ग़ालिब छुटी शराब (भाग-9) / रवीन्द्र कालिया

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एक ज़माने में पंकज सिंह को भी बहुत रोना आता था। बीसियों बरस पुरानी घटना है, हम लोग दूधनाथ सिंह के यहाँ जमे थे। पीने पिलाने का दौर चल रहा था। पंकज सिंह ने उन्‍हीं दिनों ममता का उपन्‍यास ‘बेघर' पढ़ा था। वह ‘बेघर' से अभिभूत था और उपन्‍यास की प्रशंसा करना चाहता था। नशे में उसे सही शब्‍द नहीं मिल रहे थे। वह जितनी बार बात शुरू करता, ज़ुबान बीच में ही अटक जाती। आजिज़ आकर उसने भाषा के हथियार फेंक दिये और रोने लगा। रोते-रोते वह सिर्फ इतना कह पा रहा था- ममता जी, बेघर हूँ.... हूँ.... हूँ। थोड़ा संभलकर वह फिर उपन्‍यास का प्रसंग छेड़ देता और हर बार शब्‍द उसका साथ छोड़ देते। वह बेघर, बेघर कहते हुए देर तक हिचकियां लेकर रोता रहा। मैं पंकज से बहुत प्रभावित हुआ। उसकी बेबसी को कोई शराबी ही समझ सकता था। जो लोग शराब नहीं पीते, वे इस पेचीदा मनःस्‍थिति को नहीं समझ सकते। इस बारीकी में कोई शराबी ही जा सकता है। शराब पीकर रोना एक अलौकिक अनुभव है। यह एक प्रकार का स्‍खलन है और स्‍वतःस्‍फूर्त, सहज और तीव्र स्‍खलन से तरबतर और उन्‍मादित कर देने वाला दूसरा रचनात्‍मक अनुभव नहीं होता। इस बात को भाषा के गुलाम नहीं समझ सकते। यह भाषातीत अनुभव है, इसकी लीला अपरंपार है। जो शराब पीकर सच्‍चे मन से रोया नहीं, उसका शराब पीना अकारथ चला गया। अनायास ही उसने शराब की तौहीन कर डाली। वह शराब से डस लिया गया ठग लिया गया।

इन्‍दुजी का गाना समाप्‍त हुआ तो मैं बाथरूम से हाथ मुँह धोकर बाहर निकला। लक्ष्‍मीधर चुप थे और सिगरेट के धुएँ से खेल रहे थे। हर शख्‍स खामोश था। जापान खामोश था, भारत खामोश था। जापानी बच्‍चे कौतुक से यह सब देख रहे थे और लक्ष्‍मीधर की हिंदुस्‍तानी बच्‍चियाँ कभी पिता की तरफ देख रही थीं और कभी माताओं की तरफ। अकिको सान ने आँखे मूँद ली थीं, वह माहौल के सामान्‍य होने की प्रतीक्षा कर रही थीं। समय का पहिया दाम्‍पत्‍य को रौंदता हुआ बहुत दूर निकल चुका था, इतना दूर कि उसके पास मुड़कर देखने का भी विकल्‍प न बचा था।

लक्ष्‍मीधर अपने साथ जापान से बहुत सी शराब और बहुत से सिगरेट लाये थे। अगर मैं गलत नहीं हूँ तो वे उन दिनों ‘पीस' नाम का सिगरेट पिया करते थे। वह रम के शौकीन थे, विशेषकर भारतीय रम के। उनकी पीने की अद्‌भुत क्षमता थी। मैंने कभी उनकी ज़ुबान लटपटाते और कदम डगमगाते नहीं देखे। वे समभाव से मदिरा सेवन करते थे।

लक्ष्‍मीधर परिवार के भारत प्रवास के दौरान उनके साथ बिताया एक ‘मस्त-मस्‍त शाम' याद आ रही है। वह शाम शायद इसलिए भी याद रह गयी कि लक्ष्‍मीधर ने उस शाम की अनेक छवियां कैमरे में कैद की थीं और ढेरों चित्र भिजवाए थे। आज भी वे चित्र हाथ लग जाते हैं तो शाम बोल-बोल उठती है। उस दिन अनेक रचनाकार इलाहाबाद आए हुए थे। याद नहीं पड़ रहा, वे लोग मालवीयजी से मिलने आए थे अथवा आकाशवाणी में कोई कवि सम्‍मेलन था। दोस्‍तों की अच्‍छी खासी जमात इकट्ठी हो गयी थी-नरेश सक्‍सेना, लीलाधर जगूड़ी, राजेश शर्मा, मंगलेश डबराल आदि। इतना ज़रूर याद पड़ रहा है कि वह मार्च का अंतिम दिन रहा होगा। उन दिनों मार्च का अन्‍तिम दिन शराबियों के जश्‍न का दिन हुआ करता था। शराब के ठेकेदार वित्‍तीय वर्ष के अंतिम दिन शराब का बचा-खुचा स्‍टॉक कौड़ियों के दाम बेच देते थे। ज्‍यों-ज्‍यों शाम घिरती दाम गिरते जाते। पुराने ठेकेदार अगला दिन चढ़ने से पहले अपना स्‍टाक शून्‍य कर देते। उस दिन हर दोस्‍त के पास अपनी बोतल थी। जिसकी बोतल खत्‍म हो जाती, वह लपककर चौक से नयी बोतल खरीद लाता। प्रीमियम ब्रांड रेग्‍युलर विस्‍की के दाम पर बिक रहे थे। लेखक बंधुओं की होली-दीवाली एक साथ हो गयी थी। नरेश सक्‍सेना शराब नहीं पीते, बाँसुरी बजाते हैं। उन्‍होंने बाँसुरी पर एक लोकप्रिय धुन छेड़ दी। दोस्‍तों ने अनुरोध किया तो कुछ गीत भी सुनाए। नरेश सक्‍सेना को जीवन में दुबारा ऐसी दाद न मिली होगी। जगूड़ी-मंगलेश को भी भरपूर दाद मिली। एक-एक पंक्‍ति पर दाद दी जा रही थी। बड़े-बड़े मुशायरों में भी ऐसी दाद न मिलती होगी। काव्‍यपाठ के बीच बार-बार मालवीयजी का फ़्‍लैश चमकता। वे कभी स्‍टैंड पर कैमरा बैठा कर चित्र खींचते, कभी उकडूँ बैठकर, कभी लेटकर, कभी कुर्सी पर चढ़कर। उन्‍होंने चौरासी कलाओं (आसनों) से चित्र खींच डाले। वे महफिल में होते हुए भी महफिल से गाफ़िल थे। उस समय उनकी दिलचस्‍पी दारू में थी न कविता में, वे फोटोग्राफी में आकंठ डूबे हुए थे। इस बीच अकिको सान ने जापानी में एक हाइकू सुनाया, अनुवाद सुनने से पहले ही लोगों ने इतनी दाद दे दी कि उन्‍होंने भावार्थ समझाने की कोई ज़हमत नहीं उठायी।

ममता मेहमानवाज़ी का फर्ज़ सरअंजाम दे रही थी। अनिता गोपेश उसका हाथ बँटा रही थी। मधु और गौरा (मालवीय जी की बेटियां) भी सेवा में लगी थीं। अनिता जितनी बार नीचे आती, मंगलेश उसे अपने पास बुलाता और कहता-अनिता तुम्‍हें मालूम नहीं, गोपेशजी मुझे कितना चाहते थे। अनिता जब ऊपर चली जाती तो मंगलेश बुदबुदाते- पागल लड़की जानती ही नहीं कि उसके पिता मुझे कितना प्‍यार करते थे। मंगलेश को लग रहा था, अनिता उसकी उपेक्षा कर रही है, जबकि उसके पिता उसे बहुत चाहते थे। वह मधु को देखते तो उसे आवाज़ देते-मधु ऊपर जाओ तो उस बेवकूफ लड़की को नीचे भेजना, मैं उससे गोपेशजी की बातें करूंगा। मधु हँसती और हँसकर टाल जाती मंगलेश की बात। इस बीच मधु के साथ भी एक दुर्घटना हो गयी। राजेश शर्मा (अब दिवंगत) बहुत देर से खामोश बैठे थे। वह काव्‍यपाठ में भी रुचि न ले रहे थे। वह किसी दूसरे जहान में खोये हुए थे। वास्‍तव में उन पर इश्‍क का गंभीर दौरा पड़ा था। नशे में वह मधु पर फिदा ही नहीं हो गये, सार्वजनिक रूप से प्रणय निवेदन भी कर दिया। उस समय टेप भी चल रहा था, फिल्‍मांकन भी हो रहा था। उन्‍होंने मधु से कहा कि आज उनके सदियों से भटक रहे मन को ठौर मिल गया है। वह एक जोगी की तरह प्रेम की भीख मांगने लगे-‘मधु, मेरी बात ग़ौर से सुनो। मैं अब तुम्‍हारे बगैर एक पल भी ज़िंदा नहीं रह सकता। अब समय आ गया है, मैं अपनी पत्‍नी से तलाक ले लूं। तुम्‍हारे लिए मैं सब कुछ छोड़ दूँगा-अपना घर-बार, बीवी बच्‍चे, सरकारी नौकरी। यह एक अच्‍छा संयोग है कि तुम्‍हारे पिता इस समय यहीं हैं, फिजूल के पत्राचार में समय नष्‍ट न होगा। अब देर न करो, जाओ, इसी समय जाओ और अपने पिता से शादी की इजाज़त ले लो।' मेज़बान की हैसियत से मैंने तुरंत हस्‍तक्षेप किया-‘राजेश मधु मेरी बेटी है। तुम नशे में हो मेरे भाई। मैं इस प्रस्‍ताव को नामंजूर करता हूँ।'

उन दिनों मैं दो-एक पैग पीने के बाद ज़्‍यादातर लड़कियों को अपनी बेटी बना लिया करता था। अगर कोई लड़की मुझे भा जाती तो मैं तुरंत कोई-न-कोई रिश्‍ता कायम कर लेता। वक्त ने कोई और रिश्‍ता कायम करने की गुंजाइश ही न छोड़ी थी। यह एक अत्‍यंत निरापद रिश्‍ता था। अब तो मैं इस निष्‍कर्ष पर पहुँच चुका हूँ कि घर में एक बिटिया होती तो मैं बेझिझक घर में इस तरह मदिरापान नहीं करता, जिंदगी कुछ व्‍यवस्‍थित होती, जीवन शैली इतनी अराजक न होती। बेटियों वाले घरों में ग़ज़ब का अनुशासन देखा गया है। बेटियों वाले बेटे वालों के घर जाकर मयनोशी करते हैं।

