आदिग्राम उपाख्यान / पृष्ठ 6 / कुणाल सिंह

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हराधन इलाके के चन्द शिक्षित लोगों में से है। उसके पास तीन किताबें हैं - 'सीपीएम का ग्राम सुधार आन्दोलन', 'यूको बैंक वार्षिक लेखा-जोखा : वित्तीय वर्ष 1984' और 'कई बीमारियों की एक दवाई लहसुन'। वैसे उसके पास एक और किताब है जिसे वह छुपाकर रखता है - 'कलकत्ते की कुँवारी कली कचनार'। उसने एक बार बाघा को भी दी थी वह किताब, जब मयना थी। बहुत पुरानी बात। बाघा और हराधन की दोस्ती भी बहुत पुरानी। हराधन ने शादी नहीं की। जिस प्रकार के लोग किसी समस्या का डायरेक्ट मुकाबला नहीं कर कन्नी काटकर निकल जाते हैं, हराधन मंडल वैसा ही है। स्वभाव का नरम और दयालु, समझिये एकदम से उबला हुआ आलू। भगवान से डरने वाला, भूत-प्रेत से डरने वाला। किसी तीन-पाँच में नहीं पड़ता। औरतों की इज्जत करता है। धीरे-धीरे बोलता है। मुँह पर हाथ की आड़ कर खाँसता है। सदा-सर्वदा दूसरों का भला चाहता है।

हराधन का ब्याह नहीं हुआ, इसकी सबसे बड़ी वजह है कि माना जाता है वह चुड़ैल का बेटा है। गाँव में एक पुतली माई है। उसी ने यह कहानी लोगों को बतायी थी। लेकिन यह किस्सा फिर कभी।

एक दिन बाघा हराधन के यहाँ बैठकर तमाखू पी रहा था। वह इन दिनों बच्चों की तरह सच्ची खुशी और उत्साह से ऊपर तक भरा रहता। जिधर भी देखता, उसे कुछ न कुछ अच्छा देखने और सुनने को मिल जाता। सायास अपनी खुशी को दबाते हुए वह दुनिया की छोटी और मामूली चीजों पर गौर करता, बातें करता - बिना किसी तरह ही भावुकता का प्रदर्शन किए। उदाहरण के लिए, जमाने को देखो तो सहसा यकीन नहीं होता, देखते-देखते क्या से क्या हो गया, महँगाई की ही लो माइ री! और, ये साले कौन लोग हैं जो जीप से इधर उधर घूमते रहते हैं? या फिर, गाँव-देहात की भी लड़कियों में अब लाज नहीं रह गयी, सिर उघाड़े बाप-भाइयों के सामने घूमती रहती हैं आदि। यह सब गम्भीर चिन्ता-भावना के विषय हैं।

'सोचता हूँ तो अजीब लगता है।' बाघा ने पच्छिम अकास को ताकते हुए कहा। यह एक यों ही कह दी गयी बात थी - दुनिया के बारे में चिन्ता करते हुए।

'क्या सोच रहे हो? दक्खिना के बारे में?' हराधन ने उसकी बात को गम्भीरता से लिया।

ठीक ही तो है, दुनिया भर के आगड़ू-बागड़ू पर बातें करें इससे कहीं अच्छा है किसी जाने-सुने आदमी के बारे में बातें हों। 'अजीब लगता है।' बाघा ने तत्काल बातचीत की गति को बहाल रखने के लिए वही टुकड़ा जोड़ा। इसके साथ दक्खिना से सम्बन्धित कोई चिन्तापरक वाक्य जोड़ना होगा, क्योंकि 'दक्खिना एक तेज-तर्रार लड़का है' कह देने से ही नजर लग जाने का खतरा है - बाघा यह मानता है।

तभी भागी मंडल अपने गाल को सहलाता हुआ आया और हराधन से थम्स-अप की एक बोतल खरीदी। गाँव-देहात में थम्स-अप की खूब बिक्री होती है तो यह न समझा जाए कि सब कोल्डड्रिंक्स के शौकीन हैं। दरअसल ऊँची कीमत के पेस्टीसाइट या अन्य कीटनाशक को खरीद पाने का सामर्थ्य सबके पास कहाँ होता है! सो छोटे काश्त के किसान अपनी फसलों में कीड़ा लगने से बचाने के लिए खेतों में कोल्डड्रिंक्स का छिड़काव करते हैं।

