अध्याय-1 : योगदर्शन तथा आधुनिक शारीरिकी के अनुसार मानव व्यक्तित्व के प्रमुख पक्ष / कविता भट्ट

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मानव व्यक्तित्व के प्रमुख पक्ष

इस अध्याय में हम योगदर्शन के अनुसार व्यक्तित्व के प्रमुख पक्षों की चर्चा करेंगें; किन्तु उससे पूर्व कुछ बिन्दुओं को समझ लेना आवश्यक है। हम पूर्व में ही उल्लेख कर चुके हैं कि मानव जब तक भी जीवित रहता है; दुःख को अनुभव करता है। विश्व की विभिन्न घटनाओं से सुख अथवा दुःख के अनुभव का कारण मानव का अपना दृष्टिकोण, अस्वस्थता एवं बाहरी वातावरण से अनुकूलन क्षमता का अभाव है। वातावरण को व्यक्ति परिवर्तित नहीं कर सकता; किन्तु अपने व्यक्तित्व को परिष्कृत व समायोजित करना उसके लिए सम्भव है। दुःख को उत्पन्न करने वाले कारणों को समाप्त करना सम्भव नहीं किन्तु व्यक्तित्व परिष्करण एवं स्वस्थ दृष्टिकोण के सिद्धान्त के आधार पर योगदर्शन मानता है कि दुःख से निवृत्ति सम्भव है। व्यक्तित्व परिष्करण में शारीरिक एवं मानसिक दोनों प्रकार का परिष्करण सम्मिलित है; क्योंकि शरीर एवं मन दोनों से ही दुःख सम्मिलित हैं। शरीर को देखा जा सकता है इसलिए वह स्थूल है और मन को देखा नहीं जा सकता; मात्र अनुभूतियों के आधार पर उसका अस्तित्व माना गया है; इसलिए मन सूक्ष्म है। योगदर्शन शरीर एवं मन के अतिरिक्त आत्मा की अवधारणा को लेकर व्यक्तित्व एवं दुःखों के निवारण की बात करता है। दुःखों के निवारण हेतु योगाभ्यास के विभिन्न चरण हम आगे के अध्यायों में प्रस्तुत करेंगें; किन्तु व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों का ज्ञान ना हो तो दुःखों से नहीं बचा जा सकता। पुनः उल्लेखनीय है कि दुःखों का मूल कारण व्यक्तित्व में उपस्थित दृष्टिकोण तथा बाहरी वातावरण से अनुकूलन की क्षमता का अभाव है।

योगदर्शन में व्यक्तित्व का एक समग्र एवं जटिल विवेचन प्रस्तुत किया गया है; जो यथोचित भी है। इसमें प्रकृति अर्थात् जड़ तत्त्व एवं पुरुष अर्थात् चेतन तत्त्व के मिलने से ही व्यक्तित्व को निर्मित माना गया है। जड़ का अर्थ उन सब भौतिक पदार्थों से है जो रासायनिक अभिक्रियाओं द्वारा शरीर का निर्माण, पोषण एवं वृद्धि करते हैं; किन्तु प्रश्न यह है कि; क्या मात्र यही पदार्थ व्यक्तित्व को बना सकते हैं। योग दर्शन में माना गया है कि मात्र भौतिक पदार्थ व्यक्तित्व को नहीं बना सकते। सामान्य जीवन में भी हम देखते हैं कि भौतिक शरीर में तभी तक जीवन होता है; जब तक उसमें चेतना समाहित रहती है। यह चेतना सूक्ष्म होती है तथा विभिन्न जैविक क्रियाएँ इसी के कारण होती हैं; क्योंकि मानव के शरीर में मृत्यु के पश्चात् भी सभी भौतिक अंग और अवयव वैसे ही उपस्थित रहते हैं; फिर ऐसा कौन-सा तत्त्व है; जिसके शरीर से अलग हो जाने पर मृत्यु हो जाती है। वह तत्त्व है चेतना। जितने भी भौतिक तत्त्व व्यक्ति के शरीर का निर्माण करते हैं; उसे जड़ या प्रकृति कहा जाता है। इसके अतिरिक्त चेतन तत्त्व; जो व्यक्तित्व में चेतना का संचार करता है; उसे पुरुष या आत्मा कहा जाता है। इन दोनों के आपस में मिलने से व्यक्तित्व निर्मित होता है।

राजयोग के अनुसार व्यक्तित्व का स्वरूप

सांख्यदर्शन के ही समान ही योगदर्शन भी मानता है कि प्रकृति एवं पुरुष का आपसी संयोग या तालमेल होने पर विकासात्मक प्रक्रिया द्वारा व्यक्तित्व निर्मित होता है। दोनों के मिलने पर बुद्धि या महत् नामक प्रथम तत्त्व उत्पन्न होता है। इससे त्रिगुण (सत्त्व, रज एवं तम) उत्पन्न होते हैं। सत्त्वगुण से पांच ज्ञानेन्द्रियाँ (नाक, कान, आँख, जीभ एवं त्वचा) एवं पांच कर्मेन्द्रियाँ (मुँह, हाथ, पैर, गुदा तथा जननेन्द्रिय) उत्पन्न होते हैं। रज अहंकार व्यक्तित्व में क्रियाशीलता बनाये रखता है; इससे कोई स्थूल अंग उत्पन्न नहीं होता। तम अहंकार से पांच तन्मात्र-रूप, रस, गन्ध, स्पर्श एवं शब्द) तथा पांच महाभूत (अग्नि, जल, पृथ्वी, वायु एवं आकाश) उत्पन्न होते हैं। व्यक्तित्व में सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों प्रकार की प्रवृत्तियों हेतु त्रिगुण ही उत्तरदायी होते हैं। सभी व्यक्तियों में तीनों गुण होते हैं; परन्तु अलग-अलग समय पर किसी एक गुण का प्रभाव अधिक रहता है। जिस समय जो गुण प्रभावी होता है; व्यक्ति उसी के अनुरूप व्यवहार करता है। किसी व्यक्ति में अधिक समय तक और बार-बार प्रभावी होने वाले गुण के अनुसार ही व्यक्ति की स्थायी प्रवृत्ति बनती है। सत्त्वगुण के अधिक प्रभावी रहने पर व्यक्ति सात्त्विक, रजोगुण के अधिक प्रभावी रहने पर राजसिक एवं तमोगुण के अधिक प्रभावी रहने पर तामसिक होता है। इस प्रकार तीन प्रकार के व्यक्ति होते हैं-सात्त्विक, राजसिक एवं तामसिक। इन गुणों द्वारा अभिव्यक्त व्यवहारगत प्रवृत्तियों को निम्न तालिका द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है।

त्रिगुण एवं व्यक्ति की व्यवहारगत प्रवृत्तियाँ


त्रिगुण या तीन अहंकार- व्यक्तित्व के प्रकार- संचालित अभिवृत्तियाँ

सत्त्व- विवेक से युक्त गुण- सात्त्विक- दया, दान, क्षमा, धर्म, मेधा, स्मृति, वचन-पालन करना, अनासक्ति, धृति, बुद्धि, आस्तिकता आदि समस्त सकारात्मक अभिवृत्तियाँ

रज- क्रियाशीलता से युक्त गुण-राजसिक- दुःखाधिक्य, अधीरता, अहंकार, असत्यभाषण, क्रूरता, मान, हर्श, दम्भ, काम, क्रोध तथा भ्रमणशीलता आदि अभिवृत्तियाँ

तम- अंधकार या आलस्य- तामसिक- नास्तिकता, अधर्म, बुद्धि का विरोध, अज्ञान आलस्य, मूढ़ता तथा मानसिक उद्विग्नता आदि अभिवृत्तियाँ

इसी प्रकार प्रत्येक ज्ञानेन्द्रिय का किसी एक तन्मात्र एवं महाभूत से सम्बन्ध होता है; इसे निम्न तालिका से समझा जा सकता है।

