आदिग्राम उपाख्यान / पृष्ठ 3 / कुणाल सिंह

Gadya Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

अब तक बाकी के दो लोग भी जीप के पास आ गये। हैट वाले आदमी ने एक हाथ में हैट और दूसरे में सिगरेट दबा रखी थी। दूसरा, जो उससे थोड़ा कम उम्र का और उसका सहायक - सा लग रहा था, अचानक आगे आया और भीड़ में खड़े एक अपेक्षाकृत मरियल-से आदमी को एक जोरदार चाँटा रसीद कर दिया। एकाएक शोरगुल थम गया। सब के सब सकते में आ गये। मरियल आदमी रुआँसा हो गया। अपने गाल को सहलाने लगा। वह भागी मंडल था। उसका इस दुनिया में कोई नहीं था। सब मर-खप गये थे। इस कारण वह उदास रहा करता था। चिन्ता करने के कारण उसके सिर के सारे बाल झड़ गये थे। हाड़-चाम सूख गया था। उदास होकर वह हर शाम जगदीश साहू की भट्ठी पर जा बैठता, भरपेट ताड़ी पीता और डोलता हुआ घर लौटता। अपनी हाँड़ी खुद चढ़ाता और सोच में डूब जाता कि काश कोई होता!

सहायक को जैसे अचानक होश आया कि उसने यह क्या गजब कर दिया, तो वह डर गया कि कहीं भीड़ उग्र न हो जाए। लेने के देने पड़ सकते हैं! उसने सबसे नजरें बचाकर हैट वाले आदमी की तरफ बेबस नजरों से देखा। हैट वाला आदमी उसका डर भाँप गया। डर तो वह भी गया था, लेकिन तत्काल यह जरूरी है कि वह आगे बढ़कर मोर्चा सँभाल ले।

वह आगे बढ़ा, भागी मंडल के पास आया, उसके कन्धे को सहलाते हुए पूछा, 'जानते भी हो कि हम लोग कौन हैं?' फिर वह थोड़ी देर तक चुप बना रहा। इस बीच एक राजदार मुस्कराहट उसके होठों पर खेलती रही। इस छोटे-से रहस्यमयी पॉज के बाद भीड़ को सम्बोधित करते हुए वह तनिक ऊँची आवाज में बोला, 'इन बच्चों को जीप से उतारने का काम दो मिनिट... बस दो मिनिट में हो जाए। नहीं तो? नहीं तो यहाँ पर जो भी लोग हैं, सब पर पचास-पचास रुपये का जुर्माना। अदायगी नहीं होने पर? ...सीधा जेल!'

सुनकर भीड़ पर जैसे बिजली गिर पड़ी। जुर्माना, जेल - मतलब, मतलब पुलिस। बाप रे बाप! पीछे के कुछेक तो खिसकने की भी तैयारी करने लगे। बाकी बचे हुओं ने तुरन्त मोर्चा सँभाल लिया। सुना तो बच्चों ने भी था, कुछ समझ गये थे कुछ भीड़ में मची खलबली ने समझा दिया। एक-एक करके सब उतर गये। दो-चार लोगों ने तो हैट वाले आदमी के पाँव भी पकड़ लिये।

'जाने दो सरकार, बच्चे हैं, नादान। गलती हो गयी। माफी दे दो।'

'ठीक है ठीक है!' हैट वाले आदमी ने कहा। भीड़ तितर-बितर हो गयी, लेकिन भागी मंडल वहीं खड़ा रहा। बोला, 'मेरा इस दुनिया में कोई नहीं, इसलिए जिस किसी का मन मुझ पर अपनी ताकत की आजमाइश कर जाता है।'

इतना कहने के बाद अपना गाल सहलाते हुए वह जाने लगा। जाते-जाते उसने सहायक को कैसे तो दुश्मनाना भाव से देखा, मानो कह रहा हो - याद रखूँगा बाबू!

