आदिग्राम उपाख्यान / पृष्ठ 8 / कुणाल सिंह

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चावल की सोंधी खुशबू ने अपने पाँयचे उठा लिये और खून के चहबच्चों को पार करने लगी। जैसे ही वह बच्चे के पास से गुजरी, न जाने कहाँ से ताकत बटोरकर बच्चे ने उसके एक पैर को कस के जकड़ लिया। खुशबू डरकर चीख पड़ी। बच्चे की आँखें कौव्वों की चोंच के प्रहार से बाहर निकलकर किसी पतली शिरा के सहारे लटक रही थीं। बच्चे का मुँह बार-बार खुलता बन्द हो रहा था, लेकिन कोई आवाज नहीं निकल रही थी। थोड़ी देर बाद बच्चे की पकड़ ढीली हो गयी और उसका आधा उठा हुआ शरीर वापस जमीन पर धम्म-से गिर पड़ा।

खुशबू ने ठिठककर इधर-उधर देखा कि कहीं उसकी चीख सुनकर पहरेदार तो नहीं दौड़े आ रहे हैं! ...नहीं, कोई नहीं। वह जल्दी-जल्दी रानी रासमणि की झोंपड़ी तक पहुँची। दरवाजा जैसा जो कुछ था, चौपट खुला हुआ था। भीतर चटाई पर लेटा रासमणि का बूढ़ा बाप भूख से बिलबिला रहा था। खुशबू ने राहत की एक लम्बी साँस ली कि उसे यहाँ आते किसी ने देखा नहीं। उसकी साँस की आवाज बूढ़े तक पहुँची तो उसने पूछा, 'आ गयी तू?'

खुशबू ने कहा, 'हाँ!'

अपरिचित आवाज से बूढ़ा चौंका। पूछा, 'रासमणि? ...कौन?'

'मैं, चावल की खुशबू!'

बूढ़ा बाहर आया। उसे चावल की खुशबू की लू लग गयी। वह मर गया।

परिमलेन्दु दा बताते हैं कि एक तरफ तो बंगाल के इस इलाके में इतना भीषण अकाल पड़ा था, दूसरी तरफ ईस्ट इंडिया कम्पनी के कारिन्दों का मालगुजारी वसूलने के लिए इतना अमानवीय अत्याचार। धीरे-धीरे अकाल की मार से बचे हुए लोगों में विद्रोह की चिनगारी सुलगने लगी। वे एकजुट होकर छिटपुट हमले करने लगे। कम्पनी के कारिन्दों की लाशें कभी पोखर से तो कभी जंगल से बरामद होतीं। बाद के वर्षों में आदिग्राम में दो और अंग्रेज कलक्टरों की हत्या हुई। इतिहास में इस विद्रोह को 'चुआड़ विद्रोह' कहा गया। अंग्रेज इस विद्रोह को कुचलने में नाकामयाब हो रहे थे। इलाके के बच्चे-बच्चे तक तीरन्दाजी में पारंगत हो चुके थे। जंगलों में गुप्त मीटिंगें होतीं और आगे की कार्रवाई की रूपरेखा तैयार की जाती। 'जान दूँगा, जमीन नहीं दूँगा' जैसे नारे पहली बार इतिहास में तभी गूँजे थे।

लेकिन परिमलेन्दु दा ये किस इतिहास की बात कर रहे हैं? स्कूल के पाठ्यक्रम में इतिहास की जो पुस्तक लगी है, उसमें कहाँ किसी 'चुआड़ आन्दोलन' और 'जान दूँगा, जमीन नहीं दूँगा' जैसे नारों का जिक्र आता है? कोलकाता से पढ़-लिखकर आये इतिहास के सर भी इस बारे में कुछ नहीं जानते। ...और वह 27 अक्तूबर वाली घटना? बच्चों ने जि़द पकड़ ली कि परिमलेन्दु दा एक बार फिर से 27 अक्तूबर वाली कथा सुनाएँ।

