एक आदमी जो कहता था कि मरने की बात मत करों / नवल किशोर व्यास

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एक आदमी जो कहता था कि मरने की बात मत करों


अभिनेता देव आनंद को खुद से बहुत प्यार था। इस हद कि उन्हे फिल्म में खुद को मरते दिखाना तक बिल्कुल भी पसंद नही था। उनकी कोशिश तो यहां तक रहती थी कि खुद को कभी किसी फिल्म मे बीमार, असहाय, गरीब और लाचार नही दिखाये। वो हर फिल्म में उंची काॅलर वाली शर्ट और तरह तरह की टोपिया पहन कर नायक होने का उत्सव मनाते रहे। जीवन के प्रति उनका ये उनका असीम अनुराग ही था कि जिस दौर में हीरो निर्माता से जिद कर के फिल्म के क्लाईमैकेस में अपने मरने के सीन लिखवाया करते थे, देव आनंद चेहरे पर मुस्कान लिये हर फिल्म मे हैप्पी एंडिग के साथ मिला करते थे। शायद उनके पूरे कैरियर में गाइड ही एकमात्र ऐसी फिल्म है जिसमें देव आनंद मरता है और मरता भी इस धज के साथ है कि मक़तल खुद उठकर जश्न में शामिल हो जायें। गाइड आर के नारायण के उपन्यास दी गाइड पर बनी थी और उपन्यास में नायक राजू गाइड एक गुमनाम मौत मरता है जबकि फ़िल्म में राजू गाइड के मरने पर अकाल से तड़प रहे गांव में बारिश होती है और नायक एक प्रसिद्धि वाली मौत मरता है। सिनेमा सदा से महानता के दंश से श्रापित है। सिनेमा सदा से लार्जर देन लाइफ है। गाइड को लेकर एक तथ्य यह भी है कि बावजूद इसके कि गंभीर सिनेमा को पसंद करने वालो को देव आनंद कभी रास नही आये, गाइड जैसी गूढ़ स्क्रिप्ट में देव आनंद अपनी पूरी रुमानियत के साथ तिलिस्म रचते हुए नजर आते है। ये फिल्म एक किवंदती है कि अगर निर्देशक विजय आनन्द जैसा गुणी हो तो तथ्य और तर्क मिटाये जा सकते है। क्या गाइड से देव आनद को हटाकर भी देखा जा सकता है या फिर देव आनंद के पूरे फिल्मी कैरियर को गाइड से परे रखकर देखा जा सकता है। देव आनंद की बाकी सभी फिल्मों पर एक अकेली गाइड भारी पड़ती है। इस फिल्म में भी उनका मैनेरिज्म, डायलॉग्स का बिना चबाए लगातार बोलना, बेचैन गर्दन और आंखों का झटकना कायम है पर गाइड के राजू गाइड के कैरेक्टर को इन सब से फायदा ही मिला। 


गाइड हिंदी और इंग्लिश दोनों भाषाओं में बनी। इसी फिल्म ने देव आनंद को अभिनेता के रूप में नई पहचान दी, फिल्मफेयर पुरस्कार दिलाया। ऑस्कर तक फिल्म दिखाई गई। समीक्षकों ने इससे पहले उनके लिए इतने कसीदे नही गढ़े। देव आनन्द नई ऊंचाई पर थे। इसी ऊंचाई पर उन्होंने निर्णय लिया कि अब वो बतौर निर्देशक भी फिल्में बनाएंगे। विजय आनन्द का अभिनेता और देव आनन्द का निर्देशक के रूप में आना ट्रेजेडी ही साबित हुआ। यहां से निर्देशन का जो उन्होंने ट्रैक पकड़ा उस पर अंत तक दौड़ते रहे। बच्चों सा उत्साह लिए हर छोटे छोटे सतही विचार पर फिल्म बना डाली। हर समय शूटिंग में या फिर तकनीकी पक्ष में खुद को व्यस्त रखा। ये उत्साह ही ऊर्जा में तब्दील हो रहा था। उनकी सहृदयता और सिनेमा के लिए खुद को खर्च करने का जुनून ही था कि अस्सी के दशक के बाद की उनकी हर घटिया फिल्म को निर्माता भी मिल जाते और काम करने के लिए बड़े कलाकार भी। वो अंत तक कहते रहे कि वो दिल से अभी तक जवान है और बुजुर्गों सी गंभीरता कभी उनके पास नही आई। उसके दो बहुत नजदीकी दोस्तो ने आत्महत्या की थी। इन घटनाओं के बाद वो इस बात से और ज्यादा मजबूत हो गए थे कि उन्हें जीवन का जश्न मनाना है, मातम नही। आज देव आनंद को उनकी लाइफ के साथ रुमानियत और सिनेमा के लिए अप्रतिम प्यार  के लिए याद किया जा सकता है। अभिनेता स्वरूप के लिए शायद गाइड ही याद रहे।