अज्ञात व्यक्ति के नाम मैक्सिम गोर्की का पत्र / मैक्सिम गोर्की / रूपसिंह चंदेल

Gadya Kosh से
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मैक्सिम गोर्की आपको पत्र भेजने के तुरन्त बाद 'तोल्स्तोय के पलायन' की सूचना का तार प्राप्त हुआ। और जैसा कि आप जानते हैं मैं आपको पुनः लिख रहा हूं, जबकि अभी भी मैं आपके साथ मानसिक जुड़ाव अनुभव कर रहा हूं।

निःसंदेह मैं जो कुछ भी कहने की इच्छा अनुभव कर रहा हूं वह इस समाचार से संबन्धित है जो अस्तव्यस्त कर देने वाला, संभवतः डरावना और कठोर है। आप मुझे क्षमा करेंगे। मैं ऐसा अनुभव करता हूं कि किसी ने गले से मुझे दबोच लिया है और मेरा गला घोंट रहा है।

उन्होंने मुझसे बहुत अधिक और बहुत लंबी बातें की थीं। जब मैं क्रीमिया में गास्परा में रहता था, प्रायः उनसे मिलने जाता, और उन्हें भी मेरे यहां आना प्रिय था।उनकी पुस्तकें मैं गंभीरतापूर्वक ध्यान और प्रेम के साथ पढ़ता था, अतः मुझे लगता है कि उनके विषय में मैं जो कुछ भी सोचता हूं वह कहने का मुझे अधिकार है। जैसा कि मैं जानता हूं और दूसरे भी जानते हैं कि बहुत अधिक प्रतिभाशाली कहे जाने की पात्रता रखने वाला, बहुत अधिक जटिल और अंतर्विरोधी, और हर प्रकार से महान--हर प्रकार से-- कभी कोई व्यक्ति नहीं होता। वह विशिष्ट और व्यापक दोनों ही अर्थों में महान हैं, इसप्रकार कि जिसे शब्दों में व्यक्त करना नितांत असंभव है। उनमें कुछ ऐसा है कि जो मुझमें इस इच्छा को भड़काता है कि चीखकर सभी को कहूं-- देखो, हमारे ग्रह में कितना अद्भुत व्यक्ति रह रहा है! जिस निमित्त वह हैं, ऐसे ही कहें, पूर्णरूप से एक मनुष्य के रूप में--सही अर्थों में एक व्यक्ति के रूप में, उन्हें अंगीकार करो।

लेकिन काउण्ट लेव निकोलाएविच के जीवन को 'संत जैसे पिता लेव के जीवन' में परिवर्तित करने के उनके हठीले और निरंकुश प्रयास को मैंने सदैव अस्वीकार किया है। आप जानते हैं, वह बर्दाश्त करने तक काम करते रहे हैं। उन्होंने येव्गेनी सोलाव्योव और सुलर से कहा कि उन्हें इसे न रोक पाने का कितना अफसोस है। लेकिन सुस्पष्ट रूप से--मैं दोहराता हूं--अपने मत का वजन बढ़ाने, अपने उपदेश को अत्यंत सम्मोहक बनाने, अपने दुख भोग द्वारा लोगों की दृष्टि में संत दिखने और उसे उन्हें स्वीकार करने के लिए विवश करने--उन्हें विवश करने, आप समझे, का एक हठीला उद्देश्य है उनका। इस विषय में वह जानते हैं कि उनके उपदेश पर्याप्त विश्वासोत्पादक नहीं हैं। जब उनकी डायरियां प्रकाशित होगीं आपको संदेहवाद के उनके द्वारा अपने स्वयं पर प्रयोग किए गए कुछ अच्छे नमूने मिलेंगे। वह जानते हैं कि “यंत्रणा और दुख भोगने वाले लगभग निरपवादरूप से निरंकुश और तानाशाह होते हैं”--वह सब कुछ जानते हैं। और फिर भी वह कहते हैं--”यदि मैंने अपने विचारों के लिए कष्ट उठाया तो वे बिल्कुल भिन्न प्रभाव स्थापित करेंगे।”

उन्होंने सदैव और सर्वत्र दूसरी दुनिया में अमरत्व का स्तुतिगान किया, लेकिन उनकी रुचि इसी दुनिया में अमरत्व प्राप्त करने में होगी। एक राष्ट्रीय लेखक वास्तविक अनुभव को व्यक्त करता है। वह अपनी आत्मा से राष्ट्र के समस्त बुरे स्वरूपों, हमारे इतिहास की यंत्रणाओं द्वारा दी गई समस्त विकृतियों को प्रस्तुत करता है। उनमें सभी कुछ राष्ट्रीय है, और उनके सम्पूर्ण उपदेश मात्र प्रतिक्रिया, और पुनरुद्भव हैं, जिनसे हमने पीछा छुड़ाना और पार पाना प्रारंभ कर दिया है। याद करें 1905 में लिखे उनके पत्र, “बौद्धिक, राज्य और जनता”--कितनी अप्रिय, विद्वेषपूर्ण चीज थी वह! आद्योपांत उसमें मतभेद रखनेवालों के लिए विद्वेषपूर्णता खोजी जा सकती है, “मैंने आपसे ऐसा ही कहा!” उनके शब्दों के आधार पर उस समय मैंने उन्हें उत्तर दिया दिया था कि वह “बहुत पहले ही रूसी लोगों के विषय में और उनके नाम में बोलने का अधिकार खो बैठे थे।” मेरा पत्र कठोर था और मैंने उसे भेजा नहीं था।

लेव निकोलाएविच में बहुत कुछ ऐसा है जो मेरी भावनाओं में घृणा जैसा उत्पन्न करता है, बहुत कुछ ऐसा जो एक भारी बोझ की भांति मेरी आत्मा पर रखा है। उनका अत्यधिक फूला हुआ अहम एक निरर्थक तथ्य है, लगभग असामान्य, उसमें बोगेतर स्व्यातोगोर जैसा कुछ है, जिसका वजन पृथ्वी संभाल नहीं सकी। हां, वह महान हैं। मैं गंभीरतापूर्वक स्वीकार करता हूं कि वह जो कुछ भी बोलते हैं, उसके अतिरिक्त बहुत कुछ ऐसा है जिस पर वह चुप रहते हैं--यहां तक कि अपनी डायरियों में भी--और उनके विषय में शायद वह कभी नहीं कहेंगे। यह 'कुछ' यदा-कदा, अस्थाई रूप से उनकी बातचीत में प्रकट हुआ है, और उसके संकेत उनकी उन दो डायरियों में मिलते हैं जो उन्होंने मुझे और सुलेर्जित्स्की को दिया था।

