Gadya Kosh:अबाउट
भारतीय ज्ञानोदय जैसी किसी अवधारणा के पीछे यह बात काम करती है कि जिसे हम भारत समझते हैं उसके सामूहिक विवेक में, उसके ज्ञान-विज्ञान की जानकारी और उसके प्रयोग में इतिहास में कोई बडा गुणात्मक अंतर किसी काल-खंड में पडा था जिसके पहले और बाद के समय को विस्मय के बिना एक दूसरे से जोडना कठिन जान पडता हो. यह एक यूरोपीय समझ है जिसमें समय की धारावाहिकता के सन्दर्भ में परिवर्तनों को देखने की जगह क्रांतिकारी परिवर्तनकारी समय को रेखांकित किया जाता है. यह सही है कि किसी किसी समय में ज़्यादा परिवर्तन होते हैं, लेकिन यह कुल मिलाकर इतिहास के किसी मोड को ज़्यादा गौरवान्वित करने की यूरोपीय दृष्टि का फल है कि हमारे देश में लोग मानने लगे कि गौतम बुद्ध के समय हम सारी दुनिया के गुरू थे. भारतीय सभ्यता का इतिहास किसी भी तरह से दुनिया की कई अन्य सभ्यताओं- चीन, मिश्र या फिर जिसे आज मध्यपूर्व का देश कहते हैं उससे महान नहीं रहा. हमारी सभ्यता का जो पाठ हमें आज इतिहास-सम्मत प्रतीत होता है वह अंग्रेजों के समय में तैयार किए गए पाठ के कारण है. इस देश में प्राचीन काल यानि वेदों के समय से लेकर हर्षवर्धन काल के बारे में यह कहा जा सकता है कि यह एक शक्तिशाली समाजों का समुच्चय था लेकिन यह समाज बहुत ही विभक्त और असमानताओं से भरा हुआ था. महान ग्रंथ लिखे गये और महान लोग भी हमारे यहां हुए लेकिन भारत में ज्ञानोदय हुआ हो और उसका लाभ पूरे समाज को मिला हो ऐसा मानने में कठिनाई है. जिसे हम मध्ययुग कहते हैं-यानि हर्षवर्धन से लेकर मुगल काल तक उस युग में भी हमारे देश में ज्ञानोदय के कुछ चिह्न तो मिलते हैं (जैसे- भक्ति युग ) लेकिन समाज के बहुसंख्यक लोग कठिन जीवन जीते थे और अन्य देशों की तुलना में श्रेष्ठ जीवन नहीं जीते थे. और, आधुनिक युग -जिसके अंतर्गत हम अठारहवीं से लेकर 1990 तक के समय को ले सकते हैं- पूरी तरह से अराजक समय है जिसमें ज्ञानोदय का शोर सबसे ज़्यादा हुआ लेकिन बहुसंख्यक लोग त्रस्त रहे. 1990 के बाद का समय- जिसे सुविधा के लिए हम उत्तर-आधुनिक समय कह सकते हैं आज तक का सबसे हाहाकारी समय है. अब बताइये कि किस युग में भारत के ज्ञानोदय को ढूढा जाये? आपको यह लगता होगा कि यह दृष्टि हीन भावना से अपने देश के इतिहास को देखना है. आखिरकार जिस देश ने आर्यभट्ट, बुद्ध, महावीर, कालिदास, अशोक, अकबर, कबीर और गाँधी जैसे महान जीनियस पैदा किए हो उस देश में ज्ञानोदय कैसे नहीं हुआ है? कहने वाले यह कहने से भी नहीं चूकेंगे कि हम महान थे, हैं और भविष्य में और महान होंगे. नोस्त्रेदाम की एक 'भविष्यवाणी' कि 2000 के बाद भारत दुनिया का सबसे शक्तिशाली राष्ट्र बनेगा, हमारे देश में खासी लोकप्रिय रही है. इन दिनों एक बात तेजी से फैली है कि सारी दुनिया में भारत के आई. टी. क्षेत्र से जुडे लोगों की वजह से भारत की उपस्थिति और