याद आयी। यही उमर रही होगी जब वह चंडी गुरु से मिला था। इसी के जैसा उत्साही। नवसिखुआ। टेकनीक की कमी। उस्ताद ने उसे दो-ढाई साल में ही ट्रेंड कर एकदम से शालीमार चोर बना दिया। सेंधमारी के सत्रह तरीके आते थे उसे। जाने कितने मन्तर कंठस्थ थे। भौंकते हुए कुत्तों का मुँह बाँधकर शान्त करने, अमावस की अँधियारी रात में भी साफ-साफ दिखने और जागते हुए को गहरी नींद सुलाने के मन्तर। उस्ताद ने मरते हुए चैन की साँस ली थी। कहा था, 'बाघा, जितनी विद्याएँ मैंने अपने गुरु से सीखी थीं, सब तुममें ट्रांसफर कर दिया। अब मैं चैन से मर सकता हूँ।'

ठीक रात के इसी पहर आदिग्राम में एक जीप आकर रुकती है। हेडलाइट बुझ जाती है। तीन लोग। रंगीन टी-शर्ट और जींस पहने। ड्राइविंग सीट पर एक कम शहरी-सा आदमी बैठा है। उसकी बगल में बैठे आदमी ने हैट लगा रखी है। पीछे की सीट पर बैठा तीसरा शख्स आधी नींद आधे नशे में है। आँखें खोलते हुए पूछता है, 'क्या हुआ? गाड़ी क्यों रोक दी?'

'आदिग्राम!' ड्राइवर कहता है।

'हाँ तो क्या बीच सड़क पर रोकोगे?' हैट वाला आदमी बुड़बुड़ाते हुए आदेश देता है, 'साइड में लो।'

जीप भी बुड़बुड़ाती है। टस से मस नहीं होती।

'रेडियेटर गरम हो गया है। यहीं उतरिए, देखता हूँ।' ड्राइवर उतर जाता है।

'पानी नहीं है। बियर चलेगी?' कहकर पीछे की सीट पर बैठा आदमी हँसने लगता है - हो-हो-हो-हो! चारों तरफ के सुनसान में उसकी हँसी अजीब-सी सुनाई पड़ती है। पास के पेड़ की गिलहरी की नींद खुल जाती है। दाँत किटकिटाती है। बया ने अपने घोंसले के दरवाजे पर लिख रखा है - 'रामकिंकर बया निवास : स्थापना 2003'। झाँककर देखती है। कहीं कोई कुत्ता भूँकने लगता है, 'कर्फौन सर्फाला है?' बिल में सोया सँपोला जाग के अपनी माँ से पूछता है, 'माँ, क्या सचमुच गब्बर सिंह आ गया?' साँपिन कहती है, 'सो जा बेटा, सो जा!'

'साला जंगल है एकदम।' हैट वाले आदमी ने भी उतरकर सिगरेट सुलगा ली है। वह काफी देर से जाग रहा था। उसकी आँखें जल रही थीं। उसे ठंड लग रही थी। ड्राइवर ने जीप का बोनट उठा दिया है और उसके पास आ खड़ा हुआ है। नशे में डोलता तीसरा आदमी भी जीप से उतर चुका है और पास ही खड़े होकर पेशाब कर रहा है।

'कब आएगा बैनर्जी खुद?' वह पेशाब करते-करते पूछता है, '...और हमलोग यहाँ ठहरेंगे कहाँ? इस वीराने में?' वह गाने लगता है - कहीं दीप जले कहीं दिल!

'नेटवर्क काम नहीं कर रहा। रात तो बीत ही चुकी है, सुबह होते ही किसी एसटीडी बूथ से फोन करते हैं।' हैटवाले ने जवाब दिया। फिर ड्राइवर से पूछा, 'क्यों बे, यहाँ एसटीडी बूथ तो होगा न?'