रानी रासमणि ने इलाके की औरतों को बटोरकर एक लड़ाकू वाहिनी तैयार की थी। 27 अक्तूबर, 1770 की घनघोर अँधेरी रात जब कम्पनी के कुछ कारिन्दे नलहाटी बाजार से बैलगाड़ियों पर धान लादकर चले तो उन्हें इस बात की जरा भी भनक नहीं थी कि उनके साथ क्या होने जा रहा है।

नलहाटी से जी.टी. रोड पकड़कर कलकत्ते की ओर बढ़ें तो बशीरपुर के पास आधेक मील तक रोड जंगल से होकर गुजरता है। कृष्ण पाख की अन्हरिया रात। जंगल में चारों तरफ झिंगुरों की चिर्र-चिर्र, साँपों की सिसकारियाँ। जुगनुओं की चौंध उरूज पर थी। धान से लदी चार बैलगाड़ियाँ थीं, सबके नीचे एक-एक लालटेन लटक रही थी। लालटेन की रोशनी आगे कुछ फर्लांग भर पीला उजाला कर रही थी, फिर दूर दृश्य के अँधेरे में बिला जाती थी।

पहली बैलगाड़ी पर एक लाठीधारी सिपाही भी बैठा था। बैल सुस्त चाल में चलते-चलते जब एकाएक ठिठक गये तो उसकी नींद में झिपझिपाती आँखें खुलीं। उसने चौंककर गाड़ीवान को देखा। गाड़ीवान के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थीं, यह उस मद्धिम रोशनी में भी साफ-साफ दिख गया। आँखों की पुतलियाँ स्थिर पड़ गयी थीं, मानो पत्थर की हो गयी हों। वह सामने की तरफ देख रहा था। सिपाही ने उसकी दृष्टि का अनुसरण करते हुए जब सामने की तरफ देखा, उसकी भी घिग्घी बँध गयी।

पहली नजर में तो लगा, जंगल के घनघोर अँधेरे में कहीं से दूधिया रोशनी का एक फौव्वारा फूट निकला हो। धीरे-धीरे रोशनी के केन्द्र में एक स्त्री आकृति उद्भासित हुई। सिपाही ने देखा, उस स्त्री की देह पर एक सूत भी कपड़ा नहीं था। बाल खुले हुए पीछे, जैसे घुटनों तक काले पानी का कोई झरना गिर रहा हो। शरीर का हर अंग अनावृत होकर जैसे सम्पूर्ण हो गया हो, और इस दर्प से भरकर दमकने लगा हो। केले के थम्ब जैसी चिकनी जाँघें, पेट के सुडौल खम और निर्दोष गोलाइयों वाले उच्छत स्तन जैसे दुनिया की नश्वरता और असम्पूर्णता का उपहास उड़ा रहे हों। उसकी देह से छिटकती रोशनी में दुनियावी मिट्टी का कण मात्र नहीं था, वह मानो स्वर्ग से उतरी कोई अप्सरा हो।

सिपाही को काठ मार गया। वह अपनी जगह पर बुत बन गया। कम्पनी का वह जाना-माना लठैत था। सिपाही पद पर नियुक्ति से पहले उसे लाठी चलाने की ट्रेनिंग दी गयी थी। नियुक्तिपूर्व वह हर अभ्यास में अव्वल आया था। उसका कद छ: फुट से ऊपर था। चौरस चेहरा, प्रकांड सिर, घने-घुँघरीले बाल, गलमुच्छे। उसके शरीर में दैत्य का बल था। चलता था तो धरती धम्म-धम्म बजती थी। वह उखड़े हुए अरबी घोड़े की लगाम पकड़कर मिनटों में उस पर काबू पा लेता था। अशर्फी को मुट्ठी में जकड़कर चूरमा बना डालता था। पेड़ को अँकवार में भरकर जड़ समेत उखाड़ फेंकता था। पूरा मेमना एक बार में खा जाता था और डकारता भी नहीं था। लोगबाग उसका नाम सुनकर ही काँप जाते थे। लेकिन जीवन में पहली बार डर के मारे उसकी पेशानी पर पसीने की बूँदें चुहचुहा आयीं।