पंचानन हाल्दार इस गाँव के मातब्बर (मुखिया) हैं। बहुत पहले से इस गाँव में उनकी मातब्बरी चलती आ रही है। उन्होंने अपने दरवाजे के पास एक शिकायती बोर्ड लगा रखा है। गाँव में जिसे भी किसी चीज की तकलीफ होती है, आकर शिकायती बोर्ड पर लिख जाता है। जिस दिन कोई नयी शिकायत नहीं होती, पंचानन बाबू गाँव का समाचार लिख देते हैं - 'वासुदेव की गैया बियाई है। दस्तखत पंचानन हाल्दार, मातब्बर।' अथवा कोई चेतावनी - 'चितकबरा कुत्ता पागल हो गया है। तीन ताड़ वाले रास्ते के पास पड़ा रहता है और आने-जाने वालों को अपना निशाना बनाता है। सो उस तरफ जाने वाले राहगीर कुत्ते से सावधान रहें। दस्तखत पंचानन हाल्दार, मातब्बर।' या फिर कोई आदेश ही - 'पहाड़ी मंडल के मँझले लड़के को लकवा मार गया है। गाँव के सभी लोग जाएँ और सहानुभूति जताएँ। दस्तखत पंचानन हाल्दार, मातब्बर।'

जीप अभी पंचानन बाबू के द्वार पर रुकी हुई है। तीनों जीप सवार चारपाई पर बैठे पंचानन बाबू से बातें कर रहे थे, चाय पी रहे थे। लगभग दो घंटे पहले वे यहाँ आये थे। खाना-पीना आज मातब्बर के यहाँ ही हुआ। हैट वाले आदमी ने अपना परिचय रंजन मजूमदार के रूप में दिया है। सहायक का नाम जतिन विश्वास है। शमसुल को तो पंचानन बाबू पहचानते ही हैं। रंजन मजूमदार ने सुबह की पूरी घटना का विस्तार से वर्णन किया है पंचानन बाबू के सामने। पंचानन बाबू ने गाँव वालों की तरफ से माफी माँगी है और उनके ठहरने की व्यवस्था पंचायत घर में की है। रंजन मजूमदार बताता है कि वे एक खास काम से आदिग्राम आये हुए हैं। सरकार ने भेजा है। सरकार मतलब समझते हैं न?


पंचानन बाबू कुछ खास पढ़े-लिखे नहीं हैं, लेकिन दुनियावी अनुभव की उन्हें कमी नहीं। ये कल का छोकरा उनसे पूछ रहा है कि सरकार मतलब वे समझते हैं या नहीं? हे-हे! पंचानन बाबू सब समझते हैं। ऐसा नहीं कि किसी को पकड़ लाया जाए और कहा जाए कि यह व्यक्ति सरकार है सो आज से सभी नागरिकों को इसकी इज्जत करनी चाहिए। सरकार किसी हाड़-मांस के व्यक्ति की तरह कभी इतनी प्रकट नहीं होती कि उसकी दो टूक पहचान सम्भव हो। वह एक गायब चीज है, ईश्वर की तरह। या क्या पता सरकार जैसी कोई चीज ही नहीं दुनिया में और देश अपनी दिशा-गति का निर्धारण खुद ही करता हो! समझना होगा कि कोई लचर व्यक्ति जो कल तक सबकी जी हजूरी करता हो, अचानक किसी दिन अकड़ जाए, सब पर शासन चलाने लगे, आदेश देने लगे तो इस व्यक्ति को सरकार की शै लग गयी है। जैसे किसी-किसी पर माताजी आ जाती हैं कभी-कभार। लेकिन धुर देहात में ऐसे किसी व्यक्ति को आये दिन साक्षात देखना सम्भव नहीं, इसलिए यहाँ सरकार मतलब कोलकाता।

'कोलकाता से आये हैं न?' पंचानन बाबू ने हँसते हुए पूछा। 'खैर, शमसुल जानता है पंचायत घर का रास्ता। आप लोग जाइए, जाकर थोड़ा आराम कर लीजिए।' वे अपनी चारपाई से उठ गये। बाहर जीप के पास फिर से भीड़ आ जुटी थी। पंचानन बाबू को सहसा याद आया। बोले, 'और हाँ, इस गाँव के बच्चों को हल्के में मत लीजिएगा। जरा सावधान रहिएगा।' फिर कवित्त में बोले, 'सावधानी हटी, दुर्घटना घटी।'