सारी जिन्दगी वह मृत्यु से भयभीत रहे और उससे घृणा किया। सारी जिन्दगी वह अर्जमास दुर्भिक्ष की काली छाया से भूताविष्ट रहे। पूरी दुनिया की आंखें उन पर टिकी हुई थीं। सजीव स्पंदित धागे चीन, भारत, अमेरिका तक फैले हुए थे। उनकी आत्मा सभी लोगों और सभी समय उपलब्ध थी। प्रकृति अपने नियम में कुछ अपवाद उत्पन्न कर उन्हें अर्पित क्यों नहीं करती--और मनुष्यों में केवल उन्हें शारीरिक अमरता प्रदान करती? वह एक नए रंगरूट की भांति अज्ञात बैरक के बारे में सोचकर भयभीत और निराश हैं। मुझे याद है गास्परा में स्वस्थ होने के बाद लेव शेस्तोव का 'गुड एण्ड एविल इन दि टीचिग्सं ऑफ नीत्से एण्ड काउण्ट तोल्स्तोय” (Good and Evil in the Teachings of Nietzshe and Count Tolstoy) पढ़कर वह ए.पी. चेखव की टिप्पणी के उत्तर में बोले थे, “पुस्तक पसंद नहीं।” फिर बोले :

“और मैंने उसे मनोरंजक पाया। कृत्रिम ढंग से लिखित, लेकिन बुरी नहीं, दिलचस्प। तुम जानते हो मुझे दोषदर्शी पसंद हैं, यदि वे निष्कपट हैं। उन्होंने कहीं कहा: सत्य आवश्यक नहीं है। और वह बिल्कुल सही हैं--उनके लिए सत्य क्या है? कुछ भी हो वह मर जाएगें।”

धीरे-धीरे हंसते हुए उल्लसित हो वह आगे बोले:

“एक बार एक व्यक्ति ने सोचना सीखा, और उसके विचार अपनी मृत्यु के विचार से बंधे हुए थे। सभी दार्शनिक ऐसे ही होते हैं। और सत्य का लाभ क्या जब मृत्यु आना सुनिश्चित है!”

उन्होंने आगे व्याख्या करते हुए कहा कि सत्य सभी के लिए समान है-- “ईश्वर का प्रेम”, लेकिन वह विषय पर उदासीनतापूर्वक और उकताहटपूर्वक बोले। लंच के बाद बराम्दे मे उन्होंने पुनः पूस्तक उठा ली और उस स्थान को खोजकर जहां लेखक ने कहा था, “तोल्स्तोय, दॉस्तोएव्स्की और नीत्शे उनके उत्तर के बिना जीवित नहीं रह सकते और कुछ भी नहीं के बजाय उनके लिए कोई भी उत्तर अच्छा होगा।”

“कैसा निर्भीक हज्जाम”,”उन्होंने सीधे कहा,'मैं अपने साथ विश्वासघात करूं, जिसका अर्थ है कि मैं दूसरों को भी धोखा दूं। स्पष्टतया यही निष्कर्ष है--।”

सुलर ने पूछा, “लेकिन हज्जाम क्यों?”

“हां, “विचारमग्न होते हुए उन्होंने कहा, “मेरे मस्तिष्क में यह अभी आया कि वह एक फैशनेबुल छैला है, और मुझे गांव में उसके किसान अंकल के विवाह के समय मास्को से आए एक हज्जाम की याद आई। आश्चर्यजनक आचरण था उसका। वह लांसर (इंग्लैंड का एक नृत्य) कर सकता था, और इसलिए सभी की उपेक्षा की थी उसने।”

यह बातचीत मैंने शब्दशः प्रस्तुत की है। मुझे याद है कि यह बहुत अलग ढंग की थी। मैंने इसे लिख लिया था, क्योंकि जो कुछ मुझे प्रभावित करता है लिख लेता हूं। सुलर ने और मैंने बहुत से नोट्स तैयार किए थे, लेकिन अर्जमास के रास्ते सुलर ने अपने नोट्स खो दिए, जहां वह मुझे मिलने आया था--वह बहुत ही लापरवाह है, तथापि वह लेव निकोलाएविच को स्त्रियोचित ढंग से प्रेम करता है। उनके प्रति उसका व्यवहार कुछ विलक्षण, प्रायः विनीत होता है। मैंने भी अपने नोट्स कहीं रख दिए थे और वह मुझे नहीं मिले। शायद वे रूस में हैं। मैंने बहुत निकट से तोल्स्तोय को देखा, जिन्हें मैंने सदैव चाहा और अपनी मृत्यु के दिन तक चाहता रहूंगा, क्योंकि वह सजीव आस्था वाले सच्चे व्यक्ति हैं।

कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता कि जैसे यह प्रतिभाशाली व्यक्ति मृत्यु से खेल रहा है, उसके साथ चोंचलेबाजी कर रहा है। किसी प्रकार उससे कुछ बेहतर हासिल करने का प्रयत्न कर रहा है।

'मैं तुमसे भयभीत नहीं हूं। मैं तुमसे प्रेम करता हूं। मैं तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूं।' और पूरे समय उनकी छोटी, तीक्ष्ण आंखें चारों ओर देख रही हैं-- तुम किसके समान हो? और वहां तुम्हारे पीछे क्या है? क्या तुम मुझे पूरी तरह नष्ट कर देना चाहती हो--अथवा मेरे लिए कुछ छोड़ दोगी?”

उनके शब्द: “मैं प्रसन्न हूं, अत्यधिक प्रसन्न हूं, बहुत अधिक प्रसन्न हूं!” आश्चर्यजनक प्रभाव छोड़ते हैं।और उसके तरंत बाद: “ओह, फिर दुख भोग।” मुझे एक क्षण के लिए भी आशंका नहीं हुई कि जब वह बीमार थे, वह अपने को कैदखाने में, निर्वासन में, एक शब्द में शहीदी ताज स्वीकार कर, ईमानदारी से प्रसन्न थे। क्या वह ऐसा अनुभव करते थे कि प्राणोत्सर्ग किसी प्रकार मृत्यु को उचित सिद्ध करेगा, उसे और अधिक बोधगम्य, बाह्य और औपचारिक दृष्टिकोण से सहज स्वीकार्य बनाएगा। मुझे विश्वास है कि वह कभी प्रसन्न नहीं थे--उन्होंने न तो “पुस्तकों के कलाकौशल” में, “न घोड़े की पीठ पर”, “न औरत की बाहों में” सांसारिक स्वर्ग का परमानंद प्राप्त किया। इसके लिए उनकी बुद्धि तर्कणापरक थी, और वह जीवन और जगत को भी समझते थे। उनके कुछ और शब्द:

“खलीफा अब्द-एर-रहमान के पास चौदह खुशी के दिन थे, और मैं नहीं मानता कि मेरे पास कभी इतने अधिक थे। और यह सब इसलिए कि मैं कभी सक्रिय नहीं रहा--सक्रिय कैसे रहा जाए,मुझे नहीं मालूम--अपने लिए, अपनी अंतरात्मा के लिए,लेकिन सदैव अर्थ के लिए, दूसरों के लिए जिया।”

