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वोट बैंक / तारिक असलम तस्नीम

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रविवार का दिन था और सुबह के नौ बज रहे थे। बरामदे में बैठे लोग चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे। इधर-उधर की बातें छिड़ी थीं।

आज के अख़बार के साथ साहिल साहब हाज़िर हुए। अपनी कुर्सी पकड़ने से पहले उन्होंने एक शेर पढ़ा—-"दोस्त, अपने मुल्क की किस्मत पे रंजीदा न हो, उनके हाथों में है पिंजरा, उनके पिंजरे में सुआ।"

इसे सुनकर जाहिद ने पूछा--"मियां साहिल, सब ख़ैरियत तो है? यह सुबह-सुबह दुष्यंत की गज़ल क्यों याद आने लगी?" "इसका ज़वाब अख़बार की कुछ ख़बरें देंगी।" --उन्होंने अन्दाज़ से कहा।

"ऐसी कौन-सी ख़बर छपी है?"

"यही है कि चुनाव के दिनों में सभी दलों को मुसलमानों की बड़ी याद आती है। उनकी तकलीफ़ें और परेशानियाँ आँखों के सामने नाचती हैं। उनकी भलाई के लिए वायदे-दर-वायदे किये जाते हैं; मसलन, वक्फ़ की ज़मीन पर से शासक-दल के कब्ज़े को ख़त्म किया जायेगा। मौलाना मज़हरुल हक़ अरबी फारसी विश्वविद्यालय को पूर्ण दर्जा दिया जायेगा और सामाजिक विकास की मुख्यधारा से जोड़ा जायेगा। कमाल ही तो है यह कि पूरे पाँच साल के बाद कालपात्र के समान समस्याएँ सामने आती हैं।"

"क्या ख़ूब कही आपने। मगर मुसलमानों को वक्फ़ की ज़मीन से क्या लेना? और अरबी फारसी विश्वविद्यालय में कौन पढ़ने जायेगा, जबकि हमारे बच्चे स्कूल और कालेजों में उर्दू-फ़ारसी पढ़ने को तैयार न हों! हमारे दीनी-मदरसों को आतंकवाद का गढ़ कहा जा रहा है। इससे बच्चे खौफ़ज़दा हुए हैं। यह खौफ़ हेलीकोप्टरों में मुल्लाओं और मौलानाओं के साथ उड़ने और मीडिया में बयानबाज़ी करने से दूर नहीं होगा। इसके लिए कुछ काम करने होंगे।"-- जाहिद साहब गरजे।

"अरे भाई, सभी दल वाले काम ही तो कर रहे हैं। मुसलमानों को बहलाने के लिए मुसलमानों को कांधे पर बिठाये फिर रहे हैं। इससे ज़्यादा हमदर्दी क्या हो सकती है! आख़िर हम वोट-बैंक जो ठहरे।"

साहिल साहब के इतना कहने पर सबने ज़ोर का ठहाका लगाया क्योंकि ये कभी वोट देने नहीं गये।

वैयक्तिक औज़ार

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