मालवीयजी जापान लौट गये तो बेटियों ने सचमुच मुझे अपना अभिभावक मान लिया। एक बार बहुत दिनों तक मधु-गौरा के समाचार न मिले तो मैंने उन्‍हें बुलवा भेजा। अगले रोज मधु प्रकट हुई, अत्‍यंत क्षमा याचना की मुद्रा में। वह अपने साथ स्‍टैम्‍प पेपर पर नोटरी से विधिवत सत्‍यापित किया हुआ शपथ पत्र लेकर आई कि भविष्‍य में उससे ऐसी गुस्‍ताखी न होगी और वह सप्‍ताह में एक बार कालियाजी के थाने में अपनी उपस्‍थिति दर्ज करवाएगी। वह अपने पिता से कम कल्‍पनाशील न थी। उन दिनों उसकी अजय से देखा-देखी चल रही थी। बर्ड वाचिंग (पक्षियों पर नज़र रखना) अजय की हॉबी थी। एक-एक चिड़िया को वह पहचानता था। मैं मधु को चिढ़ाया करता कि अजय ने एक बिरली चिड़िया पहचान ली है। अजय का चयन रुचि के अनुकूल इंडिया फारेस्‍ट सर्विस में हो गया और मधु का बेटा अब दस-बारह बरस को होगा। राजेश शर्मा अब इस जहान में नहीं हैं, दो बरस पहले उन्‍होंने लखनऊ की एक बहुमंजिली इमारत से कूद कर आत्‍महत्‍या कर ली थी।

उस दिन भी राजेश ने ज़्‍यादा पी ली थी। जब तक उसे बताया जाता कि जल्‍द ही मधु के हाथ पीले होने वाले हैं, वह लुढ़क चुका था। सुबह तक वह सब कुछ भूल चुका था और निष्‍पाप भाव से सिगरेट फूँक रहा था। उसे जब अपनी हरकतों की जानकारी हुई, वह देर तक पश्‍ताचाप करता रहा। लक्ष्‍मीधर ने जापान से उस यादगार शाम के ढेरों चित्र भिजवाए थे। कुछ चित्र तो ऐसे थे जिन्‍हें लिफाफे के भीतर एक और बंद लिफाफे में प्रश्‍न पत्रों की तरह हिफ़ाज़त से भेजा गया था कि बच्‍चों के हाथ न लग जाएँ। वे आचार्य रजनीश उर्फ भगवान ओशो के आश्रम के चित्र लगते हैं, उतने ही निर्कुंठ और पारदर्शी। वे मुक्‍ति के चित्र हैं, निर्वाण के चित्र हैं।

अनिता गोपेश को उस शाम की एक एक तफ़सील इतने वर्ष बाद भी याद है। जिस दिन मैं यह प्रसंग लिख रहा था (28-10-98) अचानक सुबह-सुबह अनिता चली आई। हालांकि वह विश्‍वविद्यालय के जंतु विज्ञान विभाग में रीडर है, साहित्‍य में उसकी दिलचस्‍पी बरकरार है। मेरे अनुरोघ पर उसने उस शाम का ब्‍योरा लिखकर दिया, उसमें मेरा भी ‘कैरीकेचर' खींचा गया है, इसलिए यहाँ उद्‌धृत करना ज़रूरी हो गया है ः

‘उन दिनों कालिया दम्‍पती रानी मंडी वाले अपने पुराने मकान में रहते थे। उसमें दुर्गद्वार जैसे बड़े फाटक से प्रवेश करके बायीं ओर को अंदर सात-आठ सीढ़ियाँ चढ़कर कालियाजी का कमरा था और सामने सीढ़ी चढ़कर ऊपर रिहायशी कमरे.... फिर लंबी सी छत और छत पार करने के बाद रसोई। रसोई के बगल में माताजी का कमरा हुआ करता था, जिस पर जाली लगी खिड़कियों से सामने छत से आता-जाता हर इंसान दिखाई पड़ता था।

शहर और बाहर के साहित्‍यकारों की बड़ी आमदोरफ़्‍त रहती थी उनके यहाँ। बात ही बात में आये दिन गोष्‍ठियाँ हो जाती थीं.... दो दोस्‍त बाहर से आये नहीं कि महफ़िल जम जाती। ऐसी गोष्‍ठियों के बारे में प्रायः ममताजी से सुनती रहती थी। उस बार उनके आमंत्रण पर पहुँच ही गयी उनके घर। कुछ इस ख्‍़याल से भी कि इतने लोगों का खाना पीना..... कुछ मदद हो जायगी ममताजी की और उत्‍सुकता थी कि देखेंगे कैसी होती हैं इस प्रकार की अनौपचारिक गोष्‍ठियाँ।

जापान से डॉ0 लक्ष्‍मीधर मालवीय आए हुए थे, अपनी जापानी पत्‍नी के साथ। वे कालियाजी के यहाँ ही रुके हुए थे। मालवीयजी की पहली पत्‍नी की बेटियाँ आती रहती थीं अपने पिता से मिलने। उन्‍हीं के सम्‍मान में थी गोष्‍ठी शायद। उनके अलावा बाहर से आये लोगों में मंगलेश डबराल, नरेश सक्‍सेना, लीलाधर जगूड़ी, राजेश शर्मा के नाम मुझे याद हैं, और भी दसेक लोग थे, जिनकी मुझे याद नहीं।

कमरे में जमीन पर ही गद्दों पर गोला बनाकर बैठे थे सब। शाम ढलने के बाद शुरू हुईं महफ़िल..... वह भी पीने पिलाने से। पीने के साथ ही साथ कालियाजी पिलाने के भी खूब शौकीन थे। मुझे सही-गलत बहुत से कारणों से पीने से तब भी परहेज़ था, आज भी है। सामने रहो तो घना आग्रह, पीकर तो देखो, बियर तो शराब नहीं होती, जिन तो औरतें भी पी लेती हैं। आदि-आदि।

ममताजी ने ऊपर आकर बताया, ‘नीचे काव्‍यपाठ चल रहा है। अब आ जाओ नीचे।' नीचे आकर देखा, काव्‍यपाठ के बीच वाहवाही का सिलसिला चल रहा था। दो मिनट की कविता होती तो दस मिनट ‘वाह वाह'। स्‍थिति रोचक होती चली गयी। कविता को समझ पाना मुश्‍किल हो गया तो मैं खाने की कमान संभालने ऊपर चली गयी। बहुत समय उसमें निकल गया। काम निपटा कर नीचे आई तो कुछ अजीब ही समाँ बधा था। हर कोई बोल रहा था, कोई किसी को सुन नहीं रहा था। लक्ष्‍मीधर मालवीय ममताजी से मुखातिब थे तो कालियाजी उनकी जापानी पत्‍नी को कुछ समझा रहे थे, जगूड़ीजी कविता पर बहस कर रहे थे तो राजेश शर्मा मालवीय जी की सुदर्शना लड़की से प्रणय निवेदन करने में व्‍यस्‍त थे। किसी ने मंगलेशजी से मेरा परिचय करवाया तो वह एक लंबा-सा ‘आ हा हा' करते हुए गोपेशजी की याद में डूब गये। लड़खड़ाती जुबान में मुझसे कहने लगे, ‘आप शायद नहीं जानती होंगी, गोपेशजी मुझे बहुत स्‍नेह करते थे, क्‍या खूब इंसान थे, भई वाह....' मैंने हामी भरी और सामान समेटने उनकी तरफ बढ़ी। मेरे कान के पास आकर बोले, ‘आप नहीं जानतीं, वे मुझे कितना मानते थे, कितना प्‍यार करते थे।' मैंने सौजन्‍य में कहा, ‘जी वे युवा प्रतिभाओं से बहुत प्‍यार करते थे।'

‘नहीं,' वह हाथ नचाते हुए बोले, ‘वह मुझे जितना प्‍यार करते थे, उतना किसी से नहीं करते थे।'

मेरे पास उनकी बात मान लेने के अलावा कोई चारा नहीं था। ऐसी ही स्‍थिति में महफिल सुबह चार पाँच बजे तक चली। एक दूसरे पर गिरते, निढाल होते लोगों को देख मैंने वहाँ से हट जाना ही बेहतर समझा और ममता जी के कमरे में जाकर सो गयी।

सुबह मुँह अंधेरे नीचे आई तो ज़्‍यादातर लोग सो रहे थे। जो जहाँ था, वहीं लुढ़क गया था। स्‍थानीय लोग विदा ले चुके था। अनेक खाली बोतलें भी कमरे में बिखरी पड़ी थीं। मैंने ममताजी से जाने की अनुमति मांगी तो दिन की महफिल का कुछ इस प्रकार नाटकीय समापन हुआ। ममता जी ने कालियाजी से बताया कि अनिता जा रही है तो वह आँखें मलते हुए उठ गए, उन्‍हें अचानक मेरी चिंता हो गई, ‘अभी तो अंधेरा है, अकेली कैसे जाएगी ?'

‘रिक्‍शे से चली जाऊंगी।' मैंने कहा।

‘नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। ' अधिक ही लाड़ से कहा उन्‍होंने, ‘अनिता हमारे घर आई थी... हमारे घर.... उसको घर तक छोड़ना हमारी जिम्‍मेदारी है।' जिम्‍मेदारी का भाव तो उनका सही लगा, उसे निभाने की स्‍थिति ज़रा डावाँडोल थी। मैंने तुरन्‍त कहा, ‘नहीं, नहीं, मैं तो चली जाती हूँ अक्‍सर रिक्‍शे से। अभी तो सुबह भी हो गयी है।'

‘नहीं, अनिता हमारे घर से अकेली नहीं जा सकती। मैं छोड़कर आऊँगा।'

कालियाजी के प्रस्‍ताव पर मेरी तो सांस ऊपर की ऊपर और नीचे की नीचे रह गयी। ममताजी ने भी उन्‍हें समझाने की बहुतेरी कोशिश की कि अनिता तो हमेशा ही चली जाती है, फिर तुम अभी जाने की स्‍थिति में भी नहीं हो।'

‘कौन कहता है कि मैं नशे में हूँ, एक दम ठीक हूँ, तुम देखो, मैं यों गया और यों आया।'