जब हम लौट रहे थे, चेखव ने कहा, “मैं विश्वास नहीं करता कि वह कभी खुश नहीं रहे।” मैं मानता हूं। वह नहीं रहे। लेकिन यह सच नहीं कि वह “अर्थ के लिए” जिए। उन्होंने सदैव दूसरों को दिया, जैसे कि अपना अतिरिक्त (बचत) भिखारियों को दिया। चीजों का पालन करना उन्हें प्रिय था--पढना, टहलना, सब्जियों पर जीवित रहना, मुझिकों को प्यार करना और लेव तोल्स्तोय के विवेकपूर्ण और अमोघत्व पर विश्वास करना---।”

नेपल्स से कुछ पत्रकार आए हैं--एक रोम से आया है। उन्होंने मुझसे पूछा कि तोल्सतोय के 'पलायन' के विषय में मैं क्या सोचता हूं--वे उसे तोल्स्तोय का 'पलायन' कहते हैं। मैंने उनसे बात करने से इंकार कर दिया। निश्चित ही आप समझ लें कि मेरी आत्मा में भयानक हलचल है--मैं तोल्स्तोय को संत में परिवर्तित होता नहीं देखना चाहता। उन्हें पातकी ही रहने दें---पुश्किन ओर उनसे महान और प्रिय हमारे लिए कुछ नहीं है---।

♦♦ • ♦♦

लेव तोल्स्तोय की मृत्यु हो गयी।

एक टेलीग्राम आया, जिसमें घिसे-पिटे शब्दों में कहा गया है--वह मर गए।

मेरे हृदय पर यह आघात था। पीड़ा और दुख से मैं रोया। अर्द्ध पागल अवस्था में मैं उनके चित्र देखने लगा, जैसा मैंने उन्हें जाना था, जैसा उन्हें देखा था, उनके विषय में बातचीत करने की वेदनापूर्ण इच्छा हुई। मैंने ताबूत में उनकी कल्पना की मानो सरित प्रवाह के बिस्तर पर शांत एक पत्थर रखा हो। निसंदेह अपनी भ्रामक मुस्कान--पूर्णरूप से निर्लिप्त--शांतिपूर्वक उनकी सफेद दाढ़ी में छुपी हुई है। और अंततः उनके हाथ शांतिपूर्वक मुड़े हुए हैं--उन्होंने अपने दुस्साध्य कार्य सम्पन्न कर लिए हैं।

मुझे उनकी उत्सुक आंखें--जो सभी चीजों को आर-पार देख लेती थीं--और उनकी उंगलियां, जो हवा में सदैव कुछ प्रतिरूपण करती रहती थीं, उनकी बातचीत, उनका हंसी-मजाक, उनके परम प्रिय किसानी शब्द, और उनकी अनूठी अस्पष्ट आवाज याद हैं।

एक बार मैंने उन्हें इस प्रकार देखा जैसा किसी ने कभी नहीं देखा होगा। मैं गास्परा के समुद्र तट पर टहल रहा था और ठीक युसुपोव जागीर के बाहर, चट्टानों के बीच अचानक मैंने उनके छोटे दुबले शरीर को सिलवटदार भूरे सूट और मुचड़ी हैट में देखा। वह वहां बैठे हुए थे। ठोढ़ी हाथ पर टेक रखी थी और उनकी दाढ़ी के भूरे बाल उनकी उंगलियों के बीच छितराए हुए थे। वह समुद्र की ओर देख रहे थे, जबकि उनके पैरों पर हरिताभ तरंगिकाएं (लघु लहरें) विनम्रतापूर्वक और स्नेहमयभाव से आलोड़ित थीं, मानो उस वृद्ध प्रतिभाशाली व्यक्ति को अपनी कहानी सुना रही थीं। वह एक चमकदार दिन था, चट्टानों पर बादलों की छायाएं रेंग रही थीं, इसलिए वृद्ध व्यक्ति और चट्टानें बारी-बारी से चमकती और छाया में छुप जाती थीं। चट्टानें, विशाल थीं और उनमें गहरी दरारें थीं। उनमें समुद्री शैवाल की तीखी गंध व्यप्त थी। वहां एक दिन पहले समुद्र किनारे से टकराने वाली बड़ी लहरें आयी थीं। और वह मानो कोई प्राचीन चट्टान थे जो अकस्मात सभी चीजों के आदि और प्रयोजन को जानते हुए जीवित रूप में आ उपस्थित हुए थे और इस बात से आश्चर्ययकित थे कि पृथ्वी पर पत्थरों और घास का, समुद्र में जल का, और मनुष्य और सम्पूर्ण संसार का--चट्टानों से लेकर सूर्य तक का कब और कैसा अंत होगा। समुद्र उनकी आत्मा के एक हिस्से की भांति था, और वह सब जो उनके चारों ओर था, उनका ही हिस्सा था। और अचानक एक उत्तेजित क्षण में मैंने अनुभव किया कि वह, हाथ ऊपर हिलाते हुए उठने जा रहे थे। इससे समुद्र निश्चल, भावशून्य हो जाएगा, चट्टानें हिलने-डुलने और चीखने लगेंगी, सभी चीजों को अपनी आवाज मिल जाएगी और वे अपनी वाणी में स्वयं उनके विषय में, उनके सामने बोलने लगेंगे। उस क्षण मैंने जो अनुभव किया शब्दों में व्यक्त करना कठिन है--मेरी आत्मा में आनंदातिरेक और दहल था, और फिर सब कुछ सुखद विचारों में पिघल गया था।

“मैं इस संसार में अनाथ नहीं हूं जब तक यह व्यक्ति इसमें वास कर रहा है। ”

फिर, सावधानीपूर्वक, मैं इस प्रकार वापस मुड़ा कि पैरों के नीचे रोड़े न खडखड़ाएं और उनके चिन्तन में खलल न पड़े। लेकिन अब मैं अनुभव करता हूं कि मैं अनाथ हो गया हूं। लिखते हुए मेरे आंसू बह रहे हैं--इससे पहले कभी मैं इस प्रकार विषण्ण होकर, इतनी हताशा, इतने दुख से नहीं रोया। मैं यह भी नहीं जानता कि मैं उन्हें प्यार करता था, लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है कि उनके लिए मैंने प्रेम अनुभव किया या घृणा? उन्होंने सदैव मेरी आत्मा में विपुल, अजीब अशांत भाव आलोड़ित किया। वह बहुत प्रभावशाली होते थे जब, दबंग ढंग से अपने पैरों के तलवों को रगड़ते हुए दरवाजे के पीछे से या एक गोल कोने से अचानक प्रकट होकर संसार की सतह पर निरंतर चलने वाले एक अभ्यस्त व्यक्ति की भांति छोटे, हल्के, तेज कदमों से आगे बढ़ते थे। उनके अंगूठे उनकी बेल्ट में ठुंसे होते थे। वह एक क्षण के लिए रुकते और अपने चारों और कुछ खोजती-सी दृष्टि से देखते।