ज्ञानेन्द्रिय, तन्मात्र एवं महाभूत का आपसी सम्बन्ध

पंचज्ञानेन्द्रिय -पंचतन्मात्र - महाभूत

आँख - रूप - अग्नि

जीभ - रस - जल

कान - शब्द - आकाश

नाक - गंध - पृथ्वी

त्वचा - स्पर्श - वायु

पांचों ज्ञानेन्द्रियों का कार्य होता है; उस तन्मात्र एवं महाभूत से सम्बन्धित संवेदना को प्राप्त करके बुद्धि तक सूचना पहुंचाना। बुद्धि उस पर यथोचित निर्णय देती है; तब कर्मेन्द्रिय बुद्धि द्वारा निर्धारित कर्म को सम्पन्न करती है। प्रत्येक कर्मेन्द्रिय किसी निश्चित कर्म का ही संचालन करती है। इसे निम्न तालिका से समझ सकते हैं।

कर्मेन्द्रिय एवं उससे सम्बन्धित कर्म

कर्मेन्द्रिय-कर्म

मुख-बोलना

हाथ-पकड़ना

पैर-चलना

गुदा-मलत्याग

जननेन्द्रिय-प्रजनन

योगदर्शन में माना गया है कि मन ही एकमात्र तत्त्व है; जो व्यक्तित्व में पुरुष या आत्मा की आंशिक चेतना का प्रतिनिधित्व करता है अर्थात् यह चैतन्य से युक्त है। मन ज्ञानेन्द्रियों एवं कर्मेन्द्रियों को संचालित करने वाला उभयेन्द्रिय माना गया है। मन से संचालित होकर बुद्धि एवं अहंकार भी कार्य करते हैं। मन, बुद्धि एवं अहंकार को सम्मिलित रूप से अन्तःकरण कहा जाता है। मन, पांच ज्ञानेन्द्रियों एवं पांच कर्मेन्द्रियों को बाह्य करण कहा जाता है। अन्तःकरण के निम्नलिखित कार्य हैं।

अन्तःकरण (मन, बुद्धि एवं अहंकार) के कार्य

1.सत्त्व अहंकार से उत्पन्न पांच ज्ञानेन्द्रियों एवं पांच कर्मेन्द्रियों का स्वामी या संचालक मन है। मन ही इन सभी को विषयों व कर्मो की ओर प्रवृत्त करता है। इन्द्रियों को विषयों की ओर प्रवृत्त करना, प्रत्यक्षीकरण, ग्रहण और सूचना संचरण आदि जैसे असंख्य कार्य मन की सक्रियता के कारण होते हैं। कुल मिलाकर समस्त इन्द्रियों का संचालन एवं नियमन आदि का उत्त रदायिŸव मन पर है।

2.बोध, तुलना, विश्लेषण, संश्लेषण, अनुमान तथा निष्कर्ष आदि जैसे अनेक कार्य मस्तिष्क व तन्त्रिका तन्त्र द्वारा परिचालित होते हैं; इन सब कार्यों का कुशल सम्पादन जिसके द्वारा किया जाता है; वह बुद्धि है।

3.उपर्युक्त सभी कार्य अहंकार के अनुसार यन्त्रवत् होते हैं।

4.सन्तुष्ट होने हेतु इन्द्रियाँ बाह्य जगत् में विभिन्न वासनाओं एवं भावनाओं से संलग्न होती हैं। इन्द्रियों द्वारा ग्रहण संवेदनाओं के आधार पर मन की वासनाओं, भावनाओं, संवेगों एवं प्रेरणाओं आदि से निर्मित आदतें ही कालान्तर में संस्कार में परिवर्तित होकर बुद्धि में संचित होती रहती हैं। भूत, वर्तमान एवं भविष्य से सम्बन्धित अनेक इस प्रकार के संस्कार मन, बुद्धि एवं अहंकार के सम्मिलित रूप चित्त में समाहित होती हैं।

मन पाँच प्रकार की स्थितियों में रहता है; जो व्यक्तित्व को उसी स्थिति के अनुसार अभिव्यक्त करता है।

क्षिप्त मन-चेतना की इस अवस्था में मन व्याकुल, घबराया, हुआ-सा तथा ध्यान इधर-उधर बंटा हुआ होता है। बीच-बीच में कभी-कभी थोड़ी देर के लिए मन सही हो सकता है; लेकिन अधिकांश नकारात्मक गतिविधियाँ ही चलती रहती हैं। सामान्य जीवन में प्रत्येक व्यक्ति नित्यप्रति इस अवस्था से गुजरता है।

मूढ़ मन-तमस् के प्रभाव में होने पर मन मूढ़ावस्था में रहता है; अन्य दो गुण गौणावस्था में होते है। व्यक्ति निद्रा, आलस्य और बुद्धिनाश जैसी प्रवृत्तियों से भी युक्त रहता है। यह अवस्था काम, क्रोध, लोभ और मोह के कारण होती है। इस मानसिक अवस्था में व्यक्ति अज्ञान, अधर्म, राग, लोभ एवं मोह जैसी स्वभावगत बुराइयों से ग्रसित रहता है।

विक्षिप्त मन-इस अवस्था में व्यक्ति का मन कभी-कभी किसी एक लक्ष्य पर केन्द्रित होता है; वह अधिक समय तक स्थिर नहीं रह पाता। इस अवस्था में सत्त्वगुण का प्रभाव अधिक रहता है। व्यक्ति में धर्म, ज्ञान, वैराग्य एवं ऐश्वर्य आदि रहते हैं; किन्तु कभी-कभी रजस् गुण का आंशिक प्रभाव भी होता है।

एकाग्र मन-जब मन किसी एक लक्ष्य पर केन्द्रित होता है; तो उसे मन एकाग्र अवस्था कहते हैं। योगाभ्यास के अन्तर्गत ध्यान तथा समाधि में यह स्थिति रहती है। उस समय सबकुछ छोड़कर मन को एक ही लक्ष्य पर केन्द्रित किया जाता है। सामान्य जीवन मंे यदि व्यक्ति किसी एक लक्ष्य को ध्यान में रखकर कार्य करता है तो भी सूक्ष्मकाल तक यह अवस्था रहती है। वास्तव में जो व्यक्ति किसी भी क्षेत्र में विशिष्ट लक्ष्य को ध्यान में रखकर कार्य करते रहते हैं; उनमें भी एकाग्रता की अवस्था आंशिक ही होती है। जैसे उच्च कोटि के अध्येता, वैज्ञानिक, गणितज्ञ एवं शिक्षाविद् आदि भी अध्ययन की पराकाष्ठा के अन्तर्गत एकाग्रता की अवस्था मंे होते हैं; किन्तु इनमें एकाग्रता के विषयक्षेत्र योगियों से भिन्न तथा सूक्ष्मकालीन होते हैं। किसी एक कार्य को जब कोई व्यक्ति पूरी तन्मयता के साथ करता है; तब भी वह सूक्ष्मकाल के लिए इसी अवस्था में स्थापित रहता है। इस प्रकार, एकाग्रावस्था तक तो सामान्य व्यक्ति अपने को अवस्थित कर सकता है; इससे उच्चावस्था निरुद्ध अवस्था है; जो मात्र योगियों को ही प्राप्त हो सकती है; वह भी योग की उच्चतम अवस्था में। सामान्य व्यक्ति मन की इस अवस्था तक कभी भी नहीं पहुँच सकता।

निरुद्ध मन-जब मन की के सारे उपक्रम उपचेतना के पाश्र्व में चले जाते हैं; और मात्र विशुद्ध चेतना ही प्रभावी रहती है; तो निरुद्धावस्था होती है। अर्थात् इस अवस्था में चेतना किसी भी गुण के प्रभाव में नहीं रहती है।

योग दर्शन ने माना है कि मन की अवस्था से व्यक्तित्व प्रभावित होता है। समस्त योग साधना मन के नियन्त्रण को ही आधार मानकर आगे बढ़ती है। उपनिषद् साहित्य द्वारा भी मन को अत्यंत प्रभावी माना गया है। उपनिषद् साहित्य में भी व्यक्तित्व का विशेष विवेचन मिलता है; जिसे योगदर्शन भी स्वीकार करता है। योगसाधना के प्रभावों को समझने हेतु इसे जानना आवश्यक है; इसलिए अब हम तैत्तिरीयोपनिषद में बतायी गयी व्यक्तित्व की पंचकोशीय अवधारणा को प्रस्तुत करेंगे।