'या वो भी नहीं - हा हा! कहीं दीप जले कहीं दिल...' तीसरे आदमी को चढ़ गयी थी।

'थोड़ी ही दूर पर नलहाटी बाजार है। वहाँ से हो जाएगा। वैसे महीने दो महीने की बात है बाबू। अब जब आप लोग आ गये हैं तो यहाँ भी सबकुछ हो जाएगा। एसटीडी बूथ, कूरियर कम्पनी, जेरॉक्स मशीन, एसबीआई, एटीएम।' ड्राइवर ने ऊपर आसमान में तैरते चाँद को देखकर कहा।

वह यहीं पास के जगदलपुर का वाशिन्दा शमसुल है। पहले नलहाटी-सिलीगुड़ी लाइन में ट्रक चलाता था। कुछ महीने पहले यहाँ अपनी बीमार पत्नी और दो बच्चों को छोड़कर कोलकाता चला गया। सोचा था, कुछ पैसों की बचत हो जाएगी तो पत्नी को कलकत्ते ही बुलाकर इलाज कराएगा। कुछ महीने बाद उसे एक कम्पनी में ड्राइवरी मिल गयी। अभी टेम्पररी ही थी नौकरी, लेकिन जल्दी ही पर्मानेन्ट होने की उम्मीद थी। जब उसे पता चला कि उसकी कम्पनी कुछ प्रतिनिधियों को किसी काम के सिलसिले में आदिग्राम भेज रही है, उसने बड़े बाबू से सिफारिश लगवायी कि बतौर ड्राइवर वह इस प्रतिनिधि मंडल में शामिल कर लिया जाए। कम्पनी को भी किसी ऐसे ही लोकल आदमी की जरूरत थी जो एक तरह से प्रतिनिधि मंडल के लिए गाइड के रूप में काम आ सके और इंटरप्रेटर के रूप में भी। शमसुल दोनों ही रूपों में बेहतर च्वाइस कहा जा सकता था। वह इस इलाके के इतिहास और भूगोल दोनों से भली-भाँति परिचित था।

मध्यवर्ती पश्चिम बंगाल के एकदम पूर्वी छोर पर है आदिग्राम। बड़ा गाँव है। क्षेत्रफल के अनुपात में आबादी विरल ही कही जाएगी। ज्यादातर हिन्दू परिवार। बीस-पच्चीस फीसद मुस्लिम। लगभग सारे मुस्लिम घर गाँव के उत्तरी तरफ जगदलपुर से लगे हुए हैं। आजादी से पहले ईसाई मिशनरियों द्वारा कन्वर्ट हुए कुछ ईसाई परिवार भी उस ओर ही रहते हैं। कटे-कटे-से। दक्षिण की तरफ सान्थालों की बस्ती है।

जगदलपुर में एक चर्च भी है, अस्सी फीसद जला हुआ। दरवाजे, खिड़कियों के कोयले अब भी उस घटना को ताजा बनाये हुए हैं जो आज से चार साल पहले घटी थी। जोनाथन नाम का एक पादरी हुआ करता था जिसे कुछ लोगों ने इस चर्च में जि़न्दा जला दिया था। उसकी पत्नी और छह-सात साल का लड़का राँची के आसपास कहीं रहते हैं। जोनाथन भी वहीं कहीं से आया था। रानीरहाट बार्डर पर रहता था और हर रविवार को साइकिल से जगदलपुर के चर्च तक पहुँचता। आसपास के जितने भी ईसाई परिवार थे, चर्च में प्रार्थना करने जाया करते थे। अब कोई नहीं जाता। घटना के बाद चर्च को बन्द कर दिया गया। अब तो उसके प्रांगण में बेतरतीब घास-झाड़ियाँ उग आयी हैं। टूटे हुए काँच और मलबा इकट्ठा हैं।