'और हो भागी मंडल, गाल पर हाथ काहे रखे हो? दाँत बथ रहा है क्या?' बाघा ने पूछा तो भागी मंडल ने उसे अपना गाल दिखाया। गाल पर उस तमाचे का निशान सदा-सर्वदा के लिए अंकित हो गया था जो उसे उस दिन जतिन विश्वास ने रसीद किया था जब बच्चों की टोली जीप पर उछलकूद मचा रही थी।

भागी मंडल ने बाघा से पूछा कि क्या वह उसका किस्सा सुनना चाहेगा? 'मैं जानता हूँ समय बड़ा मूल्यवान होता है। मैं तुम्हारा ज्यादा समय नहीं लूँगा। संक्षेप में बता दूँगा।'

बाघा की सम्मति पाकर वह वहीं बैठ उस दिन का किस्सा सुनाने लगा। हराधन पहले भी कई बार सुन चुका था, इसलिए उसने कोई रुचि नहीं दिखायी और एक कपड़े से सामान पर बैठी मक्खियाँ हाँकने लगा।

किस्सा सुनकर बाघा ने सहानुभूति जतायी। कहा, 'जाने दो भागी मंडल, पैसा चीज ही ऐसी है। पैसे से आदमी के माथे में पित्त हो जाता है। वर्ना उस कल के छोकरे की इतनी हिम्मत जो...!'

'गाँव के लोगों में अगर एकता होती तो उसकी इतनी हिम्मत कभी न होती बाघा भाई। आदिग्राम अब पहले जैसा नहीं रह गया। अभाव में पड़कर सबका सुभाव नष्ट हो गया है।' भागी मंडल एक हाथ में थम्स-अप की बोतल और दूसरा हाथ गाल पर रखे उठ खड़ा हुआ। जाते-जाते बोला, 'खैर मेरा क्या जाता है, मैं तो हूँ ही अभागा। जनमते ही बाप को खा गया। माँ ने जैसे-तैसे पाल-पोसकर बड़ा किया, ब्याह कर दिया। जैसे मुर्गियों को बीच-बीच में कोई रोग धर लेता है और सारी मुर्गियाँ मर जाती हैं, वैसे ही किसी रोग ने घर की दोनों लेडीज को लील लिया। इस दुनिया में अब मेरा कोई नहीं, जानकर जो आता है अपनी धौंस दिखाकर चला जाता है।' कहते हुए वह दुखी मन से चला गया।

उसके जाने के बाद बाघा और हराधन में बातचीत फिर से बहाल हुई।

'मुझे पता है दक्खिना के बारे में तुम क्या सोच रहे हो। गाँव के सभी लोगों के जुबान पर आजकल उसी की चर्चा है। लेकिन बाघा, तुम तो उसके बड़े-बड़ेरे हो, उसे रोकते क्यों नहीं?'

आएँ! यह क्या है? बाघा चौंका। किसकी चर्चा है, किस बात की? दक्खिना ने ऐसा क्या कर डाला जो गाँव के सभी लोग जानते हैं पर वह नहीं। बाघा तो झूठमूठ की कोई चिन्ता करना चाहता था लेकिन यह अँधेरे में क्या हाथ आन लगा? वह हराधन को देखने लगा। हराधन चुप था।

'अब क्या कहा जाए! खैर, ऊपर वाले की मर्जी।' बाघा ने फिर भी हार न मानते हुए एक गोलमोल-सी बात कही। वह जानना तो चाहता था लेकिन हराधन पर यह जाहिर हुए दिये बगैर कि वह कुछ नहीं जानता। घड़ी भर उसने हराधन की ओर देखा, इस उम्मीद में कि आगे वह कुछ बोले तो मामला साफ हो। लेकिन हराधन चुप रहा तो चुप ही रहा। उसकी गँदली आँखों को देखकर बाघा को सहसा वितृष्णा-सी हो आई।

बाघा के अलावा हराधन मंडल की जिससे सर्वाधिक पटती थी, वह था फोटोग्राफर। फोटोग्राफर का असली नाम क्या था, गाँव में किसी को नहीं पता। वह मेदिनीपुर का था और अरसा पहले यहाँ आकर बस गया था। वह हमेशा कमीज के ऊपर एक स्लीवलेस जैकिट पहनता और सिर पर गोल टोप लगाता। कोई कहता, वह गंजा है और अपने गंजेपन को छिपाने के लिए ही हमेशा टोप पहनता है। वह जब सोता होगा या नहाता होगा, तब शायद टोप उतारकर रख देता होगा। लेकिन आज तक किसी ने उसे सोते या नहाते नहीं देखा। वह छिपकर सोता या नहाता होगा। गाँव वालों को वह जब भी दिखा, ताजादम और नहाया-धुला दिखा। वह हमेशा फोटोग्राफर ही दिखा, इसलिए उसका नाम फोटाग्राफर पड़ गया। उसका असली नाम जानने के लिए उसे दोबारा देखना चाहिए। या काश कि एक बार वह सोते या नहाते दिख जाता।

