आदिग्राम उपाख्यान / पृष्ठ 7 / कुणाल सिंह

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'अजीब जंजाल में फँसा तो! छोड़ मेरा पैर - हट् हट्!' बाघा ने अपने पैर खींचने शुरू कर दिये। उधर दोनों ने अपने-अपने हिस्से में आए पैर को जी-जीन से पकड़ लिया।

'नहीं दादा, जब तक आप माफ नहीं करते, गुलाब को स्वीकार नहीं करते, हम नहीं छोड़ेंगे आपके पैर आपके पैर।' दक्खिना उसके पैर से एकबारगी चिपट गया। देखादेखी लड़की भी चिपटना चाही लेकिन इतने में उसका आँचल गिर गया सो तुरन्त उसने पैर छोड़कर आँचल को सिर पर ले लिया। इस बात का बाघा पर सकारात्मक असर पड़ा। बाघा को थोड़ा नरम पड़ता देख दक्खिना बोला, 'इसका नाम गुलाब है।' इतने पर लड़की ने जाने क्या समझा कि फिर से बाघा का पैर पकड़ लिया। क्या मुसीबत है यह! बार-बार पैर क्यों पकड़ती है? ...और यह भी कोई नाम हुआ - गुलाब! इससे कैसे पता चलेगा हिन्दू है कि मुसलमान! पेड़ पाखी फूल पत्ती धरती अकास पर नाम रखने का अच्छा फायदा तो! ...मयना! ओह, हट् भाई माथा खिराब मत कर! टेंसन हो गया है।

'उस पार की है।' दक्खिना ने कहा और तुरन्त लड़की को जोर से पैर पकड़ लेने का इशारा किया। लड़की का आँचल फिर लुढ़क गया, लेकिन इस बार उसने इसकी परवाह नहीं की। बाघा ने अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया। अगर उसके पैर आजाद होते तो हुमच के दक्खिना को एक लात दे मारता, यह तय है। साले की यह मजाल, तो इस घर में बांग्लादेशी छोकरी लाये! आक् थू:!

'क्या बोला, सूताग्राम में घर है इसका?' बाघा एकबारगी सिहर गया। सूताग्राम से उसका पुराना रिश्ता ठहरा। बाघा कभी बांग्लादेश नहीं गया। जरूरत ही नहीं पड़ी। वह नहीं जानता सूताग्राम कैसी जगह है। ऐसी ही होगी, और क्या! बार्डर पार करते ही तो सूताग्राम। वह सूताग्राम नहीं जाना चाहता मतलब ही तो बांग्लादेश नहीं जाना चाहना हुआ। बांग्लादेश नाम की अलग से कोई जगह थोड़े ही है। बांग्लादेश मतलब वही सूताग्राम, फरीदकोट, फैजलपुर, ढाका, मैमनसिंह, बोरिशाल। पच्छिम बांग्ला मतलब गंगा और बांग्लादेश मतलब पद्मा। बांग्लादेश मतलब मयना। मयना भी तो बांग्लादेश मतलब सूताग्राम में है। कैसी होगी वह? बुढ़ा गयी होगी अब तो। बाघा की भी तो उमर हुई। पच्छिम बांग्ला में बाघा के बाल पक गये मतलब बांग्लादेश में मयना के बाल पक गये होंगे। वह इस छोकरी से पूछना नहीं चाहता, वह मयना को पहचानती है या नहीं। हरगिज नहीं जानना चाहता वह कैसी है। अच्छी है तो क्या उसे भी बाघा की याद आती है! याद आती है तो क्या...

'क्या नाम बोला रे इस छोकरी का?'

किस बाबरनामे में आदिग्राम का जिक्र आता है ?