तैत्तिरीयोपनिषद् के अनुसार व्यक्तित्व की पंचकोशीय अवधारणा

माना गया है कि सृष्टि का मूल तत्त्व परमात्मा है; परमात्मा अर्थात् जिससे सभी जीवधारियों में जीवन सम्बन्धी चेतना है। परमात्मा से सर्वप्रथम आकाश तत्त्व उत्पन्न हुआ। आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथ्वी; इन अन्य चार तत्त्वों की उत्पत्ति हुई. इस प्रकार अन्तिम तत्त्व पृथ्वी से विविध प्रकार की औषधियों, औषधियों से आहार एवं आहार से अन्नमय कोश उत्पन्न हुआ। इन विभिन्न तत्त्वों की अपने से पूर्व के दूसरे तत्त्व की क्रमिक उत्पत्ति के सिद्धान्त को संक्षेप में अग्रांकित चार्ट के द्वारा जाना जा सकता है।

अन्नमय कोश I मनुष्य का आहार I नाना प्रकार की औषधियाँ

पृथ्वी

जल

अग्नि

वायु

आकाश

परमात्मा

तैत्तिरीयोपनिषद् में पंचतत्त्व की क्रमिक उत्पत्ति एवं विकास का सिद्धान्त

मानव व्यक्तित्व में पांच कोश हैं; जो एक के ऊपर दूसरा प्याज के छिलकों के समान एक दूसरे को ढ़कते हुए आत्मा के चारों ओर का बाहरी आवरण बनाते हैं। ये पंचकोश बाहर से भीतर की ओर तथा स्थूल से सूक्ष्म की ओर क्रमशः अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय तथा आनन्दमय हैं। आनन्दमय कोश आत्मा के सबसे निकट एवं अन्नमय सबसे दूर है। इन्हें निम्नांकित चित्र द्वारा समझा जा सकता है।

अन्नमय

प्राणमय

मनोमय

विज्ञानमय

आनन्दमय

व्यक्तित्व के पाँचों कोशों के स्तर

जिस बाहरी शरीर को हम देखते हैं; या अनुभव करते हैं; वह अन्नमय कोश सबसे बाह्य व स्थूल कोश है; इसके द्वारा आत्मा की चेतना शक्ति बाहरी संसार से जुड़ती है। सामान्य व्यवहार में हम इसी कोश का साक्षात्कार कर पाते हैं। इसलिए हम अन्नमय से प्रारम्भ करके आनन्दमय कोश तक सभी पांच कोशों का क्रमिक विवेचन करेंगे। इससे पहले कोश का शाब्दिक अर्थ समझेंगे।

कोश-संस्कृत शब्दावली के अनुसार कोश; कुश धातु में घ´् प्रत्यय लगने से बना है; जिसके अनेक अर्थ होते हैं जैसे आवरण या भण्डार आदि। व्यक्तित्व के सन्दर्भ में आवरण अर्थ प्रासंगिक है जो उपनिषद् साहित्य में आत्मा के विभिन्न आवरणों हेतु प्रयोग किया गया है। उपनिषद् साहित्य में इस शब्द का प्रयोग आत्मा को आवरित करने वाले विभिन्न स्तरों हेतु प्रयोग किया गया है।

अन्नमय कोश आत्मा सबसे बाहरी आवरण है; जो पशुओं एवं मानवों में लगभग समान है; इसे इस प्रकार समझा जा सकता है-

अन्नमय कोश ब्रह्माण्ड द्वारा प्राप्त पोषणशक्ति का वैयक्तिक स्तर

अन्न एवं मय; इन दो पदों से अन्नमय शब्द बना है; जिसका अर्थ है-अन्न वाला या अन्न से युक्त। अन्न से निर्मित भौतिक या स्थूल शरीर। यह सबसे आत्मा का पाँचवाँ एवं सबसे बाहरी स्तर या आवरण है। यह निम्नतम स्तर है; जिसके द्वारा परमात्मा या परब्रह्म अपने आपको सांसारिक सत्ता के रूप में प्रकट करता है।

अन्नमय कोश के कार्य

1. अन्न से ही पृथ्वी पर निवास करने वाले सभी प्राणियों का जीवन है।

2. अन्न से उत्पन्न रज एवं वीर्य जैसे तत्त्वों से ही शरीर भी निर्मित होते हैं।

3. समस्त व्यक्तित्व का पोषण करना।

4. समस्त व्यक्तित्व की वृद्धि करना।

5. रोग-प्रतिरोधक क्षमता का विकास करना।

अन्नमय कोश के भीतर प्राणमय कोश है।

प्राणमय कोश: ब्रह्माण्डीय प्राणऊर्जा का वैयक्तिक स्तर

प्राणमय = अर्थात् प्राण वाला, स्तर है। प्राण अर्थात् सांस, श्वास, जीवनीशक्ति, जीवनदायी वायु, जीवन का मूलतत्त्व, इस अर्थ में मुख्य व पहला प्राण फेफड़े में रहने वाला प्राण है; क्योंकि प्राण के पांच मुख्य प्रकार-प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान हंै। योग साहित्य में इसे मुख्य रूप से जीवनी शक्ति, श्वास एवं ऊर्जा जैसे अर्थों में प्रयोग किया गया है। परमात्मा इसे इसलिए कहा गया है क्योंकि प्राण के अभाव में जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। यह मानव के व्यक्तित्व का अन्नमयकोश के भीतर वाला तथा आत्मा को ढकने वाला चौथा कोश है।

प्राणमय कोश के कार्य

1. प्राण पर्यावरण से ग्रहण की गयी शुद्धवायु है जो ब्रह्माण्डीय ऊर्जा को शरीर के भीतर पहुंचाकर व्यक्ति को जीवन प्रदान करती है।

2.विज्ञान मानता है कि जैविक क्रियाओं के संचालन हेतु शरीर आॅक्सीजन को ग्रहण करता है तथा उसके द्वारा शरीर की प्रत्येक कोशिका एक पावर हाउस के रूप में ऊर्जा का निर्माण करती है। यही ऊर्जा व्यक्ति को जीवित बनाये रखती है और समस्त क्रियाओं का संचालन करती है।

3.इनके अतिरिक्त इनके सहयोगी के रूप में शारीरिक क्रियाओं को सम्पन्न करने वाले पांच उपप्राण भी बताये गये हैं।

4.नासिका के द्वारा प्राणवायु को ग्रहण किया जाता है तथा व्यक्ति के दो नासिका छिद्र होते है इन्हें ह तथा ठ नाड़ी भी कहा जाता है। हठयोग मानता है कि शरीर में दस प्रकार की प्राणवायु है। मुख्य प्राणवायु हृद्य में रहते हुए श्वास एवं निःश्वास का संचालन करती है। यही प्राणवायु हकारात्मक एवं ठकारात्मक भी है; क्योंकि हकार ध्वनि से यह वायु अन्दर आती है तथा ठकार ध्वनि से वायु बाहर जाती है। इसमें हकार को सूर्य नाडी एवं ठकार को चन्द्र नाड़ी कहा जाता है। इन्हीं प्राणों की साधना के द्वारा कैवल्य जैसे साध्य की प्राप्ति होती है। प्राणमय कोश में व्याप्त प्राणांे के कार्यों का सार निम्न तालिका में प्रस्तुत कर रहे हैं।

शरीर में पाँच प्राण, इनके स्थान एवं कार्य.


