आदिग्राम उपाख्यान / पृष्ठ 9 / कुणाल सिंह

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'हाँ याद आया, दक्खिना!'

'मैं तो बस याद दिलाने ही वाला था।' बाघा ने कसम खाकर कही।

'देखो बाघा, कुछ लोगों ने दक्खिना को बी.एस.एफ. के सिपाहियों से घुल-मिलकर बातें करते देखा है। मुझे शक है, वह बीच-बीच में बांग्लादेश भी आता-जाता होगा। तुम्हें खबरदार करना मातब्बर होने के नाते मेरा फर्ज था, सो किया। बाकी तुम देख लो।'

अन्त में बाघा सिर झुकाये अपने ठिए पर लौटेगा कि रास्ते में अँधेरा हो जाएगा। जाड़े के छोटे दिन, साढ़े पाँच-छह तक अँधेरा उतर जाता है। गुलाब एक हाथ में किरासिन की ढिबरी लिये चिमटे से दीवार पर लगे उपले उतार रही होगी। बाघा को देखेगी तो चिमटे वाले से हाथ से खींचकर आँचल सिर पर लेना चाहेगी, लेकिन तत्काल ऐसा हो न सकेगा। बाघा अपने भीतर उसके प्रति एक अजीब मुलायम-से भाव को उमड़ते हुए महसूस करेगा। वह सोचेगा कि आते वक्त हराधन से दो-चार लीटर किरासिन तेल लेते आना चाहिए था। स्टोव पर खाना बहुत जल्दी बन जाता है और धुएँ-उपले की कोई झंझट नहीं रहती।

हमने पुतली माई के हवाले से पहले ही कहीं कहा था कि गाँव के लोगों का मानना है, हराधन की माँ चुड़ैल थी। मुख्य रूप से इसी कारण उसकी शादी नहीं हुई। भला कौन होगा जो किसी चुड़ैल के लड़के के हाथ में अपनी लड़की दे और दुनिया भर के आगे बेटीबेचवा कहलाए! एक बार पंचानन बाबू ने पास के किसी गाँव में हराधन का रिश्ता कराने की जुगत भी की थी, लेकिन ऐन मौके पर किसी दिलजले ने भेद खोल दिया और लड़की वाले भाग खड़े हुए। इसके बाद हराधन ने खुद ही ब्याह करने से मना कर दिया।

हराधन का बाप काली मंडल भी दुकान चलाता था। एकाध बीघे की खेती भी थी। जब काली खेत पर होता तो उसकी माँ, यानी हराधन की दादी दुकान पर बैठती। तब जमाने में रुपये-पैसे का इतना चलन नहीं था। बच्चों को अगर लेमनचूस खाने होते थे तो अँगोछे में या फ्रॉक में अँजुरी भर चावल या मकई लेकर जाते थे और बदले में लेमनचूस या काले पाचक की पुड़िया प्राप्त कर आते थे।

तब हराधन की माँ जीवित थी, लेकिन हराधन का जन्म नहीं हुआ था। गाँव की बड़ी-बूढ़ियाँ बताती हैं कि हराधन की माँ बहुत सुन्दर थी, तिस पर भी काली ने उसे छोड़ रखा था। काली का बड़ा भाई फौज में था और जब चीन से लड़ाई हुई थी तो शहीद हुआ था। बड़े भाई की मृत्यु के बाद काली की नजदीकियाँ अपनी विधवा भाभी से बढ़ गयी थीं। इसे लेकर हराधन की माँ हमेशा दुखी रहती थी, घुट-घुटकर रोती-कलपती रहती थी। भोरहरी में, या अँधेरा उतरने पर साथ में दिशामैदान को जाने वाली औरतें-लड़कियाँ उससे पूछती थीं कि कौन-सा गम उसे खाये जा रहा है, लेकिन वह किसी से कुछ नहीं कहती, चुप रहती और जब बर्दाश्त से बाहर हो जाता, मुँह में आँचल ठूँसकर रोने लगती। औरतें-लड़कियाँ सोचती थीं कि हो न हो वह अपनी सास के अत्याचारों से त्रस्त है और जग-हँसाई के डर से किसी को कुछ नहीं बताती। इन्हीं में से पुतली माई भी थी जो तब साल भर पहले ब्याह कर आदिग्राम आयी थी।