बूढ़े को चावल की खुशबू की लू लग गयी।

परिमलेन्दु दा ने बच्चों को जिस रानी रासमणि की कथा सुनाई थी, वह कोई सचमुच की रानी नहीं थी। वह एक गरीब चासी (किसान) की बेटी थी, जिसकी मौत बंगाल के अकाल में चावल की खुशबू से हुई थी। बंगाल में अकाल कब पड़ा था, पूछने से इतिहास के सर बताते हैं कि सन तैंतालीस की बात है। रानी रासमणि की शादी बाबर से कब हुई थी, पूछा जाए तो परिमलेन्दु दा कहेंगे कि सन 1760 की बात है जब ईस्ट इंडिया कम्पनी ने इस पूरे इलाके को गोरे-काले फौजियों और तोपचियों से भर दिया था। बाबर कौन था, यहाँ कहाँ से आया था, पूछने से इतिहास के सर बताते हैं...। यह सब क्या गोलमाल है! परिमलेन्दु दा एक साथ कितनी कहानियों को जोड़-गूँथ देते हैं।

अच्छा, बाबर मतलब तो मुस्लिम, फिर उसकी शादी रानी रासमणि से क्योंकर हुई! होती है क्या? फटिकचन्द्र पूछना चाहता है कि इजराइल मियाँ-इस्माइल मियाँ की बेटी बिलकीस से वह चाहे तो ब्याह कर सकता है क्या! पिछले बरस गौरांग पूजा के टाइम उसने बिलकीस को एक हेयरबैंड और रोटोमैक की कलम दी थी। लिखते-लिखते लव हो जाए। बिलकीस ने मुस्कराकर कहा था - आईलवयू।

इजराइल मियाँ-इस्माइल मियाँ दोनों जुड़वाँ भाई थे। बचपन से ही वे दोनों इतने एक जैसे थे कि उनके अम्मी-अब्बा भी उन्हें सही-सही नाम से पहचानने में धोखा खा जाते थे। जब तक दोनों ने होश सम्भाला, तब तक किसका नाम इजराइल है और किसका इस्माइल, यह पता कर पाना मुश्किल था। हो सकता है बचपन में कई बार इनके नामों में अदला-बदली भी हुई हो। अन्तत: लोगों ने इसका समाधान ऐसे निकाला कि जब भी किसी एक से काम पड़ता, वे दोनों का ही नाम लेकर पुकारते। जब वे स्कूल जाने जितने बड़े हुए, आर्थिक तंगी के कारण उनके अब्बा ने स्कूल में दोनों में से एक को ही दाखिला दिलवाया - इजराइल हसन। लेकिन गुप्त बात यह थी कि कभी इजराइल स्कूल चला जाता तो कभी इस्माइल। इस तरह गाँव वालों को बहुत मुश्किल से दोनों को अलग-अलग पहचानने का एक नुस्खा मिला कि दोनों में से जो भी स्कूल जाए वह इजराइल, और जो न जाए तत्काल के लिए वह इस्माइल। स्कूल के रजिस्टर की मानें तो इजराइल हसन ही पढ़ा-लिखा है और इस्माइल हसन काला अक्षर भैंस बराबर है। इस प्रकार 'इजराइल हसन' नाम ने छठी दर्जा पास कर लिया और 'इस्माइल हसन' नाम अब्बा के साथ हाइवे के पास जड़ी-बूटियों और मसालों की दुकान पर बैठने लगा। बाद में जब उनकी दाढ़ी-मूँछ आ जाए जितने वे बड़े हो गये तो लोगों ने सुझाया कि एक को दाढ़ी और दूसरे को मूँछ रख लेनी चाहिए। कुछ दिनों तक उन्होंने ऐसा किया भी। लेकिन फिर वही ढाक के तीन पात। लोग भूल जाते कि दाढ़ी वाला इजराइल है या इस्माइल।