पाँच मुख्य प्राण --शरीर में इन स्थान --इनके द्वारा सम्पादित कार्य

प्राण -कन्द का निचला भाग, मुख, नासिका, हृदय और नाभिमंडल आदि सहित पैर के अँगूठे तक श्वास-प्रश्वास, खाँसना

अपान-लिंग या योनि, गुदा, उरू, अण्डकोष, पिण्डली, जानु, कमर तथा नाभिमूल मल-मूत्र विसर्जन

समान-सम्पूर्ण शरीर-वृद्धि, अन्नरस का सम्पूर्ण शरीर में संचरण व पोषण

उदान-सभी सन्धियाँ, हाथ-पैर शरीर का उन्नयन

व्यान-कान, आँख की मध्यवर्ती घुठ्ठी, नासिका, गला, टखने तथा चक्षु प्रदेश हान, उपादान एवं चेष्टा आदि

शरीर में पाँच उपप्राण, इनके स्थान एवं कार्य;

पाँच उपप्राण -शरीर में इनके स्थान-इनके द्वारा सम्पादित कार्य-

नाग-त्वचा, हड्डी एवं सारा शरीर-अंग-प्रत्यंग संचालन

कूर्म-त्वचा एवं हड्डी आदि-पलकों को खोलना-बन्द करना

कृकल / कृकर-त्वचा एवं हड्डी आदि-छींकना, डकार लेना तथा भूख बढ़ाना

देवदत्त-त्वचा एवं हड्डी आदि-तन्द्रा में जम्हाई लेना

धनंजय-त्वचा, हड्डी तथा समस्त शरीर-समस्त शरीर में नाद, शुष्कता

इस प्रकार शरीर की क्रियाओं के संचालन का उत्तरदायित्त्व पांच मुख्य प्राणों एवं पांचों उपप्राणों का है। सभी प्राणों की शक्तियों को धारण करने वाला व्यक्तित्व का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्तर या आवरण ही प्राणमय कोश है। प्राणमय कोश के भीतर मनोमय कोश है; जिसे निम्न प्रकार से समझा जा सकता है।

मनोमय कोश: ब्रह्माण्डीय चैतन्य का वैयक्तिक स्तर

मनोमय = अर्थात् मन वाला या मन से युक्त, संरचित या से बना हुआ, आत्मिक और मानसिक। यह आत्मा को ढकने वाला तीसरा आवरण या स्तर है। मनस् =् अर्थात् मन; यह वह उपकरण है; जिसके द्वारा जाने गये विभिन्न पदार्थ आत्मा को प्रभावित करते हैं। आत्मा से भिन्न चेतना की शक्ति, निर्णय अथवा विवेचन की शक्ति सोच, विचार, कल्पना। मन वह आन्तरिक यन्त्र है; जिसके द्वारा दूर के व्यक्ति या वस्तु भी पास प्रतीत हों।

मनोमय कोश के कार्य

1.मूलभूत इच्छाओं और आवश्यकताओं के प्रति रुझान उत्पन्न करना। ये आवश्यकताएँ भय उत्पन्न करने वाले कारकों से सुरक्षा, भोजन तथा प्रेम के लिए साथी आदि से सम्बन्धित हो सकती हैं। मनोमय स्तर व्यक्ति की पांच ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से देखना, स्वाद लेना, सुनना, सूंघना तथा स्पर्श करना जैसी क्रियाओं में सहयोगी है।

2.इसके कारण ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा प्राप्त उत्तेजनाएँ ही मानव को बाह्य जगत् के क्रिया-कलापों से जोड़े रखती हैं। ये उत्तेजनाएँ सुरक्षा, भोजन, प्रेम और भय आदि से सम्बन्ध रखने वाली होती हैं।

3.मन के ही कारण सामान्य व्यवहार में व्यक्ति असंतुष्ट इच्छाओं, तनावों, चिंताओं, उद्वेगों, भयों तथा विभिन्न प्रकार के सुखकर एवं दुःखकर भावों से ग्रस्त रहता है।

4.बाह्य संसार से सुखानुभूति व दुःखानुभूति ग्रहण कर पाता है। यह आत्मा एवं शरीर के मध्य एक सेतु के रूप में कार्य करता है। यह एक सेतु के समान है; जो शरीर के द्वारा प्राप्त सुख-दुःख की अनुभूति से आत्मा को सांसारिक भावों में लिप्त करता है।

विज्ञानमय कोश: बौद्धिक शक्ति का वैयक्तिक स्तर

विज्ञानमय = अर्थात् विज्ञानयुक्त या विज्ञान से निर्मित कोश। विज्ञान का अर्थ है-ज्ञान, बुद्धिमत्ता, प्रज्ञा, समझ, सांसारिक ज्ञान, तथा परमात्म विषयक ज्ञान। व्यक्ति को कर्मों की ओर प्रेरित करने वाला एवं बौद्धिक शक्ति से संरचित यह-यह आत्मा का दूसरा आवरण या स्तर है।

विज्ञानमय कोश के कार्य

1.सांसारिक एवं परमात्मा सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त करना।

2.विद्युत चुम्बकीय तरंगों के रूप में बुद्धि के कार्यों को मस्तिष्क के कार्यों के समान बताया गया है।

3.तथ्यों और अनुभवों को जुटाने में उपकरण के समान कार्य करना।

4.अन्नमय से लेकर मनोमय तक तीनों कोश प्रकृति के निम्न स्तर हैं; किन्तु विज्ञानमय कोश जीवात्मा का उच्चस्तर है। विज्ञान भी इस तथ्य को स्वीकार करता है कि मनोमय कोश तक के सभी लक्षण अर्थात् भोजन-पानी, श्वास-प्रश्वास और मन के भावों में से सुरक्षा आदि का भाव तो पशुजगत् में भी मानव के समान ही होता है किन्तु अनुसंधान और ज्ञान-विज्ञान का बौद्धिक स्तर मात्र मानव में ही होता है। यह विज्ञानमय कोश के ही कारण होता है।

आनन्दमय कोश: आत्मिक शक्ति का वैयक्तिक स्तर


आनन्दमय = अर्थात् आनन्द वाला, आनन्द युक्त या आनन्द से निर्मित या संरचित आत्मा का आवरण। आनन्द का अर्थ होता है-प्रसन्न करने वाला, सुखकर, ईश्वर एवं परमात्मा। यह आत्मा का सबसे भीतरी एवं प्रथम आवरण है।

आनन्दमय कोश के कार्य

1.वास्तव में आत्मा आनन्दमय कोश के भी भीतर है।

2.आत्मा या विशुद्ध चैतन्य की सांसारिक क्रिया-कलापों के साथ संलग्नता इसी आवरण से प्रारम्भ होकर अन्य चार कोशों के माध्यम से अभिव्यक्त होती है।

3.आनन्दमय कोश के कारण प्रमोद रहित आत्मा, प्रिय प्रमोदादि धर्मों से युक्त हो जाती है।

4.शुद्ध आत्मा या चेतना का प्रकृति या जड़ पदार्थ के विकारों के साथ संलग्न होने का क्रम इसी कोश से प्रारम्भ होता है।

5.इसी संलग्नता की परिणति मनुष्य के अन्य कोशों के माध्यम से विभिन्न बौद्धिक, मानसिक, प्राणिक एवं जैविक गतिविधियों में होती है।

6.आत्मा की सर्वाधिक निकटता के कारण आनन्दमय कोश को आनन्द से पूर्ण परमात्मा स्वरूप कहा गया है।

व्यक्तित्व की उपर्युक्त औपनिषदिक अवधारणा के अतिरिक्त; हठयोग में भी व्यक्तित्व की विशिष्ट अवधारणा भी है; जो आधुनिक विज्ञान से कुछ समानताएँ रखती है; इसे स्पष्ट रूप से समझने हेतु अब हम हठयोग में प्रस्तुत व्यक्तित्व सम्बन्धी अवधारणा को प्रस्तुत करेंगे।

हठयोग में प्रस्तुत व्यक्तित्व की अवधारणा का वैज्ञानिक पक्ष

हठयोग में आधार, नाड़ी, प्राण, चक्र एवं कुण्डलिनी आदि को व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों को प्रस्तुत किया गया है। इनको योगाभ्यास के परिप्रेक्ष्य में समझने हेतु नाड़ी, प्राण तथा चक्र आदि को जानना आवश्यक है। पहले नाड़ी को समझेंगे।