जगदलपुर में उसका एक स्टूडियो था - 'आलो आँधारी'। इलाके का वह एकमात्र स्टूडियो था जहाँ लोग जाकर अपने फोटो खिंचवाते थे। आजकल शादी-ब्याह से पहले लड़की का फोटो और बायोडाटा भेजना पड़ता है। जगदलपुर से निकलने वाले चार पन्ने के श्वेत-श्याम दैनिक 'तीसरी आँख' में जितने फोटोग्राफ्स जाते थे, सबके नीचे बारीक अक्षरों में लिखा होता है - 'छाया : फोटोग्राफर'। 'तीसरी आँख' के लिए दोपहर में अपने स्कूटर से वह बशीरपुर, रानीरहाट, नलहाटी, मुंशीग्राम, आदिग्राम या आसपास के छोटे-छोटे कस्बों तक जाता है - सभा सेमिनार, धरना हड़ताल, जुलूस प्रभातफेरी आदि के कवरेज के लिए। नीले रंग के उस पुराने लैम्ब्रेटा स्कूटर पर उसने एक स्टीकर चिपका रखा है - 'प्रेस'। कभी-कभी शाम को भी निकलना होता है। ऐसे में स्टूडियो में बहुत दिनों से झाड़ू-पोंछा का काम करने वाले तारक पर स्टूडियो छोड़कर जाना होता है। डिलीवरी वगैरह का काम वह बखूबी कर लेता है। ईमानदार लड़का है। कैश बॉक्स पर बैठता है तो और भी ईमानदार बन जाता है। फोटोग्राफर किसी कस्टमर को एकाध रुपये की रियायत कर भी दे पर वह कभी नहीं करता।

तारक पंचानन बाबू के यहाँ काम करने वाले बूढ़े दासू का लड़का है। पहले वह भी अपने बाप के साथ पंचानन बाबू के यहाँ ही काम करता था, लेकिन एक दिन पंचानन बाबू की छोटी लड़की रेबा ने उनसे तारक की शिकायत कर दी कि वह उसे देखकर सीटी बजाया करता है, गाने भी गाता है कभी-कभार, मुस्कराता है और एक दिन जब वह हैंडपम्प से पानी निकाल रही थी, तारक ने उसे देखकर आँख भी मारी थी। आँख मारने वाली बात झूठी थी, दरअसल एक दिन रेबा के कुछ अन्त:वस्त्र गायब हो गये थे। रेबा को शक पड़ गया कि हो न हो यह कारस्तानी तारक की है। अन्त:वस्त्रों वाली बात रेबा न पंचानन बाबू से कह सकती थी और न परिमलेन्दु दा से। माँ या भाभी होतीं तो शायद उन्हें बता पाती। दो-तीन साल पहले पंचानन बाबू की पत्नी का देहान्त हो चुका था और परिमलेन्दु दा ने अभी शादी नहीं की थी। सो अन्त:वस्त्रों के रहस्यमय ढंग से गायब होने वाली बात की जगह आँख मारने वाली बात को बुनकर रेबा ने अपने ढंग से इसकी भरपाई कर ली थी। पंचानन बाबू ने तारक की जगह एक दूसरे लड़के पल्टू को काम पर रख लिया।

हराधन से फोटोग्राफर की दोस्ती का सबसे बड़ा कारण दोनों का एक-दूसरे के पड़ोस में रहना था। फोटोग्राफर का स्टूडियो हालाँकि जगदलपुर में था, लेकिन घर आदिग्राम में हाइवे के पास ही था जहाँ हराधन की गुमटी और उससे लगी एक कोठरी थी। स्टूडियो से लौटकर वह हर शाम बरामदे में बैठकर शराब पीता और कविताएँ पढ़ता था। हराधन भी साथ बैठता, हालाँकि वह शराब छूता तक नहीं था और न ही उसे कविताओं का सिर-पैर समझ में आता था। कभी-कभी फोटोग्राफर टेप रिकार्डर पर कोई भड़कता-सा गीत लगा देता और झूमने लगता। वह वी.सी.आर. और टी.वी. भी रखे हुए था। रविवार की दोपहरी दोनों वी.सी.आर. पर कोई फिल्म (ज्यादातर अश्लील) देखा करते।