गाँव के जो बच्चे सुबह जीप की सवारी कर रहे थे, उनमें निमाई, खोकन, शंकर, राखाल, फटिक, बेला, सद्दाम, बाब्लू, राना, माना व हरिगोपाल प्रमुख थे। उम्र के हिसाब से इनमें सबसे बड़ा फटिकचन्द्र था, तेरह-चौदह साल का। राना-माना सगे भाई थे। माना की उम्र चार साल की थी और वह इस दल का सबसे छोटा सदस्य था। सद्दाम को छुटपन से ही शराब की लत थी। वह हमेशा नशे में डोलता रहता था। इन बच्चों के बीच आजकल रानी रासमणि की कथा बहुत प्रचलित थी। रानी रासमणि की कथा परिमलेन्दु दा ने सुनाई थी। परिमलेन्दु दा को बहुत-सी कथाएँ मुखस्त थीं। वे पंचानन बाबू के बेटे थे। दिन ढलते न ढलते सारे बच्चे उन्हें घेर लेते और वे कोई नयी कहानी शुरू कर देते।

कहानी में एक और कहानी। कथा के पीछे एक दूसरी ही कथा। पहली की पूरक नहीं, एक बिल्कुल ही अलग। इस तरह कथाओं का अनुवर्तन करतीं एक पर एक कई कथाएँ, कि कोई ओर-अन्त ही न सूझता। और कथाएँ भी कैसी? सुनने वाले को एकबारगी विश्वास ही न हो, ऐसी एकदम से अनोखी। कई बार तो लगता, परिमलेन्दु दा अपनी इन कथाओं की अविश्वसनीयता को खुद ही भाँप जाते हैं और जान-बूझकर एक दूसरी कथा के उड़ते रेशे पकड़ने लगते हैं। कहानी कहते हुए ही उनके मुँह में संशय का एक छिछोरा स्वाद घुलने लगता होगा। उन्हें महसूस होता होगा कि सामने वाला उनकी कथा की नंगई अचानक साफ-साफ देखने लगा है। यह एक ऐसी घड़ी होती जब परिमलेन्दु दा बुरी तरह सिहर जाते। सकपकाते हुए वे अपनी कथा की उघड़ी थिगलियों को ढँकते-दबाते अचानक कोई दूर की कौड़ी निकाल लाते। बच्चों को जब तक पता चल पाता कि वे कोई दूसरी कथा कहने लग गये हैं, तब तक बहुत देर हो चुकी होती। बच्चे देखते कि परिमलेन्दु दा के चेहरे पर एक स्निग्ध तरलता तिरने लग गयी है और भावों का आवर्तन बहुत स्वाभाविक ढंग से होने लगा है। कुछ देर बाद बच्चे भूल ही जाते कि उन्होंने उन लोगों के साथ धोखाधड़ी की है और तत्काल उनकी उस नयी कथा को सुनने लग जाते। ऐसा कई बार होता।

बच्चों को कभी-कभी घोर आश्चर्य होता कि आखिर उनके पास इतनी कहानियाँ आती कहाँ से होंगी। उन्हें जरा भी मोहलत मिलती और वे उन्हें घेरकर बैठ जाते। परिमलेन्दु दा को कभी किसी ने चिढ़ते नहीं देखा। उल्टे कई बार लगता, वे फुर्सत से उनकी राह ताका करते हैं। कभी-कभी कहते कि आज तुम लोगों ने बड़ी अबेर कर दी - आओ, तुम्हें एक नयी कहानी सुनाता हूँ। उनकी हर कहानी नयी होती। राखाल की स्मृति बड़ी तेज है। उसने कभी भी यह शिकायत नहीं की, कि दादा यह कहानी तो दो साल पहले वैशाख की उस दोपहर सुना चुके हो, जिस दिन जदू घोष की बहन पारुल की शादी हुई थी। एक दिन बहुत साहस कर बाब्लू ने पूछा था - परिमलेन्दु दा, आखिर तुम इतनी कथाएँ गढ़ कैसे लेते हो? उन्होंने तब एक ही आश्चर्य जवाब दिया था कि जब हिल्सा माछ और गरम भात का थाला उनके आगे होता है तभी बुद्धि जवाब दे जाती है। जितनी देर में सुस्वादु खाना सधता है उतनी ही देर तक उनके मस्तिष्क को विराम मिलता है। बाकी बचे सारे समय कथाएँ उनके दिमाग में आती ही रहती हैं। कहानियाँ हवा में होती हैं, अराजकता में इधर से उधर रेले मारतीं। जरूरत बस उन्हें पकड़कर शब्द पहनाने की है। जैसे रेडियो हवा में उड़ते ध्वनि तरंगों को पकड़ लेता है, ठीक वैसे ही।

