आदिग्राम उपाख्यान / पृष्ठ 4 / कुणाल सिंह

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'ऐसा कैसे हो सकता है? सबका कुछ न कुछ नाम होता है।' शंकर ने आश्चर्य से कहा। माना तो यह सोचकर ही हँसने लगा कि दुनिया में एक ऐसी लड़की है जिसका कोई नाम नहीं। जब राना ने उसे डाँटा तो वह चुपा गया।

बेला ने स्पष्ट किया कि उसके माँ-बाप ने कभी उसके लिए इतना समय भी नहीं निकाला कि सोच-समझकर उसे कोई नाम दें। कहा कि नाम देना बहुत प्यार का काम है। जिसे हम प्यार करते हैं उसे कोई नया नाम देते हैं, जैसे जान जानू जानेमन!

फटिकचन्द्र ने उसे दिलासा देते हुए कहा, 'मन थोड़ा न करो, हम अभी तुम्हारे लिए एक सुन्दर-सा नाम खोजते हैं।'

सब अपने दिमाग पर जोर डालकर उसके लिए किसी नाम की तलाश में लग गये। सबके लिए जि़न्दगी में यह पहला अवसर था जब उन पर कोई ऐसी जि़म्मेदारी का काम आन पड़ा था। वे अगल-बगल निगाह डालते तो कुछ-न-कुछ दिख जाता - सूरज, इमली का पेड़, धरती, सूरज, आसमान, राखाल की लाल कमीज, टुटही छड़ी, फिर सूरज, सफेद-नीली हवाई चप्पल; लेकिन उनमें ऐसा कुछ भी नहीं था जो उनके काम आता। अतीत की कोई ऐसी याद भी न थी जो इस मामले में उनकी मदद करती। उन्हें जो कुछ करना था, अभी करना था, अकेले अपने दम पर। एक ऐसा अजूबा नाम खोजना था जो किसी सचमुच की लड़की के लिए हो।

'मोती नाम कैसा रहेगा?' बाब्लू ने पूछा।

'नहीं, यह कुत्तों का नाम है।' हरिगोपाल ने यह नाम खारिज कर दिया।

'कजरी?'

'यह गाय का नाम है।'

यह सब सुनकर बेला और उदास हो गयी। बोली, 'हाय हाय, इस जहान में गाय-भैंस, कुत्ते-बिल्लियों के भी नाम होते हैं। लेकिन मुझ अभागी का कोई नाम नहीं।'

'आज से तेरा नाम है शबनम। प्यार से हमलोग तुझे शब्बो कहेंगे।' नशे में डोलता सद्दाम ने जैसे फैसला सुनाया।

'अबे यह हिन्दू है, शबनम एक मुसलमानी नाम है। शबनम, फातेमा, रोक्शाना इत्यादि।'

'तो ठीक है, तुमलोग इसके लिए नाम सोचो, यह काम मैं नहीं करता, क्योंकि मैं मुसलमान हूँ।' कहते हुए सद्दाम चुप हो गया।

लड़की ने फिर कहा, 'हाय-हाय, मुझ अभागन...!'

'तुम थोड़ी देर के लिए अगर रोना-धोना बन्द करो तो हमें कोई नाम सूझे। लड़का होती तो यह उतनी मेहनत का काम नहीं होता, दुनिया में लड़कों के कितने सारे नाम हैं! यहाँ तक कि जनाना लोगों को भी लड़कों के नाम से जाना जाता है, जैसे गोपाल की माँ, पुण्य की बुआ या सुप्रकाश की बहन!' फटिकचन्द्र ने कहा।

'चन्दू की चाची।' सद्दाम बड़बड़ाया।

'तुम फटिक दा से ब्याह कर लो तो हम तुम्हें फटिक बहू कहेंगे।' अबोध माना बीच में टपका तो फटिकचन्द्र शरमा गया।

'बेला नाम कैसा रहेगा?' निमाई ने सुझाया तो फटिक ने जल्दी से हामी भर दी, ताकि 'फटिक बहू' वाली बात पुरानी पड़ जाए।