चूँकि अब्बा ने स्कूल में सिर्फ एक लड़के की फीस भरी थी, इसलिए उनका एक ही लड़का छठी पास कहा जा सकता था और दूसरे को अनिवार्यत: अनपढ़ होना होगा। उन्होंने एक पतलून-कमीज सिलवा दी ताकि पढ़े-लिखे इजराइल को नलहाटी बाजार में कोई ठीक-ठाक काम मिल सके। पतलून-कमीज वाले लड़के को एक आढ़त में मुंशी के काम पर रख लिया गया। पतलून-कमीज पहनकर मुंशीगिरी करने कभी इजराइल चला जाता तो कभी इस्माइल। दूसरा जो रह जाता, लुंगी-बनियान पहनकर मसालों की दुकान पर बैठ जाता। एक दिन पास के गाँव से पढ़े-लिखे इजराइल के लिए एक रिश्ता आया। पहले यह सोचा गया था कि इजराइल और इस्माइल की शादी एक ही साथ किन्हीं दो बहनों से की जाएगी। लेकिन अब्बा को दहेज में अच्छी-खासी रकम मिल रही थी, सो इंकार न कर सके। अच्छा, लड़की अगर दो बहन होती तो भी क्या उसका बाप दूसरी लड़की की शादी 'अनपढ़' इस्माइल से करने के लिए राजी हो पाता? बहरहाल, लड़की इकलौती थी और सुनने में आ रहा था बहुत सुन्दर थी।

ऐन शादी के दिन क्या हुआ कि इजराइल को दस्त लग गये। शादी की तैयारियाँ पूरी हो चुकी थीं, बारात निकल पड़ने को तैयार थी और इधर इजराइल ने खाट पकड़ ली। लोगों को कुछ सूझ नहीं रहा था। अचानक इजराइल तैयार होकर घर से बाहर आया और बोला कि अब उसकी तबीयत बिल्कुल ठीक हो चुकी है और बदले में इस्माइल की तबीयत बिगड़ गयी है। लोगों ने कुछ नहीं कहा। इजराइल ने निकाह पढ़ी। शादी हो गयी। दुल्हन घर आयी। साल भर बाद बिलकीस का जन्म हुआ।

बिलकीस का जन्म 6 दिसम्बर, 1992 को हुआ था। उसके जन्म के दिन देश भर में एक जलजला आया था, आदिग्राम में भी। लोगों के घर धू-धू कर जलने लगे थे। कई लोग मारे गये। कुछ मुसलमान बांग्लादेश भाग गये और कुछ हिन्दू वहाँ से भागकर यहाँ आ बसे। इजराइल-इस्माइल की जोड़ी भी उसी साल टूटी। इनमें से एक के बारे में कहा जाता है कि वह बांग्लादेश भाग गया। कुछ लोग कहते हैं कि दरअसल वह कहीं नहीं गया, सचाई यह थी कि वही बिल्कीस का असली बाप था, इसलिए इजराइल-इस्माइल में से दूसरे ने उसे मारकर कहीं दफ्ना दिया। अन्त के दिनों में कुछ लोगों ने उसे बाघा की पत्नी मयना के साथ भी देखा था और वे मानते हैं कि अफरा-तफरी का फायदा उठाकर वह मयना के साथ बांग्लादेश भाग गया। बाघा भी ऐसा ही सोचता है।

यह बहुत पहले की बात है जब बिलकीस पैदा हुई थी। जिस दिन बिलकीस पैदा हुई थी, उसी दिन बाबरी मस्जिद का ढाँचा ढहाया गया था। इतिहास के सर बताते हैं कि बाबर दिल्ली का...। लेकिन रानी रासमणि तो आदिग्राम की थी। ...इजराइल मियाँ-इस्माइल मियाँ की तरह इतिहास में दो-दो बाबर हुए थे क्या? या दोनों दो इतिहास में अलग-अलग हुए। कौन से इतिहास में आदिग्राम का जिक्र आता है?