योग विज्ञान में नाड़ी-योगविज्ञान में 'नाड़ी' शब्द आधुनिक शरीर-विज्ञान में वर्णित 'तन्त्रिका' शब्द का पर्यायवाची माना जा सकता है; लेकिन हठयोग में नाड़ी को मात्र शारीरिक क्रिया-कलापों तक ही सीमित नहीं माना गया है; अपितु अनेक आध्यात्मिक लक्ष्यों हेतु भी नाड़ियों का उपयोग किया जाता है। पातंजलयोगसूत्र की टीकाओं में से प्राचीन टीका श्रीव्यासभाष्य में मात्र कूर्म नाड़ी की चर्चा मिलती है; वह भी मात्र एक ही बार; परन्तु हठयोग का तो नामकरण ही नाड़ी-विज्ञान के सन्दर्भ में हुआ है। हठ शब्द स्वयं मंे नाड़ियों को ही निर्देशित करता है। इसमें 'ह' का अर्थ-दाहिने नासारन्ध्र से सम्बन्धित नाड़ी है; जिसे सूर्य नाड़ी भी कहा जाता है। 'ठ' का अर्थ-बाँयें नासारन्ध्र से सम्बन्धित नाड़ी है; जिसे चन्द्र नाड़ी भी कहते हैं। इसके अतिरिक्त एक अन्य मुख्य नाड़ी 'सुषुम्ना' है; जो मेरुदण्ड (रीढ़ की हड्डी) के भीतर स्थित है। वस्तुतः सुषुम्ना नाड़ी ही योगविज्ञान में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मानी गयी है। आधुनिक शरीर-विज्ञान भी इसे ही महत्त्वपूर्ण मानता है। समस्त शारीरिक संवेदनाओं को ग्रहण करने और मस्तिष्क से अंग-प्रत्यंग को दिये जाने वाले समस्त निर्देशों का इसी मेरुदण्ड के भीतर स्थित नाड़ियों के समूह द्वारा संचालन होता है। यद्यपि नाड़ियों को लेकर अनेक शोध होने शेष हैं; तथापि कुछ तथ्यों को लेकर आधुनिक शरीर विज्ञान से इन नाड़ियों के बारे में सत्यता प्रमाणित होती हैं।

योगशास्त्र में नाडियों के वर्ग, महत्त्व एवं संख्या

योगशास्त्र में नाड़ियों को उनके महत्त्व के अनुसार तीन वर्गों में विभाजित किया गया है- अधिक, मध्यम एवं कम महत्त्वपूर्ण। अधिक महत्त्व वाली पिंगला, इड़ा एवं सुषुम्ना हैं। इनमें से भी सुषुम्ना अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। मध्यम महत्त्व की 10 से 14 नाड़ियाँ और भी हैं। सरस्वती, कूहू, गान्धारी, हस्तिजिह्वा, यशस्विनी, विश्वोदरा, वरणा, प्रतिष्ठिता, पयस्विनी, शंखिनी तथा अलम्बुषा आदि। शरीर में कुल नाड़ियों की संख्या को लेकर अनेक विद्वानों के मत भिन्न हैं; किन्तु साररूप में संख्या यह 72,000 से 3,50,000 तक मानी गयी है। इनमें से निम्न तीन प्रमुख हैं।

ह या पिंगला नाड़ी- यह नाड़ी दाहिने नासारन्ध्र से सम्बन्धित है। यह मेरुरज्जु के दाहिने मूल से निकलकर सर्प के आकार में दाहिने नासारन्ध्र तक जाती है। यह शरीर में उष्मा उत्सर्जी गतिविधियों को नियन्त्रित करके शरीर को गर्मी प्रदान करती है। इस नाड़ी को पिंगला या सूर्य नाड़ी भी कहा जाता है। यह नाड़ी सिम्पैथेटिक नर्वस सिस्टम से जुड़ी होती है।

ठ या इड़ा नाड़ी- यह नाड़ी बाँयें नासारन्ध्र से सम्बन्धित है; क्योंकि यह मेरुरज्जु के बांये मूल से निकलकर सर्प के आकार में बांये नासारन्ध्र तक जाती है। यह शरीर में ऊर्जा संग्रहित करके; उपचय से सम्बन्धित गतिविधियों को नियमित करती है। यह शरीर को शीतलता या ठंडक प्रदान करती है। इस नाड़ी को इड़ा या चन्द्र नाड़ी भी कहा जाता है। यह नाड़ी पैरा सिम्पैथेटिक नर्वस सिस्टम से जुड़ी होती है।

सुषुम्ना नाड़ी- यह मेरुरज्जु में उपस्थित होती है। यह उपरोक्त दोनों नाड़ियांे से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। यह समस्त शरीर का संतुलन बनाती है। वस्तुतः आधुनिक शरीर विज्ञान भी समस्त संवेदनाओं के संवहन हेतु मेरुरज्जु के भीतर उपस्थित नाड़ी संस्थान को ही उत्तरदायी मानता है। इड़ा एवं पिंगला नाड़ियों के कार्यों को संतुलित करके; सिम्पैथेटिक एवं पैरासिम्पैथेटिक नर्वस सिस्टम की विभिन्न गतिविधियों में यथोचित संतुलन को स्थापित किया जा सकता है। इन कार्यों मंे संतुलन आते ही शारीरिक एवं मानसिक कार्यों में संतुलन स्थापित हो जाता है।

मस्तिष्क के दो भाग हैं- दाहिना एवं बायाँ। जब दाहिने नासारन्ध्र से सांसें चलती है; तो मस्तिष्क का बांयाँ भाग अधिक सक्रिय होता है। जब बाँयें नासारन्ध्र से सांसें चलती हैं तो मस्तिष्क का दाहिना भाग अधिक सक्रिय होता है। मस्तिष्क का दाहिना भाग पूर्वाभास, कला एवं सम्पूर्णता को निर्धारित करता है। बाँयां भाग संवाद, सुनना, लिखना, बोलना, तर्कशक्ति, आकलन और विवेकशीलता को निर्देशित करता है। इस प्रकार दोनों नाड़ियों के कार्यों में संतुलन हेतु हठयोग का अभ्यास इन नाड़ियों में प्राण ऊर्जा के यथोचित प्रवाह द्वारा चक्र (नाड़ियों के केन्द्र) जागरण के अभ्यास पर केन्द्रित है। इसके लिए हमें हठयोग में विवेचित चक्र की अवधारणा को संक्षेप में जानना होगा।

व्यक्तित्व की चक्र सम्बन्धी अवधारणा

आधुनिक शरीर एवं शरीर क्रिया विज्ञान में विभिन्न क्रियाओं को नियन्त्रित करने वाले सोलर प्लेक्सेज या नाड़ी गुच्छकों को ही योग विज्ञान में चक्र की संज्ञा दी गयी है। मेरूरज्जु के अन्तर्गत वक्षप्रदेश से लम्बर उपास्थि तक थोराकोलम्बर बर्हिवाही के रूप में कार्य करता है एवं पैरासिम्पैथेटिक तन्त्र मस्तिष्क से पुच्छ अस्थि तक क्रेनिओसेक्रल बर्हिवाह का कार्य करता है। ये दोनों मिलकर बीच-बीच में कुछ स्थानों पर जटिल गुच्छों के रूप में स्थित होते हैं; इन्हें नाड़ी-गुच्छक या सोलर प्लेक्सेज या चक्र की संज्ञा दी गयी है। इनकी संख्या को लेकर विभिन्न योगियों में मतभेद है; और कहीं-कहीं तो इनकी संख्या 12 तक भी बतायी गयी है; किन्तु सामान्य रूप से ये संख्या में 7 माने जाते हैं।