बहुत से ऐसे लोग थे जिन्होंने उन्हें प्रसन्नता प्रदान करने का प्रयास किया, लेकिन मैंने नहीं देखा कि कोई अच्छे प्रकार से यह कर पाया। अपने साधारण विषयों पर कभी-कभार ही मुझसे बात करते थे--व्यापक क्षमाशीलता, पड़ोसियों के लिए प्रेम, नया टेस्टामेण्ट और बौद्धिज्म-- स्पष्टतया प्रारंभ से ही मैंने महसूस किया कि वह सब--मेरी पसंद की नहीं हैं। लेकिन मैंने गहराई से इन सबकी कद्र की।

जब वह प्रसन्न होते, वह सौम्य, व्यावहारिक, सहृदय और सज्जन हो जाते, और तब उनकी बात मनोहर, सहजतापूर्ण और शालीन होती थी, लेकिन कभी-कभी उन्हें सुनना पर्याप्त अप्रिय होता था। महिलाओं के विषय में वह जिस ढंग से बातें करते मुझे कभी पसंद नहीं आया--इस विषय में वह एक 'सामान्य व्यक्ति की भांति बहुत अधिक बोलते थे, और उनके शब्दों से कुछ अस्वाभाविक, कुछ अगंभीर ध्वनि निकलती थी, और नितांत वैयक्तिक भी। यह वैसा ही था मानो कभी किसी द्वारा आहत किए गए थे और न ही अपनी चोट को भूले थे और न ही उसे क्षमा किया था। उनसे पहली मुलाकात की शाम वह मुझे अपनी स्टडी में ले गए थे--यह खामोव्निकी—में हुई थी--मुझे अपने सामने बैठाया और 'वारेन्का ओलेसोवा' और 'ट्विण्टी सिक्स मेन एण्ड वन गर्ल' पर बात करने लगे। उन्होंने जिस अशिष्टता और निष्ठुरता से मुझसे यह मनवाने का प्रयास किया कि “एक स्वस्थ युवती की लज्जाशीलनता अस्वाभाविक है” मैं उनकी आवाज से खिन्न, और पूरी तरह क्षुब्ध हो उठा था।

“यदि लड़की पन्द्रह वर्ष की हो गई है तब वह चाहती है कि कोई उसे चूमे और खींचे।” उन्होंने कहा, “उसका मस्तिष्क उससे झिझकता है जिसे न वह जानता है, न समझता है, और उसे ही लोग शुचिता और लज्जा कहते हैं? लेकिन उसका शरीर, उसके मस्तिष्क के बावजूद, पहले से ही जानता है कि यह अनिवार्य और तर्कसंगत है और इस स्वभावगत धर्म की प्रतिपूर्ति की पहले से ही मांग करता है। तुम्हारी वारेन्का ओलेसोवा स्वस्थ चित्रित की गयी है, लेकिन उसकी भावनाएं आरक्तक प्राणी की हैं, जो कि गलत है।”

उसके बाद वह 'ट्वेण्टी सिक्स' की लड़की के बारे में सरलता के साथ एक के बाद दूसरी अश्लीलता प्रकट करते हुए बोले जो मुझे क्रूर लगा और जिसने मुझे खिजा भी दिया। इसके बाद मैंने महसूस किया कि उन्होंने केवल वे ही 'निषिद्ध' शब्द प्रयुक्त किए थे जिन्हें उन्होंने सही और सारगर्भित पाया था, लेकिन उस समय उनके बोलने का ढंग अप्रिय लगा था। अचानक मेरे जीवन , मेरी स्टडीज और मेरे पढ़ने को लेकर वह बहुत स्नेही और गंभीर हो गए थे।

“जैसा लोग कहते हैं, क्या तुम सच में उतना पढ़ते हो? कोरेन्को क्या एक संगीतकार है?”

“मैं ऐसा नहीं सोचता। मैं नहीं जानता।”

“तुम नहीं जानते? तुम्हे उनकी कहानियां पसंद हैं?”

“बहुत अधिक।”

“वैषम्यता के कारण। वह एक कवि हैं, और तुम्हारे आस-पास कवि जैसा कुछ नहीं है। तुमने वालमैन (Waltmann) को पढ़ा?”

“हां।”

“एक अच्छे लेखक, क्या वह नहीं हैं? सुस्पष्ट, सटीक और कभी अतिरंजन न करने वाले। कभी-कभी वह गोगोल से बेहतर लगते हैं। वह बॉल्जाक को जानते हैं। तुम जानते हो, गोगोल ने मर्लिन्स्की का अनुकरण किया है?”

जब मैंने कहा कि गोगोल संभवतः हॉफमैन (Hoffmann), स्टर्न (Sterne ), और शायद डिकेंस से प्रभावित थे, उन्होंने मुझ पर एक दृष्टि डाली और पूछा:

“तुमने यह कहां पढ़ा? तुमने पढ़ा नहीं है? यह सही नहीं है। मैं नहीं समझता कि गोगोल ने डिकेंस को पढ़ा था। लेकिन तुमने सच में बहुत पढ़ा है--अपना खयाल रखो--यह खतरनाक है। कोल्त्सोव ने इस तरह अपने को तबाह कर लिया था।”

जब उन्होंने मानसिकरूप से मुझे अनुपस्थित देखा मेरे चारों ओर अपनी बाहें डाल दीं और मुझे यह कहते हुए चूमा:

“तुम वास्तव में एक मुज़िक हो। लेखकों के मध्य तुम्हें संघर्ष करना होगा, लेकिन किसी बाधा से तुम्हें भयभीत नहीं होना चाहिए। सदैव वही कहो जो सोचते हो, कभी मत सोचो यदि कभी वह कुछ कठोर हो। बुद्धिमान लोग उसे समझ लेंगे।”

इस पहली मुलाकात ने मुझपर दोहरा प्रभाव डाला--तोल्स्तोय से मिलकर मैं प्रसन्न और गौरवान्वित था, लेकिन उनकी बातचीत प्रति-परीक्षण जैसी थी, और मैंने महसूस किया कि मैं 'दि कज्जाक', 'खोल्स्तमर (Kholstomer) और 'वार एण्ड पीस' के लेखक से नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति से मिला था, जिसने मुझपर कृपा की थी, और मुझसे सामान्य ढंग से सड़क छाप भाषा का प्रयोग करते हुए बातचीत करना आवश्यक समझा था, और इसने मेरी धारणा को अस्त-व्यस्त कर दिया था--धारणा जिसका मैं आदी हो गया था, और जो मुझे प्रिय थी।