ममताजी और मैंने एक-दूसरे की तरफ निरीह भाव से देखा और हथियार डाल दिये। ऐसा भी नहीं कि नशे में कालियाजी कुछ बहक जाते और कुछ बेजा हरकत कर बैठते। मैंने प्रायः पाया था कि पी लेने के बाद वह ज़्‍यादा मुखर ही नहीं, अतिरिक्‍त सभ्‍य और सुसंस्‍कृत हो जाते थे। यह अतिरिक्‍त प्‍यार और चिंता उनके नशे का स्‍थायी भाव था। नशे के बाद उनके भीतर पिता का भाव जाग्रत हो जाता। मेरी-उनकी उम्र में इतना अंतर नहीं था कि उनके मेरे बराबर बेटी होती। पर ऐसे में वह अक्‍सर ममताजी से यह कहते सुनायी पड़ते कि अगर उन लोगों की सही समय पर शादी हो गयी होती तो अनिता के बराबर बेटी होती। या मुझसे मुखातिब हो कहते-कम ऑन अनिता, यू आर जस्‍ट लाइक माई डॉटर ।

उनका इस स्‍थिति में स्‍कूटर चलाना खतरे से खाली नहीं था। उनके घर से अपने घर की दूरी की कल्‍पना करके मेरा दिल बैठा जा रहा था, पर कालियाजी पर जिम्‍मेदारी का भूत सवार हो चुका था और भूत के आगे सभी हारते हैं। धड़कते दिल से बैठी पीछे की सीट पर। ममताजी असमंजस और आशंका में खड़ी देखती रहीं ।

मुझे अच्‍छी तरह याद है, बोर्ड की परीक्षा प्रारंभ हो रही थी उस दिन से। परीक्षार्थियों की भयंकर भीड़ थी सड़कों पर। उसी भीड़ के बीच में एक डगमगाती स्‍कूटर आगे बढ़ रही थी। लग रहा था स्‍कूटर भी नशे में है। मुझे ऐसे लग रहा था जैसे चक्रवात में फंस गयी हूँ। उनके घर से अपने घर तक अनगिनत बार मैं मर-मर गयी। घर के गेट पर उतरी तो लगा-विचित्र किंतु सत्‍य। कालियाजी की जिम्‍मेदारी यहीं खत्‍म नहीं हुई, बोले, ‘गेट की भीतर जाकर अपने बरामदे में पहुँच जाओ।' मैं लंबे-लंबे डग भरते बरामदे की सीढ़ी पर पहुँची और हाथ हिलाया। उनका स्‍कूटर मुड़ा। उनके सही सलामत घर वापिस पहुँचने की कामना करते हुए घर में घुसी।

उस दिन अप्रिय कुछ नहीं घटा था, पर उस दिन के बाद बहुत दिनों तक मैं उनके घर नहीं गयी।'

फै़ज़ अहमद ‘फै़ज़' दो मर्तबा इलाहाबाद आये थे। पहली बार सन् 1957-58 में और आखिरी बार 1981 में । 1958 में तो मैं पंजाब में था । 1981 में फै़ज़ साहब से इलाहाबाद में अत्‍यंत अनौपचारिक और आत्‍मीय मुलाकात हुई। उनके साथ जाम टकराने का मौका भी मिला। मैं 1958 में भी इलाहाबाद होता मगर समय ने साथ न दिया था। मेरे दोस्‍त अमरीक सिंह कलसी और मैंने तय किया था कि इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय से एम0 ए0 करेंगे, मगर मेरे लिए यह संभव न हो सका। उन्‍हीं दिनों मेरे बड़े भाई अध्‍यापन के सिलसिले में कैनेडा गये थे और उनके बिछोह में मेरी मां रो-रोकर बेहाल हो गयीं थीं। मेरा घर से दूर जाने का प्रश्‍न ही न उठता था। यह दूसरी बात है कि दो साल बाद मैंने भी घर छोड़ दिया और ऐसा देशनिकाला मिला कि तब से बाहर ही बाहर हूँ। असली देशनिकाला तो मेरे दोस्‍त अमरीक सिंह कलसी को मिला, जो इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय से एम0 ए0 करने के बाद ऐसा लंदन गया कि वहीं का नागरिक बन गया। शादी करने भी वह भारत नहीं आया, वहीं एक मेम से शादी कर ली और स्‍कूल आफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्‍टडीज़ में पढ़ाने लगा। 1991 में वह इलाहाबाद आया था। उसने कहीं से मेरा नंबर हासिल किया और फोन किया। इससे पहले कि वह अपनी शिनाख्‍त बताता पैंतीस साल बाद भी मैं क्षणभर में उसकी आवाज़ पहचान गया। छूटते ही मैंने पूछा, ‘कलसी दे पुत्‍तर कित्‍थों बोल रेयां?' बी0 ए0 में ही हम दोनों की दोस्‍ती हो गई थी। हम दोनो की रुचियां एक सी थीं। क्‍लास में गैरहाज़िर रह कर हम लोग बाहर ढाबे में सिगरेट फूँका करते थे। साहित्‍य का रोग उसे भी लग चुका था। इसी यात्रा में वह पाकिस्‍तान भी गया था और दिल्‍ली लौटकर उसने मुझे एक दिलचस्‍प ख़त लिखा था ः

पाकिस्‍तान में नये उर्दू कहानीकारों से मिलने का मौका मिला। 8 को लंदन लौटूँगा, तब तक दिल्‍ली में ही रहूंगा। तुम भी चले आओ। इस समय मैं अपने भाई के घर पर हूँ-उसका नाम हरनाम सिंह कलसी है। कल मैं अपने रहने की कोई दूसरी व्‍यवस्‍था करूँगा, कनाट प्‍लेस के आसपास। मेरा भाई, जिसकी उम्र 82 साल है, रोज़ रात को दो बड़े पैग पीता है। दो ही मुझे देता है। तीसरा पैग न वह पीता है, न मुझे देता है। एक तो यह परेशानी। आज़ादी से सिगरेट न पी सकने की परेशानी अलग। मैं लंदन पहुँचकर भी तुम्‍हें पत्र लिखता रहूंगा ताकि फिर से जुड़ा यह संपर्क फिर नहीं टूटे।'

इस नश्‍वर संसार में हर चीज टूटने के लिए ही बनती है। लगता है यह संपर्क भी टूटने के लिए ही बना था। कलसी 1991 में ही लंदन पहुँच चुका होगा, मगर फिर से जुड़ा संपर्क दुबारा टूट गया। दोष मेरा भी है, मैं पत्र लिखने में बेहद आलसी हूँ। कलसी ने भी खत लिखने की ज़हमत न उठायी। वह भूल गया कि कालिज के दिनों में हम कितने गहरे दोस्‍त थे और नये और मौलिक खेल खेला करते थे। कलसी, कपिल अग्‍निहोत्री और मैंने मिल कर एक अनूठा खेल ईजाद किया था-उऋण प्रतियोगिता यानी ‘यूरिन रेस'। डी0 ए0 वी0 कालिज, जालंधर के पास एक नहर बहती थी, हम लोग उसी नहर के किनारे जीभर कर लघुशंका करते। जिसकी धार सबसे दूर पड़ती वह अव्‍वल रहता और जो फिसड्‌डी रह जाता उसे बियर पिलानी पड़ती। कलसी का कद हम दोनों से छोटा था, अक्‍सर उसे ही हारने का दंड भरना पड़ता। हराम की बियर हम लोगों को हराम थी। जब भनक लगती कि कलसी के घर से मनिआर्डर आ गया है, हम लोग उसे प्रतियोगिता के लिए प्रेरित और प्र्रोत्‍साहित करते। खेल जारी रखने के लिए कभी-कभार उसे जिता भी देते थे। पिछले चालीस बरसों में डी0 ए0 वी0 कालिज के बगल वाली नहर में न जाने कितना पानी बह गया होगा। नहर है भी या नहीं, मुझे इसका इल्‍म नहीं है। मैंने यह सोचकर संतोष कर लिया है कि कलसी की याददाश्‍त कमजोर हो गयी है। प्रयाग शुक्‍ल भी कलसी का हमउम्र होगा, मगर उसकी याददाश्‍त कमज़ोर नहीं हुई। इसका एहसास तब हुआ जब पिछले दिनों अचानक इलाहाबाद हम लोगों की भेंट हो गयी। हम लोग देर तक यादों की राख टटोलते रहे।

साठ के दशक के शुरू के वर्षों में प्रयाग, गंगा प्रसाद विमल, हमदम और मैं दिल्‍ली के संत नगर के पचास सौ पचपन नंबर फ़्‍लैट में एक साथ रहते थे। वे गर्दिश और फाकामस्‍ती के दिन थे। प्रयाग और हमदम (कलाकार) फ्रीलांसर थे, विमल दिल्‍ली कालिज में प्राध्‍यापक था और मैं केंद्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका ‘भाषा' के संपादकीय विभाग से संबद्ध था। जेब में पैसा होता तो हम लोग शहंशाह होते, न होता तो लाई चना खाकर सूरते हालात पर तब्‍सरा करते। हम लोगों का बियर पीने का अंदाज़ भी निराला था। उन दिनों बाज़ार में ठंडी बियर न मिलती थी। मुफ़लिसी में भी महीने में एकाध बार बियर पार्टी ज़रूर हो जाती। बर्तन के नाम पर घर में सिर्फ़ एक बहुउद्देशीय बाल्‍टी थी, वह नहाने के काम आती और वक्‍त ज़रूरत उसमें बियर भी ठंडी की जाती। हमदम बियर नहीं पीता था, उसके लिए कोकाकोला की व्‍यवस्‍था रहती। वह इंतजाम अली थो, बर्फ वगैरह की व्‍यवस्‍था वही करता। बाद में ढाबे के चाय के छोटे-छोटे गिलासों में बीयर पीते हुए एहसास होता-

वक्‍त की सीढ़ियों पर लेटे हैं

इस सदी के कबीर हैं हम लोग

दूसरी मर्तबा 25 अप्रैल, 1981 को जब फ़ैज़ अहमद ‘फै़ज़' इलाहाबाद आये, मैं इलाहाबाद का बाशिंदा बन चुका था। इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय ने उनके सम्‍मान में एक जलसे का आयोजन किया था। विश्‍वविद्यालय के विशाल प्रांगण में इससे भव्‍य आयोजन फिर दूसरा नहीं हुआ। उन दिनों छात्र आंदोलन के कारण विश्‍वविद्यालय में पठन-पाठन का कार्य लगभग ठप था और विश्‍वविद्यालय प्रशासन आयोजन की सफलता को लेकर बहुत सशंकित था। सीनेट हाउस के लॉन पर एक बहुत बड़ा मंच बनाया गया था। शाम होते-होते बरगद के नीचे का मैदान छात्रों से खचाखच भर गया। छात्रावास सुनसान हो गये। लग रहा था शहर के तमाम रिक्‍शे, तांगे, स्‍कूटर, मोटर साइकिल और कारें सिर्फ़ एक दिशा में दौड़ रही हैं। जगह-जगह जाम लग गया। पूरा शहर जैसे विश्‍वविद्यालय की तरफ़ उमड़ आया था। मैं और ममता भी किसी तरह सभास्‍थल पर पहुँचे। फै़ज़ प्रकट हुए तो तालियों की गड़गड़ाहट से परिसर गूँज उठा। महादेवी वर्मा ने सभा की अध्‍यक्षता की थी। फिराक साहब उन दिनों अस्‍वस्‍थ थे, उन्‍हें गोद में उठाकर मंच पर लाया गया था। मंच पर फै़ज़, फिराक और महादेवी के अलावा उपेन्‍द्रनाथ अश्क, प्रोफेसर अकील रिज़वी और डाक्‍टर मुहम्‍मद हसन मौजूद थे। फै़ज़ ने सियासत और अदब के गहरे रिश्‍तों को रखांकित करते हुए कहा कि उनका एक ही संदेश है दुनिया के लिए कि इश्‍क करो। फिराक साहब जैसे सातवें आसमान पर बैठे थे। उन्‍होंने यह शेर सुना कर श्रोताओं को मुग्‍ध कर दिया ः

आने वाली नस्‍लें तुम पर रश्‍क करेंगी हम असरो!