दोनों की दोस्ती की एक वजह यह भी थी कि दोनों अकेले थे। हराधन ने शादी ही नहीं की थी और फोटोग्राफर की बीवी उसके साथ नहीं रहती थी। गाँव में फोटोग्राफर की बीवी को किसी ने नहीं देखा। कहते हैं, मेदिनीपुर छोड़कर यहाँ आते समय वह माल-असबाब के साथ-साथ अपनी बीवी को भी छोड़ आया था। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि बीवी ने उसे छोड़ दिया इसलिए वह मेदिनीपुर छोड़ने के लिए मजबूर हुआ।

रविवार को जगदलपुर का बाजार बन्द रहता है, सो स्टूडियो आलो आँधारी भी। कभी-कभी कवरेज के लिए निकलने को अपवाद मानें तो रविवार को फोटोग्राफर दिन भर खाली रहता है। तारक रविवार को स्टूडियो न जाकर फोटोग्राफर के घर ही आ जाता है ताकि साप्ताहिक झाड़-पोंछ, सौदा-सुलुफ आदि हो सके। दोपहर बाद फोटोग्राफर उसकी छुट्टी कर देता है। काम निबटाकर जाने से पहले तारक का आखिरी काम होता है फोटोग्राफर को ताजा खिंची महुआ की बोतल थमा जाना। रविवार को फोटोग्राफर दोपहर ढलते ही पीने बैठ जाता है। भुने हुए मांस पर नून छींटकर खाता है और महुआ पीता है। पेट में ठंडा-ठंडा लगता है।

फोटोग्राफर को रतौंधी का रोग है, लेकिन वह इसे छिपाता है। वह कोशिश करता है कि दिन डूबने से पहले ही वह घर लौट ले। अक्सर उसे आसपास के क्षेत्र से शादी-ब्याह की वीडियो रिकार्डिंग के ऑफर मिलते हैं लेकिन चूँकि शादियाँ रातों में होती हैं, वह इंकार कर देता है। एक बार जब शुरू-शुरू में उसे अपने इस रोग की जानकारी मिली ही थी, उसने रानीरहाट में एक शादी की वीडियो रिकार्डिंग की थी। कई दिनों तक वीडियो कैसेट की डिलीवरी देने में वह बहाने बनाता रहा, टाल-मटोल करता रहा। अन्त में एक दिन उसने पार्टी के आगे हाथ जोड़ लिये कि पता नहीं कैसे रील खराब हो गयी है और इसलिए वह कैसेट नहीं दे पाएगा। पेशगी में लिये गये पैसे लौटाने के बाद भी जिस फजीहत का सामना करना पड़ा था, उसे याद है।

इस घटना के बाद से उसने अपना उसूल ही बना लिया कि जाड़े में पाँच और गर्मियों में छ: बजे के बाद स्टूडियो आलो आँधारी बन्द। सभा-संगोष्ठी आदि भी दिन के वक्त ही होती हैं, सो इस तरफ से उसे कोई खास दिक्कत नहीं आयी। स्टूडियो से अच्छी-खासी आमदनी हो जाती है, 'तीसरी आँख' से जो कुछ भी आय होती है, वह ऊपरी आय ही कही जाएगी। सो कुल मिलाकर फोटोग्राफर की आर्थिक स्थिति ठीक-ठाक कही जा सकती है।