अगली बार मैं उनसे यास्नाया पोल्याना में मिला। वह एक अच्छी फुहार वाला उदास दिन था, और उन्होंने भारी ओवर कोट, ऊंचे चमड़े के जूते, और नियमित पहनने वाले जलसह जूते पहन रखे थे और मुझे भुर्ज के छोटे वृक्षों , जिन्हें नियमित काटा जाता था, की ओर टहलने के लिए साथ ले गए थे। वह जवानों जैसी फुरती से गड्ढों और कीचड़ को फांद जाते थे। पेड़ों की शाखाओं से पानी की बूंदें उनके सिर पर टपक रही थीं। पूरे समय वह मुझे विस्तृत विवरण सुनाते रहे कि किस प्रकार शेन्शिन; (Shenshin)(फेत- अनुवादक) ने उन्हें उसी स्थान पर शॉपेनहावर (Schopenhauer) के विषय में समझाया था। और उन्होंने भुर्ज के कोमल कौशेय तने को प्यार से सहलाया था।

मैंने कुछ पंक्तियां हाल में पढ़ीं--

“मशरूम अधिक नहीं हैं, बल्कि सब निस्सार है,
क्या मशरूम की आर्द्र गंध से सुगन्धित--।
अच्छी है, बहुत अच्छी तरह अवलोकित।”

अचानक एक खरगोश हमारे पैरों के पास चीखने लगा। एल.एन. उत्तेजित हो तेजी से उछले। उनके गाल लाल हो गए और वह ऊंचे स्वर में लिहो! लिहो! चीख उठे। फिर वर्णनातीत मुस्कान के साथ उन्होंने मेरी ओर देखा और समझदार और मानवोचित हंसी हंसे। उस क्षण वह श्लाघ्य थे।

दूसरी बार, पार्क में, उन्होंने बाज को एक पशु अहाते पर मंडराते, उसके चक्कर काटते, और फिर आसमान में अचल लटके हुए देखा। उसके पंख हल्के-हल्के हिल रहे थे, मानो वह इस अनिश्चय में था कि अभी झपट्टा मारे या कुछ देर प्रतीक्षा करे। एल.एन. तुरंत चौकन्ना हो गए। उन्होंने अपनी आंखें अपनी गदोली से ठांप लीं और आशंकित हो फुसफुसाने लगे।

“बदमाश हमारे मुर्गी के बच्चों के पीछे पड़ा है। देखो-देखो--अब--ओह”, वह भयभीत थे। “संभवतः कोचवान वहां है--हमें कोचवान को बुलाना चाहिए--। ”

और उन्होंने उसे पुकारा। जब वह चीखे, बाज डरा और उड़ गया।

एल.एन. ने आह भरी और स्पष्टतः अपने को फटकारते से बोले--

“मुझे चीखना नहीं चाहिए था--हर हालत में वह बहुत दूर चला गया होगा---।”

एक बार तिफ्लिस के विषय में बात करते हुए मैंने वी.वी. फ्लेरोव्स्की - बेर्वी का जिक्र किया--

“तुम उन्हें जानते थे?” एल.एन. ने सोत्सुक हो पूछा, “उनके विषय में कुछ बाताओ।”

मैंने बताना प्रारंभ किया कि फ्लेरोव्स्की दुबले-पतले, लंबी दाढ़ी और बड़ी आंखों वाले लंबे व्यक्ति थे। पाल के कपड़े के वस्त्र पहनते थे। उनकी बेल्ट से लाल शराब में उबले चावलों का छोटा बैग लटकता रहता था और विशाल कैनवस का छाता लेकर चलते थे। वह मेरे साथ काकेशस के पार के पहाड़ी रास्तों में घूमते थे, जहां एक बार, एक संकरे रास्ते में हम एक सांड़ से टकरा गए थे। उस बदमिजाज जानवर को खुले छाते से धमकाते हुए हम किसी प्रकार बच निकले थे। पीछे हमें रसातल में गिरने का पूरे समय जोखिम बना रहा था। अचानक मैंने एल.एन. की आंखों में आंसू और घबड़ाहट देखी थी।

“कोई बात नहीं, जारी रखो, जारी रखो! यह केवल एक अच्छे व्यक्ति के विषय में सुनने के कारण था। वह कितने दिलचस्प व्यक्ति रहे होगें। मैंने उनके विषय में अभी इसी प्रकार की कल्पना की थी। वह दूसरे व्यक्तियों जैसे नहीं थे। वह बहुत परिपक्व, उग्र विचारधारा वाले लेखकों में सबसे अधिक बुद्धिमान हैं। उन्होंने ए.बी.सी. में अत्यन्त कुशलतापूर्वक यह प्रतिपादित किया कि हमारी संपूर्ण सभ्यता बर्बर है, जबकि संस्कृति जनजातियों का मामला है , कमजोरों का मामला, न कि शक्तिशालियों का।”

“उदाहरण के लिए, कोई फ्लेरोव्स्की के सिद्धांत के साथ योरोप के इतिहास में नोरमैन्स से मिलान कैसे कर सकता है?”

“ओह, नोरमैन्स, वह बिल्कुल भिन्न है।”

यदि उनके पास कोई उत्तर तैयार न होता, वह कहते, “वह भिन्न है।”

मैंने सदैव अनुभव किया कि एल.एन. साहित्य पर चर्चा करना पसंद नहीं करते थे, और मैं नहीं समझता कि मैं गलत सोच रहा था, लेकिन किसी लेखक के व्यक्तित्व में वह अत्यधिक रुचि दिखाते थे। मैंने प्रायः उनके प्रश्न सुने: “तुम उन्हें जानते हो? वह किस तरह के हैं? वह कहां पैदा हुए थे?” और उनका विचार विनिमय सदैव प्रायः व्यक्ति पर बहुत खास दृष्टिकोण प्रकट करता था।

वी.जी. कोरोलेन्को के विषय में विचारशील होते हुए उन्होंने कहा:

“वह एक उक्रेनी हैं और इसीलिए वह हमारी जिन्दगी को हमारी अपेक्षा कहीं बहुत बेहतर और बहुत स्पष्टता से देखने में समर्थ हैं।”

चेखव, जिन्हें वह अंतःकरण से प्रेम करते थे:

“उनके व्यवसाय ने उन्हें बरबाद कर दिया। यदि वह डाक्टर न होते तब वह और अधिक अच्छा लिखते।”

एक युवा लेखक के विषय में उन्होंने कहा: “वह अंग्रजों जैसा खेलता है, और मास्को के लोग उस जैसे अच्छे नहीं हैं।”