जब उनको यह ध्‍यान आयेगा तुमने फिराक को देखा है।

फिराक को जैसे अपना अंत नज़र आ रहा था। मुझे उनकी अली सरदार जाफ़री को अत्‍यंत कातरता से लिखी ये पंक्‍तियां याद आ गयीं- ‘भाई अली सरदार, बहुत बीमार हूँ-िफराक'। इस ऐतिहासिक सम्‍मेलन के कुछ दिनों बाद ही 3 मार्च, 1982 को फिराक इस फ़ानी दुनिया से कूच कर गये। डाक्‍टर मुहम्‍मद हसन का यह जुमला आज भी लोग अक्‍सर उद्‌धृत करते हैं कि ः

आने वाली नस्‍लें तुम पर रश्‍क करेंगी हम असरो?

जब उनको यह ध्‍यान आयेगा

फिराक, महादेवी, फै़ज़ को तुमने

एक साथ मंच पर देखा था।

प्रोफेसर अकील रिज़वी ने फै़ज़ को याद करते हुए एक दिलचस्‍प किस्‍सा बयान किया है-‘जब हम फै़ज़ साहब को छोड़ने सर्किट हाउस चलने लगे तो एक लड़की ज़िद करने लगी कि वह फै़ज़ साहब के साथ बैठेगी। फ़ैज़ साहब की हिफ़ज़त भी हम लोगों का फर्ज़ था। खयाल गुज़रा मालूम नहीं यह लड़की कौन है। फै़ज़ साहब से वह अनुमति माँग रही थी, मगर फै़ज़ साहब खामोश थे। मैंने लड़की से सख्‍ती के साथ इंकार कर दिया। अब वह लड़की कार के आगे खड़ी हो गयी कि मैं जाने न दूँगी, जब तक आप मुझे फै़ज़ साहब के साथ बैठने न देंगे। हम लोगों का संदेह और बढ़ गया। खयाल गुज़रा कि वह कोई आतंकवादी है, जो फै़ज़ साहब का पीछा कर रही है। अभी यह कोई हथगोला या पिस्‍तौल निकालेगी। उस समय पुलिस भी न थी। फ़ैज़ साहब नीचे उतर आये और उन्‍होंने लड़की से अंदर बैठने को कहा और लोगों के रोकते-रोकते वह भी अंदर बैठ गए। कमबख्‍त लड़की जब अंदर बैठ गयी तब उसने बताया कि वह एक समाचारपत्र की संवाददाता है। दो दिन से फै़ज़ साहब का इंटरव्‍यू लेना चाहती है, मगर कोई उसे मौका नहीं देता। अब उसने यह तरकीब इसलिए निकाली थी कि चलती हुई कार में ही वह इंटरव्‍यू ले सकती है। हम लोगों को इत्‍मीनान हुआ। वह अपने प्रश्‍न करती जाती और फ़ैज़ साहब उनका जवाब देते जाते।'

फै़ज़ इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय के निमंत्रण पर इलाहाबाद आये थे। उन दिनों प्रोफेसर उदित नारायण सिंह विश्‍वविद्यालय के उपकुलपति थे। राजनीति शास्‍त्र विभाग के जेएनयू रिटर्न नये प्रवक्‍ता देवीप्रसाद त्रिपाठी उनके संपर्क में क्‍या आये कि वह गणित से ज़्‍यादा शायरी में दिलचस्‍पी लेने लगे। यहाँ तक कि फै़ज़ अहमद फै़ज़ तक की कई ग़ज़लें उन्‍हें कंठस्‍थ हो गयीं। जब फै़ज़ को इलाहाबाद बुलाने का प्रस्‍ताव आया तो वह तुरंत मेजबानी के लिए तैयार हो गये।

इलाहाबाद के जजों, वकीलों, मंत्रियों, नेताओं और रईसों में फै़ज़ को दावत देने की होड़ लग गयी। लोगों के लिए फै़ज़ को अपने घर बुलाना प्रतिष्‍ठा का प्रश्‍न बन गया। हम लोगों को लगा कि इस मार-काट में फै़ज़ से अनौपचारिक मुलाकात संभव न होगी। एक रोज़ देवीप्रसाद त्रिपाठी रानी मंडी आए तो मैंने छूटते ही हमला बोल दिया-डीपीटी, सुनो! हिंदी लेखकों से फै़ज़ की मुलाकात न हुई तो अच्‍छा न होगा, सुना है तुम्‍हारा वाइस चांसलर पात्रता नहीं, हैसियत देखकर फै़ज़ के कायर्क्रम तय कर रहा है।

डीपीटी को आपने कभी अकेले न देखा होगा, यह उसके लिए संभव नहीं। उसके साथ उससे दुगुनी उम्र का साथी भी हो सकता है और उससे आधी उम्र का भी। आने वाले ने खुद अपना परिचय दे दिया तो बेहतर, वरना डीपीटी ने न मैंने कभी इसकी जरूरत महसूस की थी। महफिल में कौन किससे परिचय करवाता है। जो महफिल में शामिल हो गया, वह बिरादरी में शामिल हो गया, एकाध पैग के बाद वह परिचय का मोहताज न रहा। मेरी बात सुनकर डीपीटी अचानक सकपका गया। बेतकल्‍लुफी में मैं आगे कुछ कहता कि डीपीटी के लिए अपने साथी का परिचय देना ज़रूरी हो गया-‘अरे भाई मैं परिचय कराना भूल गया। आप ही तो हैं हमारे विश्‍वविद्यालय के उपकुलपति प्रोफेसर यू0 एन0 सिंह।' अब आप अपना सिर पीट लीजिए या डीपीटी का। डीपीटी की ऐसी ख्‍याति थी कि मेरी मां कहती थीं-भैडे़-भैड़े यार हैं मेरी फ़त्‍तों के। डीपीटी आँखों से लाचार डेढ़ पसली के शख्‍स थे। आँख से सटाकर किताब पढ़ते थे और जो पढ़ते थे, उनके मस्‍तिष्‍क के प्रिंटर में छप जाता था। टिमटिमाते दिये-सी अपनी कमज़ोर आँखों से उन्‍होंने जाने कितना देशी विदेशी साहित्‍य पढ़ रखा था। उनके पास गज़ब की स्‍मरण शक्‍ति थी। अगर उन्‍हें चलता फिरता कम्‍प्‍यूटर कहा जाए तो गलत न होगा। मैं अक्‍सर कहा करता था, जिसका मित्र देवीप्रसाद, डायरेक्‍टरी का क्‍या काम है। फिराक, पंत और महादेवी का निधन हुए एक अर्सा हो चुका है, डीपीटी को आज भी उनके टेलीफोन नंबर याद होंगे। दो-चार पैग पीने के बाद उस पर लोकगीत सुनाने की धुन सवार होती मेज़ नहीं तो वह माचिस की डिबिया से तबले का काम लेते हुए यके बाद दीगरे, अवधी, भोजपुरी, पंजाबी, कश्‍मीरी, सिंधी, तेलुगु, कन्‍नड़, मलयालम गर्ज़ यह कि किसी भी भाषा के लोकगीतों की झड़ी लगा देते । वह गीत गोविंद का पाठ कर सकते थे, संस्‍कृत के श्‍लोक सुना सकते थे, कुरान की आयतें सुना सकते थे। वह जेएनयू छात्रसंध के अध्‍यक्ष रह चुके थे। सम्‍मोहित करने की उनमें अद्‌भुत क्षमता थी। इसका प्रयोग लड़कियों पर उन्‍होंने बहुत कम किया। लड़कियों की बात भी वह प्रायः नहीं करते थे। छोटी उम्र में जिनकी शादी हो जाती है, उनका यही हश्र होता है। ऐसे लोगों की भूख लगने से पहले ही खत्‍म हो जाती है। डीपीटी की भी भूख खत्‍म हो चुकी थी प्‍यास बाकी थी, जो कभी खत्‍म ही नहीं होती थी। आज भी बरकरार है। जे0 एन0 यू0 की भी किसी समूची लड़की की उन्‍हें याद न थी। किसी के गेसू (काली घटा) किसी की आँखें (झील) किसी की बाहें (मर्मरीं) किसी की आवाज़ (प्र्रपात) और किसी की महज़ सुगंध (संदल) याद रह गयी थी। मैं बालों का प्रसंग छेड़ देता तो डीपीटी के आसमान में काली घटाएँ छा जातीं, केश राशि पर लिखे श्‍लोक, गीत, शेर, रूबाइयां, सॉनेट, हाइकू उनकी जुबां से झरने लगते। यकायक शराब की खपत बढ़ जाती। मेरी तरह उन्‍हें भी दारू की लत लग चुकी थी। मद्यपान में वह बड़े-बड़े योद्धाओं को परास्‍त कर देते। कई बार तो शक होता था कि विधाता ने उन्‍हें पेट दिया है कि मटका। मेरी तरह वह भी बर्बादी के रास्‍ते पर चल निकले थे। साथ में हमेशा कोई न कोई शिष्‍य रहता या प्रवक्‍ता। प्रवक्‍ता भी कुछ दिनों बाद शिष्‍यों की श्रेणी में आ जाता। कुलपति को भी उनके साथ देखकर मैंने यही सोचा था। उसी शाम तय हो गया कि 27 अप्रैल, 1981 की शाम फै़ज़ हिंदी लेखकों के बीच बितायेंगे। मेज़बानी का मौका मिला इलाहाबाद के तत्‍कालीन शहर कोतवाल यानी पुलिस अधीक्षक विभूति नारायण राय को। वह डीपीटी के क्‍लासफेलो थे। दोनों पुराने साथी थे। फै़ज़ के लिए उनसे बेहतर मेज़बान नहीं हो सकता था।

