उद्योग और राजनीतिक गठजोड़ का खेल है जीडीपी एवं महंगाई / अमित त्यागी

Gadya Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

तुम्हारे पाँव तले ग़ज भर ज़मीन नही
कमाल यह है फिर भी तुम्हे यकीन नही
तेरी ज़बान है झूठी जम्हूरियत की तरह
तू एक ज़लील सी गाली से बेहतरीन नही
---दुष्यंत कुमार

राजनीति, मुद्दों की होनी चाहिए, मुद्दों पर नही। मुद्दे प्रायः दो परिप्रेक्ष्य में उठाये जाते हैं। एक मसले को हल करने के लिए एवं दूसरा मसले का राजनीतिक फायदा उठाने के लिए। जब मुद्दों की राजनीति के स्थान पर मुद्दों पर राजनीति होने लगती है तब समस्या पहले विकराल रूप धारण करती है फिर नासूर बन जाती है। इसके बाद इसका फायदा उठाने वाले कुकरमत्ते की तरह उगने लगते हैं। हिंसात्मक आवाहन होते हैं और फिर मसला कोर्ट में पहुँच जाता हैं। मुद्दों पर राजनीति करने वाले इसके बाद नया मुद्दा उठा लेते हैं। फिर उस मुद्दे का भी बलात्कार किया जाता हैं। मसले का हल करने वाली राजनैतिक इच्छाशक्ति वर्तमान में लुप्त हो गयी है।एक महत्वपूर्ण मुद्दा है कि कैसे ज्यादा से ज्यादा लोग पैसा कमायें न कि ज्यादा से ज्यादा लोग पैसा गंवाएँ। आज भारतीय बाजा़र मे कीमत अंतर्राष्ट्रीय बाजा़र के अनुसार तय होती है। जो देश अपने यहॉ की मंदी में बहुत कुछ गवाँ बैठे हैं वह अब भारत पर नज़रें गड़ायें बैठे हैं। विदेशी पूंजी के द्वारा सेंसक्स में आयी बढ़ोतरी पूंजी के जाते ही अर्थव्यवस्था को चोट पहुँचा जाती है। तेजी का जश्न भी लोग मना नही पाते कि मंदी आ जाती है। उद्वारण के लिए क्रिसमस के आसपास अधिकतर विकसित देशों के शेयर बाज़ार बंद रहते हें तो वहॉ के निवेशक अपना पैसा भारत में लगा देते हैं फलस्वरूप एक हफतें के लिए भारत के बाज़ार में उछाल आ जाता है। नये वर्ष पर विदेशी निवेशक अपना पैसा निकाल लेते हैं। बाजार फिर नीचे आ जाता है। सबसे ज्यादा प्रभावित मध्यवर्ग ही होता है क्योंकि.. वह आकांक्षाओं को पालता है एवं सपनो के सच होने के लिए निवेश करता है। और मुॅह की खाता हैं। इसके निवारण के लिए ऐसे पूंजी निवेश की तरफ ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो अर्थव्यवस्था की जड़ों को मजबूत करे न कि मौसमी फल की तरह आकर विदेशी पूंजी को सम्मानित करके चला जाये। हमारी स्वयं की पूंजी जो विदेशों में फंसी है या काले धन के रूप में जमा हैं, का भारत में वापस आना एवं स्थानीय विकास पर निवेशित होना लाभकारी होगा। प्रधानमंत्री जी ने 100 दिन के कार्यकाल में काले धन की वापसी का वादा किया था किन्तु अब तो उनका दूसरा कार्यकाल भी समाप्त होने को है काले धन के द्वारा भी मॅहगाई नियंत्रण में कुछ मदद मिल सकती है।

हम लोग विकसित देशों का अनुकरण तो कर रहें हैं किंतु उनके यहाँ की वास्तविकताए कुछ भिन्न हैं। विकसित देश आर्थिक खुशहाली का दंभ तो भरते हैं किन्तु मानसिक खुशहाली उनके पास नही है। इसका सबूत है कि फ्रॉस के राष्टपति निकोलस सरकोजी ने समग्रता में खुशहाली ढूंढने के लिए आग्रहपूर्वक कई नोबेल विजेता जैसे लेआर्ड, अमर्त्य सेन, स्टिंगलिज्ग, पार्थदास गुप्ता जैसे अर्थशास्त्रियों को मानवीय खुशहाली का पैमाना निर्माण करने को कहा है, जिसका आधार आर्थिक न होकर जीवन स्तर, बेहतर पर्यावरण एवं नागरिक हित हों। ओबामा ने भी कानून पारित करके ऐसे इंडीकेटर बनाने के लिए कहा है जिसमें खुशहाली का आधार जीडीपी व आर्थिक समृद्वि न हो। गॉधी जी ने 1909 में ही हिंद स्वराज में कहा था अमीर प्रायः दुखी रहते है एवं गरीब दुखी।

ऐसा ही एक अन्य मुद्दा अनियंत्रित मूल्य वृद्वि है। इसी क्रम में ज़रूरी वस्तुओ की कीमतों का बढ़ना प्राकृतिक न होकर कृत्रिम है। मुद्रास्फीति की दर को काबू करना आज बड़ी चुनौती है, रिजर्व बैंक के भी समय समय पर अपनी लाचारी के संकेत आते रहते है। जैसे मुद्रास्फीति की दर में वृद्वि जारी रहती है तो ब्याज दरों में वृद्वि की जा सकती है। सीधे शब्दों में कहें तो रिजर्व बैंक ने भी मॅहगाई के आगे घुटने टेक दिये हैं। विचारयोग्य है कि रिजर्व बैंक के पास मुद्रास्फीति कम करने के उपाय सीमित हैं।