उनकी बातों पर बच्चों को शक होता, लेकिन वे कुछ कहते नहीं। कहानियाँ कहीं हवा में उड़ती हैं भला! 'हमें तो कभी नहीं दिखीं। परिमलेन्दु दा जरूर कुछ छिपा रहे हैं।' निमाई कहता है।

'लेकिन जो रेडियो वाली बात उन्होंने कही, उसमें तो सचमुच दम लगता है।' बाब्लू ने कहा।

हवा में उड़ना एक कहानी थी, रेडियो वाली बात दूसरी कहानी।' यह सद्दाम था। नशे में डोलता हुआ।

'परिमलेन्दु दा ने फिर से हमें धोखा दिया है। एक कहानी की कमजोरी को छिपाने के लिए उसमें दूसरी कहानी जोड़ दी।' फटिकचन्द्र ने अपना मन्तव्य दिया।

'अच्छा, अगर वाकई कहानियाँ हवा में उड़तीं तो कितना मजा आता! हम खेतों की तरफ दौड़ते और खुले में कोई कहानी हमारी देह से आ लगती।'

'बहुत जमाने पहले की बात है। रानी रासमणि एक कहानी में दुखी होकर विलाप कर रही थी और देखो कि वही कहानी आकर देह से सट गयी।'

'रानी रासमणि के आँसू मेरी कमीज भिगो गये। इसी दशा में घर जाऊँ तो निश्चित है माँ पीटेगी।'

'सोचेगी कि कपड़ा पहने ही घोष लोगों के पद्द पुकुर में छलाँग मारी है। कहीं डूब जाता तो?'

'रानी रासमणि के दुख में डूबकर मैं भी दुखी हो जाता। रासमणि का पालतू तोता पूछता है कि तुम कौन हो और रासमणि के दुख में दुखी क्यों हो?'

'मैं कहता कि बहुत जमाने बाद की बात है।' निमाई कहता।

परिमलेन्दु दा से कथा सुनने कभी-कभी निमाई का छोटा भाई ढोढ़ाई भी आ जाता, लेकिन उसकी एक गुप्त बात है। अभी से ही वह बीड़ी पीने लगा था। बहुत जमाने बाद उसके होंठ काले पड़ने वाले थे। इसलिए वह अपने बड़े भाई से डरता था और दल के बाकी बच्चों से शरमाता था। वह एक कथा सुनने के बाद तीन-चार दिन तक गाँव में दिखाई नहीं पड़ता था। घरवालों को इसकी आदत थी। वे निश्चिन्त रहते थे, कि जब उसे फिर कथा सुनने की तलब होती, वह प्रकट हो जाता। उस वक्त बच्चों के दल में अगर निमाई हुआ तो थोड़ी दूर पर किसी पेड़ की आड़ से कथा सुनता। निमाई यह जान गया था, इसलिए तीन-चार दिन के अन्तराल में वह जानबूझकर कथा सुनने नहीं जाता। जाता भी तो परिमलेन्दु दा से जोर आवाज में कथा सुनाने का आग्रह करता, ताकि पेड़ की आड़ में बैठा ढोढ़ाई भी स्पष्ट सुन सके। ढोढ़ाई की सोचकर निमाई दुखी रहता था।

वैसे बच्चे इतने पाजी हैं कि उन्हें शक है, परिमलेन्दु दा जब कोलकाता गये थे, तब वहाँ खूब सारा पैसा खरचकर असंख्य गल्पों की कोई मोटी किताब खरीद लाये होंगे। रात में जब गाँव के सभी लोग सो जाते हैं, तब एकान्त में कोई कथा मुखस्थ कर लेते होंगे और बाद में बच्चों को सुना देते होंगे। हरिगोपाल ने देखा है, रात-बिरात परिमलेन्दु दा के कमरे से प्रकाश आता है। उनके शक की कुछ पुख्ता वजहें भी हैं। जब कभी वे परिमलेन्दु दा के घर उनकी अनुपस्थिति में कथा सुनने पहुँच जाते, उनका वह दासू नाम का पिद्दी नौकर उन्हें उनके कमरे के इर्द-गिर्द भी फटकने नहीं देता। बच्चों को तत्क्षण उस पर बहुत गुस्सा आता। वह बहुत बूढ़ा है। बाद में दासू के साथ बच्चों की सहानुभूति होती। उसके चेहरे की झुर्रियाँ नमकीन होतीं। वह बरामदे में बिठाकर उन्हें चाय पिलाता। चाय मीठी होती।