चक्र शब्द संस्कृत शब्दावली का है जिसका अर्थ गोलाकार चक्का या परिधि युक्त वस्तु या फिर पौराणिक भारतीय शब्दावली में युद्ध में प्रयुक्त होने वाले चक्र से समझा जा सकता है। हठयोग में यह शब्द शरीर के अन्दर रीढ़-रज्जु के भीतरी सुषुम्ना मार्ग में अवस्थित ऐसे पंखुड़ीयुक्त गोलाकार शक्ति केन्द्रों के लिए प्रयोग होता है; जो व्यक्तित्व के विविध आंतरिक व बाह्य पक्षों को नियमित एवं निर्धारित करते हैं। ये शक्ति केन्द्र्र आधुनिक विज्ञान में नाड़ी गुच्छक या ग्रन्थि या उपत्यिकाओं (solar Plexus) के नाम से भी जाने जाते हैं। यद्यपि कुछ विद्वान ऐसा मानते हैं; किन्तु आधुनिक विज्ञान जिन हॉर्मोनल ग्लैंड्स या अन्तःस्रावी ग्रन्थियों को विवेचित करता है वह स्वरूप व क्रियात्मकता में कुछ भिन्न रूप से अभिव्यक्त की जा सकती हैं; तथापि सम्भवतः हठयोग में विवेचित चक्रों को मात्र ग्रन्थि कह देना पूर्णतः सही नहीं कहा जा सकता है। इसका कारण यह है कि हठयोग में प्रस्तुत चक्रों की अवधारणा शरीर स्थित स्थूल ग्रन्थियों की अवधारणा से अत्यधिक विस्तृत व रहस्यात्मक है। उसका उपयुक्त स्वरूप समझना अभ्यास व साधना पर ही निर्भर है। व्यक्तित्व की व्यवहारगत कमियों व योगाभ्यास द्वारा उन कमियों में आये सुधारों से सिद्ध होता है कि यह अवधारणा मात्र रहस्यात्मक नहीं; अपितु इसके ठोस तार्किक व वैज्ञानिक आधार भी हैं। चक्र को मात्र ग्रन्थि नहीं माना जा सकता; अपितु ग्रन्थियों के साथ कुछ शरीर तन्त्रों के क्रिया नियंत्रण केन्द्र अथवा नाड़ी समूहों के रूप में इनको चक्र की संज्ञा देना ही उचित है।

चक्रों की संख्या

शिव संहिता में स्वयं भगवान शिव, सिद्धसिद्धान्तपद्धति में महायोगी गोरक्षनाथ आदि ने चक्रों को विवेचित किया है। इनकी संख्या को लेकर विद्वानों में मतभेद रहा है। यद्यपि चक्रों की संख्या अधिकांश विद्वानों के अनुसार सात मानी गयी है; तथापि यहाँ यह जान लेना आवश्यक है कि शिवसंहिता में सात व सिद्धसिद्धान्तपद्धति में नौ चक्रों का वर्णन मिलता है। पौराणिक साहित्य में कहीं-कहीं इनकी संख्या छः भी बतायी गयी है। शिवसंहिता में सात चक्र (मूलाधार, मणिपूर, स्वाधिष्ठान, विशुद्ध, अनाहत, आज्ञा व सहस्त्रार) तथा सिद्धसिद्धान्तपद्धति में इन्हीं में दो और चक्रों (तालु व आकाश) को जोड़कर नौ चक्रों की अवधारणा है। 7 की संख्या अधिकांश ग्रन्थों में है; इसलिए हम 7 चक्रों का संक्षिप्त विवेचन करेंगे।

योग निर्देशित मुख्य सात चक्रों का सामान्य परिचय एवं इनकी शरीर में स्थिति

सहस्रार आज्ञा चक्र विशुद्धि अनाहत मणिपुर स्वाधिष्ठान मूलाधार

मूलाधार चक्र-

यह चक्र पुरुष के शरीर में मूलाधार पिण्ड में तथा स्त्री शरीर में गर्भाशय ग्रीवा में स्थित हैं। मूलाधार शब्द दो पदों से निर्मित है- मूल एवं आधार अर्थात् मूल का आधार। मूलाधार चक्र का सम्बन्ध नाक ज्ञानेन्द्रिय एवं गुदा कर्मेन्द्रिय से माना जाता है। इसका रंग गहरा लाल एवं प्रतीक चार दल वाला कमल है। इन दलों पर क्रमशः वं, शं, षं तथा सं बीजाक्षर अंकित हैं। इस चक्र के केन्द्र में पृथ्वी तत्त्व का यन्त्र पीला वर्ग है और इसका बीजमन्त्र लं है। वर्ग के केन्द्र में एक लाल त्रिभुज के भीतर धूम्र वर्ण का स्वयंभू लिंग है; जो सू़क्ष्म शक्ति का प्रतीक है। लाल रंग का एक सर्प इस लिंग के चारों ओर साढ़े तीन फेरे लगाकर लिपटा हुआ है, जो सुषुप्त कुण्डलिनी का प्रतीक माना जाता है। लाल त्रिभुज सात सूँड वाले एक हाथी पर टिका हुआ है। हाथी पृथ्वी तत्त्व की स्थिरता एवं एकात्मकता का प्रतीक है। सर्पिणी के रूप में कुण्डलिनी स्वयंभूलिंग के चारों ओर प्रसुप्तावस्था में लिपटी है।

यहाँ पर सबकुछ प्रतीकात्मक है। हाथी को स्थिरता एवं भारीपन का प्रतीक माना जाता है। मूलाधार शरीर को आधार एवं स्थित रहने की क्षमता प्रदान करता है; इसलिए हाथी प्रतीक रखा गया होगा। जो बीजाक्षर हैं; वे विभिन्न सूक्ष्म नाड़ियों के प्रतीक हो सकते हैं। कुण्डलिनी मेरुरज्जु से ऊपर की ओर जाने वाली सूक्ष्म तन्त्रिकाओं के समूह का प्रतीक हो; ऐसा भी सम्भव है। उल्लेखनीय है कि शरीर क्रिया विज्ञान ऐसा मानता है कि मेरुरज्जु के कॉक्सीजियन क्षेत्र के आस-पास जननांगांे का क्षेत्र भी है। यह चक्र कई गुच्छकों से युक्त सेक्रल प्लेक्सेज से सम्बन्धित माना जाता है। मेरुरज्जु के इस भाग से गुजरने वाली बहुत सी तन्त्रिकाओं को पूरे शारीरिक नियन्त्रण में प्रमुख माना जाता है। इसलिए योग की यह अवधारणा विज्ञान के निकट है। मूलाधार चक्र के पश्चात् स्वाधिष्ठान नामक द्वितीय चक्र शरीर में अवस्थित माना जाता है; जिसका विवेचन निम्नांकित है।

स्वाधिष्ठान चक्र-

मूलाधार चक्र से लगभग दो अंगुल ऊपर मेरूरज्जु जननेन्द्रिय के ठीक पीछे स्वाधिष्ठान चक्र स्थित है। इस चक्र को सिंदूरी रंग के षट्दलीय कमल पुष्प के रूप में चित्रित किया जाता है। इन षट्दलों पर क्रमशः बं, भं, मं, यं, रं तथा लं बीजाक्षर अंकित होते हैं। इस चक्र के मध्य में जल तत्त्व का यंत्र, अर्धचन्द्र तथा बीजमंत्र वं अंकित रहता हैं, इसका वाहन मगर है; जो कि कर्मों की अन्तर्भौतिक गति का प्रतीक है। यह चक्र व्यक्ति की इच्छाओं को प्रेरित करता है। इसका सम्बन्ध जीभ ज्ञानेन्द्रिय तथा जननेन्द्रिय से है। सम्भोग की इच्छा इसी चक्र से नियन्त्रित होती है। इस चक्र से अपान वायु का सम्बन्ध भी है। विज्ञान के अनुसार इस चक्र की तुलना लगभग यहीं स्थित प्लेक्सेज सुषुम्ना के दोनों ओर स्थित सिम्पैथेटिक गैंगलियान व सुषुम्ना के नाड़ी गुच्छकों से की जाती है। स्वाधिष्ठान चक्र के पश्चात् मणिपुर नामक तृतीय चक्र शरीर में अवस्थित माना जाता है; जिसे निम्न विवेचन द्वारा समझा जा सकता है।

मणिपुर चक्र

मणिपुर चक्र नाभि के ठीक पीछे मेरूरज्जु में स्थित है। मणिपुर चक्र को अग्नि तत्त्व का केन्द्र माना जाता है, यह दस दलों से युक्त पीले कमल के रूप में चित्रित किया जाता है। इन दलों पर दं, धं, नं, टं, ठं, डं, ढं, णं, पंं एवं फं बीजाक्षर अंकित रहते हैं। कमल के मध्य में गहरे लाल रंग का त्रिभुज विद्यमान होता है। इस चक्र का बीजमंत्र रं है। इस चक्र का वाहन भेड़ है, जो क्रियाशीलता एवं निश्चयात्मकता का प्रतीक है। यह आंख ज्ञानेन्द्रिय एवं पैर कर्मेन्द्रिय से सम्बन्ध रखता है। यह भूख, प्यास, नींद, साहस व प्राणशक्ति आदि से भी सम्बन्धित है। विज्ञान के अनुसार इसकी तुलना मेरुदण्ड के लम्बर वर्टिब्रा में स्थित वेगस नाड़ी तथा अनुकम्पी गुच्छकों से मिलकर बनने वाले प्लेक्सेज से की जाती है। यह चक्र अग्न्याशय से सम्बन्धित भी माना जाता है। मणिपुर चक्र के पश्चात् अनाहत नामक चक्र शरीर में अवस्थित माना जाता है। इस चक्र को निम्न विवेचन द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है।