2005 से 2010 के बीच में खाघ वस्तुओं का उत्पादन काफी बढ़ा हैं। 2005 में प्याज का उत्पादन जहॉ 59 लाख टन था वह 2010 तक बढ़कर 1 करोड़ टन हो गया है। इस अनुपात में जनसंख्या नही बढ़ी हैं। अब सोचने वाली बात है कि उत्पादन में 10 प्रतिशत की कमी कीमतों में दुगनी वृद्वि कैसे कर देती है? 2005 से 2010 के बीच जब औसत वस्तुओं का सूचकांक 24.14 प्रतिशत था तब खाघ वस्तुओं का सूचकांक 40.76 प्रतिशत तक कैसे पहुँच गया? महॅगाई एक ऐसा पहलू है जिसमें हाल ही में शुरू हुये वायदा कारोबार एवं व्यवस्था के छिद्रो का फायदा उठाकर पूंजीपति और अधिक अमीर एवं गरीब, लाचार होता जा रहा है। अनियंत्रित कीमत वृद्वि की पहली वज़ह वायदा कारोबार है। वायदा कारोबार को एक बार बंद करके देख लिया जाये, सारी हकीकत सामने आ जायेगी। समस्या की दूसरी बड़ी वजह खुदरा बाजा़र में प्राइवेट होल्डिंग की है। वर्तमान व्यवस्था जमाखोरी को बढ़ावा देती है। सरकार की खाघ भंडारण नीति ही दोषों से भरपूर है। तीसरी वजह सरकार द्वारा डिमांड ओर सप्लाई में अंतर का पूर्वानुमान न लगा पाना है। सरकार का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वह पूर्वानुमान लगाये एवं पूर्वानुमान के द्वारा समस्याए न आने दें। पर वास्तविकता यह है कि समस्याए खड़ी की जाती है। और फिर उन्हे सुलझाने के नाम पर करोडों के वारे न्यारे कर दिये जाते हैं। अब तो इस बात का पूर्वानुमान लगाया जाता है कि कौन सी समस्या कितना फायदा दे सकती है? चौथी वजह सट्टेबाजी की है। सट्टेबाज कीमतों में अचानक उछाल ला देते हैं। भ्रष्ट तंत्र एवं सट्टेबाजों का मेल खतरनाक समीकरण बनाता है। इनको ग्रीन सिगनल देते हैं मंत्री महोदय के बयान। जैसे “.... एक साल उन्होने कहा था कि अभी दाम बढ़ेगें। फिर बाद मे कहा कि दाम घटने में समय लगेगा।...... “ यानि सीधा सा संकेत उन लोगों को जो कीमतों में वृद्वि के लिए जिम्मेदार हैं। प्रधानमंत्री स्वयं एक अर्थशास्त्री हैं किंतु उनका अर्थशास्त्र सिर्फ उच्च विकासदर प्राप्त करने तक सीमित रहता है। उच्च विकासदर के द्वारा निवेशक तो आते ही रहेंगें...?

यदि सिर्फ जीडीपी को विकास आधार माने तो समझते हैं कि ये कैसे बढ़ती है। यदि किसान खेत मे केमिकल फर्टिलाइसर डालता है तो जीडीपी बढ़ती है किन्तु यदि साधारण प्राकृतिक खाद से स्वास्थ्य वर्धक खेती करता है तो जीडीपी नहीं बढ़ती। केमिकल से भरी फसल खाकर अगर आप बीमार हो जाएँ और अस्पताल मे इलाज़ कराएं तो जीडीपी बढ़ती है। किन्तु अगर आयुर्वेद के द्वारा देसी इलाज़ से ठीक हो जाएँ तो जीडीपी नहीं बढ़ती। आगे यही क्रम सिर्फ भौतिकतावादी चीजों के उपभोग के द्वारा जीडीपी को बढ़ाने का काम करता रहता है।

हमारें राजनैतिक प्रतिनिधि कार्यो को अधूरा छोड़ देते हैं। कुछ समय काले धन एवं स्विस बैंक पर ध्यान लगाते हैं फिर खापों के कार्यो का प्रतिकार करते हैं। कुछ समय महॅगाई पर भी चर्चा करते हैं। संसद और विधानसभाओं मे प्रदर्शन भी करते हैं। कोई भी कार्य हाथ में लेकर एक सिरे से निपटाते नही हैं। समस्याए काफी उलझी हुयी हैं एवं रास्ता जटिल है। धरना प्रदर्शन करने वाले विपक्ष का कार्य सिर्फ सत्ता पक्ष का विरोध करना होता है मुद्दों को सुलझाना नही। मुद्दो के सुलझते ही सबकी राजनैतिक जमीन ही खिसक जायेगी। कोई भी पार्टी जो महॅगाई के मुददे पर संजीदा है क्यों इसी मुददे पर चुनाव में नही जाती ? एक बहुत बड़े वर्ग का समर्थन उन्हे मिल जायेगा। सम्प्रदाय और जाति आधारित वोट बैंक की आवश्यकता ही नही पड़ेगी। और यदि ऐसा नही है तो एक समझदार और परिपक्व लोकतंत्र की परम्परा निभाते हुये मुद्दों की राजनीति करें, मुद्दों पर राजनीति नही....!!