रानी रासमणि उसके करीब आयी। लालटेन की पीली रोशनी में उसने रासमणि के अंडाकार चेहरे को देखा। भँवों की गोलाई, मछलियों जैसी उसकी आँखें देखीं। गरदन की मांसल धारियाँ और नीचे की फीकी त्वचा जहाँ से स्तन उगने शुरू हुए थे, बायीं तरफ एक काला तिल था। रानी रासमणि की समस्त क्रियाशीलताओं की मुखरता जैसे उसी एक तिल के प्रतिनिधित्व में हो रही थी। इस प्रकार वह तिल प्रमुख होकर सिपाही की चेतना पर छाने लगा। सिपाही उस तिल पर जाकर अटक गया। उसे लगा, उसके भीतर के सारे दरवाजे एकाएक भड़भड़ाकर बन्द पड़ गये हों। उसने अपने घुटनों में हल्की कँपकँपी महसूस की। पेड़ू में रह-रहकर एक मरोड़-सी उठ रही थी। हलक में मानो काँटे उग आये हों। उसने कई बार अपने होंठ गीले करने की कोशिश की। धड़कनों की रफ्तार इतनी बढ़ गयी थी कि लगता था छाती के पंजरे फट पड़ेंगे। सिपाही पद पर नियुक्ति के वक्त उसे बिल्कुल नहीं सिखाया गया था कि ऐसी स्थिति में उसे क्या करना चाहिए। उसके पास तेल पिलायी मजबूत लाठी थी, लेकिन आज वह एक छोटे-से तिल से हार गया था।

तभी पीछे से कई स्त्रियाँ आयीं और बैलगाड़ियों से धान की बोरियाँ उतारने में लग गयीं। सिपाही समेत सारे गाड़ीवान उन्हें ऐसा करते देखते रहे और अपनी जगह पर बुत बने रहे। बोरियाँ उतारकर उन्होंने एक दूसरे की पीठ पर लादीं और जैसे आई थीं, वैसे ही अँधेरे में बिला गयीं। रानी रासमणि ने सिपाही के कन्धे पर हाथ रखा। एकाएक सिपाही के शरीर में रक्त का प्रवाह बढ़ गया। सबसे पहले उसकी नाक से खून की बूँदें निकलीं, टपकने लगीं। दाँतों-मसूढ़ों से खून निकलकर होठों को रँगने लगा। उँगलियों की पोरें फट गयीं। कनपटी के पीछे से खून की एक झिझकती-सी रेखा निकल पड़ी। हड्डियाँ तड़कने लगीं। रासमणि के निर्वस्त्र शरीर की आँच से सिपाही झुलसने लगा, उसकी चमड़ी गलने लगी। चारों तरफ मांस जलने की एक चिरचिराती-सी गन्ध फैल गयी। देखते-देखते सिपाही का पूरा शरीर गलकर बहने लगा। सिपाही फना हो गया।

ऐसी रानी रासमणि ने इलाके के जमींदार बाबर से शादी क्यों की? कहते हैं कि बाबर अमावस की अँधेरी रात की तरह काला था, उसकी तोंद निकली हुई थी, उसकी एक आँख पत्थर की थी, उसे एक कान से सुनाई नहीं देता था, वह लँगड़ा कर चलता था और उसकी देह से हमेशा पसीने की एक अजीब खट्टी गन्ध आती थी। क्या इन्हीं सब वजहों से इस दुनिया में सिर्फ वही था जो रानी रासमणि से ब्याह कर सकता था?