वह आश्चर्य किताब एक और जगह हो सकती है। फटिक बता रहा था कि दोपहर बारह बजे के आसपास जब गाँव के लगभग सारे मर्द खेतों पर होते हैं, वह परिमलेन्दु दा को अक्सर घोष लोगों के बगान की तरफ जाते देखता है। घोष लोगों के बगान में घने-आम लीची के पेड़ों से दिन के वक्त भी ठंडा अँधेरा छन रहा होता है। चौबीसों घंटे झींगुर की चिर्र-चिर्र! चारों ओर मच्छरों की भिनभिनाहट का साम्राज्य। फिर ऊँची-घनी घास-झाड़ियाँ, वन-लताएँ और उनके बीच कित्-कित् खेलते साँप-छछूँदर। बिना काम कोई उस तरफ जाने की हिम्मत नहीं करता।

बगान के पूरब कोने में थोड़ी साफ-सफाई है और दायीं तरफ उसी से लगता घोष लोगों का विशाल पद्द पुकुर। बगान और पद्द पुकुर के बीच जो थोड़ी-सी जगह निकलती है, वहाँ है घोष लोगों की पुरानी कोठी, जिसके आगे का अहाता जर्जर और टूटा-फूटा है। दल में कुछ बच्चों का विचार था कि हो न हो सबसे आँख बचाकर परिमलेन्दु दा ने उस किताब को इन्हीं मलबों में कहीं दबा रखा है और दोपहर में जब कोई उन्हें देखने वाला नहीं होता, चुपचाप आकर कहानी पढ़ जाते हैं। यह भी हो सकता है कि परिमलेन्दु दा ने किताब मलबों में न रखकर बगान में कहीं छिपा दी हो। यह सोचकर फटिकचन्द्र ने यह प्रस्ताव रखा कभी सब लड़के दल बाँधकर बगान से होते हुए उन मलबों की तरफ जाएँगे। एक साथ जाने से डर भी नहीं लगेगा और काम भी शीघ्रता से निबट जाएगा।

फटिकचन्द्र के इस प्रस्ताव पर सभी खुश हुए सिवाए निमाई के। दरअसल निमाई सोचता है कि अपने गायब दिनों में ढोढ़ाई घोष लोगों के बगान में ही छिपकर रहता है। वहाँ उसे कोई देख नहीं सकता कि वह बहुत जमाने पहले से बीड़ी पीता आ रहा है। उसने किसी घने पेड़ को अपना ठिकाना बना लिया होगा, या किसी ऐसे खन्दक को जो घास-झाड़ियों के घने में दूर से समतल दिखता हो। अपने निविड़ एकान्त में वह बेतरतीब हो सकता है। खँगालकर अपनी धोती फैला दी हो और नंगे ही जमीन पर पड़ा बीड़ी पीता हो। ऐसे में यदि बच्चों का दल बगान में चला गया तो वह उदास होकर ठिकाना बदलने के लिए बाध्य होगा। छिपने का ठिकाना बदलना सिर्फ पेड़ या खन्दक बदलना नहीं होगा। हो सकता है तब वह पृथ्वी का कोई ऐसा कोना चुन ले जो निमाई और उसके घरवालों की सोच से बाहर का हो। ऐसे में ढोढ़ाई का हमेशा के लिए गायब हो जाने का खतरा है।

