आदिग्राम उपाख्यान / पृष्ठ 5 / कुणाल सिंह

Gadya Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

बड़े झमेले की बात है। गरीब आदमी आखिर कहते किसे हैं? फिर गरीब में भी ज्यादा गरीब कौन? जिसके पास रुपये-पैसे न हो, ताड़ के पेड़ न हों, गाय-भैंस-बकरी और हंस-बत्तख-मुर्गी न हों। पहनने के लिए कपड़ा, रहने के लिए घर, खाने के लिए रोटी न हो। ऐसे लोगों की गाँव में कमी नहीं। दो-दो दिन तक भूखे रहने वाले एक टाइम किसी भी तरह से रोटी का जुगाड़ कर लेने वालों से ज्यादा गरीब हुए। फिर जिसके घर में पत्नी हो, बच्चे हों, और वे सब भूखों मर रहे हों तो वे और भी ज्यादा गरीब कहलाएँगे। मजदूरी के लिए निकले तो मजदूरी कभी मिले, कभी न मिले। सिर पर दुनिया भर का कर्ज हो, सूद बढ़ता ही जा रहा हो, महाजन की निगाह घर की बहू-बेटियों पर हो। रोज अपमान का कड़वा घूँट पीना पड़े। इससे भी ज्यादा गरीब वह जिसकी पत्नी या बच्चों में से कोई बीमार हो, खून की कमी खून की उल्टियाँ एनीमिया निमोनिया। दवा-दारू का साधन नहीं, सरकारी अस्पताल में जाएँ तो डॉक्टर उन्हें भगा दे - जाओ भागो यहाँ से, अंटी में कौड़ी नहीं मुँह उठाये चले आते हैं, गेटाउट! या कहे कि ऑपरेशन की जरूरत है शहर के अस्पताल में ले जाओ, फौरन। कहीं ढूँढने, रोने-गिड़गिड़ाने से भी कर्ज न मिले, गिरवी-बन्धक रखने को घर में टूटे बरतन तक न बचे हों। ऑपरेशन के लिए दस हजार रुपये शाम तक नहीं जुटा सके तो पत्नी मर जाए, बच्चे अनाथ हो जाएँ। बिना माँ के बच्चे गाँव-देहात में यों ही छुट्टा घूमें, गलत संगत में पड़ जाएँ, चोरी करें डाका डालें, पुलिस की मार पड़े, जेल हो जाए, सजा-ए-मौत। गाँव में जिन्हें कहीं किसी के घर या खेत पर काम न मिले, जैसे हरिजन हों या ईसाई, तो वे और भी ज्यादा गरीब। फिर उनकी दो-दो जवान बेटियाँ हों, गोरी हों, देखने में सुन्दर हों और जिनकी शादी-ब्याह की तो छोडि़ए, पहनने-ढँकने को एक चींथड़ा खरीदने का भी पैसा न हो तो वे भी गरीब।

लोग लौट आये थे और फिलहाल पंचानन बाबू के दुआर पर बैठे थे। परिमलेन्दु दा से रघुनाथ ने जब पूछा कि आखिर सत्ताईस ही क्यों? तो परिमलेन्दु दा ने समझाया कि एक गाँव में कुल कितने गरीब हों, इसका फैसला नयी दिल्ली में बैठे-बैठे हो जाता है। गाँव ही क्या, जि़ले और राज्य में गरीबों की कुल संख्या बता दी जाती है। किसी राज्य में गरीबों की संख्या कम होती है तो किसी में ज्यादा। कर्नाटक नामक एक राज्य है जहाँ सौ में पिचासी लोग गरीब बताये जाते हैं तो तमिलनाडु के सारे लोग गरीब। गाँव के लोग न कर्नाटक को जानते हैं, न तमिलनाडु को। नयी दिल्ली का नाम सबने सुन रखा है। इसी तरह कलकत्ता, बम्बई, मद्रास आदि चार महानगर हैं। बंगलौर, अहमदाबाद के बारे में किसी को कुछ नहीं पता। बम्बई का नाम मुम्बई और मद्रास का चेन्नई हो चुका है। पाकिस्तान के बारे में सब जानते हैं। कश्मीर भारत का ही अभिन्न अंग है। दूध माँगोगे खीर देंगे, कश्मीर माँगोगे चीर देंगे। अभी कुछ समय पहले कारगिल वाला मामला खूब चला था। जदू घोष की बहन पारुल बहुत सुन्दर है कहना हो तो कहते हैं, जदू घोष की बहन पारुल एकदम कारगिल है। नागा चक्रवर्ती का लड़का गुजरात में नौकरी करता था, दंगे में मारा गया।