'अच्छा, कोलकाता में तो बहुत बढ़िया पढ़ाई-लिखाई होती होगी न?'

'होती होगी।' नशे में डोलता सद्दाम कहता है।

'फिर इतिहास के सर रानी रासमणि के बारे में क्यों नहीं जानते?'

'रानी रासमणि तो आदिग्राम की है, कोलकाता में इतिहास की दूसरी पढ़ाई होती होगी।' हरिगोपाल सोचता है।

'हर जगह इतिहास की अलग-अलग किताब पढ़ाई जाती है क्या?' बाब्लू पूछता है। इतिहास विषय के रूप में उसे कभी पसन्द नहीं आया, वह हमेशा इतिहास में फेल होता है।

'नहीं, हरिगोपाल ने गलत कहा। हर जगह एक ही इतिहास पढ़ाया जाता है। रानी रासमणि की कथा हमारे स्कूल में चलने वाली इतिहास की किताब में भी कहाँ है!' फटिकचन्द्र ने सोच-समझकर कहा।

'क्या पता यह पुस्तक कलकत्ते में चलने वाली पुस्तक है और यहाँ के स्कूल में लगा दी गयी है।'

'क्या पता परिमलेन्दु दा झूठ बोलते हों।'

'क्या पता सच बोलते हों, सचमुच की कोई रासमणि हो और हमें बताया नहीं गया। इसलिए परिमलेन्दु दा बताते हैं तो हमें झूठ लगता है।'

'क्या पता।'

'पता नहीं!'

गुलाब को अपने पर लिखा गया निबन्ध याद करना होगा।

जब हम देखते हैं तो क्या देखते हैं ?

जाड़े के छोटे दिन। साढ़े पाँच-छह तक अँधेरा उतर जाता है। हराधन के यहाँ से जब बाघा लौटा, गुलाब एक हाथ में किरासिन की ढिबरी लिये चिमटे से दीवार पर लगे उपले उतार रही थी। बाघा को देखा तो चिमटे वाले हाथ से खींचकर आँचल सिर पर लेना चाहा, लेकिन तत्काल ऐसा न हो सका। बाघा खाँसते हुए कोठरी की तरफ बढ़ चला।

गुलाब के आने के बाद से बाघा की रहनवारी का एक हद तक कायान्तरण हो चुका था। बाहर वाली कोठरी, जिसे गुलाब के आने से पहले रसोई की तरह इस्तेमाल में लाया जाता था, बाघा ने अपनी चारपाई वहीं डाल ली थी। चारपाई पर साफ चदरी बिछी थी। दीवार पर माँ तारा की तस्वीर वाला एक कैलेंडर टँगा था। दरवाजे के दायें-बायें अँजुरी से फूल गिरातीं दो लड़कियों की तस्वीर और ऊपर की चौखट से टँगे आम के पत्तों की झालरनुमा तोरण पर 'वेलकम' लिखा हुआ। आम के पत्ते सूख गये हैं। कपड़े-लत्ते आले पर करीने से तहा कर रखे हुए थे। भीतर वाली कोठरी में दक्खिना और गुलाब रहते थे। दोनों कोठरियों के बीच की जगह में थोड़ी आड़ कर दी गयी थी, जहाँ फिलहाल मिट्टी के चूल्हे पर एक हाँड़ी चढ़ी थी। बाघा ने सोचा कि आते वक्त हराधन से दो-चार लीटर किरासिन तेल लेते आना चाहिए था। स्टोव पर खाना बहुत जल्दी बन जाता है और धुएँ-उपले की कोई झंझट नहीं रहती।

बाघा ने अपने भीतर गुलाब के लिए एक अजीब मुलायम-सा भाव उमड़ता हुआ महसूस किया। आज अगर उसकी बेटी होती तो गुलाब की ही उमर की होती। बाघा को अफसोस हुआ कि आज ही वह हराधन से गुलाब के बारे में क्या-कुछ उल्टा-सीधा बक आया है। उसे ऐसा नहीं करना चाहिए था, जो भी हो गुलाब अब उसके घर की इज्जत है।