हाँ तो सन 1760 की कथा चल रही थी जब जमींदारी खत्म कर ईस्ट इंडिया कम्पनी के तीन कारिन्दे मालगुजारी के नियमों में हुए बदलाव की घोषणा करने आदिग्राम पहुँचे थे। कहते हैं कि तब यहाँ जंगल का फैलाव मीलों मील था। नलहाटी बाजार तो अँग्रेजों के यहाँ आने के बाद बसा, जब जी.टी. रोड से नजदीकी के कारण वहाँ अनाज मंडी और गोदाम बनाये गये। इधर जहाँ आज रानीरहाट है, वहाँ पहले कुछ मुसलमान घर थे और बाद में रानी रासमणि के नाम पर उस जगह का नाम रानीरहाट पड़ गया। दक्खिन की तरफ जहाँ सान्थालों की बस्ती है, घनघोर जंगल हुआ करता था जो बशीरपुर-मुंशीग्राम तक फैला था। इस पूरे इलाके का जमीदार का नाम बाबर था, जिसकी कोठी आदिग्राम में थी। कोठी अब खंडहर में तब्दील हो चुकी है, जहाँ बाघा और दक्खिना ने अपनी गृहस्थी बसा रखी है।

ईस्ट इंडिया कम्पनी की तरफ से जो तीन कारिन्दे आये थे, उनमें दो गोरे थे और तीसरा काला। काले को साथ में इसलिए रखा गया था क्योंकि वह मूलत: यहीं का रहने वाला था, सो इलाके के भूगोल से भली-भाँति परिचित था। दूसरे, वह गोरे साहबों की भाषा भी जानता था और यहाँ बोली जाने वाली देसी भाषा भी।

इलाके के लोगों ने पहली बार गोरों को देखा था। बाँस की तरह लम्बे छह फुटे, नीली-भूरी आँखें और रंग जैसे दूध में गुलाब की पंखड़ियाँ घुली हों। लाल-लाल मुँह और गेरुए रंग के बाल। उनमें से एक हमेशा हैट पहने और चुरुट पीता रहता। दूसरा, जो पहले से कम उम्र का लेकिन ज्यादा अनुभवी लगता था, हमेशा अपने गले में बायनाकूलर लटकाये रहता, बीच-बीच में आँखों से लगाकर देखता। बायनाकूलर से देखने से क्या दुनिया दूसरी तरह की दिखती है?

आदिग्राम के किसानों ने जब जाना कि अब उनकी जमीन उनकी नहीं रही, ईस्ट इंडिया कम्पनी की हो गयी है, और इस पर खेती करने के लिए उन्हें फसल का एक हिस्सा कम्पनी को देना होगा, तो वे मरने-मारने पर उतारू हो गये। एक दिन आदिग्राम के जंगलों में दोनों गोरे अफसरों की लाश पाई गयी। काले को इसलिए जि़न्दा छोड़ दिया गया कि वह जाकर अपने हुक्मरानों को इसकी इत्तला कर सके। उन दो गोरे अफसरों में हैट और चुरुट वाला, भारत का पहला अंग्रेज कलक्टर था और दूसरा जो उससे थोड़ी कम उम्र का, लेकिन ज्यादा अनुभवी लगता था, दारोगा था।

आदिग्राम के इतिहास में होने वाला यह पहला कत्ल था, और एक नहीं दो-दो, दोनों ही गोरे अफसर। दूर-दूर से लोग आये थे देखने। छूकर देख रहे थे कि गोरी चमड़ी को छूने में कैसा लगता है। लाशों की मिट्टी काठ की तरह कड़ी हो गयी थी। लोग तय नहीं कर पा रहे थे कि लाशों को हिन्दुओं की तरह जलाया जाए या मुसलमानों की तरह दफ्न किया जाए। हिन्दू तैयार नहीं थे कि जहाँ उनके शवों का दाह किया जाता है वहाँ किसी म्लेच्छ का भी अन्तिम संस्कार हो और दूसरी तरफ मुसलमान भी अपने कब्रिस्तान में उन्हें कोई कब्र देने के लिए राजी नहीं हो रहे थे। इलाके के इतिहास में यह पहली बार था जब दो-दो लाशों को यों ही छोड़ दिया गया जंगली जानवरों के हवाले। जंगली जानवरों ने पहली बार इंसानी खून चखा।