जब वह गायब होता है, पृथ्वी पर किसी खास जगह एकदम खुले में होता होगा। वहाँ का कोई स्थानीय व्यक्ति यदि उसे पहचान ले तो उसे पुन: जगह बदलनी पड़ सकती है। इस तरह बार-बार जगह बदलकर इस भरी-पूरी दुनिया में अपनी शिनाख्त करवाता वह चाहे तो अत्यन्त लोकप्रिय हो सकता है। ...लेकिन उसके गायब होने का कोई पंचांग नहीं था। जब उसका प्रकट और गायब होना सूर्योदय और सूर्यास्त की तरह विश्वसनीय हो जाएगा, तब कुछ व्यापारी उसका उद्योग करेंगे। फिलहाल सिर्फ सट्टा किया जा सकता है कि ढोढ़ाई कब प्रकट होगा।

बच्चों के दल में एक लड़की बेला भी थी। दोढ़ाई की तरह उसकी भी एक गुप्त बात है कि वह अपने माता-पिता और भाई की निगाह में पूरी तरह अदृश्य हो चुकी है। बात यह है कि जब वह पैदा होने वाली थी, न सिर्फ उसके पिता वामन सरकार, बल्कि माँ भी यही चाहती थी कि उसे बेटा हो। जब दायी उसकी जचगी करवा रही थी, वामन सरकार कमरे के बाहर बेचैनी से चहलकदमी कर रहा था। बीच-बीच में कमरे की खिड़की से झाँककर पूछता, 'हुआ?'

दायी बोलती, 'अभी नहीं।'

'और कितनी देर लगेगी?'

'देख ही रहे हो खाली नहीं बैठी। नाल अटक गया है। ओह, तुम जाते क्यों नहीं?'

वह फिर से बाहर टहलने लग पड़ता। कमरे से पत्नी की चीख-पुकार, हाय-तौबा की आवाजें आती रहीं, लेकिन उसके तो कान लगे थे बच्चे की रुलाई पर। रुलाई की आवाज जैसे ही कानों में पड़ी, उससे रहा न गया। वह दौड़ा-दौड़ा कमरे में गया और मारे खुशी के लगभग चीख पड़ते हुए पूछा, 'हुआ?'

दायी ने कहा, 'हाँ हुआ। बधाई हो!'

'नहीं हुआ।' बिस्तरे पर निढाल पड़ी पत्नी ने कहा तो वामन सरकार ने दायी की गोद में पड़े बच्चे की टाँगों के बीच देखा। देखकर उदास हो गया।

इस तरह बेला अपनी पैदाइश के समय से ही अपने माँ-बाप की उपेक्षा की शिकार रही। यहाँ तक कि उन्होंने उसका कोई नाम भी न रखा। जब भी उसे पुकारना होता, कहते, 'ऐ लड़की!' बाप उसे बात-बात पर पीट देता और माँ भी कच्ची उमर से ही उससे घर के सारे काम करवाने लगी।

कुछ सालों बाद जब उसकी माँ फिर से गर्भवती हुई तो वामन सरकार ने घर में गौरांग महाप्रभु की पूजा रखवाई कि न सही तब, इस बार उसे बेटा हो। बेटा ही हुआ। दोनों की खुशी का ठिकाना न रहा। वामन सरकार ने हाडू घोष से कर्ज लेकर पूरे गाँव को खिलाया, बाम्हनों को दान दिया।

जैसे-जैसे बेला का भाई बड़ा होता गया, उसे ही लेकर पति-पत्नी की मशरूफियत बढ़ती गयी। बेला घर के काम-काज निबटाकर अब अपना ज्यादातर समय घर के बाहर-बाहर रहकर बिताने लगी। यही वह समय था जब उसकी दोस्ती गाँव के दूसरे उसके हमउम्र लड़कों फटिकचन्द्र इत्यादि से हुई। पहले पहल तो फटिकचन्द्र एंड कम्पनी ने लड़की होने के कारण उसे अपने से दूर-दूर रखा, लेकिन जब एक दिन बेला ने उन्हें अपनी कथा सुनाई तो फटिकचन्द्र पिघल गया। कहा कि तुम जब चाहो आकर हमारे साथ खेल सकती हो। निमाई ने कहा कि हम तुम्हें वे सारे खेल सिखा देंगे जो लड़के खेलते हैं। सबने कहा कि हर दल में एक लड़की का होना जरूरी होता है। सबने कहा कि बिनु घरनी घर भूत का डेरा।

लड़कों ने जब उससे उसका नाम पूछा तो वह बोली, 'मेरा कोई नाम नहीं।'