दरअसल गुलाब से बाघा की चिढ़ की कुछ ठोस वजहें हैं। एक तो मयना कांड के बाद बाघा औरतजात से ही चिढ़ने लगा है, दूसरे गुलाब भी मयना की तरह बांग्लादेशी है। औरत और वह भी बांग्लादेशी, मतलब करेला और नीम चढ़ा। फिर जब से गुलाब आयी है, दक्खिना का मन धन्धा-रोजगार में कम ही लगने लगा है। पहले वह हर रात धन्धे पर निकलता था और कुछ न कुछ बटोर ही लाता था, लेकिन अब वह कभी-कभी नागा भी कर दिया करता है। इसके अलावे दिन भर दोनों के बीच प्यार-मनुहार का खेल चलता रहता है और कभी-कभी वे यह भी भूल जाते हैं कि बगल की कोठरी में बाघा सोया है या जग रहा है। लड़की भी दक्खिना के पीछे ठीक-दुरुस्त रहती है, लेकिन अगर उसके साथ दक्खिना भी हो तो उससे लाज-लिहाज-मरजाद ऐसे गायब हो जाते हैं जैसे गधे के सिर से सींग। दोनों कभी-कभी शाम को हाथ में हाथ डाले घूमने-टहलने निकल जाते हैं और रिक्शा पर सवार होकर एक दूसरे के हाथ से आइसक्रीम चाभते हुए लौटते हैं। या दिन-दुपहरी एक साथ पोखर में नहाने उतर जाते हैं। घंटों एक दूसरे की देह पर पानी उलीचते हैं, जलकुम्भियों के कन्द उछालते हैं और पनिया साँप की माला पहन लेते हैं। टिटकारी मारकर पनकौव्वे, बगुले या टेंटेई उड़ाते हैं।

औरत बाघा के साथ भी रही लेकिन ऐसी मस्ती को उसने सदैव दूर से प्रणाम किया, जिसमें मनुष्य को इन्द्र-चन्द्र की भी सुध नहीं रहती। यह क्या कि पूरा गाँव तमाशा देखे जा रहा है और आपको कोई होश ही नहीं। गाँव भर में इनकी बेशर्मी के किस्से मशहूर हो रहे हैं। वह दिन दूर नहीं जब गाँव के मातब्बर पंचानन बाबू बाघा को बुला भेजें और डाँट-फटकार लगाने लगे।

पंचानन बाबू शिकायती बोर्ड पर लिखी पंक्तियों को आधार बनाएँगे। कोई आधी रात, जब कोई देखता न होगा, आकर बोर्ड पर गुलाब के लिए लिख गया होगा कि उसके आचरण से गाँव की लड़कियों पर गलत असर पड़ रहा है।

'उल्टे पल्ले की साड़ी पहनती है। सिंगार-पटार पर खूब ध्यान देती है। वेल्वेट की 'सदा सुहागन' बिन्दी और 'अमानत' पाउडर लगाती है। इठला के चलती है। दो लम्बर की जाली पारटी है।'

- एक गुमनाम आदमी।

पंचानन बाबू एक छड़ी को बोर्ड पर लिखे हर शब्द पर फिराते हुए पढ़ेंगे जैसे स्कूल में मास्टर लोग पढ़ते हैं - मदन घर चल, माला ताला ला। दुआर पर जितने भी लोग बैठेंगे, पंचानन बाबू द्वारा हर पंक्ति के पढ़े जाने के बाद उसे सस्वर दुहराएँगे। एक बार, फिर बार-बार। बार-बार दुहराने से उन्हें वे पंक्तियाँ याद होने लगेंगी। इस प्रकार उनकी जेहन में गुलाब की एक छवि बनेगी। छवि इठला के चलेगी, 'अमानत' पाउडर लगाएगी। गाय पर निबन्ध, मेरा प्यारा गाँव पर निबन्ध की तरह पंचानन बाबू गुलाब पर निबन्ध लिखने की 'टास्क' देंगे। धीरे-धीरे इन पंक्तियों में और भी पंक्तियाँ जुड़ती चली जाएँगी और गाय की तरह, हमारा प्यारा गाँव की तरह गुलाब का चरित्र निर्धारण होगा।