दस-पन्द्रह दिन के भीतर आदिग्राम का चप्पा-चप्पा गोरे-काले फौजियों से भर गया। जंगल के सीमान्त प्रदेश में सात-आठ सौ तम्बू लग गये, जगह-जगह तोप, बंकर। लोगों के चेहरे पर भय की काली परछाइयाँ उतरने लगीं - मारे डर के मुँह चूना हो गया। वे अपने-अपने घरों में छिप गये। फौज के कमांडर ने गाँव में घूम-घूमकर मुनादी करवा दी कि जो किसान कम्पनी को मालगुजारी देने में आनाकानी करेगा, उसे सरेआम कोड़े से पीटा जाएगा। अगर वह फिर भी राजी नहीं हुआ, तो उसे सूली पर टाँग दिया जाएगा। फौजी सशस्त्र थे और किसान निहत्थे, बाल-बच्चों वाले, सो यह पूरी तरह से इकतरफा लड़ाई थी। इस प्रकार रातोंरात पूरे इलाके पर ईस्ट इंडिया कम्पनी का राज हो गया। सारी जमीन एक झटके में कम्पनी की हो गयी। अब किसान अपनी ही जमीन पर मजदूरी करेंगे। फसल बोने से पहले उन्हें कम्पनी की इजाजत लेनी पड़ेगी कि धान रोपें या मान लीजिए अफीम या नील की खेती करें।

इतना होने के बाद, जैसे यह काफी नहीं था, पाँच-छ: साल बाद भीषण अकाल पड़ा। अब तक दर्ज इतिहास में बंगाल पर पड़ने वाला पहला अकाल। लोग दाने-दाने के लिए मोहताज हो गये। चारों तरफ हाहाकार मच गया। लेकिन कम्पनी ने मालगुजारी में कोई रियायत नहीं बरती। खाने को अन्न नहीं, मालगुजारी कहाँ से दें! बच्चे बूढ़े सब पर कोड़े बरसे, औरतों ने अफसरों की सेवा-टहल तक कबूल कर ली, फिर भी मालगुजारी चुक्ता करने भर पैसे इकट्ïठा नहीं हुए। यह तब की बात है जब रानी रासमणि चौदह साल की थी।

रानी रासमणि का जन्म एक गरीब किसान के घर हुआ था। रासमणि जब पैदा हुई, उसे देखकर उसका बाप डर गया। रासमणि की माँ ने समझा कि उसके पति का चेहरा सहसा इसलिए बुझ गया है कि वह मन ही मन बेटे की आस लगाये होगा। उसने डरते-डरते कहा, '...लेकिन तुम तो कहते थे कि बेटा हो या बेटी, भगवान का दिया सर-आँखों पर! बेटी को भी वही दर्जा दोगे जो, मान लो कि बेटा होता, तो उसे देते।'

'लेकिन इतनी सुन्दर लड़की! हम लोग गरीब हैं। आखिर क्या गलती हुई जो हम गरीब को ऊपरवाले ने इतनी सुन्दर लड़की दी!'

रासमणि की माँ ने नवजात को देखा, उसकी छोटी-सी देह से जैसे रोशनी की धारें फूटती हों। देखकर रासमणि की माँ के मन में अतीत की किसी खुशी का स्फुरण दौड़ गया और सौरी की खाट पर झुककर उसने बच्ची का माथा चूम लिया।

'हम इसे कहाँ छिपा के रखेंगे!' बाप ने कहा और डर गया।

कहते हैं जिस दिन वह पैदा हुई, एकाएक उसके बाप की उमर दुगनी हो गयी। बाल आधे से ज्यादा झड़ गये और जो बचे उस पर चाँदी का पानी चढ़ गया। चेहरा झुर्रियों से भर गया, सारे दाँत गिर गये, आँखों में मोतिया के छल्ले पड़ गये। वह दिन-दिन भर खाँसने और कमर के दर्द के मारे झुककर चलने लगा। वह इतना कमजोर हो गया कि साँस लेने में भी उसे काफी मशक्कत करनी पड़ती और चलते वक्त अक्सर उसका दायाँ पैर सन्तुलन खोकर घिसटने लग पड़ता।