महत्त्व को माना जा रहा है. ये बातें कुछ हद तक सही भी हैं लेकिन इसका ज्ञानोदय से कोई सम्पर्क नहीं है. यूरोप में ज्ञानोदय को मानवतावादी दृष्टिकोण के शक्तिशाली होने के संकेत के रूप में लिया जाता है. अगर ज्ञानोदय के बाद यूरोप के समाज में कोई बडा परिवर्तन हुआ तो वह है कि इसके मनुष्य की शक्ति को महत्त्व मिला और उसकी मुक्ति के संघर्ष के प्रति एक विश्वास पैदा हुआ. भारत इस तरह का देश अभी तक नहीं बन पाया है जहां मनुष्य और मनुष्य के बीच अंतर न किया जाता हो. इस देश के जिस महान ज्ञान की परम्परा पर गर्व किया जाता है उसके मूल में यह बात है कि ज्ञान सबके लिए नहीं है. अभी भी जब भारतीय दर्शन पढाया जाता है तो यह बतलाया जाता है कि भारतीय दर्शन के हिसाब से दर्शन सबके लिए नहीं है ! दरअसल, ज्ञानोदय हर समाज में हो यह जरूरी नहीं. इसके बिना भी देश अच्छा भला रह सकता है. अमरीका में ज्ञानोदय नहीं हुआ, जापान में नहीं हुआ, रूस में भी नहीं हुआ. उस अर्थ में शायद चीन में भी नहीं हुआ. ये देश सभी देशों से आगे हैं और जहां ज्ञानोदय हुआ वे किसी भी प्रकार से आज बेहतर समाज नहीं हैं. मूल बात है कि हम अपने देश की दशा को बदल कर बेहतर बना पायेंगे या नहीं. भारत वैश्वीकरण के दौर में एक हाहाकारी समाज बनता जा रहा है जहां असमानता, बर्बरता और श्रम विमुखता आज भयानक रूप से बढ रही है. ऐसे कठिन समय में जब 15 करोड से ज़्यादा मनुष्य भारतीय नागरिक कहलाने के अधिकारी नहीं हैं एक ऐसा उपक्रम चल पडा है जिसका उद्देश्य है देश के प्रत्येक नागरिक को पहचान पत्र देना. जहां सरकारी आंकडे बताते हैं कि बहुसंख्यक जनता की आमदनी 20 रूपये से कम है, यानि वे अपने परिवार का पेट भरने के लिए सक्षम नहीं हैं. पूरा देश मानो वैश्वीकरण के अफीम में धुत्त पडा हुआ है. कहते हैं जब अंग्रेज केंटॉन से चीन के साथ व्यवसाय करते थे उन्होंने पूरे चीन को अफीम के नशे का ऐसा आदी बना दिया कि जब चीन की स्वायत्तता को खतरा हुआ और उसे अंग्रेज व्यवसायियों से लडना ही पडा तो पाया गया कि महान चीन अफीम के नशे में इस कदर डूब चुका था कि वह लड ही नहीं सकता था! अगर वैश्वीकरण की प्रक्रिया इसी तरह चलती रही तो भारत का हश्र भी ऐसा हो सकता है. अगर भारत बचेगा भी तो इस लिए कि इस देश में वैश्वीकरण का पूर्ण प्रचार इसके आकार और इसके पिछडेपन का कारण पूरी तरह से शायद सफल न हो. इस देश के इलिट ने इस देश को मानसिक रूप से त्याग दिया है. एक सर्वेक्षण कराया जाये कि इस देश के इलिट इस देश में रहना चाहते हैं या किसी दूसरे देश में. परिणाम सबको पता है. भारत में ज्ञानोदय हुआ है या नहीं इस प्रश्न को न पूछकर यह प्रश्न पूछा जाना चाहिये कि यह देश कब ऐसा हो सकेगा जब यहां के शक्तिशाली लोग इस देश में रहना चाहेंगे और इस देश के हिसाब से मानवोचित सहज भाव से देश के हिसाब से रहने में संकोच का अनुभव नहीं