इस तरह बेला का नाम बेला पड़ गया। आदर से सब उसे बेला देवी कहते।

बेला का बाप वामन सरकार नलहाटी बाजार में टिकुली-सेंदुर का ठेला लगाता था। आलता, 'टिप-टाप' कुमकुम, महावर-मेहँदी, हेयरबैंड, क्लिप इत्यादि। गरदन बैठाकर मोटी आवाज में 'ऐं, आल्ता-सेन्दुर' की हाँक लगाता अलस्सुबह जो निकल पड़ता तो सूरज डूबने के बाद लौटता। अब जब कभी वह आता और बेला घर पर हो, तो भी उसे बेटे की ही फिक्र होती। वह बेटे को देखते ही उसे गोदी में उठा लेता, पुचकारता-प्यार करता, कहता चन्दा है तू मेरा सूरज है तू! कभी उसके लिए खिलौने लाता तो कभी कपड़े-मोजे। बाजार से मुगलई पराँठा या कीमा-रूमाली रोटी बँधवा रहा होता तो बेला को अक्सर भूल जाता। खाने पर सब साथ-साथ बैठे होते, वह अपनी पत्नी को छेड़ बैठता, भूल जाता कि न सही उसका बेटा, बेला अब बड़ी हो चुकी है।

इस प्रकार बहुत धीरे-धीरे बेला अपने घरवालों के लिए अदृश्य होने लगी। पहली बार इसका पता उसे तब चला जब एक दोपहर वह खाट पर लेटी थी कि पोखर से नहाकर उसकी माँ कोठरी में आयी और दरवाजा भिड़ाकर अपने कपड़े बदलने लगी। इतवार होने के कारण वामन सरकार उस दिन घर पर ही था। गीले कपड़ों में लिपटी पत्नी को देखा तो उससे छेड़छाड़ करने, गुदगुदाने लगा। उसकी माँ खिलखिलाकर हँसती दोहरी होने लगी और इधर वामन सरकार उसकी देह से एक-एक कर सारे गीले कपड़े उतारकर फेंकने लगा। यह सब देखकर बेला अचकचाकर खटिये पर से उठ बैठी। खटिये की बान पर रखा लोटा उसके पैर से टकराया और जमीन पर गिरकर बजा तो दोनों ने चिहुँककर देखा। माँ ने फुसफुसाकर कहा, 'शायद बिल्ली होगी। तुम रुको मत।'

वाकई उन्होंने वहीं दो बित्ते की दूरी पर बैठी बेला को नहीं देखा। उस रात जब सब खाने पर बैठे तो बेला ने अपनी उपस्थिति जताने की गरज से बेवजह खाँसना शुरू कर दिया। वह खाँसते-खाँसते बेहाल हो गयी लेकिन किसी ने उस पर ध्यान नहीं दिया। वामन सरकार और उसकी पत्नी किसी बातचीत में मशगूल चपड़-चपड़ खाते रहे। बेला उठी और वहीं पास में सोये पड़े अपने भाई के गाल पर कस के एक तमाचा जड़ दिया। भाई उठकर रोने लगा। माँ ने उसके मुँह में अपना स्तन ठूँसते हुए वामन सरकार से कहा, 'जरूर कोई बुरा सपना देख रहा होगा।'

बेला को जब पूरा यकीन हो गया कि अपने माँ-बाप-भाई के लिए वह अब अदृश्य हो चुकी है, तो उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। अगले कुछ दिन वामन सरकार और उसकी पत्नी के लिए कठिन बीते। रात के निभृत अकेलेपन में वे एक दूसरे में समा ही रहे होते कि एकाएक बरतनों से सजी आलमारी जमीन चाटने लग पड़ती। वामन सरकार की कमीजें पोखर किनारे मिट्टी-कादो में सनी मिलती तो उसकी पत्नी अपने बालों में हिमताज तेल लगाने के बाद पाती कि शीशी में तेल की जगह आलता थी। नन्हें बच्चे के पोंतड़े अक्सर चूल्हे में या छानी पर रखे मिलते तो रविवार की दोपहर भात-नींद लेता वामन सरकार की नाक में गोबर की दुर्गन्ध बस जाती।

लेकिन यह सब शुरुआती दिनों का ही रोमांच था जिसके चुक जाने में ज्यादा वक्त नहीं लगा। कुछ ही दिनों में बेला को घर के लोगों द्वारा उसे न देखा जाना अभिशाप जैसा लगने लगा है। उसे अफसोस होता है कि काश एकदम पहले ही दिन, जब उसकी माँ पोखर पर से नहाकर आयी थी, वह शोर करने लगती। उसके माँ-बाप भले ही न देख पाते, लेकिन शोर सुनकर इकट्ठा हुए पड़ोसी उसे जरूर देख लेते। तब उसके माँ-बाप पर भी जाहिर हो जाता कि वह इनके लिए अदृश्य हो चली है। ऐसे में उसे लेकर वे किसी ठोस नतीजे तक तो पहुँच ही सकते थे।