काली की माँ, यानी हराधन की दादी के बारे में पुतली माई कहती है कि वह बड़ी कुटनी थी। बड़ी बहू को चूँकि विधवा पेंशन मिलती था, इसलिए उसे खूब मानती थी और घर का सारा काम काली की बीवी से करवाती थी। खुद भी एक खर नहीं सरकाती थी, दुकान पर बैठती थी या घूम-घूमकर पर-पंचइती करती रहती थी। आधी-आधी रात तक काली की बीवी से अपने गोड़ दबवाती थी और उधर काली अपनी भाभी का लहँगा सूँघता रहता।

एक बार जब पूरे गाँव में हैजा फैला तो काली की बीवी भी उसके प्रकोप में धरा गयी। शहर से डॉक्टरों का एक दस्ता आया था जो हैजे से पीड़ित लोगों का मुफ्त में इलाज करता था। कहते हैं कि अन्त समय में काली का मन पसीजा था और वह अपनी पत्नी का इलाज करवाना चाहता था, लेकिन काली की माँ ने ऐसा नहीं होने दिया। वह पराये डॉक्टरों द्वारा अपने घर की औरत को 'छूने-सहलाये जाने' के विरोध में अड़ गयी और काली को धमकी दे डाली कि अगर वह ऐसा करेगा तो अगले ही पल गले में बालू से भरा गगरी बाँधकर पोखर में छलाँग लगा देगी। अन्त में दो दिनों तक बुरी तरह छटपटाने के बाद काली की पत्नी मर गयी। तब तक हराधन का जन्म नहीं हुआ था।

पत्नी के मरने के बाद काली एकदम से बदल गया, ऐसा बतलाते हैं। दिन-दिन भर आम की बगियारी में बउआता रहता, पाखी-पखेरू से अपना दुखड़ा रोता, बिलखने लगता। दो-तीन महीने में ही सूखकर काँटा हो गया, आँखें धँस गयीं, गालों पर की हड्डियाँ उभर आयीं, चेहरे का रंग कोयला हो गया, पूरे चेहरे पर नाक खांडे की तरह निकली प्रतीत होती थी। चलता था तो हड्डी-पंजरी आपस में टकराती, खन-खन बजती।

इधर मरने के बाद काली की बीवी चुड़ैल बन गयी। संयोग से उसने उसी आम की बगियारी में एक घने पेड़ को अपना ठियाँ बनाया। दिन भर पेड़ के घनेरे में छिपकर रहती और रात उतरते ही घूमने-पराने निकल पड़ती। एक दिन की बात है कि काली उसी पेड़ की जड़ के पास बैठा रो रहा था। डाल से लटक रही चुड़ैल ने देखा तो झट एक सुवे का रूप धरा और पूछा, 'ऐ आदमी, तू क्यों रो रहा है, बता।'

काली ने सुवे को आदि से इति तक अपनी व्यथा-कथा बतलायी। सुवे की भेख में चुड़ैल ने जब अपने पति को पछतावे की आग में झुलसते देखा तो उसकी आँखें भर आयीं, दिल पसीज गया। उसने मन ही मन संकल्प किया कि जैसे भी हो वह अपने पति से मिलकर रहेगी।

सुवे ने काली से पूछा, 'ऐ आदमी, अगर आज की रात तेरी अभागन नार तुझसे मिलने आये तो तू क्या करेगा, बता।'

काली ने सुवे से कहा, 'फिर तो मैं उसे अपने पास से कभी न जाने दूँ। एक बार उसे खो चुका हूँ, दुबारे से ऐसी गलती भूलकर भी न करूँगा।'

सुवे ने कहा, 'लेकिन अब तो वह चुड़ैल की योनि में चली गयी है। दिन होते ही उसे वापस अपनी योनि में जाना पड़ेगा। अगर तू वचन दे कि सुबह होने से पहले तू उसे जाने दिया करेगा तो वह हर रात तुझसे मिलने आया करेगी।'