करेंगे. अगर भारत एक सभ्यता, संस्कृति और देश का नाम है तो इस देश में रहने वालों को इससे परिचित होना होगा. इस देश का ज्ञान, इसकी सभ्यता-संस्कृति को समझने का जो जतन स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उन्नसवीं शताब्दी में शुरू हुआ उसमें तमाम कमजोरियों के बावजूद यह प्रयास था कि देश के लोग एक दूसरे से मानसिक तौर पर जुडाव महसूस करें. आज आलम यह है कि इलिट अपने देश के सामान्य गरीब लोगों के लिए उतना सरोकार भी नहीं रखता जितना फिरंगी साहब इस देश के गरीब के प्रति रखता था. जरूरत इस बात की है कि इस देश की बौद्धिक विरासत की लोकधारा को समझा जाए. इस देश की आम जनता के जीवन में इस देश की संस्कृति का वास है. धर्म, सामाजिकता और पारस्परिकता का जो पाठ लोक जीवन में हमें दिखलाई पडता है उसे बचाने की जरूरत है. यह सही है कि लोक का सभी पक्ष समयानुकूल नहीं है. कुछ चीजों को बदलने की भी जरूरत है (खासकर जाति और स्त्री के सन्दर्भ में), लेकिन कुल मिलाकर लोक के पास पारस्परिकता का, सामाजिकता का और सदाचार का बोध है और यही इस देश की सबसे बडी ताकत है. क्या यह गौर करने की बात नहीं है कि इस देश में दुनिया के किसी भी बडे देश से कम लोग हिंसा के शिकार हुए हैं, सबसे कम लोग युद्ध, धार्मिक युद्ध और सामाजिक संघर्ष की भेंट चढे हैं. यह देश बुद्ध, और गांधी को आज भी याद करता है और इस देश के सांस्कृतिक नायकों की उदात्तता हमें आज भी प्रेरित करती हैं तो इसके कारण हैं. यह लगभग हार चुकी लडाई में अपनी बची-खुची ताकत को समेटकर उठ खडे होने का समय है. हम आखिरी लडाई संस्कृति के मोर्चे पर ही लड रहे हैं. ज्ञानोदय जब हुआ था तो यह मुक्तिकामी शक्तियों का प्रतीक था, पर अब इसका विमर्श प्रगति के झांसा देने वाले विमर्श से ढंक चुका है. हमें इतिहास के झांसे, छद्म भाषा के घटाटोपों से निकलकर इस देश के अपने विमर्श और इतिहास की अवधारणा का निर्माण करना होगा. कुछ जरूरी बातें गांधी ने हिन्द स्वराज में उठाई थीं, मसलन यह कि क्या हमारे पूर्वज अज्ञानी थे जो उन्होंने विकास को जीवन का केन्द्र नहीं माना ? एक बात पर गौर किया जाना चाहिए कि क्या कारण है कि ईसा के पूर्व की सहस्राब्दि में चीन से लेकर मध्य-पूर्व के देशों में लगभग एक ही समय महान विचारों और विचारकों का उदय हुआ. यह और भी महत्त्वपूर्ण है कि इस बात का पता लगाया जाए कि इस महान और असली ज्ञानोदय की चर्चा इतिहास में हाशिये पर ही क्यों होती है. यह बात हमें आज भी ठीक से क्यों नहीं बताई जाती कि विश्व की महान सभ्यता की महानतम उपलब्धियां उस हिस्से से हमें मिली हैं जिसे हम इराक कहते हैं. क्या यह रोचक नहीं है कि रोमन लिपि का आविष्कार इराक में हुआ था या फिर महान ग्रीक सभ्यता के विकास के तार उसके पूर्व की क्रीट सभ्यता से जुडे हुए थे जिसके साथ मिश्र और भारतीय सभ्यता का सम्पर्क था ?