अब जब कभी गाँव में किसी औरत पर माताजी आतीं, वह अपने बाल बिखराकर, आँखें लाल कर अंट-शंट बकने लगती, तो भले ही गाँव की दूसरी औरतें उससे डरतीं, मरद-मानुष ओझा-गुनी को बुलाकर झाड़-फूँक करवाने की सलाह देते, लेकिन परदे के पीछे उस औरत का क्या दर्द है इसे बेला अच्छी तरह समझने लगी। दाँत पीसती, गरदन को झटके देती वह औरत कल तक गाँव की सबसे नेक बहू, सबसे नेक पत्नी, सबसे नेक माँ या बेटी होती जो दिन-रात काम करती, सुख में दुख में सदा-सर्वदा हँसती रहती। अचानक उस पर माताजी की सवारी हो जाती है तो वह चीखने लगती है, झोंटे को मुट्ठी में भर-भरकर नोंचने लगती है, फाँय-फाँय साँस छोड़ती है और उसे अपने कपड़े-लत्ते का भी होश नहीं रहता। जिन्होंने कभी उसकी परछाईं तक न देखी, आज गाँव भर के लोग उसके दर्शन को आते हैं, उससे डरते हैं, डरते-डरते कोई अच्छत-रोली, जवाकुसुम का फूल चढ़ाता है, गंगाजल छींटता है तो कोई तीसी का तेल और दस पइसी-बीस पइसी जिसकी जितनी औकात। कोई कोई अठन्नी-रुपया भी चढ़ाता है और लेटकर प्रणाम करता है। यह सब देखकर उस औरत में एक बहक समा जाती है। वह मन ही मन सोचती है कि आज सबको मजा चखाएगी, कहाँ गयी वह लाल्टू की माँ जो हमेशा 'बाँझ है बाँझ है' कहकर उसका मजाक उड़ाती थी! उसे लगता है कि अब तक उसके भीतर जो बन्द-बन्द सा पड़ा था, आज मुक्त होकर गरगर बहने लगा है। वह हल्की हो गयी है, पंख जितनी हल्की। बेला समझने लगी है कि मरदों को नहीं, औरतों को ही क्यों बीच-बीच में यह शय लग जाती है।

बेला धीरे-धीरे बड़ी होने लगी है। जब वह ब्याह करने जितनी बड़ी हो जाएगी, कोई शुभचिन्तक पड़ोसी वामन सरकार को टोकेगा कि लड़की ताड़ की तरह लम्बी हो गयी है, उसके ब्याह की फिक्र करो। तब बेला का अपने माँ-बाप की नजरों में पुनर्वास होगा। तब अचानक उसके माँ-बाप बूढ़े तथा भाई गबरू जवान हो जाएगा।

शाम के झुटपुटे में खंडहर के सामने एक रिक्शा आकर रुका। बाघा उस वक्त खँडहर की बाहरी दीवारों पर लगी काई खुरच रहा था। रिक्शा की झड़ाँग-झड़ाँग जैसी आवाज से बाघा ने चौंककर देखा। दक्खिना आ गया था उसके साथ रहने। बाघा खुरपी फेंककर रिक्शे के पास आ गया। दक्खिना की गोद में रखी अटैची और पोर्टेबल टीवी उतारने में मदद की। रिक्शे के फुटबोर्ड पर टीवी के लिए एक एसिड बैटरी और लाल-पीले तार क्लिप वगैरह तमाम जन्तर जमाकर रखे गये थे। इन सबको रिक्शे वाले की मदद से बाघा ने उतारा। अन्त में खुद उतरे दक्खिना मोशाई। सिर पर लाल टोपी और आँखों पर काला चश्मा। पीले रंग की जैकिट। जूते, बेल्ट। गले में बिलाची से गूँथी गेंदे की माला। पूछने पर पता चला कि यहाँ आते समय साथियों ने फेयरवेल दिया है।