सन् 1981 के अप्रैल महीने के आखिरी हफ़्‍ते की वह ऐतिहासिक शाम विभूति के घर पर फै़ज़ के नाम दर्ज हो गयी। हिंदी-उर्दू के लेखकों, शायरों, रंगकर्मियों और संस्‍कृत कर्मियों को फै़ज़ के सान्‍निध्‍य का मतलब समझ में आया। लग रहा था कि कई युगों और समुद्रों के पार से अपनी बिरादरी का कोई खोया हुआ सिद्धार्थ घर लौट आया है। फै़ज़ गज़लें सुना रहे थे और श्रोताओं में उपेन्‍द्रनाथ अश्क, डॉ0 मुहम्‍मद अकील रिज़वी, मार्कण्‍डेय, अमरकांत, दूधनाथ सिंह, ममता और मेरे अलावा विश्‍वविद्यालय के अनेक विभागों के प्रवक्‍ता, रीडर और विभागाध्‍यक्ष थे। धीरे-धीरे शाम फरमाइशी कार्यक्रम में तब्‍दील हो गयी। हर कोई अपनी पसंदीदा ग़ज़ल फै़ज़ की आवाज़ में सुनना चाहता और रिकार्ड करना चाहता था। फै़ज़ हर किसी की फरमाइश पूरी कर रहे थे। यहाँ इस बात का उल्‍लेख करना भी ज़रूरी लग रहा है कि फै़ज़ अपनी रचनाओं का बहुत खराब पाठ करते थे, जैसे अपने किसी दुश्‍मन का कलाम सुना रहे हों। उनकी ग़ज़लों का उनसे कहीं बेहतर पाठ करने वाले उसी महफिल में मौजूद थे। मैंने किसी शायर को इतनी बेदिली से अपनी रचनाओं का पाठ करते नहीं देखा। लग रहा था वह शायरी नहीं कोई नीरस गद्य सुना रहे हों। मैंने जब बगल में बैठे दूधनाथ सिंह से यह बात कही तो वह काकभुशुंडी की तरह बोला-‘तुम अज्ञानी हो कालिया। तुम्‍हें शायद मालूम नहीं मिर्ज़ा ग़ालिब तो फै़ज़ से भी खराब पढ़ते थे। हमेशा याद रखो, जितना घटिया शायर होगा, उतना ही अच्‍छा अपनी रचनाओं का पाठ करेगा।' बहरहाल, फै़ज़ इलाहाबाद से अभिभूत थे, इस बात से और भी ज़्‍यादा कि हिंदी के रचनाकारों के बीच भी वह उतने ही मकबूल थे। पढ़ते-पढ़ते कहीं अटक जाते तो महफिल में से कोई न कोई हिंदी अदीब उन्‍हें सही सतरें सुना देता।

जैसे घर का छोटा बच्‍चा बड़े पर अधिक ध्‍यान देने से उपेक्षित अनुभव करता है, अश्‍कजी वैसा ही अनुभव करने लगे। वह जल्‍दी-जल्‍दी अपना गिलास खाली कर रहे थे, जबकि फै़ज़ साहब का जाम कभी-कभार ही लबों को छूता था। अश्‍कजी बहक गये और मौका मिलते ही अपनी ग़ज़लें सुनाने लगे, मगर लोग अश्‍क जी को सुनने नहीं आये थे, किसी ने उनकी तरफ तवज्‍जो न दी। निराश होकर अश्‍क डॉ0 अतिया निशात को एक तरफ ले गये और देर तक ग़ज़लसरा होते रहे।

हम लोगों के पास पाकिस्‍तान में निर्मित और बाद में एच0 एम0 वी0 द्वारा भारत में जारी फै़ज़ की गज़लों के दो एल0 पी0 रिकार्ड थे। पृष्‍ठभूमि में धीमी आवाज़ में एक रिकार्ड चल रहा था। अचानक किसी दिलजले ने स्‍टीरियो की आवाज़ तेज कर दी और नूरजहाँ की तेज, तीखी और सुरीली आवाज में फै़ज़ की पंक्‍तियाँ फ़िज़ा में तैरने लगीं-

लौट आती है इधर को भी नज़र क्‍या कीजै

अब भी दिलकश है तेरा हुस्‍न मगर क्‍या कीजै

और भी दुख हैं ज़माने में मुहब्‍बत के सिवा

मुझसे पहली सी मुहब्‍बत मेरी महबूब न माँग

महफिल का माहौल फै़ज़ की इस नज़्‍म के ठीक विपरीत था। माहौल नज़्‍म की चुगली खा रहा था। लग रहा था जमाने में मुहब्‍बत के सिवा और कोई दुख ही नहीं। हुस्‍न है, मुहब्‍बत है, बेवफाई है। यही सच है, जैसे-

ज़माने भर के ग़म

और इक तेरा ग़म

यह ग़म होगा तो कितने ग़म न होंगे।

हर अदीब लहुलुहान था-कोई मयगुसारी से, कोई शेरो शायरी से और कोई अफ़सानानिगारी से।

अश्‍कजी के बाद अब डीपीटी को दौरा पड़ा था। वह अपना गिलास थामे फै़ज़ के चरणों में बैठ गया और कान पर हाथ रखकर अवधी की तान छेड़ दी। फै़ज़ ने राहत की सांस ली, जब से वह इलाहाबाद आये थे मुतवातिर अपना कलाम सुना रहे थे। शायद यही वजह थी कि वह अपने ही शेर निहायत बेदिली से सुना रहे है, जैसे रस्‍मअदायगी कर रहे हों। उन्‍होंने ममता से अवधी के किसी शब्‍द का अर्थ पूछा और इतने प्रसन्‍न हो गये कि ममता के हाथ से दोनों एल0 पी0 के कवर लिए, कलम माँगा और उनपर लिखा ः ममता के लिए मुहब्‍बत के साथ-फै़ज़

वे दोनों कवर हम लोगों की प्राइज़ पजेशन हो। वर्षों से उन्‍हें कलाकृति की तरह फ्रेम करवाने की सोच रहा हूँ। फै़ज़ ने बताया कि जब बेगम अख्‍तर पाकिस्‍तान आई थीं तो उन्‍होंने बेगम से एक ठुमरी अनेक बार सुनी थी-


‘हमरी अटरिया आओ सजनवा

देखा देखी बलम हुई जाये'

मैंने जब फै़ज़ को बताया कि यह ठुमरी मेरे दोस्‍त सुदर्शन फाकिर ने लिखी थी तो उन्‍होंने फाकिर के बारे में भी बहुत सी जानकारी हासिल की और बताया कि वह इस ठुमरी को भारत-पाक संबंधों की रोशनी में सुना करते थे। जवाब में मैंने पाकिस्‍तानी गायिका फरीदा खानम की ग़ज़ल स्‍टीरियो पर पेश कर दी-

आज जाने की ज़िद न करो,

यों ही पहलू में बैठे रहो।

जान जाती है जब,

उठके जाते हो तुम,

ऐसी बातें किया न करो।

इसी माहौल में भोजन हुआ, सामूहिक चित्र खींचे गये, आखिरी जाम सड़क के नाम तैयार हुए और महफ़िल बर्खास्‍त हुई। डीपीटी लुढ़कते-लुढ़कते फै़ज़ के साथ ही गाड़ी में सवार हो गया। फै़ज़ ने कुछ और लोकगीत सुनने की फरमाइश की थी। डीपीटी ने तान छेड़ दी और गाड़ी स्‍टार्ट हो गयी।

हम लोग डीपीटी की क्षमता से परिचित थे, वह अनंत काल तक लोकगीत सुना सकता है। इसका भरपूर परिचय उसने कुछ दिन पहले ही दिया था, जब भीष्‍म साहनी सपत्‍नीक हमारे यहां रुके हुए थे। शाम को अनायास ही डीपीटी प्रकट हो गये थे भये प्रगट कृपाला। भीष्‍मजी से परिचय होते ही उसने ‘चीफ की दावत' के अंशों का पाठ शुरू कर दिया। भीष्‍मजी और उनकी पत्‍नी शीलाजी चमत्‍कृत रह गयीं कि यह कैसा शख्‍स है, जो कविता की तरह कहानी याद रख सकता है। मुझे मालूम था, डीपीटी की स्‍मरण शक्‍ति ही नहीं घ्राण शक्‍ति भी विलक्षण है। उसने कमरे में घुसते ही सूँघ लिया था कि माहौल सुवासित है। उसने अपना कश्‍कोल (भिक्षापात्र) आगे बढ़ा दिया मय और माशूक के दरबार में कश्‍कोल ही बढ़ाया जा सकता है, यह इस कोठे का दस्‍तूर था। कोठे का ही नहीं, इलाहाबाद की संस्‍कृति का भी। यहां ताज भी कश्‍कोल में हासिल किया जाता है, जैसे विश्‍वनाथ प्रताप सिंह ने किया था, यह नारा बुलंद करके ः ‘राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है।' उन दिनों फकीरी फैशन में आ चुकी थी, वरना डीपीटी जैसा इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय के राजनीतिशास्‍त्र विभाग का प्राध्‍यापक फकीरों के अंदाज में चप्‍पल चटखाते हुए पैदल विश्‍वविद्यालय क्‍यों जाता? गुरुजी को पैदल चलते हुए देख छात्र साईकिल से उतर कर गुरुजी के पीछे हो लेते। क्‍लास में पहुँचने तक उसके पीछे अच्‍छा खासा जुलूस हो जाता। एक दिन ममता को डीपीटी के साथ आये एक छात्र से उसकी पदयात्रा की जानकारी मिली तो ममता ने डीपीटी की जेब में कुछ रुपये ठूँस दिये कि शायरों और छात्रनेताओं की तरह विश्‍ववविद्यालय जाना बंद करें। डीपीटी ने जेब से नोट निकाले, आँखों के नजदीक ले जाकर गिने और ममता के वहाँ से हटते ही अपने साथी को बोतल खरीद लाने के लिए रवाना कर दिया। ममता के स्‍नेह से वह इतना विभोर हो गया कि देखते ही देखते नोट बोतल में तब्‍दील हो गये। ममता नाराज होती, इससे पहले ही डीपीटी ने उसे विश्‍वास दिलाया ममता जी, बंदा कल से रिक्‍शा में विश्‍वविद्यालय जाएगा, मगर उसके लिए आपको कुछ पैसों का और इंतजाम करना पड़ेगा।

बहरहाल एक खूबसूरत और याद रह जाने वाली शाम भीष्‍म दम्‍पती के नाम भी दर्ज है। फकीरों के डेरे की रौनक देखकर भीष्‍म दम्‍पती ने पंजाबी के कुछ टप्‍पे सुनाए, उसके बाद तो वह शाम लोकजीवन के आंगन, दुआर, ताल-पोखर, खेत-खलिहान, ड्‌योढ़ी, चौपाल में डूबती उतराती चली गयी। डीपीटी ने गरीबी और अभाव के, विवशता और असमर्थता के, पीड़ा और कसक के ऐसे कारुणिक बिंब प्रस्‍तुत किये कि खुद उसकी आँखें नम हो गयीं ः

हेरउं कासी हेरउं बनारस

हेरउं देस सस आरि

तोहईं जोग बेटी सुघर बर नाही

अब बेटी रहउ कुंआरि।

डीपीटी ने ढेर सारे लोकगीत सुना डाले और करूणा, अभाव, विरह, शोषण, श्रृंगार और राग-विराग की अनेक लोक छवियाँ पेश कर दीं। अमरकांतजी मिदरापान नहीं करते, मगर नशा सबसे पहले और सबसे अधिक उन्‍हें ही चढ़ता था। उन्‍होंने भी एक लोकगीत प्रस्‍तुत किया, जो आज तक दिमाग में दस्‍तक दिया करता है-

सबका देहलन शिवजी

अन्न, धन-सोनवा

हो हमरा के लरिका भतार

शिवजी लरिका भतार....