सुनकर काली की खुशी का ठिकाना न रहा। पूछा, 'ऐ सुवे, क्या ऐसा सचमुच हो सकेगा?' सुवा चुप ही रहा। सुवे को कुछ बोलता न पाकर काली बेचैन हो गया। आतुर होकर बोला, 'मैं वचन देता हूँ कि भोर उपजने से पहले-पहले मैं उसे विदा कर दिया करूँगा।'

तब सुवे ने कहा कि आज से वह घर के बाहर वाली पलानी में अपनी खटिया डाल ले और रोज रात को वहीं सोया करे। अगर कोई पूछे तो कहा करे कि घर-गिरिस्ती से उसका मन उचट गया है। हर रात दूसरे पहर उसकी पत्नी उसी मड़ई में उससे मिलने जाया करेगी और उसके साथ एक पहर बिताकर चली आएगी। इतना कहने के बाद सुवा उड़ा और पेड़ के घनेरे में बिला गया। काली खुशी-खुशी अपने घर लौट आया।

कहे के मुताबिक रात के दूसरे पहर चुड़ैल आयी। दूध की-सी चाँदनी। दुआर पर चारों तरफ सुनसान था, चिरई का पूत भी नहीं था, फिर भी चौकन्ना होकर उसने इधर-उधर देखा। दूर चिमन साहू के दुआर पर खूँटे से बँधी भैंस पगुरा रही थी। वहीं थोड़ा हटकर धान उसीनने की हाँड़ी औंधी पड़ी थी। धान को खेतों से लाकर खलिहान में रखने के दिन थे। हर घर के दुआर पर पुआलों का ढेर लगा रहता। सूप में धान को उठाकर ऊपर से गिराने से खलियाँ-खखरी उड़ जातीं और ढेर लग जाता। दिन भर अनाज को उसीनने-सुखाने-निराने का काम चलता रहता। पलानी के पास ही बैलों को खोल एक बैलगाड़ी को झुकाकर रखा गया था। उसके चक्कों के पास कुछ चूहे चावल के दानों के बीच चीं-चीं करते फुदक रहे थे।

चुड़ैल ने धीमे से पलानी का दरवाजा खोला और अन्दर हो लिया। भीतर काली उसका इन्तजार ही कर रहा था। वचन के अनुरूप उसने भोर होने से पहले ही चुड़ैल को विदा कर दिया। इस तरह वह रोज ही पलानी में सोने लगा तो एक दिन उसकी माँ ने टोका कि आखिर क्या बात हो गयी जो अब वह घर में नहीं, बाहर मड़ई में सोने लगा है। सुवे के सिखाये अनुसार काली ने कहा कि अब घर-गृहस्थी से उसका मन हट चला है। वह सारे सुखों को तजकर अब सात्विक जीवन जीना चाहता है।

काली की माँ ने आखिर नौ महीने उसे अपने पेट में रखा था। उसे समझते देर न लगी कि वह झूठ बोल रहा है और कि दाल में कुछ काला है। उसने तय किया कि चाहे जैसे भी हो आज की रात वह सचाई का पता लगाकर रहेगी। ऊपर-ऊपर उसने रोने का नाटक किया। कलपते-बिसूरते हुए काली को छाती से लगा लिया कि इस भरी जवानी में उसका पूत साधू-संन्यासी होने चला है। काली इस तिरिया चरित्तर को समझ न सका।

उस रात काली की माँ घर के किवाड़ की आड़ लेकर खड़ी हो गयी और इन्तजार करने लगी। चाँदनी रात थी, इस कारण किवाड़ की आड़ से पलानी तक साफ-साफ देखा जा सकता था। रात के दूसरे पहर चुड़ैल को आना था, आयी और पलानी के दरवाजे के पास ठिठककर इधर-उधर देखा। काली की माँ ने जब सफेद साड़ी में लिपटी चुड़ैल को देखा तो अचकचाई कि गाँव की यह कौन स्त्री है जो चुपके-चुपके उसके बेटे के पास आयी है। फिर जब उसकी नजर चुड़ैल के उल्टे पाँवों पर गयी तो समझने में देर न लगी कि यह कोई अनचिन्हार औरत नहीं, काली की मृत पत्नी ही है जो मरने के बाद अब चुड़ैल बन चली है।