आदिग्राम के दक्खिनी सीमाने से लगता झाऊ और करोंदे का एक भरा-पूरा जंगल है। गाँव में यह सोचने और कहने का प्रचलन होता है कि उस जंगल में कई खूँखार जंगली जानवर रहते हैं, हालाँकि गाँव में अब तक किसी ने उन्हें साफ-साफ और दो टूक नहीं देखा। ऐसा नहीं है कि झाऊ के जंगल में सिर्फ झाऊ के ही पेड़ होते हैं। वहाँ और भी कई गाछों, पौधों की प्रजातियाँ हैं। इस पर भी उसे झाऊ का जंगल ही कहा जाता है। हो सकता है कि गाँव के किसी आद्य पुरुष ने सभ्यता की जल्दबाजी में उसका यही नामकरण कर दिया हो और तब से यही नाम परम्परा में चलता चला आया हो।

धूप होती तो जंगल का ऊपरी सिरा बहुत मद्धम सुलगता था। दोपहर के सुनसान में उदास लकड़ियों के चिटखने की आवाज सुनाई पड़ती। ऊपर उठते भाप के रेशे हरे रंग के होते। कोई सहज ही चिन्तित हो सकता है कि इस तरह तो जंगल की सारी हरियाली ही बिला जाएगी। लेकिन हर जमाने में लोगों के पास सच्ची चिन्ताओं के साथ झूठी दिलासाएँ होतीं। जंगल में तोते बहुतायत में होते। जंगल की किसी रहस्यमयी आहट से सभी तोते उड़ते और दूर से देखने पर भ्रम होता कि हरा जंगल जल रहा है और हरे-हरे चिनगारे उड़ रहे हैं। लोग हँसते और अपने काम से काम रखते।

झाऊ के जंगल से सटा गाँव का वह हिस्सा है जो जंगल प्रदेश को गुलजार करता है। गाँव से थोड़ा हटकर लगभग जंगल के धुँधलके में किन्नरों के दो-चार घोटुल हैं। इनमें किन्नरों का उन्मुक्त और सामूहिक बासा है। इनसे बायीं ओर सान्थालों की कुछ झोंपड़ियाँ हैं। झोंपड़ियाँ साधारणतया पीली मिट्टी से बनी होतीं और उन पर फूस की छाजन दी जाती। घर-दुआर सब मिट्टी से लिपे हुए चमचम चमकते। किन्नरों के घोटुल उजड़े हुए होते। ...ये सब गाँव के बाशिन्दों से कटे किन्हीं दूसरे लोक में जीते। सान्थालों को आज तक किसी ने गाँव के भीतरी हिस्से में जाते नहीं देखा। जंगली कन्द खाते, पोखर से सितुहे-घोंघे और जंगल से लकड़ी-काठी बीन लाते, थोड़ी-बहुत खेती-बाड़ी करते। अलबत्ता शादी-ब्याह और गोद-भराई जैसी रस्मों पर इक्के-दुक्के किन्नर गाँव में दिख जाते। वे ढोल पर थाप देकर खूब नाचते-गाते और कभी न थकते। बनाव-सिंगार और चुहल-मजाक पर विशेष ध्यान देते। गाँव के लोगों के बीच बिला शर्म अश्लील इशारे करते और लतीफे बनाते। बड़े-बूढ़े हँसते और घर की स्त्रियाँ जल भुनतीं। यदा-कदा गाँव में आने वाले इस किन्नर दल में फिरोजा, बनफूल, अमीना, झरना आदि हमेशा ही होतीं।

घोटुल में कुल कितने किन्नर हैं - इसका कोई अनुमान नहीं। यह अजीब बात थी कि दिन-प्रतिदिन सान्थाल कम होते जा रहे हैं और किन्नरों की संख्या बढ़ती जा रही है। अघोर मोशाई का कहना मानें तो किन्नरों के साथ कुछ ऐसे भी हो गये हैं जो सचमुच के किन्नर नहीं हैं। झूठ-मूठ के किन्नर कैसे होते हैं, इसका किसी को अन्दाजा नहीं। कोई सभ्य घर का आदमी भला किन्नर होने क्यों जाएगा?