एस.डी.ओ. ने रघुनाथ को अलग से जो बातें कही थीं, इसमें उसकी एक छिपी हुई मंशा यह थी कि रघुनाथ या गाँव के वे दूसरे लोग, जिनके पास बी.पी.एल. कार्ड नहीं था, वे उन लोगों की जड़ खोदने में लग जाएँ जिनके पास कार्ड था। यह एक मानी हुई बात है कि दुनिया में कोई भी अन्तिम रूप से सर्वाधिक गरीब नहीं कहा जा सकता। सो रघुनाथ से सर्वाधिक गरीब सत्ताईस लोगों की जिस सूची को तैयार करने के लिए कहा गया था, वह कभी भी पूरी नहीं होने वाली थी।

दूसरा काम जो उस दिन एस.डी.ओ. ने किया, वह यह था कि पंचानन बाबू से सबके सामने पूछा गया कि जिन सत्ताईस लोगों के नाम बी.पी.एल. कार्ड जारी किये गये हैं, क्या वे सचमुच के गरीब हैं? पंचानन बाबू बहुत पहले से गाँव के मातब्बर रहे हैं। गँवई लोगों की उन पर अटूट आस्था है। एस.डी.ओ. ने उसी आस्था को सरेआम प्रश्नांकित किया था। उसने रघुनाथ को बढ़ावा दिया था कि सूची तैयार करने के बाद आकर मिलो, अकेले भी आ सकते हो, साथ में यह बारात लाने की कोई जरूरत नहीं। सबने देखा था, रघुनाथ के कन्धे पर एस.डी.ओ. का हाथ था। यह प्रकारान्तर से पंचानन बाबू की मातब्बरी के समानान्तर एक अन्य सत्ता खड़ी करने की कोशिश थी। एक अनधिकृत सत्ता, जिसका जब मर्जी अपने हक में इस्तेमाल किया जा सके और जब मर्जी उसे बातिल-बर्खास्त किया जा सके।

यह सच है कि गाँव में हरिजनों, ईसाइयों और मुसलमानों को मिलाकर सात सौ से ज्यादा ही लोग गरीब थे। इनमें उनकी संख्या अधिक थी जिनके पास खेती नहीं थी और जिनका गुजारा दूसरों के खेतों या जगदलपुर और रानीरहाट के ईंट भट्ठों पर मजदूरी करके चलता था। कुछ नलहाटी बाजार में 'भैन' (ठेला-रिक्शा) भी खींचते थे, दुकानों पर काम करते थे। आदिग्राम में भी हाइवे के पास पन्द्रह-बीस दुकानें थीं, पान-बीड़ी-सिगरेट के ठेले थे, चाय की गुमटियाँ थीं। जिन्होंने जैसे-तैसे ड्राइविंग सीख ली थी, वे सिलीगुड़ी-नलहाटी लाइन में ट्रकें चलाते थे। मुंशीग्राम में आइसक्रीम की एक फैक्ट्री थी जहाँ कुछ लोग मजदूरी करने जाते थे। औरतें भी खेतों पर मजदूरी कर लेतीं। बीड़ी बाँधने, 'सदा सुहागन' बिन्दी के पीछे लेई लगाकर पत्ते तैयार करने जैसे छोटे-मोटे काम औरतें-बच्चे भी कर लेते।