बाघा को यह तामझाम कुछ पसन्द न आया। ये सारी चीजें बाघा और दक्खिना जैसे लोगों के लिए हरगिज नहीं बनाई गयीं। वे हुए समाज में छिपकर रहने वाले लोग, जबकि ये सारी चीजें लोगों को उजागर करती हैं। आँखों पर चढ़ाती हैं। जिस समाज में ज्यादातर लोग पैदल चलने वाले हों, उसमें रिक्शा पर चलना, जहाँ लोग मनोरंजन के लिए साल-साल भर जात्रा-नौटंकी की प्रतीक्षा करते हों वहाँ टीवी-रेडियो रखना और नंग-धड़ंगों के बीच भर बाँह की कमीज-जूते गाँठना सहज ही आँख में चुभने वाली बातें हुईं। तिस पर पीले जैसे चटख रंग की जैकिट। बाघा और दक्खिना जैसे लोगों को तो कम से कम मुरादें पालनी चाहिए। कम से कम कपड़े, कम से कम साज-सिंगार। उन्हें किसी भी तरह प्रकट नहीं होना चाहिए। दिन में नहीं, रात में निकलना चाहिए जब कोई देखने वाला न हो। वे लोगों की निगाह में जितना गायब रहेंगे, उतना ही ठीक। यहाँ तक कि बोलने-बतियाने में भी उन्हें कम से कम और जहाँ तक हो सके जाने-पहचाने शब्दों का इस्तेमाल करना चाहिए। दक्खिना बात-बात पर जो संस्कृत उवाचने लग जाता है, वह उनकी तरह के लोगों के लिए एकदम सूटेबल नहीं।

बहरहाल बाघा और दक्खिना साथ-साथ रहने लगे। दक्खिना की ट्रेनिंग पहले दिन से ही शुरू हो गई। दोनों दिन भर छिटपुट काम करते, खाते-पीते और सोते रहते। रात होते ही निकल पड़ते फील्ड में। बाघा उसे अपने साथ ही रखता। धन्धे की छोटी-छोटी बारीकियाँ समझाता और विषम परिस्थितियों से बेदाग बच निकलने के टैक्टिस बताता। उसने दक्खिना को कुछ मन्तर भी मुखस्थ करवा दिये थे। खुले में कभी-कभी वह उन मन्तरों का परीक्षण कर उसे दिखलाता। निष्कर्ष निकालता। कुछ विद्याएँ ऐसी थीं जिन्हें जिस रूप में उसने चंडी गुरु से सीखी थीं, उसी रूप में दक्खिना को सिखा दीं। लेकिन कुछ विद्याएँ थोड़े सुधार की गुंजाइश रखती थीं। उन्हें अपने अर्जित ज्ञान व अनुभवों के बूते थोड़ी हेर-फेर के साथ दक्खिना को सिखाना पड़ा। दरअसल विद्याएँ तो देशकाल सापेक्ष होती हैं। चंडी गुरु के टाइम में जमाना कुछ और था। आज दुनिया में विज्ञान की इतनी तरक्की के बाद जाहिर है कुछ विद्याएँ अपने मूल स्वरूप में उतनी कारगर नहीं रहीं। फिर कई विद्याएँ ऐसी दुर्लभ थीं कि उनका प्रयोग आये दिन सम्भव नहीं हो पाता। ऐसी विद्याएँ भूल न जाए इस डर से बाघा ने एक पोथी में मयना के हाथों दर्ज करवा रखी थीं। दक्खिना प्राण-पण से उसके अध्ययन में जुट गया।

गाँव में सिर्फ सत्ताईस लोग गरीब हो सकते हैं।

यह पगडंडी सीधे अमेरिका ले जाएगी न ?

आज बुधवार है। पंचानन हाल्दार के दुआर पर लोगों की भीड़ लगी है। प्रत्येक बुधवार को पंचानन बाबू के यहाँ राशन की दुकान लगती है। राशन कार्ड धारकों को सरकारी दर पर गेहूँ, दाल, चीनी आदि मिलता है। कभी-कभी कॉपी, साबुन और बिस्किट भी। केरोसिन तेल के लिए अलग कार्ड बनता है। पंचानन बाबू कार्ड देखकर पर्ची बनाते हैं और फिर लोगों को अपना गैलन लेकर पास ही नीम के पेड़ के नीचे बैठे बूढ़े दासू के पास जाना होता है। वह पर्ची पर पंचानन बाबू का घसीटू अक्षर देखकर सामने वाले को कभी डेढ़ लीटर, कभी दो लीटर केरोसिन माप देता है। इसी तरह गेहूँ, दाल, चीनी के लिए नीम के पेड़ के पास ही बनी कोठरी तक जाना होता है और पल्टू को पंचानन बाबू वाली पर्ची देनी पड़ती है।