दूर से देखने पर किन्नरों का समाज बड़ा उत्सवधर्मी लगता। दिन भर तरह-तरह के मुखौटे बनाना, उस पर रंग-रोंगन और पालिश करना, ढोलक से नयी ताल निकालना और उत्फुल्ल होकर गीत गाने का अभ्यास करना बड़ा रंगधर्मी प्रतीत होता है। हाइवे पर पान का ठेला लगाने वाला तपन कहता है कि उनमें से कुछ किन्नर जादू जानते हैं। जंगल से रात-बिरात रोशनी उठती तो लगता, वे अपने जादू को सिद्ध करते होंगे। तभी तो उनके चेहरे कैसे दिपदिपाते हैं, जबकि सान्थालों की देह में कालिख पुती होती।

चर्च को जलाये जाने के पहले की घटना है। हाडू घोष का साला भूपत आया हुआ था। एक सुबह वह दिशामैदान के लिए निकला तो जंगल की तरफ चला गया। वहीं कुछ सान्थाली लड़कियाँ निबटान के लिए आई हुई थीं, जिनमें एक केंदा माँझी की लड़की काजल भी थी। अब पूरी बात तो पता नहीं कि क्या हुआ, मगर कुछ ही घंटों में जब लोगों ने केंदा माँझी के लड़के दुलू को भूपत के पीछे फरसा लेकर दौड़ते हुए देखा तो पूरे गाँव में हल्ला मच गया। भूपत की हालत बड़ी खराब थी - शरीर में जगह-जगह से खून रिस रहा था। मुखिया पंचानन हाल्दार के बीच-बचाव से सबकुछ शान्त हुआ। भूपत को उसी दम उसके घर मानिकतल्ला भेज दिया गया। बाद में जब चर्च जलाया गया, पुलिस आयी और दुलू को पकड़ के ले गयी। दुलू को किस आधार पर पकड़ा गया, इसके विस्तार में जाने की जरूरत नहीं। लेकिन इस घटना के बाद से गाँव का कोई भूलकर भी सान्थालों की बस्ती की तरफ पाँव नहीं बढ़ाता। जंगल में खूँखार जंगली जानवर रहते हैं - यह प्रवाद भी इन्हीं दिनों फैला।

दक्खिना बनगाँ साइड का था। यहाँ आने से पहले लोको कारशेड में लोकल ट्रेनों से ट्यूब-पंखे की चोरी करता था। कुछ दिनों बनगाँ-सियालदह लाइन में पाकिटमारी भी की। चावल की चोरी करते पकड़ा गया और पुलिस की मार पड़ी। घर से निकाला गया और फिर मालदह में कुछ दिनों अपनी दीदी के यहाँ छिपकर रहा। तीन-चार महीने पहले ही इस इलाके में आया।

यहाँ आने के बाद उसका परिचय इसी लाइन के कुछ दूसरे लोगों से हुआ। इन्हीं लोगों से उसे बाघा के बारे में बहुत कुछ सुनने को मिला। उसकी दिलेरी के कई किस्से। बाघा इन लोगों का रोल मॉडल था। इस लाइन के नये लड़के उसी की तरह बिना कनपटियों के बाल रखते थे। चलते और खाँसते भी उसी की तरह थे। जैसे दोनों हाथों को जोड़कर गाँजा पिया जाता है, वैसे बीड़ी पीने का रिवाज सिर्फ इसलिए चल पड़ा था कि बाघा दा इसी स्टाइल में बीड़ी पीते हैं। इसी तरह इन लड़कों में सिर्फ अजन्ता का मुद्गर छाप हवाई चप्पल पहनने का प्रचलन था - बाघा दा का फेवरिट ब्रांड। उसी बाघा से जब दक्खिना की यों मुठभेड़ हुई तो उसके हर्ष का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। तिस पर इससे बड़ी बात और क्या होगी कि बाघा दा ने उसे अपने ठिए पर चलने के लिए कहा।