अनाहत चक्र

वक्ष के केन्द्र के पीछे मेरुरज्जु में अनाहत चक्र को स्थित माना जाता है। इस चक्र का सम्बन्ध हृद्य से है जो आजीवन लयबद्ध होकर कार्य करता रहता है। इस चक्र को बारह दल कमल वाले नीले कमल के रूप में दर्शाया जाता है। बारह दलों पर कं, खं, गं, घं, ङं, चं, छं, जं, झं, ञं, तं तथा थं बीजाक्षर अंकित रहते हैं। कमल के केन्द्र में दो अन्र्तग्रंथित त्रिभुजों से निर्मित षट्कोणीय आकृति है। यह वायु तत्त्व का यन्त्र है और इसका बीजमंत्र यं तथा वाहन काला हिरण है, जो जागृति, स्फूर्ति तथा करुणा का प्रतीक है। यह त्वचा ज्ञानेन्द्रिय तथा हाथ कर्मेन्द्रिय से सम्बन्ध रखता है। ऐसा माना जाता है कि कलात्मक तरंगों, भावनाओं तथा कोमल संवेदनाओं से सम्बन्ध रखता है। शरीर विज्ञान के अनुसार कार्डियक प्लेक्सेज यहीं पर है। अनुकम्पी गुच्छक श्रृंखला, सुषुम्ना एवं वेगस नाड़ी तन्तु मिलकर एक गुच्छक बनाते हैं जो सम्पूर्ण हृद्यक्षेत्र को ऊर्जा प्रदान करते हैं। थायमस ग्रन्थि भी यही से सम्बद्ध है। इस चक्र के पश्चात् शरीर में विशुद्धि चक्र को अवस्थित माना जाता है; जिसे निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है।

विशुद्धि चक्र

यह चक्र कण्ठ कूप के पीछे ग्रीवा के पिछले भाग में स्थित है। यह चक्र शुद्धि का केन्द्र माना जाता है। धुएं के रंग जैसे इस चक्र में सोलह दल वाला बैंगनी कमल, कमल के केन्द्र में सफेद वृत्त है, जो आकाश तत्त्व का यन्त्र है। इसका सम्बन्ध कान ज्ञानेन्द्रिय तथा वाक् या मुख कर्मेन्द्रिय से माना गया है। इस चक्र में सदाशिव को विराजमान बताया गया है। जो इस चक्र का ध्यान करता है; वह महाज्ञानी, कवि, शान्त, शोकहीन तथ दीर्घजीवी होता है। इस चक्र का बीजमंत्र हं तथा वाहन सफेद हाथी है। सोलह दलों पर क्रमशः अं, आं, इं, ईं, उं, ऊं, ऋं, लृं, एं, ऐं, ओं, औं, अं, मं (अनुस्वार) और अःं वर्ण अंकित रहते हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से यह थॉयरॉयड ग्रन्थि, फेरेन्जियल व लेरेन्जियल प्लेक्सेज से सम्बन्धित माना जाता है। इसके पश्चात् आज्ञा चक्र को स्थित माना गया है।

आज्ञा चक्र

मध्य मस्तिष्क में, भू्रमध्य के पीछे मेरुदण्ड के शीर्ष पर आज्ञा चक्र अवस्थित है। इस चक्र को तीसरे नेत्र, ज्ञान चक्षु, त्रिवेणी, गुरुचक्र तथा शिव के नेत्र नाम से भी जाना जाता है। आज्ञा चक्र को चाँदी के रंग के दो पंखुड़ियों वाले कमल के रूप में दर्शाया जाता है; जिन पर हं तथा क्षं बीजाक्षर अंकित रहते हैं। ये दो पंखुड़ियाँ सूर्य (पिंगला) तथा चन्द्र (इड़ा) नाड़ियों का प्रतीक हैं। सूर्य (पिंगला) तथा चन्द्र (इड़ा) नामक दो प्राण-प्रवाह क्रमशः दाहिने एवं बाएँ नासारन्ध्र के द्वारा शरीर में प्रवाहित होते हैं। ये दोनों नाड़ियाँ अलग-अलग होती हैं; किन्तु इस चक्र में ये दोनों तथा सुषुम्ना नामक नाड़ी मिलकर एक हो जाती हैं। इसलिए यहाँ पर ध्यान करने से महान फल मिलते हैं। यह ज्ञानात्मक शक्तियों का केन्द्र माना गया है। यह ऊँ या प्रणव का स्थान भी माना गया है। इस चक्र का तत्त्व मनस् है तथा बीजमन्त्र ऊँ है। विज्ञान के अनुसार इस चक्र का सम्बन्ध पिनीयल तथा पिट्यूटरी ग्लैंड से है।

उपर्युक्त छह चक्रों के अतिरिक्त शरीर में सर्वोच्च चेतना के केन्द्र के रूप में सातवाँ चक्र शीर्ष भाग में बीचों-बीच अवस्थित है; जिसे सहस्त्रार चक्र कहा जाता है। सहस्त्रार चक्र को निम्न विवरण द्वारा समझा जा सकता है।

सहस्रार चक्र

हजार दलों से युक्त सहस्त्रार चक्र विशुद्ध उच्च चेतना का केन्द्रबिन्दु है; इसे शून्य चक्र भी कहा जाता है। माना जाता है कि यहाँ पर द्रव्यमानरूपी शिव एवं ऊर्जारूपी शक्ति का मिलन होता है। सम्भवतः यह हाइपोथैलेमस से तुल्य हो; क्योंकि यहीं पर चेतना रूपी मन तथा अचेतन शरीर का मिलन माना जाता है। सहस्रदल कमल के ठीक केन्द्र में दीप्त ज्योतिर्लिंग है, जो विशुद्ध चेतना का प्रतीक माना जाता है। यहाँ पर अ से लेकर क्ष तक बीजाक्षर अंकित माने जाते हैं। सम्भवतः ये उन जटित तन्त्रिकीय केन्द्रों के प्रतीक होंगे जो सम्पूर्ण व्यक्तित्व को नियन्त्रित तथा नियमित करते हैं। यहाँ पर ध्यान करने से आत्मज्ञान की यही अवस्था है। इस अवस्था में पहुंचने के उपरान्त परमज्ञान होने पर जानने को कुछ भी शेष नहीं रहता। सहस्त्रार की शक्तियों का जागरण मस्तिष्क के समस्त नियन्त्रण केन्द्रों की शक्ति का जागरण कहा जा सकता है। इसे कुण्डलिनी जागरण भी कहा जाता है। इसे समझने हेतु कुण्डलिनी को स्पष्ट करेंगे।

कुण्डलिनी शक्ति- योगसाधना करते हुए भीतर ध्यान करने हेतु कुण्डलिनी शक्ति का ध्यान किया जाता है। नाभि के नीचे तथा मूलाधार के ऊपर मेरुरज्जु के निचले छोर पर कुण्डलिनी को विद्युत धारा के समान स्थित माना जाता है। यह श्वेत रंग की होती है; ब्रह्मनाड़ी में कमलतन्तु के समान उपस्थित रहती है। जहाँ पर सहस्त्रार चक्र स्थित होता है; वहाँ पर ब्रह्मरन्ध्र तक उपस्थित रहती है; किन्तु ऐसा कुण्डलिनी जागरण के बाद होता है। सामान्य स्थिति में साढे़ तीन फेरे लगाकर मेरु के अन्तिम छोर में सुप्तावस्था में रहती है; जागृत होने पर पूरे मेरुरज्जु से ऊपर की ओर आवेशित होते हुए सहस्त्रार में पहुँचती है। हठयोग में इसे शक्ति कहा गया है और ऐसा माना गया है कि विभिन्न योगाभ्यासों के फलस्वरूप यह सहस्त्रार में विराजमान शिव या कल्याण से मिल जाती है।