लरिका भतार ले के सुतली ओसरवा

जरि गइले एड़ी से कपार....

डीपीटी के अनुरोध पर अमरकांत ने वह ग़ज़ल भी सुनाई, जो वह आगरा में प्रगतिशील लेखक संघ की गोष्‍ठियों में सुनाया करते थे, जिसका उल्‍लेख राजेन्‍द्र यादव ने अमरकांत पर लिखे अपने संस्‍मरण में किया है-

मुझसे न पूछ मेरा हाल

सुन मेरा हाल कुछ नहीं

मेरे लिए जहान में

माज़ी और हाल कुछ नहीं।

उन दिनों पाकिस्‍तान की लोकगायिका रेशमा की बहुत धूम थी। अखबारों में रेशमा की खोज को लेकर तरह-तरह के किस्‍से शाया हो रहे थे। संगीत प्रेमियों के बीच रेशमा की आवाज़ सुनने की होड़ मची थी। इलाहाबाद के ‘विख्‍यात कथाकार' बलवंत सिंह ने सबसे पहले रेशमा का कैसेट हासिल किया था। उन्‍होंने श्रीमती शीला संधू की मार्फत रूस से वह पाकिस्‍तानी कैसेट मँगवाया था। बलवंत सिंह वह कैसेट किसी को देते नहीं थे, मगर एक दिन मुझ पर इतने मेहरबान हो गये कि मुझे रिकार्ड करने की इजाज़त दे दी। उस शाम हम लोगों ने रेशमा का पूरा कैसेट सुन डाला। देर रात तक सुरा और संगीत की कॉकटेल बहती रही। टेप डेक में रेशमा के साथ-साथ भीष्‍म दम्‍पती, अमरकांत और डीपीटी के लोक गीत भी रिकार्ड हो गये। रेशमा की तरह वह कैसेट भी मांगे पर जाने लगा और लेखकों के बीच इतना लोकप्रिय हो गया कि दोस्‍तों के बीच घूमते-घूमते एक असाधारण पुस्‍तक की तरह या यों कहना चाहिए कि एक दिलफरेब माशूका की तरह लापता हो गया, जिसकी आज भी तलाश है। जाने किस खुशनसीब के पास वह खज़ाना गड़ा है, रह रहकर उसकी हुड़क उठा करती है।

अगले रोज़ भीष्‍मजी को एक सामारोह में अध्‍यक्षता करनी थी। आयोजक लोग सुबह-सुबह ही उन्‍हें लिवा ले गये। मुझे और डीपीटी को यह भी खबर नहीं थी कि ममता कब कालिज गयी और बच्‍चे स्‍कूल। हम लोगों ने देर रात तक रेशमा का ‘दमादम मस्‍तकलंदर' सुना था और कलन्‍दर की तरह ही मस्‍ती में झूमते रहे थे। दोपहर को बच्‍चों ने स्‍कूल से लौटकर हमें जगाया, मशीनों की गड़गडा़हट सुनकर मुझे इत्‍मीनान हुआ कि प्रेस चल रहा है। प्रेस में उन दिनों पाठ्‌य पुस्‍तकों के मुद्रण का काम चल रहा था और एक-एक पुस्तक का पि्रंट आर्डर एकाध लाख से कम न होता था। जब तक बिजली रहती थी, मशीनें चलती थीं। वर्षों के जद्दोजहद के बाद प्रेस की गाड़ी पटरी पर आ गयी थी। मेरी भूमिका केवल कर्मचारियों के वेतन और किश्‍तों की व्‍यवस्‍था करने तक सीमित थी। भीष्‍मजी समारोह से लौट भी आए, हम दोनों कलंदर उसी हालत में पड़े थे, जिस हालत में वे छोड़ गये थे। उन्‍हें यकीनन जीने का यह ढब अजीब लगा होगा।

मेरे माता-पिता कभी भूले-भटके पंजाब से आ जाते तो उन्‍हें भी मेरी जीवन शैली देखकर बहुत तकलीफ होती, जबकि उनकी उपस्‍थिति में मैंने न कभी सिगरेट फूँका था और न कभी मदिरा पी थी। उनके आने की सूचना मिलते ही सबसे पहले मैं घर से खाली बोतलें हटाता। प्रेस का कोई कर्मचारी बोरे में भरकर बोतलें ले जाता तो मुझे बहुत शर्म आती कि श्रमिक सोचते होंगे उनके परिश्रम के बल पर मैं गुलछर्रे उड़ा रहा हूँ। इस उम्र में मेरे माता-पिता मुझे डाँट भी न सकते थे, जबकि मेरे माता-पिता के आते ही ममता, बच्‍चों और माता-पिता का मेरे खिलाफ संयुक्‍त मोर्चा खुल जाता। दुनिया जहान का अनुशासन मुझ पर लागू हो जाता। सुई की नोक पर सोना, उठना, नहाना और खाना पड़ता। इससे बच्‍चों का बहुत मनोरंजन होता। शराबी को इससे बड़ी सज़ा नहीं दी जा सकती कि उसे सूरज डूबते ही खाना खिला दिया जाए। मुझे खाने के बाद पीने का अभ्‍यास ही न था। गुनाह बेल्‍लज़त हो जाता। मेरे पिता उस ज़माने के अध्‍यापक थे जब यह सोचा जाता था कि केवल सख्‍ती से, खास तौर पर पिटाई से बच्‍चों को सुधारा जा सकता है। लिहाज़ा बचपन में मेरी जमकर धुनाई होती थी और शायद ही कोई ऐसा दिन निकलता होगा कि मुझे टाँगों के भीतर से कान पकड़कर दीवार की तरफ मुंह कर मुर्गा न बनना पड़ा हो। अब इस उम्र में मेरे माता-पिता मुझे पीट तो न सकते थे, वह अपने मौन से बहुत कुछ स्‍पष्ट कर देते। मेरे साथ बचपन में भी उनका यह प्रयोग असफल रहा था। घर में मेरे साथ जितनी सख्‍ती की जाती, मुझ पर जितना अनुशासन लागू किया जाता, मैं उसी अनुपात में अधिक ज़िद्दी, ढीठ और गुस्‍ताख होता चला गया था। अवज्ञा का प्रथम पाठ मैंने उन्‍हीं दिनों सीखा था। पिता ने तो आजिज आकर मुझे मेरे हाल पर छोड़ दिया था, मगर मेरी मां ने डाँट-फटकार का क्रम अंत तक जारी रखा। पिता जीवन भर डीएवी शिक्षण संस्‍थाओं से जुड़े रहे। जब तक उनका बस चला, उन्‍होंने घर में शुद्धतावादी आर्यसमाजी अनुशासन कायम रखने की भरपूर कोशिश की, मगर मुझे उस माहौल में वैसी ही घुटन महसूस होती जो हवन की गीली लकड़ी के ठीक से आग न पकड़ने पर उसके धुएँ से होती है। इस उलझन से बचने के लिए मैं बहुत कम पिता के सामने पड़ता था। वह नीचे आते तो मैं ऊपर चला जाता, वह ऊपर बैठते तो मैं नीचे। सिगरेट की लत ने भी मुझे परिवार से दूर कर दिया था।

एक दिन डीपीटी अपनी नादानी से मेरे पिता के हत्‍थे चढ़ गया, जबकि मैंने उसे आगाह कर रखा था कि जब तक माता-पिता शहर में हैं वह ज़रा बचकर रहे। वह मेरी बात नहीं माना। रात को मैं तो खा-पीकर ऊपर जाकर सो गया था, देवीप्रसाद की ऐसी ‘कूकी' चढ़ी कि वह दोपहर तक सोते रह गया। दोपहर को किसी काम से फोरमैन कमरे में गया तो उसने लौटकर पिता को बताया कि कमरे में कोई सो रहा है। दिन के बारह बजे का समय होगा। मेरे पिता सशंकित हो गये कि मेरे किसी और दोस्‍त ने तो आत्‍महत्‍या नहीं कर ली। उन्‍होंने ऊपर जाकर देवीप्रसाद की नाक पर हाथ रखकर महसूस किया कि सांस चल रही है या नहीं। इससे पूर्व जालंधर और दिल्‍ली में मेरे करीब आधा दर्जन दोस्‍त इस प्रकार की नादानियों का शिकार हो चुके थे। कोई मजाज़ की तरह सर्दी में अकड़ गया था और किसी ने नींद की इतनी गोलियां खा लीं कि उसकी शाम की सुबह नहीं हुई। पिता गुस्‍से में तममाए हुए नीचे आ गये और फोरमैन से कहा कि देवीप्रसाद को उठाकर नीचे लाओ। फोरमैन ने देवीप्रसाद को जगाया तो उसने चाय की फरमाइश की। चाय पीकर डीपीटी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए मुँह धोने के लिए नीचे उतरे। तौलिए की जगह तकिए का गिलाफ उनके हाथ में था। पिता ने डीपीटी को आसन ग्रहण करने को कहा और उसकी क्‍लास ले ली, ‘सुनो बरखुरदार, मैंने सुना है, तुम विश्‍वविद्यालय में पढ़ाते हो।'

‘जी', डीपीटी ने आँखे मलते हुए जवाब दिया, ‘बंदा यूनिवर्सिटी में मुदर्रिस है।'

‘आज छुट्टी है क्‍या?'