इनमें अधिकांश लोग अनपढ़ हैं। जो लोग पढ़े-लिखे नहीं हैं, वे जैसे हर खेल से बाहर महज दर्शक की तरह हैं। उदाहरण के लिए उनके राशन कार्ड देखकर पंचानन बाबू जो पर्ची बनाते हैं, उस पर क्या कुछ लिखा होता है, यह वे नहीं जान पाते। दासू या पल्टू को पर्ची सौंप देना और जो कुछ भी वे माप-तौल के दें, ले लेना उनकी नियति बन चुकी है। वे इस पर्ची-खेल से सम्पूर्णत: बाहर हैं, अलबत्ता इसके अन्तिम भोक्ता भी वही हैं। वे नहीं जानते किस आधार पर उन्हें इस हफ्ते सिर्फ डेढ़ लीटर ही केरोसिन का मिलना तय हुआ है, जबकि किसी भी हफ्ते, मान लीजिए, तीन लीटर से ज्यादा की जरूरत पड़ती है। पूछने पर बताया जाता है, सरकार ने इस हफ्ते तेल की आपूर्ति कम की है और डेढ़ लीटर में ही गुजारा करना पड़ेगा। यह तो कुछ ऐसे हुआ जैसे दूर बैठी सरकार अपनी मर्जी से उन सबके लिए कपड़े सिलवा भेजे और अब वे उस कपड़े की साइज के हिसाब से अपने शरीर की कतर-ब्योंत कर लें।

हालाँकि पंचानन बाबू ने पर्ची सिस्टम काम को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए ही अख्तियार किया है, लेकिन पर्ची पर या फिर शिकायती बोर्ड पर लिखे हुए शब्द जैसे अनपढ़ों को एकबारगी बेदखल कर देते हैं। समझदारी की उनमें कमी नहीं, वे बहस-मुबाहिसों में पड़ सकते हैं, सलाह-मशविरा दे सकते हैं, बावजूद इसके चूँकि उन्हें पढ़ना नहीं आता, वे 'अनपढ़' हैं। भाषा उनके पास भी वही है जो किसी पढ़े-लिखे के पास है, लेकिन उस भाषा को दर्ज करना उन्हें नहीं आता, इस कारण वे खारिज हैं। और ऐसा शुरू से चला आया है, लिपि के आविष्कार के बाद से ही। समाज के एक वर्ग ने अपनी विशिष्टता कायम रखने की मंशा से लिपि का आविष्कार कर लिया। जहाँ लिपि सिखाई जाती थी, वहाँ उसी विशिष्ट वर्ग के बच्चों को प्रवेश मिलने लगा। इस तरह साजिश के तरह एक बड़े जनसमूह को अनपढ़ बनाकर मुख्यधारा से निष्काषित कर दिया गया।

ऐसे लोगों के लिए हालाँकि रघुनाथ भी पढ़ा-लिखा, इसलिए दूर का था, लेकिन कम-से-कम वह पंचानन बाबू की तरह अमीर नहीं था। सी.पी.टी. कम्पनी में उसके बाप की चार बीघा जमीन चली गयी थी, तब से वह मजदूरी कर के अपना पेट पालता था। उन्हीं लोगों की तरह मिट्टी के घर में रहता था, बारिश होती तो उसका घर भी टपकता था। पंचानन बाबू चित्रगुप्त की तरह ऊँचे आसन पर बैठकर फैसले सुनाते थे कि इस हफ्ते ढाई किलो ही चावल मिलेगा, जबकि रघुनाथ हाथ में झोला व राशन कार्ड लिये उन्हीं की तरह कतार में खड़ा रहता था। यही कारण है कि एस.डी.ओ. ने जब रघुनाथ को पंचानन बाबू के समकक्ष खड़ा किया, बहुत से लोगों का मौन समर्थन उसकी झोली में आ गिरा। वह इस गाँव का भावी नेता होगा, यह उसी दिन तय हो गया।