वे जल्द ही एक खंडहर तक पहँच गये। कोई प्राचीन इमारत। छत का अधिकांश नदारद। मोटे-मोटे चौकोर खम्भे ठूँठ की तरह खड़े थे। चाँद का फुटबॉल कभी इस खम्भे तो कभी उस खम्भे पर उछल रहा था। खंडहर के बाहर चारों तरफ विस्तीर्ण साँवली दूरियाँ थीं - चाँदनी में नाक सिनकती-सी। पीछे एक पोखर - आधा से अधिक जलकुम्भियों से ढँका। खंडहर के बाहर थोड़ा बायें हटकर ऊपर जाने के लिए पत्थर की सीढ़ियाँ थीं। ऊपरी मंजि़ल तो कब की गिर पड़ जमीन चाट रही थी और सीढ़ियाँ थीं कि आज भी कहीं ऊपर ले जाने के झूठे दर्प में एक पर एक चढ़कर खड़ीं - एकदम आतुर। खंडहर से लगे चारों तरफ मलबे ही मलबे। फर्श को फोड़कर इधर-उधर उग आईं घास-झाड़ियाँ।

दक्खिना चुपचाप बाघा के पीछे-पीछे घिसटता रहा। भीतर, फिर भीतर, फिर और भी भीतर एक-दो कमरे कुल-मिलाकर सही-सलामत थे। बाघा की रहनवारी। कोठरी के भीतर घुप्प अँधेरा। बाघा ने ढिबरी जलायी। पीली मद्धिम रोशनी में कोठरी में जमाये गये असबाब उजागर हुए। एक ढीली बान की चारपाई पर बाघा बैठ गया। दक्खिना को भी बैठने का इशारा किया। दक्खिना वहीं फर्श पर चुक्के-मुक्के बैठ कर बाघा को टुकुर-टुकुर ताकने लगा। बाघा ने टो कर अन्दाजा किया, पेट फिर से फूलकर बैलून हो गया है। टाल गया! बची हुई एक बीड़ी जलायी और अपने उसी निराले अन्दाज में पीने लगा। उसे बीड़ी पीते देखना दक्खिना के लिए एक अप्रतिम सुख था। उसने जब से बाघा के बारे में जाना है, उसकी हर गतिविधि पर पैनी निगाह रखे है। अच्छी तरह जज्ब कर रहा है। उसे पूरा यकीन है, उसके साथियों को एकबारगी विश्वास ही नहीं होगा जब वह उन्हें बाघा दा से अपनी इस औचक मुलाकात के बारे में बताएगा। वह उन्हें यकीन दिलाने की गरज से सबकुछ भलीभाँति कंठस्थ करता जा रहा है।

बाघा देर तक बैठा चुपचाप बीड़ी पीता रहा। इधर दक्खिना उसका मुँह जोह रहा था। बाघा की समझ में नहीं आ रहा था कि बातचीत की शुरुआत कैसे हो। वह शुरू से ही कम बोलने वाला जीव रहा है। उतना ही बोलता है जितना जानता है। जानता भी उतना ही है जितना जान पाना सहज हो। उदाहरण के लिए आसमान का रंग नीला है, प्राचीन काल से ही सुख-दुख की अपरम्पार लीला चलती आयी है, धामन साँप का विष बहुत जल्दी चढ़ जाता है आदि। बहुत सोचने-विचारने के बाद भी उसका माथा ठीक से काम नहीं कर पा रहा था कि वह दक्खिना से ऐसा क्या कहे जो एकदम पते की बात हो। दक्खिना उसकी कितनी इज्जत करता है, यह वह जान चुका है। वह कोई उथली बात कह के उसका मन नहीं तोड़ना चाहता। अन्त में बीड़ी खत्म करके उसने लापरवाही से कोठरी के बाहर उछाल दिया। बीड़ी की टोंटी दरवाजे से टकराकर भीतर ही आ गिरी। बाघा को दुख हुआ कि दक्खिना के सामने उसका निशाना फेल हो गया। वह इस बात पर लजा गया। यह अति हो रहा है। कुछ न कुछ तो कहना ही होगा, सोचकर उसने कहना शुरू किया, 'दिन-काल ऐसा आ गया है कि क्या कहने!' इतना कहने के बाद उसे लगा कि अब और नहीं रोका जा सकेगा। पेशाब की नली पूरी तरह बँध चुकी है। वह 'एक मिन्ट में आया' कहकर कोठरी से बाहर आ गया।

