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मुर्दे / श्याम सुन्दर अग्रवाल

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जब उग्रवादी ने वीराने में चार राहगीरों को रोका तब रिवाल्वर में केवल दो गोलियाँ ही शेष बची थीं। पहली चार गोलियाँ दो व्यक्तियों को लाशों में बदल चुकी थीं। चारों राहगीर भयभीत थे। एक ने जान बचाने के लिए भागने का प्रयास किया तो रिवाल्वर ने गोली उगली और भागने वाला वहीं ढ़ेर हो गया। शेष बची एक गोली तीनों के लिए काफी नहीं थी। इसलिए उन तीनों को कब्रें खोदने का हुक्म सुनाया गया। कब्र खोदते हुए पहले ने कहा. “यह हमें कब्रों में जिंदा दफन कर देगा। हमें मिल कर इसे काबू कर लेना चाहिए।” सहमा हुआ दूसरा बोला, “नहीं कब्रें तो उन तीन लाशों के लिए हैं। हमने कोई गड़बड़ की तो वह हमें गोली मार देगा।” “जैसा वह कहता है, वैसा ही करें, शायद वह हमें छोड़ दें।” तीसरा दूसरे की बात से सहमत था। जब वे कब्रें खोद चुके तो आदेश मिला, “अपनी-अपनी कब्र में लेट जाओ, वर्ना गोली मार दी जायेगी।” पहले ने धीमी आवाज में दूसरे से कहा, “अभी भी मौका है, और नहीं तो हम भाग ही जाएँ। रिवाल्वर की गोली बहुत दूर तक मार नहीं करती।” दूसरे ने काँपते हुए कहा, “नहीं वह हमें मार देगा। कब्र में लेटने के बाद शायद उसे हम पर रहम आ जाए।” दूसरा और तीसरा कब्रों में लेट गये और आदेशानुसार अपने ऊपर मिट्टी डालने लगे। पहले ने उग्रवादी को सम्बोधित होते हुए कहा, “ वहाँ जमीन में कुछ हथियार दबे हुए लगते हैं।” हथियार देखने के लिए उग्रवादी कब्र के नज़दीक हुआ। पहले ने उसे धक्का दे कब्र में फेंक दिया और अपने पूरे सामर्थ्य से उस पर मिट्टी डालने लगा।

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