यह सब पिछले साल चैत की बात है। रघुनाथ के पिता दयाशंकर माइती की मौत हो चुकी है और अब वह पार्टी का होलटाइमर बन चुका है। हँसिये-हथौड़े वाली पार्टी नहीं, बन्दूक वाली पार्टी। कभी गाँव में दिख जाता, वर्ना तो महीनों उसका कोई पता नहीं चलता। गाँव में रघुनाथ के बारे में कई किंवदन्तियाँ चल निकली हैं। कोई कहता कि उसने झारखंड के जंगलों में जाकर बन्दूक चलाने की ट्रेनिंग ली है। पहले-सा नहीं रहा, एकदम अगिया-बेताल बन गया है, बात-बात पर गोलियाँ बरसाने लगता है। निशाना क्या ही पक्का है उसका! आँखों पर पट्टी बाँधकर सोडे की बोतल हवा में उछाल देता है और गोली सीधे बोतल में जाकर लगती है।

कुछ लोग पार्टी से उसके जुड़ाव पर सन्देह व्यक्त करते, अलबत्ता वे भी बन्दूक और गोलियों और निशाने वाली बात से इंकार नहीं करते। वे कहते कि वह गया तो था ट्रेनिंग के लिए ही, बन्दूक चलानी भी सीख ली, लेकिन फिर उसका मन बदल गया और उसने पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। पार्टी छोड़ने के कारणस्वरूप ये लोग बताते हैं कि जिस जंगल में उसने बन्दूक चलानी सीखी थी, वहाँ एक आदिवासी कबीला रहता था। कबीले के सरदार से रघुनाथ की गहरी छनती थी। सरदार ने मरते वक्त अपनी रूपसी बेटी का हाथ रघुनाथ के हाथों में देते हुए उससे वचन लिया था कि वह उसकी बेटी और कबीले की अच्छी तरह देखभाल करेगा। सो रघुनाथ अब पार्टी का सदस्य नहीं, उस कबीले का सरदार है। उसकी पत्नी अनिंद्य सुन्दरी है। इतनी गोरी, जैसे कि मेम हो कोई। लोग कहते कि हालाँकि रघुनाथ अब वहीं बस गया है, उन आदिवासियों में रम गया है, फिर भी अपनी माटी का खिंचाव तो होता ही है। जिस मिट्टी ने पैदा किया, वह मरते दम तक चुम्बक की तरह खींचती है। सो वह तीन-चार महीने में एक बार आदिग्राम का चक्कर लगा जाता है।

जब-जब वह गाँव आता, हमेशा गाँव के जवान लड़कों के आकर्षण के केन्द्र में होता। उनमें से कइयों को वह अपनी तरह बन्दूक चलाना सिखाने का वायदा कर चुका था। शाम होती तो वे सब हाइवे पर फाटाकेष्टो की चाय की गुमटी पर अड्डा मारते। फाटाकेष्टो का असली नाम केष्टा गिरि है, लेकिन गाँव में दो-दो केष्टा के होने के कारण बार-बार कन्फ्यूजन हो जाता था। एक बार चाय की गुमटी वाले केष्टा का सिर फट गया था, तब से उसका नाम फाटाकेष्टो पड़ गया। इसी तरह गाँव के कई लोगों के नाम हैं। कोई जरूरी नहीं कि एक नाम के दो लोग हों तभी इस तरह का नामकरण होता है, कई बार यों ही नाम पड़ जाता है। हरिपद के घर के पीछे बरगद का पेड़ होने से उसका नाम बटहरि पड़ गया। इसी तरह कानू सरकार का एक बैल मर गया और दूसरे के लिए उसे कई महीने इस गाँव उस गाँव की खाक छाननी पड़ी। इस बीच जो उसका नाम सिंगिल कानू पड़ा तो आज तक वह इसी नाम से जाना जाता है। आम के पेड़ से गिरने के बाद गगन के एक हाथ में प्लास्टर चढ़ गया था, एक बार किसी ने उसे ढेला मारा तो उसने प्लास्टर वाले हाथ से ढेले को ऐन उसी स्टाइल में रोका जैसे शहंशाह में अमिताभ बच्चन अपने स्टीलकवर वाले हाथ से दुश्मनों की गोलियाँ रोकता है। इसके बाद से गगन का नाम शहंशाह इस कदर पड़ा कि उसका बाप भी उसे शहंशाह कहकर पुकारता है। राना-माना की बड़ी बहन की उम्र हालाँकि बमुश्किल चौदह-पन्द्रह साल होगी, लेकिन पता नहीं क्यों सब उसे बुढ़िया कहते हैं।