'मुझे और भूख लगी है, एक रोटी और खाऊँगी।' अगर गुलाब कहेगी तो सारे लोग जल्दी-जल्दी निबन्ध के पन्ने पलटने लगेंगे। आपस में राय-विचार कर निष्कर्ष निकालेंगे कि वह सिर्फ दो रोटी ही खा सकती है।

पंचानन बाबू के दुआर पर सारे लोग बैठे रहेंगे और बाघा अपनी बेंच पर खड़ा रहेगा। उसे मन ही मन घंटी के बजने का इन्तजार होगा। घंटी बजने के बाद सारे लोग दुआर से चिल्लाते हुए भागेंगे - 'छुट्टी'! लेकिन बाघा वहीं खड़ा रहेगा। पंचानन बाबू बोर्ड पर लिखे को डस्टर से मिटाने के बाद एटेंडेंस रजिस्टर उठाकर जाने को होंगे कि उनकी नजर बाघा पर जाएगी। उन्हें याद आएगा। वे उसके पास आएँगे। कहेंगे, 'बाघा, तुम इलाके के नामी चोर हो। गाँव के सभी लोग तुम्हें मानते हैं, तुम्हारा आदर करते हैं। लेकिन यह लड़की तुम्हारी इज्जत पर बट्टा लगा रही है। तुम्हें कुछ करना चाहिए, वर्ना मजबूर होकर मुझे एक्शन लेना पड़ेगा।'

बाघा कुछ कहना चाहेगा, लेकिन ऐन क्या कहना चाहिए, ठीक-ठीक पता नहीं चल पाएगा। इस प्रकार वह चुप ही रह जाएगा।

पंचानन बाबू पूछेंगे, 'तुम्हें अपनी सफाई में क्या कहना है बाघा?'

बाघा चुप रहेगा। उसे सहसा याद आएगा कि गुलाब इठला के चलती है, यह उसने हराधन के यहाँ से लौटते हुए सोचा था। 'अमानत' पाउडर भी उसी ने कोठरी में रखे आले पर देखा था। हथेली पर जरा-सा छिड़का भी था। क्या खुशबू थी उसकी!

पंचानन बाबू उसके कन्धे पर हाथ रखेंगे। मुलायम स्वर में कहेंगे, 'देखो बाघा, यह पूरे गाँव की इज्जत का सवाल है। गाँव की बहू-बेटियों, लड़कियों पर गलत असर पड़ेगा, मतलब गाँव की इज्जत खराब होगी। समझ रहे हो न? फिर भी तुम्हें एक मौका दिया जा रहा है। जो तुम कर सकते हो, करो। और अगर नहीं कर पा रहे हो तो हमें कहो, आखिर हम गाँव के बड़े-बुजुर्ग हैं! मेरी मानो तो दोनों को निकाल बाहर करो। न यह लड़की ठीक है और न वह लड़का, क्या नाम है उसका...!'

पंचानन बाबू चाचा नेहरू की तरह गाल पर एक उँगली रखकर सोचने लगे। जब भी उन्हें कुछ याद करना होता है, वे ऐसा ही करते हैं। बाघा ने सोचा कि वह मर जाएगा, फिर भी उन्हें दक्खिना का नाम याद नहीं दिलाएगा। लेकिन तब तक कोई आकर शिकायती बोर्ड पर लिख जाता है - दक्खिना रजक।