बाहर एक खम्भे की आड़ लेकर बैठ गया बाघा। वही रह-रहकर छुल-छुल टप-टप! जीना दुश्वार कर दिया है इस रोग ने। क्या ही बढ़िया शुरुआत हो चुकी थी बातचीत की! सब गुड़-गोबर। बाघा बैठा-बैठा सोचता रहा कि कोठरी में वापस जाकर बात का सिरा फिर से कैसे पकड़ेगा। उसके दिमाग में रह-रहकर एक चिनगारी-सी कौंधती थी। लगता, कोई बड़ी बात आते-आते रह गयी। कोई ऐसी बात जिसका सम्बन्ध न सिर्फ बाघा और दक्खिना से, बल्कि पूरी दुनिया से है। ऊँची बात। सदा-सर्वदा सँजोकर रखी जा सकने वाली कोई सीख। गुरु मंत्र।

जब वह कोठरी में वापस आया तो दक्खिना को चारपाई पर झुका पाया। चारपाई पर एक तरफ उपेक्षित पड़ा एक तकिया था। तकिये की खोली पर मयना ने कढ़ाई कर रखी थी। चारों तरफ फूल-पत्ती से सजाकर बीच में गोल-गोल सुन्दर अक्षरों में लिखा था - 'आराम हराम है!' बहुत पुरानी बात। सदा-सर्वदा सँजोकर रखी गयी सीख। अब तो फूल-पत्ती के रंग-बिरंगे धागे उधड़ने लगे हैं। दक्खिना झुके-झुके वही कला-कौशल निरिख रहा था। बाघा को देखते ही झट्-से अटेंशन की मुद्रा में आ गया।

बाघा मुस्कराते हुए चारपाई पर आ बैठा। बिना सोचे-समझे ही बोला, 'क्यों न तुम यहीं मेरे साथ रह जाते हो? ...देखो, मामला यह है कि अब मेरी उमर भई। तुम मेरे बेटे की भाँत हो। तुम रहोगे तो बाकी की जिनगी बोलते-बतियाते कट जाएगी। मुझसे अब पार नहीं लगता। अपने लिए भात बनाना तो दो मुट्ठी चावल मेरे लिए भी डाल देना। इधर मैं कुछ ही दिनों में तुम्हें अपनी सारी विद्याएँ दे दूँगा। अच्छी तरह ट्रेंड कर दूँगा। शास्त्रों में कहा ही गया है, बिना सद्गुरु के ज्ञान प्राप्ति के मार्ग में बहुत विघ्न-बाधाएँ आती हैं। मुझे मेरे गुरु ने बनाया और मैं तुम्हें इलाके का सबसे डेंजर चोर बना दूँगा। ये मेरा वादा रहा।'

दक्खिना चुप, भकर-भकर बाघा का मुँह देखता रह गया। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या कहे। अपनी किस्मत पर यकीन नहीं हो रहा था। बाघा दा खुद कह रहे हैं कि उसे अपना शिष्य बनाएँगे। यह कौन-से जन्म का पुण्य उदित हुआ है! यह वह क्या सुन रहा है! देर तक चुप बने रहने के बाद उसके मुँह से बस यही बोल फूटे - जरूर। अहो भाग्य!