पिछली बारिश में रघुनाथ के घर की छानी गिर गयी थी जो दुबारे से नहीं छवाई गयी। हफ्ते-डेढ़ हफ्ते के लिए अब जब कभी उसका आना होता है, वह फाटाकेष्टो की दुकान में ही डेरा डालता है। चाय की गुमटी के पीछे ही एक कोठरी है जिसमें दुकान बन्द करने के बाद कोयले, उपले, चीनी-चायपत्ती के डिब्बे, बरतन-बासन आदि रखे जाते हैं। फाटाकेष्टो का घर रानीरहाट बार्डर के पास है। बांग्लादेशी है, यहाँ रहते हुए उसे दस-बारह साल से ऊपर हो गये। बानबे के दंगे में वह वहाँ से भागा था। पिछले विधानसभा चुनाव से पहले रानीरहाट-बशीरपुर सीट से खड़े होने वाले रासबिहारी घोष ने कई बांग्लादेशियों के राशन कार्ड-वोटर्स आई.डी. बनवा दिये थे। उसी लॉट में फाटाकेष्टो भी भारतीय नागरिक बन गया। उसने एक बंगाली लड़की से शादी भी कर ली है और उससे चार-पाँच साल का एक लड़का है।

रघुनाथ की संगत में आने से इस बीच उसने दुनिया-जगत के बारे में बहुत कुछ जाना-सीखा है। माओ-त्से-तुंग के बारे में। सद्दाम हुसैन के बारे में, जार्ज बुश के बारे में। अमरीका और वियतनाम के बारे में। रघुनाथ कहता है कि हम फिर से गुलाम हो गये हैं और इस गुलामी से छुटकारा पाने के लिए हमें गुरिल्ला वार लड़ना होगा। पूछने पर उसने गुरिल्ला वार के बारे में बताया था। गुरिल्ला वार मतलब छिपकर, घात लगाकर पटकनी देना। बी.पी.एल. कार्ड के बारे में भी सरकार की चालाकी अब गाँव वालों से छिपी नहीं रही। तीन-चार दिन पहले ही रघुनाथ ने एक छोटी-सी जनसभा की थी जिसमें कोई सौ-डेढ़ सौ लोग आये थे। सभा में यह खुलासा किया गया कि सरकार विकास मद में अपने बजट में कटौती करने के लिए ही एक काल्पनिक रेखा खींच देती है और कहती है कि वह सात सौ लोगों में से सिर्फ सत्ताईस लोगों को ही वह तमाम सुविधाएँ देगी जो कि एक गरीब का हक है। रघुनाथ ने आह्वान किया कि सरकार को गरीबी रेखा के बदले अमीरी रेखा खींचनी चाहिए। जिसके पास घर हो, खेत हो, गाड़ी हो, नौकर-चाकर हों, वो अमीर और बाकी सारे लोग गरीब। भाई चावल में से घुन को अलग करना ही तो समझदारी है, न कि आप चावल को ही बीनने लग जाएँ।

अन्त में सबने सशस्त्र क्रान्ति की जय और अमेरिका मुर्दाबाद कहकर सभा को विसर्जित किया।