‘जी नहीं, छुट्टी तो नहीं है। रात देर से सोया, सुबह नींद नहीं खुली।'

‘आपने छुट्टी ले रखी है?'

‘जी नहीं, छुट्टी तो नहीं ली, मगर विश्‍वविद्यालय में चलता है।'

‘क्‍या चलता है?'

‘छात्र मुझे बहुत चाहते हैं, वे इसके आदी हो चुके हैं।'

‘आप बहुत ग़ैर जिम्‍मेदार उस्‍ताद हैं। आप अपने छात्रों के जीवन के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।'

डीपीटी हक्‍का-बक्‍का उनकी तरफ देखने लगा। पिता ने अपना उपदेश जारी रखा, ‘जब उस्‍ताद इतना काबिल होगा ताे छात्र कैसे निकलेंगे? कभी सोचा है आपने, आप अपने समाज के साथ कितना बड़ा विश्‍वासघात कर रहे हैं?'

डीपीटी सुबह-सुबह इस मुठभेड़ के लिए तैयार न था। फोरमैन ऊपर आकर मुझे तफसील से बता गया कि बाबूजी त्रिपाठीजी पर बिगड़ रहे हैं। मैं समझ रहा था, मेरी नालायकियों की सज़ा भी डीपीटी को मिल रही होगी। मैंने नीचे उतरना भी मुनासिब न समझा। चुपचाप नहाने चला गया। जब तक डीपीटी मुँह-हाथ धोकर तैयार होते, पिताजी ने यूनिवर्सिटी के लिए रिक्‍शा मँगवा दिया था। देवीप्रसाद चुपचाप रिक्‍शा में बैठकर रवाना हो गया। शाम को फोन पर उसने मुझे सुबह के हादसे के बारे में बताया और कहा कि जब तक आपके पिता शहर में हैं, रानी मंडी आने की हिम्‍मत न पड़ेगी और सचमुच डीपीटी तब तक हमारे यहाँ नहीं आये जब तक उन्‍हें इसकी प्रामाणिक जानकारी न मिल गयी कि मेरे माता-पिता पंजाब लौट चुके हैं।

डीपीटी का वृहस्‍पति बहुत बलवान है और वह उसकी कुंडली में जरूर केंद्र में पड़ा रहा होगा। उसके जीवन में कोई और अभाव रहा हो तो रहा हो, मदिरा का कभी अभाव नहीं रहा। महीने के पहले सप्‍ताह तो वह किसी का मुखापेक्षी ही न रहता था, उसके साथ उसका मोबाइल बार चलता था। इस मामले में उसे मुकद्दर का सिकंदर कहा जा सकता था, मगर वह इतनी तेज़ी से अपने खज़ाने खाली कर देता कि बाकी तीन सप्‍ताह मुकद्दर के पोरस की तरह बिताता। उसका अच्‍छा-खासा वेतन एक हफ़्‍ते में खलास हो जाता। वह शौक से पीता और फराखदिली से पिलाता। जेब इजाज़त दे या न दे। वह हर शाम ग़ालिब की पंक्‍तियाँ चरितार्थ कर दिखाता कि ‘हर शब पिया ही करते हैं मय जिस कदर मिले।' कई बार तो लगता था मदिरा उसकी चेरी है, गर्ल फ्रेंड है, कॉल गर्ल है, जो उसके एक ही फोन पर कच्‍चे धागे से बेँधी चली आती है, आने में असमर्थ हो तो उसे बुलवा भेजती है। वह अपनी बातों की दौलत से उसकी झोली भर देता। बातों का सौदागर है वह। अक्‍सर नशे के आलम में वह बुदबुदाया करता हैः

कभी तेरा दर कभी दरबदर

कभी अर्श पर कभी फर्श पर

मैंने उसे अर्श पर भी देखा है और फर्श पर भी। रानीमंडी उसका फर्श था तो दिल्‍ली अर्श। उसके साथ मैंने जीभर कर अर्श की सैर भी की है। दिल्‍ली का शायद ही ऐसा कोई पांच सितारा होटल होगा जहाँ डीपीटी की बदौलत इस ख़ाकसार के कदम न पड़े हों। अर्श के तमाम बैरों से भी उसकी पहचान हो चुकी थी। वे उसे सूरत से ही नहीं सीरत से भी पहचानते थे। उसके बैठते ही सागरो मीना खुद-ब-खुद चले आते। खाने-पीने का बिल अदा करने का भी उसका अपना अंदाज था। नोट गिनने में उसे आलस आता था, वह पूरी गड्‌डी की बलि दे देता, प्रसाद के रूप में अगर कुछ रकम लौटती तो वह बेनियाजी से उसे जेब के हवाले कर देता। उसके अर्श में ट्रेन चलती थी न बस, सिर्फ विमान चलते थे। इलाहाबाद हवाई नक्‍शे से गायब हो गया तो वह लखनऊ से लौट जाता। नितीश कुमार रेल मंत्री हुए तो उन्‍होंने उसे अर्श से उतारने की कोशिश की। मुझे इसका एहसास तब हुआ जब पिछली मुलाकात में एक कार्ड उसकी जेब से फिसल कर नीचे गिर गया। यह वातानुकूलित श्रेणी का एक रेल पास था, जो रेलमंत्री ने ‘गुरुजी' को दिया था। यह कोई अनहोनी घटना नहीं है, प्रत्‍येक पार्टी में उसके नितीश कुमार हैं। आपातकाल में वह मधु लिमये, चंद्रशेखर, जार्ज फर्नाडीज़ के साथ बंदी बना लिया गया था। चंद्रशेखर की भारत यात्रा में वह भी सहयात्री था। राजीव गाँधी की ज्‍योति बसु से मुलाकात उसी के घर पर तय हुई थी। उसके ड्राइंग रूम में झरने फूटते थे। बेनज़ीर भुट्‌टो की शादी में वह शामिल था, मालूम नहीं बाराती की हैसियत से या बतौर घराती। सुबह वह लखनऊ में रमेश भंडारी के साथ नाश्‍ता कर सकता है, भोपाल में दिग्‍गी राजा के साथ लंच और पटना में लालू प्रसाद यादव के साथ डिनर। वह शीला दीक्षित को डॉ0 रामविलास शर्मा के यहाँ ले जा सकता है और अशोक बाजपेयी की अध्‍यक्षता में फहमीदा रियाज का काव्‍यपाठ करा सकता है। उसके शब्‍दकोश में सब कुछ संभव है। ताज्‍जुब न होगा, किसी दिन खबर मिले डीपीटी संसद में पहुँच गया है, निमाड़ में विश्राम कर रहा है या तिहाड़ में। वह कभी अर्श पर है कभी फर्श पर। कई बार तो लगता है डीपीटी हमारा चंद्रास्‍वामी है, हमारा सुब्रह्मण्‍यम स्‍वामी है। वह विचारधारा से ऊपर उठ चुका है, विचारधारा की संकीर्ण दीवारें उसने तहस-नहस कर डाली हैं और अकबर इलाहाबादी के इस चलते-फिरते शेर में तब्‍दील हो चुका हैः

मेरा ईमान क्‍या पूछती हो मुन्‍नी

शिया के साथ शिया सुन्‍नी के साथ सुन्‍नी

ऐसा जादूगर शाम को तश्‍नःलब नहीं रह सकता, यह दूसरी बात है कि ‘कब तश्‍नःलब की प्‍यास बुझी है शराब से।' फै़ज़ अहमद फै़ज़ इलाहाबाद आये और आकर लौट गये, मगर डीपीटी की तश्‍नगी खत्‍म न हुई। उसकी तश्‍नगी का आलम फै़ज़ के शब्‍दों में यों बयान किया जा सकता हैः

न गुल खिले हैं,

न उनसे मिले,

न मय पी है,

अजीब रंग में अब के बहार गुज़री है

यह अकारण नहीं है कि अगले रोज़ जब महादेवीजी की अध्‍यक्षता में फै़ज़ का नागरिक अभिनंदन और विदाई समारोह हो रहा था तो डीपीटी ने मंच से शुभा मुद्‌गल को फै़ज़ की यही ग़ज़ल पेश करने की दावत दी थी। उन दिनों शुभा मुद्‌गल शुभा गुप्‍ता थीं और इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय की छात्रा थीं-अत्‍यंत दुबली-पतली और छरहरे बदन की छुईमुई सी युवती। तब तक इलाहाबाद इस प्रतिभा से नितांत अपरिचित था। शुभा मुद्‌गल ने जब अपने सधे कंठ से फै़ज़ की ग़ज़ल पेश की तो हाल में सन्‍नाटा खिंच गया। उनकी अदायगी में शास्‍त्रीय संगीत का पुट और गज़ब का कसाव था। फै़ज़ खुद दाद देने लगे। उनकी गायी हुई एक गज़ल आज भी स्‍मृतियों में कौंध रही है-

गुलों में रंग भरे बादा-ए-नौ बहार चले

चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले।

बहुत कम लोग जानते होंगे, शुभा मुद्‌गल हिंदी के प्रख्‍यात प्रगतिशील समीक्षक प्रकाशचंद्र गुप्‍त की पौत्री हैं। इस बात का उल्‍लेख करना भी ग़ैरज़रूरी न होगा कि शुभा के पिता स्‍कंदगुप्‍त फ़ैज़ के ज़बरदस्‍त फैन थे और पिता की तरह इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग से सम्बद्ध थे। उन्‍होंने फै़ज़ के कार्यक्रमों पर मूवी कैमरे से फिल्‍म बनाई थी। और फै़ज़ की हर गुफ़्‍तगू और तकरीर का टेप तैयार किया था। वह भारत के मान्‍यताप्राप्‍त क्रिकेट कमेंटटर भी थे। आज वे हमारे बीच नहीं हैं। वह फिल्‍म और वह दुर्लभ टेप कहाँ है, कहा नहीं जा सकता।

आज टीवी के प्रत्‍येक चैनल पर शुभा मुद्‌गल की धूम है। ‘आली मेरे अंगना' के बाद उन्‍होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। आज इंटरनेट पर शुभा मुद्‌गल का अपना वेबसाइट है और वह शास्‍त्रीय संगीत से पॉप संगीत की ओर मुड़ गयी हैं। ‘अब के सावन' तमाम चैनलों पर उनके पॉप संगीत ने कहर ढा रखा हैः