जब चुड़ैल आश्वस्त होकर पलानी के भीतर चली गयी तो काली की माँ अपने कमरे में लौट आयी। उसने अपने आँचल से एक चाकू बाँध लिया और इन्तजार करने लगी। रात का दूसरा पहर जब बीतने को हुआ, वह घर से निकली और बिल्ली की तरह दबे पाँव पलानी के दरवाजे से जा लगी। कान लगाकर सुना, भीतर घोर शान्ति व्याप्त थी। दरवाजों की फाँक से लगकर देखा, काली और चुड़ैल एक दूसरे से लिपटे बेसुध सो रहे थे। दोनों के कपड़े अस्त-व्यस्त हो रहे थे। चुड़ैल के बाल खुलकर खटिया से नीचे को लटक रहे थे। काली की माँ ने पलानी का दरवाजा इतने हौले से खोला जैसे घाव पर से पट्टी उतारते हैं। घुटनों के बल चलती हुई वह खटिये तक पहुँची और चाकू से चुड़ैल के कुछ बाल काट लिये।

सुबह जब चुड़ैल चलने को हुई तो उसके कदम उठ ही नहीं रहे थे। किसी तरह पैर घसीटते हुए वह वहाँ से निकली, लेकिन रास्ता भटककर फिर वहीं की वहीं पहुँच गयी। ऐसा कई बार हुआ, यहाँ तक कि पूरब आसमान में लाली छिटक आयी और मुसलमानों की बस्ती की तरफ से ढेंकियों पर चिवड़ा कूटने की आवाज आने लगी। चुड़ैल को सारा माजरा समझ में आ गया। वह वापस पलानी में आयी और काली को बताया कि उसकी माँ ने उसके थोड़े से बाल काट लिये हैं। जब तक उसके बाल नहीं मिल जाते, वह चाहकर भी यहाँ से जा नहीं सकती।

काली उसे लेकर जब अपनी माँ के पास पहुँचा तो माँ ने स्वीकार कर लिया कि उसने ऐसा किया है। जब चुड़ैल ने अपने बाल माँगे तो माँ ने कहा, अभी फुर्सत नहीं है, देखती नहीं कि इतने सारे बर्तन माँजने को पड़े हैं। चुड़ैल पल की पल में बर्तन माँजने में जुट गयी। बर्तन माँजकर उठी और फिर अपने बाल माँगे तो सास ने कहा, अभी फुर्सत नहीं है, घर में झाड़ू-बुहार करना है। चुड़ैल ने झाड़ू उठा लिया और घर बुहारने में लग गयी।

काली की माँ काम गढ़ना खूब जानती थी, चुड़ैल को जरा भी फुर्सत न देती। चुड़ैल जब भी अपने बाल माँगने जाती, कोई न कोई काम अढ़ा देती - घर-दुआर लीपना, कंडे थापना, छानी में लगे मकड़े का जाल हटाना, मसाला बाटना, बरी पारना, सूखने के लिए राई पसारना, सिरका छानना, ढेंकी चलाना आदि गृहस्थी में रोज ही सैकड़ों काम उपजते हैं। ऐसे ही दिन बीतते रहे और एक दिन चुड़ैल ने काली के कानों में फुसफुसाकर कहा कि वह पेट से है। काली की खुशी का ठिकाना न रहा। जब उसकी माँ ने सुना तो वह भी बहुत खुश हुई। अब तक दिन-रात उसे एक ही चिन्ता खाये जा रही थी कि उसके चौखट पर दीवा जलाने वाला कोई न हुआ। बड़ी बहू निपूती ही विधवा भई और हैजे ने दूसरी बहू को भी लील लिया। अब जब उसने यह खबर सुनी तो जैसे उसके सारे मृत पड़ चुके अरमान जाग उठे। उसने गौरांग महाप्रभु से गुहार लगायी कि उसे पोता ही हो और वह उसका नाम श्री हराधन मंडल रखेगी।