इसके अलावा उसे एक अजीब-सी बीमारी और है कि अपने देखने पर उसे सहसा यकीन नहीं होता। एक बार यकीन कर भी ले तो थोड़ी देर बाद उसे फिर से सन्देह होने लगता है कि उसने जो देखा है, क्या पता वह सही न हो। उदाहरण के लिए माना कि आज रविवार है और तारक बोतल रखकर जा चुका है। फोटोग्राफर सोचता है कि थोड़ी बेला हो जाए तो बोतल खोली जाए या फिर बरामदे में बैठा वह हराधन का इन्तजार कर रहा है। दिन ढल चुका है। बरामदे में जाड़े की धूप का एक मुलायम रूमाल भर बिछा है : गुलाबी रंग का छोटा-सा कढ़ाईदार लेडीज रूमाल। घड़ी दो घड़ी बाद वह भी नहीं रहेगा। धूप की विदाई की रस्म पूरी हो चुकी है। जो थोड़ी-बहुत धूप बची है, वह दरअसल दरवाजे तक जाकर न जाने क्या सोच क्षण भर के लिए लौट आई धूप है। कुछ कहने के लिए। कुछ याद दिलाने के लिए। 'भूल तो नहीं जाओगे?' जैसा एक तसलीमी सवाल। या फिर 'हाँ, एक बात कहना तो भूल ही गयी' जैसी कोई जरूरी बात। चाहे उतनी जरूरी भी नहीं, कोई आम रस्मी बात ही। या फिर ऐसा कुछ भी नहीं, जाते-जाते केवल एक बार घूमकर ताक लेना भर। मुस्कराकर धीमे से कहना - सी यू, गुडबाई!

फोटोग्राफर ने बैठे-बैठे एक बार पलटकर देखा। पीछे के कमरे का दरवाजा खुला था। खुले दरवाजे से भीतर शाम का झिरी अँधेरा घिर आया था। फोटोग्राफर आश्वस्त हो गया कि कमरे की खिड़की उसने बन्द का दी है। इस वक्त अगर भूल से खिड़की खुली रह जाए तो कमरे में मच्छर भर जाते हैं और फिर रात भर तकलीफ होती है। यह बात फोटोग्राफर के भीतर इतने गहरे धँस गयी है कि बार-बार वह पलटकर देखता है कि खिड़की बन्द है या नहीं। बन्द देखकर भी थोड़ी देर बाद उसे वहम हो जाता है कि क्या पता खुली रह गयी हो। एक बार 'क्या पता खुली रह गयी हो' सोचते ही उसे प्रमुखता से लगने लगता है कि खिड़की सचमुच ही खुली रह गयी है। वह फिर से पलटकर देखता है।

नहीं, ऐसे नहीं। यह बहुत ही महीन बात है। इसे विस्तार से समझना होगा। दरअसल दिन ढलने के साथ ही जब फोटोग्राफर खिड़की के पल्लों को बन्द कर रहा होता है, उसी वक्त अपने 'बन्द करने' पर उसे सन्देह हो जाता है कि वह वाकई बन्द कर रहा है या सिर्फ खयालों में ही ऐसा। बन्द करने के बाद वह सिटकनी को छूकर जाँचता है कि सचमुच बन्द हो गयी या बन्द होना दिख भर रहा है। छूकर जाँचने के बाद वह दो-चार कदम पीछे हटकर आँखें गड़ाते हुए सिटकनी को देखता है। बन्द हुई खिड़की की जो छवि दिखती है, वह हू-ब-हू प्राचीन काल से बन्द एक खिड़की की छवि से मिलती-जुलती है। इसके बाद फोटोग्राफर जाकर बरामदे में बैठ जाता है। रह-रहकर उसकी आँखों के सामने बन्द हुई खिड़की की छवि तैर जाती है। लेकिन थोड़ी देर बाद उसके मन में शक के बीज पड़ जाते हैं कि क्या पता यह छवि पिछले किसी रविवार को बन्द की गयी खिड़की की हो! यहीं से खेल शुरू हो जाता है - पलटकर बन्द खिड़की को देखना। फिर देखना। फिर फिर देखना।

ऐसा नहीं कि सिर्फ खिड़की के मामले में यह बात हो। दरवाजे पर ताला लगाकर स्टूडियो के लिए निकलने वक्त भी यही खेल चलता। ताले में चाबी घुमाकर जैकिट की ऊपरली जेबी में डालने के बाद फोटोग्राफर ताला खींचकर देखता कि ठीक से बन्द हुआ या नहीं। उसे जोर-जोर से हिलाकर छोड़ देता। एकाध बार दाएँ-बाएँ डोलने के बाद ताला जब अपने मूल स्थान पर मुँह लटका लेता तो फोटोग्राफर उसे गौर से देखता। वही सदियों से बन्द होते आये एक आदर्श ताले की जैसी छवि। शान्त और दृढ़ प्रतिज्ञ। वज्र की तरह कठोर। इर्द-गिर्द की चंचल हवा से पूरी तरह निर्लिप्त अपने काम से काम रखने वाला एक गम्भीर ताला।