गाँव के दरवाजे पर लिखा था - ' बच्चों से सावधान ' ।

चोरों को संस्कृत बोलना उचित नहीं।

सुबह की पहली किरण जब जीप पर पड़ी तो आदिग्राम के पेड़-पौधों, जन्तु-जानवरों ने उसे देखा। आश्चर्यचकित हुए। गिलहरी गौरेया को बता रही थी कि उसने ही सबसे पहले जीप को देखा था जब वह रात के आखिरी पहर यहाँ आकर रुकी थी। सामने के शीशे और बोनट पर शीत की बूँदें चस्पाँ हो गयी थीं। नीचे बिसलेरी की एक खाली बोतल पड़ी थी। उस पर भी शीत की बूँदें और कुछ तिनके चिपके हुए थे। नम्बर प्लेट से एक बूँद टपकने-टपकने को थी। वहीं एक चितकबरा कुत्ता खड़ा था जिसने अभी थोड़ी देर पहले अपनी टाँगें उठाकर टायर को गीला किया था। उसे इसमें बहुत मजा आया था। जाने से पहले वह एक बार और ऐसा करना चाहता था।

जीप जहाँ खड़ी थी, वह आदिग्राम का सीमान्त इलाका था। कच्ची सड़क थोड़ी ऊँचाई पर थी और दोनों तरफ ढलान पर खेत-बेहार। चारों तरफ के खुले में जीप बहुत भयानक लग रही थी। दहशत होती थी कि ये क्या अजूबा है!

जब तक तीनों जीप सवार जीप के पास पहुँचे, तब तक आदिग्राम में खबर पहुँच चुकी थी। लोग आकर जीप को देख रहे थे। पहले भी उन्होंने कई दफे जीप-एम्बेस्डर देखी है जब कोई नेता या अफसर दौरे पर आता है, लेकिन वे अपने पीछे गुबार उड़ाती सन्न-से गुजर जाती हैं। हाइवे पर भी गाड़ियाँ ये जा वो जा! यह पहली बार था जब वे एक लावारिस गाड़ी को देख रहे थे, छू रहे थे, कयास लगा रहे थे। उन्हें अन्दाजा नहीं था आने वाले तीन-चार महीनों में ही आदिग्राम में इस तरह की गाड़ियों की आवाजाही कितनी बढ़ जाने वाली है।

कुछ बच्चे बाकायदा जीप में चढ़ चुके थे और उसकी गद्दीदार सीट पर धमाचौकड़ी मचा रहे थे। तीनों जीप सवारों ने जब यह नजारा देखा, तो जहाँ थे वहीं ठिठक गये। बच्चे उन्हें किसी टिड्डी दल की तरह प्रतीत हुए जिन्होंने एकाएक हमला बोल दिया हो। थोड़ी देर बाद आदेश पाकर शमसुल दौड़ा-दौड़ा जीप तक आया और बच्चों को खींच-खींचकर उतारने में जुट गया। बच्चे खिलखिला रहे थे, पूरा वातावरण उनकी हँसी-किलकारियों से गूँज रहा था। उन्होंने सीट की पुश्त पर लगे रॉड को जकड़ लिया था और भरपूर कोशिश कर रहे थे कि उतरने न पाएँ। शमसुल बच्चों को खींचते हुए गालियाँ भी दे रहा था, लेकिन उन पर गालियों का कोई असर नहीं हो रहा था। वे जि़द पर अड़े थे। उनकी खिलखिलाहट बढ़ती ही जा रही थी। जिन्हें वह उतारने में सफल हो जाता, दूसरी तरफ से फिर कूदकर चढ़ जाते। गाली के जवाब में जोर से खिलखिलाते, चिकोटी काटते, दाँत गड़ा देते, बीच-बीच में गुदगुदी भी कर देते। नीचे जमा लोगबाग हँस रहे थे, तालियाँ बजा रहे थे, शाबाशी दे रहे थे, 'लिहो-लिहो' कर बच्चों का मनोबल ऊँचा कर रहे थे। चितकबरा कुत्ता भी भौंक रहा था।