एक दिन जब चुड़ैल ने अपने बाल माँगे तो सास को सूझा ही नहीं कि उसे क्या काम अढ़ाये। जब चुड़ैल नकियाते हुए अपने बाल माँगती ही रही तो सास ने कहा, अभी फुर्सत नहीं है, एक पसेरी गेहूँ फटकना है। चुड़ैल को आश्चर्य हुआ कि अभी दो-एक दिन पहले ही उससे गेहूँ फटकवाया गया था। बहरहाल, वह कोठाल से गेहूँ निकालने लगी। अचानक उसे कागज की एक पुड़िया मिली। खोलकर देखा तो उसमें उसके बाल लिपटे पड़े थे। सास की नजर पड़ी तो दौड़ी-दौड़ी आयी और चुड़ैल के पैरों से रपट गयी। चुड़ैल ने कहा कि अब उसके बाल मिल गये हैं, वह किसी भी सूरत पर नहीं रुक सकती। सास ने बिनती के स्वर में कहा कि अगर चुड़ैल ने जाने की ठान ही ली है तो उसे भला कौन रोक सकता है, लेकिन अब बस दो-ढाई महीने रह गये हैं, अगर वह बच्चा होने तक रुक सके तो बड़ी मेहरबानी होगी। चुड़ैल पसोपेश में पड़ गयी, बच्चे की बाबत तो वह भूल ही गयी थी। सात महीने का पेट लेकर वह कहाँ मरघट-मसान में घूमती-पराती रहेगी! पेड़ पर चढ़ने-उतरने में भी दिक्कत होगी।

अन्त में उसने अपना सात महीने का गर्भ अपनी जेठानी को दिया और पल की पल में वहाँ से अन्तर्धान हो गयी। दो महीने बाद जब बड़ी बहू ने हराधन को जन्म दिया तो पूरे गाँव में हल्ला मच गया। लोगों ने काली को मारने के लिए घेर लिया जिसने अपनी विधवा भाभी के साथ मुँह काला किया था। अन्तत: काली की माँ को आगे आना पड़ा और शुरू से लगाकर अन्त तक सारी कहानी कहनी पड़ी। लोगों को विश्वास नहीं हुआ तो उसने नवजात बच्चे के सिर पर हाथ रखकर किरिया खायी।

बच्चे का नाम हराधन पड़ा। आज भी लोग यह कहते हैं कि जिस वंश को आगे बढ़ाने के लिए बुढ़िया ने चुड़ैल को इतना तड़पाया, वह देखो कैसे बुझने वाला है। भला कौन होगा जो अपनी बहन-बेटी का ब्याह किसी चुड़ैल के लड़के से करेगा!

जीप फिलहाल तीन ताड़ वाले रास्ते पर खड़ी थी। कलकत्ते से बैनर्जी आ चुका था और जीप से उतरकर दूर-दूर तक पसरे खेतों को देख रहा था। जाड़े की चमकीली धूप थी जिसकी चौंध से आँखों को बचाने के लिए उसने उल्टी हथेली की आड़ कर ली थी। रंजन मजूमदार ने हमेशा की तरह हैट पहन रखा था। सहायक जतिन विश्वास जीप के बोनट पर फैलाये गये नक्शे पर झुका हुआ कुछ देख रहा था। उन लोगों के साथ शमसुल भी था जो जीप के पिछवाड़े खड़े तीन ताड़ के पेड़ों के पास बैठा ऊँघ रहा था।

बैनर्जी ने जतिन विश्वास को नक्शे पर झुका हुआ देखा तो मुस्कराया। बोला, 'हाथ पर हाथ रखकर सिर्फ नक्शा निहारने से कुछ नहीं होने वाला बरखुरदार। एरिया आइडेंटिफिकेशन को फेब्रीकेट करो। पिछले दो हफ्ते से तुम लोग यहाँ क्या कर रहे हो, यह मेरी समझ से बाहर है।'