साइकिल से घर लौटते फाटाकेष्टो को तीन ताड़ के नीचे दो थके-माँदे यात्री बैठे दिखते हैं - अपनी-अपनी पोटलियों के साथ। दो होने के बावजूद वे सगी पोटलियाँ दिखती थीं। एक में सत्तू होगा तो दूसरी में गुड़ की भेली। यात्रा में पानी साथ लिये चलने का रिवाज नहीं होता था। पानी के लिए पृथ्वी पर भरोसा किया जाता था कि पृथ्वी हरी-भरी है। जहाँ दोनों यात्री बैठे थे, चारों तरफ खुले खेत थे। यहाँ एक के बाद एक तीन ताड़ के पेड़ थे और मोरम वाला रास्ता दो तरफ मुड़ जाता था। एक दक्खिन की ओर रानीराहट की तरफ चला जाता था तो दूसरा उत्तर की ओर जाकर फिर पूरब को मुड़ जाता था - बशीरपुर की तरफ।

यात्रियों में एक बूढ़ा था, दूसरा जवान। बूढ़े की आँखों में पीछे छूट चुके रास्तों के गर्द छिटक रहे थे। जवान की आँखों में आगे तय किये जाने वाले रास्तों की धूप खिल रही थी। दोनों सगे सम्बन्धी दिखते थे। कुल मिलाकर दोनों उदास दिखते थे।

फाटाकेष्टो ने पूछा, 'कहाँ के लिए? कोलकाता जाएँगे?'

'अमेरिका जाना है।' दोनों बोले और उदास हो गये।

फाटाकेष्टो ने साइकिल रोकी, सीट पर बैठे-बैठे पैर से आड़कर खड़ा हो गया। जवाब सुनकर वह थोड़ा आश्चर्यचकित हुआ था। बोला, 'हवाई जहाज से जाना होगा। सात समन्दर पार है।'

दोनों चुप हो गये। थोड़ी देर बाद बूढ़े ने उदास स्वर में कहा, 'हमारे पास इतने पैसे नहीं हैं। हम गरीब हैं लेकिन हमारे पास बी.पी.एल. कार्ड नहीं है। ब्लैक में अनाज खरीदकर खाते-खाते सब बिक-बिका गया।'

'किस गाँव के हो?' फाटाकेष्टो ने पूछा।

'कासारीपाड़ा में घर है।'

'बी.पी.एल. कार्ड नहीं है तो उस दिन हमारे साथ एस.डी.ओ. के ऑफिस का घेराव करने क्यों नहीं गये थे? पूरा जवार गया था। कासारीपाड़ा से भी लोग आये थे - नबा दा, रफीकुल, मो. रिजवान, अशर्फी घोष और भी जाने कौन-कौन!'

'बाद में गया था। एस.डी.ओ. से मिला। वह बोलता है कि बी.पी.एल. कार्ड चाहिए तो पहले अपने घर के आगे एक तख्ती लटकाओ कि हम गरीब हैं।' जवान बोला। 'अब हम भी उसके बाप से मिलने जा रहे हैं। साला कुत्ते का बच्चा!' वह तैश में आ गया।

फाटाकेष्टो ने बूढ़े से पूछा, 'लेकिन अमेरिका ही क्यों जा रहे हैं?'

बूढ़े ने कहा, 'मुझे सब पता है। अपने बाल धूप में सफेद नहीं किये बच्चू।'

फाटाकेष्टो ने दुनियादारी में शातिर बूढ़े का मुस्कराकर अभिवादन किया। वाकई उसके बाल सन की तरह उजले थे। यह महज इत्तेफाक की बात है कि फाटाकेष्टो ने बूढ़े से पूछा था। शायद जवान कोई उपयुक्त उत्तर देता। उसके पास सफेद बालों का बहाना नहीं था। मुहावरे में काले बालों का जि़क्र नहीं होता था।

