"चिल्ड्रन ऑफ हैवन" मासूमियत और दर्द की कविता / राकेश मित्तल

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"चिल्ड्रन ऑफ हैवन" मासूमियत और दर्द की कविता
प्रकाशन तिथि : 19 जनवरी 2013


पिछले कुछ वर्षों में ईरान की फिल्मों ने विश्व के श्रेष्ठतम सिनेमा के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मोहसिन मखमलबफ, जफर पनाही, माजिद मजीदीए अब्बास कियारोस्तामी जैसे अनेक ख्यातनाम निर्देशकों ने ईरानी सिनेमा को बहुत ऊंचे पायदान पर ला खड़ा किया है। कांस, बर्लिन, वेनिस जैसे सम्मानित फिल्म समारोहों में ईरानी फिल्मों की लगातार मौजूदगी और बार-बार पुरस्कारों के लिए नामित होने तथा पुरस्कृत होने के कारण दुनिया भर का ध्यान ईरानी फिल्मों की ओर गया है। ऐसी ही एक फिल्म है चिल्ड्रन ऑफ हैवन’ जिसे ईरान के मशहूर फिल्मकार माजिद मजीदी ने निर्देशित किया है। इस फिल्म को 1997 की सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा की फिल्म के ऑस्कर पुरस्कार के लिए नामित किया गया था।

फिल्म की शुरूआत में एक 9 वर्षीय बालक अली (आमिर फारूख हाशेमियां) अपनी छोटी बहन जारा (बहार सिद्दीकी) को स्कूल से लेकर आ रहा है। बहन के जूते फट गये हैं, जिन्हें वह रास्ते में सुधरवाता है और उन्हें जमीन पर रखकर सब्जी वाले से आलू खरीदने लगता है। इसी बीच एक सफाईकर्मी सड़क की सफाई करते हुए गुजरता है और वहां बेकार पड़े जूतों को देख उन्हें उठाकर अपने कचरे के डिब्बे में डालता हुआ आगे बढ़ जाता है। अली उन जूतों को न देख बदहवास होकर उस सफाईकर्मी के पीछे भागता है किंतु वह हाथ नहीं आता। दोनों भाई-बहन बेहद निराश हो जाते हैं, क्योंकि जारा के पास वही एक जोड़ी जूते थे और उनके पिता की माली हालत नए जूते खरीदने की नहीं है। अली यह खबर अपने पिता को बताकर उन्हें और परेशान नहीं करना चाहता। अब उन दोनों भाई-बहन के बीच सिर्फ अली के एक जोड़ी जूते हैं और वे भी पुराने हो चुके हैं। इसके बावजूद दोनों इन्हीं एक जोड़ी जूतों से काम चलाने का निर्णय करते हैं।

सुबह जारा अली के जूते पहनकर स्कूल जाती है। दोपहर में उसका स्कूल छूटने के बाद अली की शिफ्ट शुरू हो जाती है। स्कूल छूटते ही जारा तेजी से भागते हुए घर आती है और अली को उसके जूते देती है। अली तुरंत उन जूतों को पहनकर दौड़ता हुआ स्कूल जाता है। घर से स्कूल लगभग तीन-चार किलोमीटर दूर है। पूरी ताकत से दौड़ने के बावजूद अली रोज देर से स्कूल पहुंचता है और टीचर्स की डांट खाता है। बीच-बीच में कई बार नई परेशानियों से स्थिति और बदतर हो जाती है। जूतों की यह अदला-बदली भाई-बहन के लिए बेहद असुविधाजनक और तनावपूर्ण है किंतु इसके अलावा उनके पास कोई और चारा नहीं है।