कम्पनी ज्वाइन करने से पहले बैनर्जी फौज में था। उसकी चाल-ढाल में वही ठसक और आवाज में वही कड़क अब भी मौजूद थी। वह अब भी फौजियों की तरह छोटे-छोटे बाल रखता, तन कर चलता खड़ा होता और उसके चेहरे पर जमीन की मटमैली सतह से खूब ऊपर उठे होने का वही दर्प था जो बेवकूफ फौजियों में भूसे की तरह शुरू से ही भर दिया जाता है।

'सर वो...। कम्पनी नहीं समझेगी बट यू कैन अंडरस्टैंड सर कि इस सबमें टाइम तो लग ही जाता है। एंड द पीपल हियर आर वेरी फिल्दी।' रंजन मजूमदार को जब सूझा नहीं कि बैनर्जी के इस अटैक का क्या जवाब दे तो वह कहानी बनाने पर उतर आया।

'दे आर फिल्दी बिकॉज यू आर फोर्सिंग देम टु फील देयरसेल्व फिल्दी।' बैनर्जी एक साँस में उगला, फिर अगले ही पल ठंडा पड़कर समझाइश के लहजे में बोला, 'उनके बीच बाहर के आदमी बनकर जाओगे तो वे कभी ओपन-अप नहीं होंगे। मेक देम कम्फर्टेबल एंड ईजी।'

'सर आपने कहा प्रोपोजल को फेब्रीकेट करो। सर मैं कुछ समझा नहीं।'

'मतलब कम्पनी को जो मीमो भेजोगे उसमें मेंशन करो कि अब तक तुमने यहाँ के अधिकांश किसानों से बातें कर ली हैं। भइया, नौकरी बचानी हो तो ऐसा करो, वर्ना लिख दो कि दो हफ्ते से तुम लोग यहाँ गुलछर्रे उड़ा रहे हो। तुम लोगों को दो हफ्ते लगते हैं पेपर वर्क पूरा करने में?' बैनर्जी कड़का।

'सर, कुछ किसानों से बातें तो की ही हैं।' रंजन मजूमदार अब तक हकलाने पर उतर आया था।

'शाबाश! तुम्हें पता भी है कि तुम्हें जिस एरिया को आइडेंटीफाई करना है, वह है कितना? दो हफ्तों में दो किसानों से बातें हुईं तुम्हारी। हमें उन्नीस हजार एकड़ चाहिए, दो बिस्वा नहीं। यू शुड बी फास्ट, यू नो?'

'येस सर।'

'तो एक तरफ तो बढ़ा-चढ़ाकर कम्पनी को लिखो और दूसरी तरफ दिन-रात लोगों को मोबिलाइज करने में लग जाओ, समझे? ...और हाँ याद रखो, अपने आपको किसी भी तरह के कमिटमेंट से बचा के रखना है तुम्हें। फिलहाल स्टेट गवर्नमेंट की तरफ से ऐसा कोई निर्देश नहीं मिला है हमें। या हद से हद यह वर्वल आश्वासन दे सकते हो कि केमिकल हब के बैठने के बाद उन्हें कॉन्ट्रैक्ट बेसिस पर मजदूरी दी जाएगी।'

'ओके सर।' कहते हुए रंजन मजूमदार ने जतिन को इशारा किया। जतिन ने जीप के पीछे लदे काटन से दो-तीन कैन बियर लाकर रंजन और बैनर्जी को दिया। बियर देखकर बैनर्जी थोड़ा नरम पड़ा। सिप करते हुए बोला, 'आदिग्राम, बशीरपुर, मुंशीग्राम और रानीरहाट से ही काम नहीं चलेगा। लाओ जरा मैप तो दिखाओ।'

इससे पेश्तर कि जतिन बोनट पर बिछाये नक्शे को उठाता, बैनर्जी खुद वहाँ चला गया। जतिन ने थोड़ा खिसककर दोनों के लिए जगह बनायी। बैनर्जी नक्शे को गौर से देखने लगा। एक जगह उँगली रखते हुए पूछा, 'ये क्या है?'