एक से अधिक बार उन्होंने मुझसे कहा: “तुम एक काल्पनिक कथा लेखक हो। तुम्हारी कुवाल्दा (Kuvaldas ) और दूसरे सभी विशुद्ध रूप से काल्पनिक हैं। ”

मैंने टिप्पणी की कि कुवाल्दा को जीवन से लिया है।

“बताओ कि तुम उससे कहां मिले थे।”

वह कजान के 'जस्टिस ऑफ दि पीस ' कोलोन्ताएव के कार्यालय के दृश्य से बहुत प्रसन्न हुए, जहां मैं कुवाल्दा नाम से चित्रित व्यक्ति से मिला था।

“अभिजातवर्गीय। अभिजातवर्गीय! वह यही है!” उन्होंने हंसते और अपनी आंखें पोंछते हुए कहा। “लेकिन कैसा मनोहर-मनोरंजक व्यक्ति है। तुम लिखने से कहीं बेहतर ढंग से कहानी कहते हो। तुम एक काल्पनिक कथा लेखक हो, तुम जानते हो--एक अन्वेषक, तुम्हे यह स्वीकार करना चाहिए।”

मैंने कहा कि सभी लेखकों ने कुछ हद तक अन्वेषण किया है। अपने जीवन में जिन लोगों को वे पसंद करते थे उन्हें प्रस्तुत किया। मैंने यह भी कहा, मैं सक्रिय लोगों को पसंद करता हूं जो अपनी पूरी शक्ति, यहां तक कि हिंसा से , जीवन में बुराई का विरोध करने की आकांक्षा रखते हैं।

“लेकिन हिंसा स्वयं में मुख्य बुराई है!” मेरी बांह पकड़कर वह चीखे।

मुझे अपनी कोहनी से हल्के से टहोका देते हुए वह मंद-मंद मुस्कराए, “इससे बहुत-बहुत खतरनाक निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए। तुम सच्चे समाजवादी नहीं हो। तुम एक कल्पना प्रधान व्यक्ति हो, ओर रोमानी व्यक्ति किचिंत राजतंत्रवादी होते हैं, जैसा कि सदैव होता रहा है।”

“विकटर ह्यूगो के विषय में क्या कहते हैं?”

“विक्टर ह्यूगो भिन्न है। मैं उसे पसंद नहीं करता। वह एक शोर मचाने वाला व्यक्ति है।”

वह प्रायः मुझसे पूछते कि मैं क्या पढ़ रहा हूं, और निरंतर वह मुझे मेरी पुस्तकों की खराब पसंद को जानकर झिड़कते थे।

“गिब्सन कोस्तोमारोव की अपेक्षा बदतर थे। तुम्हे मॉम को पढ़ना चाहिए। वह महा उबाऊ हैं, लेकिन वह बहुत ठोस हैं।”

जब उन्हें ज्ञात हुआ कि पहली जो पुस्तक मैंने पढ़ी वह ले फेरेस ज़िम्गानो (Les Freres Zemganno ) थी, वह पूर्णरूप से क्रोधाविष्ट हो उठे थे।

“तुमने--एक पूर्खतापूर्ण उपन्यास! इसीसे तुम तबाह हुए। तीन फ्रेंच लेखक---स्टेण्डल (Stendhal)] बाल्जॉक, और फ्लॉबर्ट--तुम मोंपासा को भी जोड़ सकते हो, लेकिन चेखव बेहतर हैं। गान्कर्ट केवल विदूषक हैं। वे गंभीर होने का अभिनय करते हैं। उन्होंने उन जैसे अन्वेषकों द्वारा लिखी पुस्तकों से ही जीवन को जाना है और वे उस सबको गंभीरता से लेते हैं, लेकिन किसी को उनके लेखन की आवश्यकता नहीं है।”

मैं उनसे सहमत नहीं था, और इसने एल.एन. को क्षुब्ध कर दिया। वह प्रतिवाद पर खड़े नहीं रह सके और उनके तर्क आश्यर्चजनकरूप से दुराग्रही थे।

“अपकर्ष जैसा कुछ नहीं होता।” वह बोले, “यह सब इटैलियन लाम्ब्रोसो (Italian Lombroso) के अन्वेषण हैं। यहूदी नॉर्दो (Jew Nordau) ने उसे तोते की तरह दोहराया। इटली धूर्त और तिकड़मियों का देश है--केवल अरेटिनो (Aretinos), कसनोवा (Casanovas) कैग्लिओस्ट्रस (Cagliostros) जैसे लोग वहां पैदा हुए।”

“गैरी-बॉल्डी के विषय में आपके विचार?”

“वह राजनीति है, वह भिन्न है!”

जब रूस के सौदागर परिवारों के इतिहास से एक के बाद दूसरे तथ्य प्रस्तुत किए, उन्होंने उत्तर दिया:

“यह सत्य नहीं है। यह सब चतुराई से लिखी गई पुस्तकों में प्राप्त होता है- - “ मैंने उन्हें अपने परिचित सौदागर परिवार की तीन पीढ़ियों की कहानी बतायी ---विशिष्ट बेरहमी के साथ हुए उनके अपक्षय की कहानी।

उत्तेजना में मेरी बांह पकड़कर उन्होंने कहा:

“वह सही है! वह मैं जानता हूं--तूला में दो ऐसे परिवार हैं। इसलिए तुम्हें उस विषय पर लिखना चाहिए। संक्षेप में--एक बड़ा उपन्यास। तुमने समझा मेरा मतलब क्या है? उसे करने का यही तरीका है।”

और उनकी आंखें उत्सुकता से चमक उठीं।

“उसका कुछ नहीं। यह बहुत महत्वपूर्ण है। कोई व्यक्ति अपने पूरे परिवार के लिए प्रार्थना करने हेतु सन्यासी हो जाता है--यह अद्भुत है। वही वास्तविक जीवन है। तुम पाप करो और मैं तुम्हारे पापों से उद्धार के लिए जाता हूं। और दूसरा--उकताऊ लोभी--वह भी सच है। उसके लिए, पियो, और जानवर और विलासी बन जाओ, और सभी को प्रेम करो, और अचानक हत्या करो-- यह सब कितना अच्छा है! इसीलिए तुम चोरों और आवारागर्दों के बीच हीरो खोजने के बजाय उस विषय पर लिखना चाहते हो।”

वह प्रायः मेरी कहानियों में अतिरंजनाओं की चर्चा करते, लेकिन एक बार 'डेड सोल' के दूसरे भाग पर बोलते हुए, उन्होंने स्वभाविक रूप से मुस्कराते हुए कहा:

“हम सभी पहले दर्जे के कल्पित कथाकार हैं, मैं भी हूं। कभी-कभी कोई लिखना प्रारंभ करता है, और फिर अचानक वह किसी चरित्र को कमजोर अनुभव करता है और उसे विशेष महत्व देने लगता है अथवा, दूसरे को हल्का करने लगता है, जिससे तुलना में पहला निराशाजनक प्रतीत न हो।”

और उसी समय, एक निर्णायक की दृढ़ और गंभीर आवाज में बोले :

“और इसीलिए मैं कहता हूं, कला झूठ, धोखा, निरंकुश चीज है, जो मानवता के लिए घातक है। वास्तविक जीवन जैसा है तुम उसे उसीप्रकार नहीं लिखते , लेकिन जीवन के प्रति तुम्हारे अपने विचार, तुम स्वयं जीवन के प्रति क्या सोचते हो--वह लिखते हो। किसीके यह जान लेने से क्या होगा कि मैं टावर , अथवा समुद्र, अथवा तातार को कैसे देखता हूं? कौन जानना चाहता है। उसका उपयोग क्या है?”