अब के सावन ऐसे बरसे

भीगे तन मन

जिया न तरसे।

इलाहाबाद में मेरे पास अपना कुछ भी नहीं था, जो कुछ था कर्ज़ का था। यही ग़नीमत थी कि मैं कर्ज़ की मय नहीं पीता था। इलाहाबाद आये एक बरस भी न हुआ था कि मेरा पहला कथा संग्रह ‘नौ साल छोटी पत्‍नी' प्रकाशित हुआ। उस में लेखक परिचय कुछ इस प्रकार दिया हुआ था- रवीन्‍द्र कालिया, उम्र तीस साल, कर्ज़ पैंतीस हज़ार। इस परिचय के बावजूद यहाँ के लेखक बंधु मुझे धन्‍ना सेठ समझते थे, जबकि मैं बीड़ी-सिगरेट को मोहताज था। मुझ में एक खामी यही थी कि मैं अपनी गुरबत का बखान नहीं करता था, इसका नतीजा यह निकला कि वक्‍त ज़रूरत बिरादरी के लोग प्रायः संकट में डाल देते। मेरी स्‍थिति का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि शादी के बाद हम मियाँ-बीवी अलग-अलग रहने को मजबूर थे। ममता उन दिनों मुम्‍बई के महिला विश्‍वविद्यालय एस0 एन0 डी0 टी0 में अंग्रेजी की प्राध्‍यापिका थी। वह होस्‍टल में अकेले रह रही थी, मैंने अश्‍कजी के यहाँ तम्‍बू गाड़े हुए थे । मैं अश्‍कजी के भरे पूरे परिवार के साथ रह रहा था। आवास और भोजन की कोई समस्‍या नहीं थी, जेब खर्च के लिए ममता मनी-आर्डर भिजवा देती थी, मगर मेरी मुफ़लिसी का एहसास किसी को नहीं था। मुम्‍बई से मैं अपने साथ रेफ्रिजरेटर और कुकिंग गैस का कनेक्‍शन लाया था। इलाहाबाद में उन दिनों इन दोनों उपकरणों का ज़्‍यादा प्रचलन नहीं था। अश्‍कजी के यहाँ भी चूल्‍हे पर खाना बनता था। कौशल्‍याजी को गैस काफ़ी सुविधाजनक लगी। रेफ्रिजरेटर सीधा रानी मंडी पहुँच गया था। घड़े का ठंडा पानी पीने वाले रेफ्रिजरेटर का पानी पीकर मुझे कोई रईसजादा समझ लेते, जबकि मुम्‍बई के जीवन में कामकाजी दम्‍पत्‍ती के लिए रेफ्रिजरेटर एय्‍याशी नहीं बुनियादी ज़रूरत थी। यह विरोधाभास ही था कि मुम्‍बई का एक गरीब लेखक इलाहाबाद का संघर्षशील लेखक नहीं दिखायी दे रहा था। दोनों शहरों की जीवन शैली और मूल्‍यों में इतना अन्‍तर था कि जब आकाशवाणी ने मेरे प्रसारण शुरू किये तो पाया कि मेरी फीस इलाहाबाद के वरिष्‍ठ लेखकों के बराबर थी। इलाहाबाद में लेखकों को जितनी फीस मिलती थी उससे मुम्‍बई में तो लेखकों का टैक्‍सी भाड़ा न निकलता।

बाहर से कोई लेखक इलाहाबाद पधारता तो कई मेज़बान अपने मेहमान को लेकर इस अपेक्षा से मेरे यहाँ चले आते कि शाम अच्‍छी गुज़र जाएगी, मगर जल्‍द ही लोगों का मोहभंग होने लगा। मुझे तो सिगरेट के लाले पड़े हुए थे। मैंने कभी घटिया ब्रांड की सिगरेट न पी थी। एक बार तलब लगी तो सिगरेट वाले से उधार माँगने की मूर्खता कर बैठा। उसने स्‍पष्‍ट रूप से मना कर दिया। मुझे हमेशा के लिए एक सबक मिल गया यह दूसरी बात है कि बाद के वर्षों में सिगरेट वाले को ज़रूरत पड़ती तो मुझसे उधार ले जाता। उसे याद भी न होगा कि शुरू के दिनों में उसी ने मुझे एक सबक सिखाया था। अपनी तंगदस्‍ती की एक घटना तो भुलाए नहीं भूलती। इलाहाबाद के लिए यह कोई अनूठा अनुभव नहीं था। प्रायः सभी लेखक संघर्षरत थे। उन दिनों शराब का भी इतना रिवाज नहीं था। शायद ही कोई लेखक नियमित रूप से मदिरापान करता हो। ज़्‍यादातर लेखक पैदल टहलते हुए ही मिलते थे, जबकि चौक से स्‍टेशन तक का रिक्‍शा भाड़ा मात्र दस नये पैसे था। शायद यही कारण था कि आर्थिक संघर्ष में भी वे मस्‍त रहते। धनोपार्जन किसी की प्राथमिकता में ही नहीं था। एक सिगरेट चार छह लोग पी जाते थे।

छुट्टी के एक दिन दोपहर को किसी ने दरवाज़ा खटखटाया। मैं शहर में नया-नया आया था किसी की प्रतीक्षा भी न थी। ऊपर से झांक कर देखा, हिन्‍दी के एक अत्‍यन्‍त प्रतिष्‍ठित और बुजुर्ग रचनाकार दरवाज़ा पीट रहे थे। मैं भाग कर नीचे पहुँचा, उन्‍हें दफ़्‍तर में बैठाया। आदर सत्‍कार क्‍या करता, घर में चाय बनाने की भी सुविधा न थी और सर्वेश्‍वर के शब्‍दों में कहूँ तो जीवन ‘खाली जेबें, पागल कुत्‍ते और बासी कविताएँ' था। खाने पीने की व्‍यवस्‍था अश्‍क जी के यहाँ थी, इसलिए निश्‍चिंत था। मुझ से अश्‍कजी की एक ही अपेक्षा थी कि वे दिनभर जितना लिखें, मैं शाम को सुन लूँ। शुरू में तो यह बहुत सम्‍मानजनक लगता था कि एक अत्‍यन्‍त वरिष्‍ठ लेखक मुझे इस लायक समझ रहा है कि मैं उनकी रचना पर कोई राय दे सकूँ। मगर कुछ दिनों बाद मैं इससे ऊबने लगा।

‘आज बहुत मुसीबत में तुम्‍हारे पास आया हूँ।' उन बुजुर्ग रचनाकार ने बताया कि उनकी पत्‍नी को ‘हार्ट अटैक' हो गया है और उन्‍हें किसी भी तरह सौ रुपये तुरन्‍त चाहिएँ।'

सौ रुपये उन दिनों एक बड़ी रकम थी और मैंने दिनभर के लिए किसी तरह एक अठन्‍नी बचा कर रखी हुई थी। मेरे लिए अचानक एक संकट खड़ा हो गया। चाहकर भी मैं उन की कोई मदद नहीं कर सकता था। मैंने अत्‍यन्‍त सकुचाते हुए उन्‍हें बताया कि उन्‍हें यकीन तो न आयेगा मगर सच्‍चाई यही है कि मेरे पास इस समय सिर्फ़ एक अठन्‍नी है। वह हैरत और अविश्‍वास से मेरी ओर देखने लगे। उनके चेहरे के आईने में मेरा गैरलेखकीय महाजनी चेहरा मुझे ही चिढ़ा रहा था। मुझे लगा, मेरी बात सुनकर वह संतप्‍त ही नहीं, आहत भी हुए हैं। उन्‍होंने नज़र उठाकर प्रेस का जायज़ा लिया और लम्‍बी साँस भरते हुए बोले, ‘जो ईश्‍वर को मंजूर है। कहीं और जाकर हाथ फैलाता हूँ।' यह देखकर मुझे भी मर्मांतक पीड़ा हो रही थी कि इतने वर्ष घोर तपस्‍या करने का समाज ने उन्‍हें यह पुरस्‍कार दिया है कि वह अपनी पत्‍नी के इलाज को मुहताज हैं। वह कुछ देर तक चिन्‍तामग्‍न बैठे रहे, पानी पिया और बोले, ‘आप वह अठन्‍नी ही दे दीजिए ताकि रिक्‍शा करके दौड़ भाग कर सकूं।' मैंने खुशी-खुशी अपनी अन्‍तिम पूँजी उन्‍हें सौंप दी। यह दूसरी बात है कि मैं अब सिगरेट के लिए भी मोहताज हो गया था।

हिन्‍दी के वह मूर्द्धन्‍य साहित्‍य साधक चले गये। मुझे भी कोई काम नहीं था, मैं भी उनके पीछे चल दिया, यह सोचकर कि देखते हैं इस विषम परिस्‍थिति से वह कैसे निपटते हैं। वह लोकनाथ की तंग गलियों में खरामा-खरामा बढ़ने लगे। चौराहे पर एक पान की दुकान पर उन्‍होंने एक जोड़ा पान लिया और कुछ दूर जाकर रिक्‍शा में बैठकर कहीं रवाना हो गये। मैं पैदल ही लूकरगंज की तरफ चल दिया ज्ञान के यहाँ। ज्ञान को बताया कि अमुक लेखक की पत्‍नी को हार्ट अटैक हो गया है और वह बहुत परेशान थे। ज्ञान पर मेरी बात का कोई असर न हुआ, बोला, ‘भैया यह इलाहाबाद है। इसकी लीला न्‍यारी है। तुम अपना खून मत सुखाओ। उनकी पत्‍नी स्‍वस्‍थ प्रसन्‍न हैं और संगम पर एक आश्रम में कल्‍पवास कर रही हैं। यकीन न हो तो चलो मेरे साथ अपनी आँखों से देख लो ।'

ज्ञान ने लोकनाथ जाकर नाश्‍ता कराया और फिर हम लोग सचमुच संगम की तरफ चल दिये। जब तक हम सच्‍चा आश्रम पहुँचे दोपहर ढल चुकी थी। सच्‍चा बाबा के आश्रम में प्रवचन कीर्तन का माहौल था। हमने देखा लेखक दम्‍पती तन्‍मयता से कीर्तन भजन में संलग्‍न थे।

मेरे लिए यह संतोष का विषय है कि तीस बरस बाद भी वह लेखक उसी प्रकार साहित्‍य साधना में लीन हैं, सपत्‍नीक स्‍वस्‍थ प्रसन्‍न हैं। उनकी गर्दिश का दौर अभी तक जारी है और प्रयाग की तपोभूमि पर वह अपनी अलख जगाए हुए हैं। प्रयाग का यह फक्‍कड़ अन्‍दाज़ आज भी रचनाकारों को आकर्षित करता है। मुफ़लिसी यहाँ अभिशाप नहीं, सहज स्‍वीकार्य है। सुविधाओं, पुरस्‍कारों और सम्‍मानों की अंधी दौड़ यहाँ के माहौल से एकदम नदारद है।