स्टूडियो में तारक भी उसकी आदत से परेशान रहता। फोटोग्राफर दराज को बार-बार खोलता। एक बार खोलने के बाद उसे भ्रम होता होगा कि क्या पता दराज अभी नहीं खुली हो। दराज के खुले हुए पेट का दिखना, उसे भीतर रखे कैश मीमो, कार्बन पेपर, कलम, पेंसिल, नेगेटिव्ज, छोटी कैंची, स्टेप्लर, रोल्स आदि का दिखना झूठमूठ का दिखना हो। झूठमूठ खुली दराज को सचमुच खोलने के लिए उसे वापस बन्द करना होता। बन्द करते हुए वह सोचता कि यह क्या अहमकाना हरकत है! बन्द करने का अर्थ ही है कि दराज पहले से खुली हुई है। लेकिन इससे पहले कि वह पूरी तरह इस निष्कर्ष पर पहुँचता कि दराज खुली हुई है, वह पूरी तरह दराज बन्द कर चुका होता। दुबारा खोलने से पहले वह तारक को साक्षी रखकर कहता - तारक, मैं इस दराज को सचमुच खोलने जा रहा हूँ।

इसी तरह जब वह खाना खा रहा होता, तारक इधर-उधर होता तो खुद से कहता - दिनांक 14/9, समय दोपहर के सवा दो, मैं खाना खाने जा रहा हूँ। इस वाक्य को वह स्पष्ट और चौड़े उच्चारण के साथ बोलता, ताकि भविष्य में जब उसे शक हो, वह अपने कहे हुए वाक्य की ध्वनि को हू-ब-हू याद कर सके। पहचान के लिए वह बाहर सड़क की तरफ देखता। एक आदमी हरी कमीज पहने साइकिल लिए गुजरता दिखता है। फोटोग्राफर देखता है कि वह साइकिल पर चढ़े हुए नहीं, साइकिल की हैंडिल पकड़े पाँव-पाँव चल रहा है। शायद वह सोचता हो कि थोड़ी देर बाद साइकिल पर चढ़ना चाहिए। थोड़ी देर बाद जब वह चढ़ेगा, तब तक खड़े रहने से क्या फायदा, इसलिए वह पाँव-पाँव चलने लग गया। ऐसा करते-करते उसे जहाँ पहुँचना होगा, वहाँ वह बिना साइकिल पर चढ़े पैदल ही पहुँच जाएगा। वहाँ पहुँचने के बाद उसे इस बात का खयाल आयेगा और उसे लगेगा कि उसके साथ छल हुआ।

फोटोग्राफर ने उस आदमी को उसकी पूरी विलक्षणता में देखकर कंठस्थ कर लिया, ताकि अगर कहे हुए वाक्य की ध्वनि याद करने के बाद भी उसे शक हो तो वह इसका सहारा ले सके कि बात तब की है जब हरी कमीज पहने एक आदमी साइकिल के साथ-साथ गुजरा था। वह आदमी इतना अजीब था कि एक बार देखने के बाद कोई भी उसे कभी नहीं भूल सकता। उदाहरण के लिए वह हरी कमीज पहने था। उसकी आँखें छोटी-छोटी थीं और रंग साँवला था। और तो और अपने साथ होने वाले छल के प्रति वह पूरी तरह अंजान था। अन्त तक।

एक दिन बाघा अपनी कोठरी में चारपाई पर पड़ा सोने का यत्न कर रहा था कि दक्खिना ने आकर उसके गोड़ छुए। बाघा हड़बड़ाकर उठा कि आज ऐसी क्या बात हुई! दक्खिना अब तक उसके पैर दबाने लग पड़ा था - खुशामद में दोनों कानों तक मुँह को चियारे हुए। अभी बाघा उसे ताड़ने की कोशिश ही कर रहा था कि बाहर चूड़ियों की एक दबी-सी खनक हुई।

'कौन है बे? किसको लेकर आया है?' बाघा ने तुरन्त सिरहाने पड़ी अपनी मिरजई उठायी और पहनने लग पड़ा।

'हे-हे, आपकी बहू दादा! बियाह कर लाया हूँ।' दक्खिना उसी तरह दाँत निकाले-निकाले बोला, बस अबकी उसके नकूश पर शर्म का पतला पानी चढ़ा था। उसने गरदन घुमाकर सीटी मारी। तुरन्त एक लड़की, जो अब तक दरवाजे की आड़ में छिपी खड़ी थी, कोठरी में भदभदाकर घुसी और बाघा का दूसरा पैर पकड़कर बैठ गयी।