एक बार उन्होंने कहा:

“मई के अंत में मैं कीव के एक मुख्य मार्ग में टहल रहा था। धरती स्वर्ग थी, आकाश बादलों से रहित था, चिड़ियां चहचहा रही थीं, मधुमक्खियां भिनभिना रही थीं और मेरे चारों ओर सब कुछ आनंदमय था, मानवोचित--शानदार। मेरे आंसू निकल आए मानो मैं स्वयं एक मधुमक्खी था और दुनिया भर में प्यारे फूलों पर मडरा रहा था और मानों ईश्वर मेरी आत्मा के अतिनिकट था। अचानक मैंने क्या देखा? सड़क के किनारे झाड़ियों के नीचे, दो यात्री, एक पुरुष और एक स्त्री, एक-दूसरे पर हाथ-पैर चिमटाकर चढ़े हुए लेटे थे। दोनों व्यभिचारी, गंदे, बूढ़े, कीड़ो की भांति कुलबुला, फुसफुसा और कुड़बड़ा रहे थे। सूर्य निर्दयतापूर्वक उनके अनावृत्त विवर्ण पैरों पर रोशनी डाल रहा था। ओह, ईश्वर, सौन्दर्य के सृजनकर्ता--क्या तुम स्वयं पर लज्जित नहीं? मैंने बहुत बुरा अनुभव किया--।”

बोलते समय उनकी आंखों के भाव बहुत विशिष्ट प्रकार से बदल रहे थे, कभी वे बचकानी विषादपूर्ण होतीं, कभी उनमें एक कठोर शुष्क चमक दिखती। उनके होंठ फड़कते और मूंछे खड़ी होतीं। जब उन्होंने बोलना समाप्त किया उन्होंने अपने कुर्ते की जेब से रूमाल निकाला और जोरदार ढंग से अपने चेहरे को रगड़ा, हालांकि वह सूखा हुआ था।

एक दिन मैं ड्यूल्बर से अई.टोडोर तक निचली सड़क के समानान्तर सड़क पर उनके साथ टहल रहा था। एक युवक की भांति लंबे हल्के डग भरते हुए और अधिक उत्तेजना प्रकट करते हुए उन्होंने कही:

“आत्मा की अपेक्षा शरीर को सुप्रशिक्षित होना चाहिए। जहां कहीं भी आत्मा उसे भेजे उसे जाना चाहिए। और हमारी ओर देखो। शरीर विलासी और चंचल है, और आत्मा दयनीय निस्सहायता के साथ उसका अनुकरण करती है।”

उन्होंने ठीक हृदय के ऊपर अपनी छाती को जबर्दस्ती रगड़ा, अपनी भौंहे उठायीं, और ध्यानपूर्वक कहना जारी रखा:

“मास्को में सुखारेव टावर के निकट--यह शरद ऋतु की बात है,एक बार मैंने शराब में धुत्त एक युवती को देखा। वह एक गटर में पड़ी हुई थी। गंदे पानी की धार उससे एक गज दूर ठीक उसकी गर्दन और पीठ के नीचे टपक रही थी, और वहां वह ठण्डे पानी में कुड़बुड़ती, हिलती-डुलती, छटपटाती, लनगभग भीगी हुई, उठने में असमर्थ पड़ी हुई थी।”

वह कांपे, क्षण भर के लिए आंखें बंद कीं, सिर हिलाया और धीमे स्वर में बोले--

“यहां बैठते हैं। एक धुत्त स्त्री की अपेक्षा कुछ भी अधिक भयानक, अधिक घृणित नहीं होता। मैं जाकर उठने में उसकी सहायता करना चाहता था, लेकिन कर नहीं सका। मैंने अपने को उससे पीछे हटा लिया था। वह पूरी तरह गंदी और गीली थी। उसे छूने के बाद एक महीने तक आप अपने हाथ साफ करने में असमर्थ रहते--दारुण! और उसके निकट किनारे के पत्थर पर एक भूरी आंखों, सुन्दर बालों वाला छोटा लड़का गालों पर आंसू बहाता, सूं-सूं करता और असहाय-सा चीखता हुआ बैठा था।”

“मा--म-S-S-S-उठो--।”

“हर बार जब तब वह अपनी बाहें उठाती, फुफकारती, अपना सिर उठाती, और पुनः--कीचड़ में उसे गिरा देती।”

वह चुप हो गए और फिर, अपने चारों ओर देख घबड़ाए हुए लगभग फुसफुसाते हुए दोहराने लगे।

“घृण्य, घुण्य! तुमने बहुत-सी नशे में धुत्त स्त्रियां देखी होंगी? तुमने देखी हैं न--ओह, ईश्वर! उस विषय पर मत लिखना, तुम्हें नहीं लिखना चाहिए।”

“क्यों नहीं?”

मेरी आंखों में देखते हुए मुस्कराते हुए उन्होंने दोहराया:

“क्यों नहीं?”

फिर वह चिन्तनशील हो धीमे स्वर में बोले:

“मुझे मालूम नहीं। यह यूं ही कि मुझे---पाशविकता के विषय में लिखना शर्मनाक प्रतीत होता है। लेकिन अंततः-- क्यों नहीं? किसी को सभी विषयों पर लिखना चाहिए---।”

उनकी आंखों में आंसू छलक आए। उन्होंने उन्हें पोंछ डाला और पूरे समय मुस्कराते हुए अपनी रूमाल की ओर देखते रहे, तभी आंसू उनकी झुर्रियों पर पुनः टपक पड़े थे।

“मैं रो रहा हूं” वह बोले, “मैं एक बूढ़ा व्यक्ति हूं, जब मैं किसी भयानक चीज के विषय में सोचता हूं वह मेरे हृदय को कंपा देती है।”

फिर मुझे हल्के-से टहोका देते हुए--” सब कुछ अपरिवर्तित रहेगा, और तुम इससे अधिक दुखपूर्वक रोओगे जितना मैं इस समय रो रहा हूं, और अधिक आंसू टपकाओगे, जैसा कि किसानों की स्त्रियां करती हैं---लेकिन सभी विषयों पर लिखना चाहिए, सभी पर, अथवा सुन्दर बालों वाला छोटा लड़का आहत होगा, वह तम्हारी भर्त्सना करेगा---।”

