सामान्य परिचय ‘चित्रलेखा’ / भगवतीचरण वर्मा

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सामान्य परिचय

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में लिखा गया आपका सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यास ‘चित्रलेखा’ 24 उपखंडो में विभक्त है

‘चित्रलेखा’ बारे में सुप्रसिद्ध आलोचक निर्मला जैन का कहना है कि इसके केंद्र में पाप और पुण्य का विषय है जिसमें एक संन्यासी सांसारिकता की ओर अग्रसर होना चाहता है। लेकिन नायिका चित्रलेखा उसे फटकारती है तथा उसकी खुद की रूचि संन्यास में हो जाती है। चित्रलेखामें महान योगी कुमारगिरि और भोग-विलास और वासना में लिप्त शासक बीजगुप्त के चरित्रों की पारस्परिक तुलना में अप्रत्याशित रूप से पाप और पुण्य की नयी परिभाषा गढ़ते हैं और अपने शिक्षक से अंतिम पाठ इस प्रकर सुनते हैंः-

‘संसार में पाप कुछ भी नहीं है, वह केवल मनुष्य के दृष्टिकोण की विषमता का दूसरा नाम है। प्रत्येक व्यक्ति एक विशेष प्रकार की मनःप्रवृति लेकर पैदा होता है । प्रत्येक व्यक्ति इस संसार के रंगमंच पर एक अभिनय करने आता है। अपनी मनःप्रवृति से प्रेरित होकर अपने पाठ को वह दोहराता है यही मनुष्य का जीवन है जो कुछ मनुष्य करता है वह उसके स्वभाव के अनुकूल होता है और स्वभाव प्राकृतिक होता है। मनुष्य अपना स्वामी नहीं है वह परिस्थितियों का दास है-विवश है। कर्ता नहीं है, वह केवल साधन मात्र हैं ।फिर पाप और पुण्य कैसा?

मनुष्य में ममत्व प्रधान होता है। प्रत्येक मनुष्य सुख चाहता है। केवल व्यक्तियों के सुख के केन्द्र भिन्न होते हैं । कुछ सुख को धन में देखते हैं , कुछ त्याग में देखते हैं -पर सुख प्रत्येक व्यक्ति चाहता है, कोई भी व्यक्ति संसार में अपनी इच्छानुसार वह काम न करेगा जिसमें दुःख मिले -यही मनुष्य की मनःप्रवृति है औ उसके दृष्टिकोण की विषमता हैं । संसार में इसीलिये पाप की परिभाषा नहीं हो सकी और न हो सकती है। हम न पाप करते हैं और न पुण्य करते हैं, हम केवल वह करते हैं जो हमें करना पड़ता है।’

आलोचकों के अनुसार वर्मा ने अपने दौर में ऐसे विषयों पर कलम चलाई जिन पर लिखना उस समय बेहद साहस का काम समझा जाता है। इस मामले में उनकी कृति चित्रलेखा और रेखा की मिसाल दी जाती है।

एक सहित्यिक पत्रिका के संपादक गौरीनाथ के अनुसार भगवती चरण वर्मा की कई रचनाओं में गजब की पठनीयता है और वे किशोर एवं युवाओं की मानसिकता के काफी करीब हैं। गौरीनाथ के अनुसार उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति चित्रलेखा, रेखा सहित कई उपन्यासों और कहानियों में ऐसे तत्व हैं जो पाठकों में भावावेश उत्पन्न करते हैं। ऐसे में पाठक किताबें बीच में छोड नहीं पाता। यही वजह है कि उनकी कई रचनाएं हिंदी में सर्वाधिक पढी जाने जाने वाली पुस्तकों की सूची में शामिल हैं।

गौरीनाथ का मानना है कि उनकी रचनाओं में भावुकता स्थाई भाव रहा है और वे करुणा और कोमल भाव जगाने में सफल रहे हैं। उनकी रचनाओं में विचार, रहन सहन के लिहाज से परंपरा पर अधिक जोर दिखता है। उनके पात्रों में तमाम उतार चढाव के बावजूद लीक से हटकर फैसला लेने का भाव नहीं दिखता और अंतत: वे पारंपरिक सोच तथा संस्कार के साथ ही चलते हैं।

निर्मला जैन के अनुसार भगवती चरण वर्मा ने संन्यास की कमियों और उसमें छिपी बुराइयों को बेहतरीन तरीके से स्पष्ट किया है तथा इसके लिए उन्होंने प्रेम को साधन बनाया है। दरअसल उन्होंने प्रेम के माध्यम से अपनी बात सामने रखी है। रेखा जैसी रचनाओं के बारे में निर्मला जैन ने कहा कि एक दौर में यह खूब पढी गई। ऐसा ही धर्मवीर भारती की कृति गुनाहों का देवता के साथ भी हुआ। लेकिन ऐसी रचनाओं में स्थाई भाव की कमी होती है। जब स्थाई भाव की बात आती है तो चित्रलेखा और धर्मवीर भारती की बहुचर्चित कृति सूरज का घोडा जैसी रचनाएं ही आएंगी।

गौरीनाथ के अनुसार भगवती चरण वर्मा को अपने व्यक्तिगत जीवन में कई तरह की बाधाओं का सामना करना पडा। पारिवारिक भार भी आया। कम उम्र में ही पिता की मृत्यु होने से समस्याएं और बढ गई। इसके बावजूद वह हार नहीं मानने वाले थे और उन्होंने अपने जीवन में कई तरह के काम किए। लेकिन बाद में उन्होंने स्वतंत्र लेखन किया। उनकी कृति चित्रलेखा पर दो बार 1941 एवं 1964 में फिल्में बनीं और दोनों बार उसे अच्छी लोकप्रियता हासिल हुई।

(श्री अनिल जनविजय द्वारा लिखित आलेख से साभार )


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