जैसे-जैसे रासमणि बड़ी होती गयी, उसकी सुन्दरता की कीर्ति फैलती गयी। वह जहाँ कहीं जाती, एक पवित्र उजाले से उसका आसपास भर उठता। अँधेरे में भी रासमणि की देह से रोशनी फूटती होती। लोग दूर-दूर से उसे देखने आते और कहीं किसी आड़ से देखते, लौट जाते। दुनिया में यह कहने-सुनने का प्रचलन होता था कि रासमणि की सुन्दरता में ऐसी गैबी ताकत है कि जो कोई भी उसे सीधे-सीधे, बिना किसी ओट के देखता, फिर उसमें कुछ और देखने की लालसा हमेशा के लिए मर जाती। उसका कोई अंग विक्षत हो जाता, एक आँख की रोशनी चली जाती, एक पैर में फालिज मार जाता, एक हाथ बेकाम हो जाता, वह गूँगा-बहरा हो जाता। इस संसार से उसका जी उचाट हो जाता, मन में वैराग्य घर कर जाता, घर-द्वार पत्नी-बच्चे बूढ़े माँ-बाप को छोड़कर वह साधू-संन्यासी हो जाता, जंगल-जंगल पर्वत-पर्वत घूमता-बउआता रहता, एक दिन आत्महत्या कर लेता।

रानी रासमणि जब अठारह साल की हुई तो बंगाल में फिर दूसरा अकाल पड़ा। तब तक ईस्ट इंडिया कम्पनी नलहाटी बाजार में अनाज की आढ़त और गोदाम बनवा चुकी थी। यहाँ से अनाज बैलगाड़ियों में लादकर कलकत्ते पहुँचाया जाता। कहा जाता है कि जब दूसरा अकाल पड़ा, कम्पनी के गोदामों में कोई एक लाख मन धान जमा रखा हुआ था।

रानी रासमणि का बूढ़ा बाप अब तक इतना कमजोर पड़ चुका था जैसे कोई पुराना जर्द कागज। उसकी देह की चमड़ी छिपकली की तरह सिकुड़ गयी थी। कहते हैं कि जिस दिन वह मरा, उस दिन अंग्रेजों की कोठी में बासमती चावल पकाया जा रहा था। चूल्हे पर चढ़ाई गयी चावल की हाँड़ी से गरम-गुदाज खदबदाहट की आवाज निकल रही थी।

पकते हुए चावल की खुशबू हाँड़ी से निकलकर कोठी की सेहन तक जब पहुँची, सुबह के सवा दस बज रहे थे। सेहन में दो काले पहरेदार रात भर के जागरण के बाद अभी अधनींदे बैठे थे। वहीं एक खाज खाया कुत्ता गुटिआया हुआ पड़ा था। कुत्ते ने अपनी थूथन उठाकर खुशबू को देखा और इशारा किया। खुशबू इसकी भरपूर कोशिश करते हुए कि उसके पैरों की आहट पहरेदारों को न मिले, सेहन से उतरकर बाहर चली आयी।

कुत्ते ने जिस रास्ते की ओर इशारा किया था, उस पर कदम रखते ही चावल की खुशबू के होश उड़ गये। चारों तरफ, जहाँ तक नजर जाती, लाश ही लाश पड़ी थीं। कुछ लाशों को गिद्ध-सियारों ने बुरी तरह नोंच डाला था। उनके खुले हुए पेट से आँतों की बद्धियाँ दूर-दूर तक खिंची हुई थीं। दो सटे हुए घरों के बीच फूस की छाजन से वर्षा का पानी गिरने से जिस जगह पर एक गड्ढा बन जाता है, वहाँ एक बच्चा पड़ा हुआ था। बच्चे की साँसें अभी तक चल रही थीं। दो कौव्वे उसकी आँखों पर चोंच मार रहे थे। बच्चे के शरीर में इतनी सकत भी नहीं बची थी कि वह उन्हें उड़ा पाता। खून और कीचड़ से सनी पृथ्वी पर बेशुमार घोंघे और केंचुए रेंग रहे थे। साँपों से धरती पट गयी थी।