पंचानन बाबू एक ऊँची चौकी पर बैठते हैं जिस पर एक महँगी दरी बिछी होती है। चौकी के ऊपर सामने की तरफ, जहाँ लोगों को लाइन में खड़ा होना होता है, उन्होंने एक और दराजों वाली छोटी चौकी रखी होती है, जिस पर कलम, दावात, बही-खाता इत्यादि होता है। दराज को गल्ले की तरह इस्तेमाल किया जाता है।

गाँव में सत्ताईस लोग ऐसे हैं जिन्हें बी.पी.एल. कार्ड मिला हुआ है। ये लोग गरीबी रेखा से नीचे के लोग हैं। इन लोगों को दूसरों की अपेक्षा सस्ते दर पर राशन मिलता है। जिनके पास बी.पी.एल. कार्ड होता है, वे सरकारी गरीब हैं और जिनके पास यह कार्ड नहीं है, सरकार उन्हें अमीर मानती है। इसे लेकर पिछले साल चैत में काफी हो-हल्ला हुआ था। दयाशंकर माइती के बेटे रघुनाथ ने कुछ लोगों को बटोरकर नलहाटी में एस.डी.ओ. के कार्यालय का घेराव कर दिया था। उससे पहले वे पंचानन बाबू के दुआर पर भी आये थे और शिकायती बोर्ड पर लिखकर यह माँग की थी कि पंचानन बाबू उन सबके लिए भी बी.पी.एल. कार्ड जारी करें। उनका कहना था कि चूँकि वे भी गरीब हैं, इसलिए सरकार को उन्हें गरीब मानने में कोई दिक्कत पेश नहीं होनी चाहिए। पंचानन बाबू मातब्बर हैं, इसलिए उनका फर्ज बनता है कि वे जाकर सरकार को बताएँ, उनके गाँव में सिर्फ सत्ताईस लोग ही गरीब नहीं हैं।

पंचानन बाबू की समझ में नहीं आया, इस झमेले का निबटारा कैसे किया जाए? सरकार से वे भी उतना ही अपरिचित थे, जितना कि रघुनाथ या भीड़ में शामिल दूसरे लोग। सरकार का घर कहाँ है, कोलकाता में? नयी दिल्ली में? या कि कहीं और?

ऐसे में पढ़े-लिखे परिमलेन्दु दा ने बड़ी मुश्किल से उन लोगों को समझाया कि बी.पी.एल. कार्ड जारी करने का अख्तियार पंचायत को नहीं, न बी.डी.ओ. को है। सचाई तो यह थी कि इसमें एस.डी.ओ. भी कुछ नहीं कर सकता था। लेकिन लोगों की पहुँच ज्यादा से ज्यादा एस.डी.ओ. तक ही थी। इसलिए तय हुआ कि नलहाटी बाजार चलकर एस.डी.ओ. के कार्यालय का घेराव किया जाए। रघुनाथ ने यह माँग रखी कि चूँकि पंचानन बाबू मातब्बर हैं, सो घेराव करने उन लोगों के साथ वे भी चलेंगे। पंचानन बाबू की शमूलियत से उन लोगों की बातों में वजन आ जाएगा। अन्तत: पंचानन बाबू को ही नहीं, परिमलेन्दु दा को भी घेराव में शामिल होना पड़ा।

एस.डी.ओ. दुनिया देखे हुए था, अनुभव की उसे कमी न थी। आँखों पर मोटे काँच का चश्मा पहनता था, छोटा सिर, सीधी माँग निकालता था। सफारी सूट पहने हुए था, जो जरा भी छोटा-बड़ा नहीं था, एकदम चुस्त। उसके चेहरे के इर्द-गिर्द बनने वाली हवा यही कहती थी - 'यह मैं हूँ!' भीड़ को कैसे काबू में लिया जाए, यह उसे भली-भाँति पता था। उसने अपने कार्यालय से बाहर निकलकर बहुत ही विनम्रतापूर्वक लोगों को समझाया कि वे लोग फिक्र न करें, वह जल्द ही जिला मजिस्ट्रेट तक उनकी बात ले जाएगा। लोगों को यकीन हो गया कि वह जनता का हितैषी है और उसके रहते चिन्ता की कोई बात नहीं।