उन्होंने पूरी तरह से अपने को हिलाया और खुशामदी ढंग से बोले:

“आओ, कुछ कहो, तुम बहुत अच्छे वक्ता हो। बच्चे के विषय में, अपने विषय में। यह विश्वास करना कठिन है कि कभी तुम भी बच्चे थे, तुम भी--- ऐसे विलक्षण व्यक्ति। ऐसा प्रतीत होता है कि तुम बड़े ही जन्मे थे। तुम्हारे विचारों में बहुत कुछ बचकाना, अपरिपक्व है, और फिर भी तुम जीवन के बारे में बहुत कुछ जानते हो---तुम्हें और अधिक जानने की आवश्यकता नहीं है। आओ, मुझे कुछ सुनाओ---।”

और वह देवदारु वृक्ष की बाहर निकली जड़ पर, धूसर देवदारु के छेद से निकल रही चीटियों की घबड़ाहट और गतिविधियों को देखते हुए आराम से बैठ गए थे।

सड़क पर वह द्रुत, त्वरित चाल से एक अनुभवी भूपर्यटक की भांति चलते थे। उनकी उत्सुक आंखों से देखने, मापने, पर्यवेक्षण और तुलना करने से पत्थर ही नहीं, विचार भी बच नहीं पाते थे। और वह अपने अविच्छिन्न जीवंत विचारों को अपने चारों ओर बिखेरते रहते थे। उन्होंने सुलर से कहा:

“सुलर, तुम कभी नहीं पढ़ते, यह बहुत खराब है। यह दम्भ है, और यहां गोर्की बहुत पढ़ते हैं, और यह भी गलत है।--यह उसमें आत्मविश्वास की कमी प्रकट करता है। निश्चित ही मेरे सोचने का ढंग मेरे लिए अच्छा है, यद्यपि गोर्की सोचते हैं कि उनके लिए यह गलत है, और तुम बिल्कुल नहीं सोचते। तुम किसी चीज को पकड़कर दबोच लेने के लिए केवल आंखें झपकाते और देखते हो और तुम उन चीजों को पकड़ लेते हो जिनका तुम्हारे लिए कोई अर्थ नहीं--प्रायः तुमने वही किया है। तुम पकड़ लेते हो चिपका लेते हो, और जिस चीज को तुमने चिपकाया हुआ होता है वह जब तुमसे अलग होकर गिरने लगती है, तुम उससे अलग हो जाते हो। चेखव की एक बहुत अच्छी कहानी है--'दि डार्लिगं'--निश्चय ही उसमें वर्णित स्त्री तुम्हें पसंद है!”

“किस रूप में?” सुलर हंसा।

“तुम सदैव प्रेम के लिए तैयार रहते हो, लेकिन तुम नहीं जानते कि चयन कैसे करना है, और तुम उस छोटी-सी बात पर अपनी ऊर्जा नष्ट कर देते हो। ”

“क्या सभी को वह पसंद नहीं है?”

“सभी को?” मंद-मंद मुस्कराते हुए एल.एन. बोले, “नहीं--नहीं--सभी को नहीं। ” और अचानक उन्होंने मुझ पर प्रहार शुरू कर दिया:

“तुम ईश्वर में विश्वास क्यों नहीं करते?”

“मुझे विश्वास नहीं है, एल.एन.।”

“यह सही नहीं है। स्वभाव से तुम आस्तिक हो। ईश्वर के बिना तुम आगे नहीं बढ़ सकते। जल्दी ही तुम यह अनुभव करने लगोगे। तुम इसलिए विश्वास नहीं करते क्योंकि तुम दुराग्रही हो, और क्योंकि तुम खीजे हुए हो। संसार में ऐसे रास्ते नहीं बनते जैसा तुम चाहोगे। कुछ लोग अपने संकोच के कारण नास्तिक होते हैं। कभी-कभी नौजवान ऐसे होते हैं। वे किसी स्त्री की आराधना करते हैं, लेकिन उसे प्रकट होना बर्दाश्त नहीं कर सकते। उन्हें गलत समझे जाने का भय होता है, और इसके अतिरिक्त उनमें साहस भी नहीं होता। विश्वास के लिए प्रेम की भांति, साहस, और निर्भीकता की अपेक्षा होती है। तुम्हें स्वयं से कहना चाहिए, 'तुम विश्वास करते हो' और सब कुछ ठीक हो जाएगा और जैसा तुम चाहते हो सब वैसा ही प्रतीत होगा। सभी कुछ स्वयं तुम्हें स्पष्ट हो जाएगा, तुम्हें आकर्षित करेगा। बहुत कुछ है जिसे तुम प्रेम करते हो, उदाहरण के लिए, विश्वास प्रेम का केवल तीव्रीकरण है। तुम्हें और अधिक प्रेम करना चाहिए और प्रेम विश्वास में परिवर्तित हो जाएगा। संसार में स्त्री के लिए अच्छा है कि पुरुष उसे प्रेम करें, और संसार में सभी अच्छी स्त्री को प्रेम करें और एक तुम हो---वही विश्वास! विश्वास न करने वाला कभी प्रेम नहीं कर सकता। वह आज एक के साथ प्रेम में पड़ता है, और एक वर्ष बाद दूसरे के साथ--। ऐसे व्यक्ति की आत्मा आवारागर्द होती है, वह निर्जीव है, और यह सही नहीं है। तुम एक आस्तिक के रूप में जन्में हो ओर अपनी प्रकृति के विरुद्ध जाने का प्रयास उचित नहीं है। तुम सदैव कहते हो---सौन्दर्य। और सौन्दर्य है क्या? सर्वोच्च और सर्वाधिक परिपूर्ण है--ईश्वर।”

इससे पहले इन विषयों पर उन्होंने मुझसे बहुत कम बात की थी, और विषय का महत्व, उसकी अतार्किकता ने मेरी अनभिज्ञता को प्रभावित किया और मैं अभिभूत हो उठा था। मैंने कुछ नहीं कहा। वह सोफे पर बैठे थे। उन्होंने अपने पैर अपने नीचे कर लिए। उनकी दाढ़ी पर एक उल्लसित मुस्कान खिल उठी और मेरी ओर एक उंगली हिलाते हुए वह बोले:

“तुम जानते हो, तुम कुछ नहीं कहकर उससे भाग नहीं सकते।”

और मैंने, जो ईश्वर में विश्वास नहीं करता, उन पर चुपचाप एक सरसरी दृष्टि डाली और स्वयं से कहा:

“यह व्यक्ति ईश्वर की भांति है।”