रोज-रोज की दौड़धूप से अली एक अच्छा धावक बन जाता है और उसे अंतरविद्यालयीन दौड़ प्रतियोगिता में स्कूल की ओर से प्रतिभागी बनाया जाता है। पूरा स्कूल चाहता है कि अली इस प्रतियोगिता में प्रथम आए किंतु वह तीसरे नंबर पर आना चाहता है क्योंकि प्रतियोगिता में तीसरा पुरस्कार एक जोड़ी नए जूते हैं। प्रतियोगिता के अंतिम क्षणों में प्रतिभागियों के बीच अत्यंत कम दूरी होने से अली सही स्थिति नहीं समझ पाता और प्रथम आ जाता है। स्कूल के सारे बच्चे और टीचर्स खुशी से झूम उठते हैं और अली को बधाइयां देने लगते हैं पर अली की आंखों से आंसू बह रहे हैं, क्योंकि वह नए जूते हासिल नहीं कर पाया और जो जूते उसके पास थे, वे भी प्रतियोगिता में देर तक दौड़ने के कारण तार-तार हो चुके हैं।

इस छोटी-सी मार्मिक कहानी को निर्देशक माजिद मजीदी ने इस खूबी से प्रस्तुत किया है कि यह विश्व सिनेमा के इतिहास की यादगार और असाधारण फिल्मों में शामिल हो गई है। अली और जारा के माध्यम से हम बच्चों के ऐसे संसार में प्रवेश करते हैं जहां उनकी निश्छल मासूमियत, भोलापन और ईमानदारी हमें गहरे तक छू जाती है। फिल्म देखते हुए अनेक बार आप अपने भीतर आर्द्र महसूस करते हैं। अनेक छोटी-छोटी घटनाओं को जिस कुशलता से चित्रित किया गया है, वह निर्देशक की सिनेमा माध्यम पर गहरी पकड़ को दर्शाता है। ईरानी फिल्मकार बच्चों से कमाल का अभिनय करवाते हैं और इस फिल्म में शायद यह अपने चरम पर है। अली और जारा के अभिनय को अभिनय कहना नाइंसाफी होगी। उन्होंने अपने चरित्रों को जिया है और किसी भी निष्णात वयस्क अभिनेता से वे कमतर नहीं हैं।

फिल्म के कई दृश्य यादगार बन पड़े हैं। एक दृश्य में जारा स्कूल से लौटते हुए घर की तरफ दौड़ रही है और अली के जूते बड़े होने के कारण उसके पैरों से फिसलकर नाली में गिर जाते हैं और पानी के साथ बहने लगते हैं। बड़ी मुश्किल से वह उन्हें निकाल पाती है और नाली के कीचड़ में सने गंदे जूतों के साथ किसी तरह घर पहुंचती है, जहां गुस्से में जला-भुना अली उसका बेसब्री से इंतजार कर रहा है, क्योंकि स्कूल जाने में बहुत देर हो चुकी है और उसका टीचर से फिर डांट खाना निश्चित है। अपराध बोध, बेचारगी और गुस्से के मिले-जुले मनोभावों को दोनों बच्चों ने अद्भुत तरीके से व्यक्त किया है।

एक अन्य दृश्य में जारा अपने गुमे हुए जूतों को उसकी क्लास की सहपाठी रोजा के पैरों में पहने देखती है। स्कूल छूटने पर जारा चुपचाप उसका पीछा करते हुए उसके घर तक जाती है और यह बात शाम को अली को बताती हैं दोनों भाई-बहन तुरंत अपने जूते वापस लाने रोजा के घर जाते हैं वहां पहुंचने पर वे पाते हैं कि रोजा कि पिता दृष्टिहीन हैं और उनसे भी ज्यादा गरीब हैं। यह देखकर वे बिना कुछ कहे वापस आ जाते हैं। ऐसे अनेक दृश्यों ने फिल्म को अविस्मरणीय बना दिया है।

फिल्म के रिलीज होते ही दर्शकों और समीक्षकों ने इसे हाथों-हाथ लिया था। दुनिया भर के फिल्म समारोहों में इसकी सराहना हुई। मांट्रियल, वारसा, सिंगापुर, फिनलैंड, फ्रैंकफर्ट और मुंबई फिल्म समारोहों में इसे सर्वोत्तम फिल्म का पुरस्कार मिला। कई समीक्षकों ने इसे विटोरियो-डी-सिका की क्लासिक फिल्म ‘बायसकल थीव्स’ से भी बेहतर फिल्म बताया। निःसंदेह माजिद मजीदी के करियर की यह श्रेष्ठतम कृतियों में से एक है।