जवान ने अकुताकर पूछा, 'यही पगडंडी जाएगी न? तुम भले आदमी दिखते हो।'

'एकदम नाक की सीध में चले चलिए।' फाटाकेष्टो ने अपनी भलमनसाहत का परिचय दिया। दोनों को शुभयात्रा कहा और दक्खिन की तरफ वाली सड़क पर साइकिल घुमा दी। जाने क्यों वह खुश था, गुनगुना रहा था। ऊपर आकाश में एक हवाई जहाज गुजरा तो उसने साइकिल रोक दी। चिल्लाकर कहा, 'आकाश में इसी पगडंडी - एकदम नाक की सीध में।'

वह देर तक बच्चों की तरह हाथ हिलाकर 'टा-टा' करता रहा।

हम जिसे भी देखते हैं , दो बार देखते हैं।

पेड़ पाखी फूल पत्ती धरती अकास पर नाम रखने के कुछ फायदे।

बाघा को इतनी जल्दी की भी उम्मीद न थी। दक्खिना ने महीने-डेढ़ महीने में ही कमाल दिखाना शुरू कर दिया। यह भी ठीक है कि बाघा ने इस अवधि में उस पर जी तोड़ मेहनत की। खुद पानता भात और नोना रोटी खाकर भी दक्खिना को रोजाना एक रोहू का माथा खिलाता ताकि उसकी बुद्धि विकसित हो और देह में तागद-चुस्ती आए। सोते समय कुल्ला करने के लिए पानी सुसुम करके देता ताकि लड़कियों के सपने न आएँ। नित्य शाम को व्यायाम भी करवाता। उन सबका सकारात्मक नतीजा यह निकला कि दो महीने में ही दक्खिना धंधे पर अकेले निकलने लगा। और अक्सर वह बाघा की उम्मीद से ज्यादा ही बटोर लाता। बाघा उसकी उत्तरोत्तर प्रगति से खुश रहने लगा। दक्खिना न सिर्फ उसके बुढ़ापे की लाठी बनकर आया था, बल्कि इससे भी बड़ी बात यह थी कि बाघा के साथ-साथ बुढ़ातीं और एक दिन मर जातीं उन तमाम विद्याओं को दक्खिना जैसे सुपात्र के रूप में एक नया जन्म मिल गया था। चंडी गुरु ने अपने अन्तिम दिनों में जो चैन की साँसें ली थीं, अब बाघा भी ले सकेगा।

अब ऐसा अक्सर होता कि दक्खिना धन्धे पर निकला होता और बाघा कोठरी में या ज्यादातर हराधन के यहाँ बैठा रहता। हराधन हाइवे के पास एक मोदीखाना चलाता था। चार पायों के ऊपर बैठाई गयी काठ की एक गुमटी। ऊपर एस्बेस्टस की छत। छत से लगाकर पायों तक अलकतरा से रँगी चकाचक। माँ मनसा वेरायटी स्टोर्स। ज्यादा कुछ नहीं है दुकान में, यही सब दाल चावल आटा मूड़ी आदि। हॉर्लिक्स की खाली शीशी धो-धाकर उसमें नारंगी-काले लॉजेन्स रखता है। नारियल के लड्डू, जयनगर का प्रसिद्ध मोंआ, तालमिसरी, नलेन गुड़। सादे और पीले बताशे। लाल दन्त मंजन और गुड़ाकू। दुकान की छत से चायपत्ती, शैम्पू, गुटखा-सुरती की पाकिटों की कई-कई चमकीली झालरें लटका रखी हैं। कलम-कॉपी भी रखता है। वैशाली एक्सरसाइज बुक। पार्ले जी। बीड़ी। अंडे। मिठुन की 'दादा : द बॉस इज बैक' नामक फिल्म का एक कैलेंडर है जिसमें सुई खोंसकर रखता है। वैसे सुई-धागे की बिक्री न के बराबर है। लोग फटेहाल रह लेते हैं।