एस.डी.ओ. बचपन में नेता बनने का सपना देखा करता था, लेकिन आर्थिक तंगी की वजह से उसे नौकरी करनी पड़ी। अब भी जब कभी उसे मौका मिलता है, सामने चाहे बिलाई का बच्चा ही क्यों न हो, वह उसे भाषण देकर विस्तार से समझाने की कोशिश करता है। लोगों को अपने कंट्रोल में आता देख एस.डी.ओ. को अपने वाक्-चातुर्य पर गर्व हुआ। उसने मन ही मन सोचा, यह भाषणबाजी का अच्छा मौका मिला। खँखारकर उसने कहना शुरू किया, 'दोस्तो, यह बहुत ही गम्भीर मसला है और सरकार को इसे गम्भीरतापूर्वक लेना चाहिए। मेरा कहना है कि लोगों को उनका हक किसी भी कीमत पर मिलना चाहिए। लेकिन दोस्तो, सचाई यह है कि जिला मजिस्ट्रेट के हाथ में भी यह मामला नहीं। उन्हें भी, सोचिए एक जिला मजिस्ट्रेट को भी, इसके लिए कलकत्ता से मुहर लगवाना होगा। इसे कहते हैं कठपुतली सरकार! सचाई यह भी है दोस्तो कि राज्य सरकार के हाथ में भी यह मामला नहीं। अब आप पूछेंगे कि एस.डी.ओ. साहब, तब किसके हाथ में है! भइया, सीधा केन्द्र से आर्डर आता है कि एक गाँव में कुल कितने गरीब होने चाहिए। आई बात समझ में? ...तो कलकत्ता से कागज पहले दिल्ली जाएगी। दिल्ली कितनी दूर है, आप सब जानते हैं! ट्रेन से दो दिन का रास्ता है। पहले तो इतनी जल्दी टिकट ही नहीं मिलती। फिर क्या पता दिल्ली से भी कागज कहीं और भेज दिया जाए मुहर लगवाने के लिए! इसे कहते हैं कठपुतली...। तो फिर इन सबमें थोड़ा टाइम लगेगा। लेकिन भाइयो और बहनो, दिल्ली दरबार में देर है पर अँधेर नहीं। ...खैर, अब जब आप लोग मेरे पास आ ही गये हैं तो मेरा फर्ज बनता है कि मैं आप सबको निश्चिन्त करूँ! धन्यवाद।'

लेकिन जाते-जाते एस.डी.ओ. ने एक और चाल चल दी। उसने पंचानन बाबू से सबके सामने पूछा कि बी.पी.एल. कार्ड क्या सचमुच के गरीबों को मिला है?

'सचमुच के गरीब? ...मतलब झूठमूठ के गरीब भी होते हैं क्या?' प्रतिप्रश्न किया परिमलेन्दु हाल्दार ने।

'नहीं, मेरा मतलब कहीं वे कागजी गरीब तो नहीं हैं?'

'नहीं, सब हाड़-मांस के हैं।'

एस.डी.ओ. ने परिमलेन्दु दा को एक बार तेज नजरों से घूरा, फिर रघुनाथ से पूछा कि जिन लोगों को बी.पी.एल. कार्ड मिला है, क्या गाँव में ऐसे लोग नहीं हैं जो उन सत्ताईस लोगों से भी ज्यादा गरीब हैं? सबने देखा कि एस.डी.ओ. साहब ने रघुनाथ के कन्धे पर हाथ रखा।

'तो सबसे पहले तुम्हें इस बात की फिक्र होनी चाहिए कि गाँव में सबसे गरीब सत्ताईस लोग कौन हैं?'

'हजूर, गाँव में सात सौ से ज्यादा लोग गरीब हैं।'

'सात सौ नहीं, सत्ताईस। अगर सत्ताईस बी.पी.एल. कार्ड हैं तो ये गाँव के सबसे गरीब लोगों को मिलने चाहिए। पता करो, फिर बताओ। सबसे गरीब लोगों की लिस्ट बनाओ, मुझसे मिलो। अकेले भी आ सकते हो, साथ में ये बारात लाने की जरूरत नहीं।'