हठयोग द्वारा प्रस्तुत व्यक्तित्व की अवधारणा अत्यंत रहस्यात्मक है। इन रहस्यों को समझने हेतु हमें चेतना को अभिव्यक्त करने वाले स्थूल शरीर को समझना होगा। इसका विवेचन आधुनिक शरीर रचना एवं शरीर क्रिया विज्ञान में अधिक उपयुक्त ढंग से मिलता है। योगदर्शन में व्यक्तित्व के समस्त पक्षों का गूढ़ विवेचन किया गया है; किन्तु उसको समझ पाना तब तक सम्भव नहीं है; जब तक हम स्थूल शरीर को नहीं समझेंगे। इसलिए अब हम स्थूल शरीर के विभिन्न पक्षों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करेंगें।

शरीर रचना एवं शरीर क्रिया विज्ञान के अनुसार मानव शरीर

शरीर व्यक्ति द्वारा ग्रहण किये गये भोजन एवं पानी के रसायनों के नियत आनुपतिक मिश्रण से तैयार होता है। यही नियत मिश्रण शरीर की कोशिकाओं, ऊतकों, अंगों एवं तन्त्रों का क्रमिक विकास एवं निर्माण करता है। इसे निम्न चार्ट के माध्यम से समझा जा सकता है-

मानव व्यक्तित्व का सबसे बाहरी एवं स्थूल कोश : अन्नमय कोश शरीर-तन्त्र

अंग

ऊतक

कोशिकाएँ रसायनों का नियत आनुपातिक मिश्रण ( गृहीत भोजन एवं पानी आदि से प्राप्त)

मानव शरीर पदार्थ एवं ऊर्जा का संयुक्त रूप है। पहले हम पदार्थ की बात करते है। पदार्थ विभिन्न रसायनों से निर्मित होते है। मानव शरीर को समझने हेतु पदार्थ को संक्षिप्त विवेचन इस प्रकार है- पदार्थ- मानव शरीर कोई भी वस्तु जो स्थान घेरती है; जिसमें भार होता है; उसे पदार्थ कहते हैं। यह तीन प्रकार के रूपों में पाया जाता है-

ठोस-जिसका आकार एवं आकृति निश्चित होते हैं। इसमें अणुओं के बीच का खाली स्थान अत्यंत कम होता है। अणुओं के बीच में एक दूसरे को बांधे रखने वाला बल अधिक होता है। मानवशरीर एक ठोस रचना है। हड्डियाँ तथा मांस आदि सभी ठोस हैं।

द्रव- द्रव का न कोई आकार होता है; ना ही आकृति; जिस बर्तन में रखे जाते हैं; उसी की आकृति ग्रहण कर लेते हैं। इसके अणुओं के बीच में खाली स्थान ठोस से अधिक होता है तथा आपस में बंधे रहने वाला बल कम। इसलिए ये ऊँचे तल से नीचे तल की ओर बहते हैं। पानी द्रव है; जो मानव शरीर के कुल भार का 70 प्रतिशत भार होता है। मानव शरीर में रक्त, पाचक रस, अन्तःस्रावी रस एवं मूत्र आदि द्रव का उदाहरण हैं।

गैस- गैस का आकार आकृति एवं आयतन निश्चित नहीं होता। इनके अणुओं के बीच खाली स्थान बहुत अधिक तथा आपस में बाँधे रखने वाला बल बहुत कम होता है। यह अधिक दाब से कम दाब की ओर गति करती है। मानव शरीर में ऑक्सीजन, नाइट्रोजन तथा कार्बन डाई ऑक्साइड आदि गैसें पायी जाती है।

पदार्थ की संरचना

परमाणु एवं अणु- पदार्थ छोटे-छोटे कणों से मिलकर बना है। ये कण परमाणु कहलाते हैं। दो या दो से अधिक परमाणुओं से मिलकर अणु बनते हैं। किसी पदार्थ की वह सूक्ष्मतम इकाई है; जो स्वतन्त्र, स्थिर तथा रासायनिक क्रियाओं में भाग न ले। असंख्य अणुओं के मिलने से दिखायी देने वाला पदार्थ बनता है। जिस पदार्थ का जो अणु होता है; उसमें उस पदार्थ के गुण विद्यमान होते हैं।

तत्त्व- तत्त्व वह है; जिसका प्रत्येक परमाणु समान संरचना एव समान गुणधर्म वाला होता है। तत्त्व के गुणधर्म उसके परमाणुओं के समान ही होते हैं। इसे साधारण रासायनिक अभिक्रियाओं द्वारा तोड़ा नहीं जा सकता। अभी तक कुल 116 तत्त्व खोजे जा चुके हैं; इनकी संख्या अधिक भी हो सकती है। इनमें से मानव शरीर में 25 तत्त्वों को अभी तक पहचाना जा चुका है।

शरीर में समाहित मुख्य रसायनों के नियत आनुपातिक मिश्रण को साररूप में तालिका के माध्यम से निम्न प्रकार समझा जा सकता है।

ग्रहण किये गये भोजन के रसायन अन्नमय कोश में उपस्थित रसायनों का कुल प्रतिशत ऑक्सीजन 65ः कार्बन 18ः हाइड्रोजन 10ः नाइट्रोजन 3ः कैल्शियम 2ः फॉस्फोरस 1ः शेष अन्य रसायन (आयरन, कॉपर, कोबाल्ट और निकिल इत्यादि) 1ः

यौगिक- अलग-अलग प्रकार के गुणधर्मांे से युक्त परमाणु मिलकर के यौगिक बनाते हैं। इन्हें साधारण रासायनिक क्रियाओं द्वारा आसानी से तोड़ा जा सकता है। प्रोटीन, कार्बोहाड्रेट, फैट, जल, नमक, क्षार एवं अम्ल आदि शरीर में पाये जाने वाले यौगिक ही हैं। इन यौगिकों के टूटने से ही विभिन्न प्रकार की ऊर्जा मुक्त होती है; जो शरीर की समस्त क्रियाओं को संचालित करती है। ऊर्जा को इस प्रकार समझा जा सकता है।

ऊर्जा- पदार्थ को गतिशील बनाये रखने वाली शक्ति को ऊर्जा कहा जाता है। इसे पदार्थ पर इसके प्रभावों के रूप में ही मापा जा सकता है। इसका निर्माण नहीं किया जा सकता; परन्तु एक प्रकार की ऊर्जा का दूसरे प्रकार की ऊर्जा में रूपान्तरण हो सकता है। इसे न उत्पन्न किया जा सकता है; ना ही समाप्त किया जा सकता है; इसके मात्र रूपान्तरण हो जाते है।

ऊर्जा के प्रकार- ऊर्जा दो प्रकार की होती है; पहली गतिज ऊर्जा- जो किसी वस्तु को चलाती है तथा दूसरी स्थितिज ऊर्जा- जो किसी वस्तु को स्थिर बनाये रखती है।

ऊर्जा के रूप- पदार्थ की विभिन्न अवस्थाओं में ऊर्जा के निम्नांकित रूप पाये जाते हैं-

रासायनिक ऊर्जा- ऊर्जा का यह रूप अणुओं एवं परमाणुओं के मध्य रासायनिक बन्ध के रूप में पाया जाता है। पदार्थ बनते समय ऊर्जा एकत्र होती है; तथा टूटते समय ऊर्जा मुक्त होती है। जैसे जब हम कार्य करते है तो शरीर में एकत्र ऊर्जा रासायनिक ऊर्जा मुक्त होती है; जिससे हम कार्य कर पाते हैं।

विद्युत ऊर्जा- दो विषम आवेशों अर्थात् ऋणात्मक एवं धनात्मक आवेशों के मध्य बल के रूप में पायी जाने वाली ऊर्जा विद्युत ऊर्जा कहलाती है। मानव शरीर में इन्हीं विपरीत आवेशों से आवेशित परमाणु कोशिका कला के दोनों ओर एकत्रित होकर विद्युत ऊर्जा उत्पन्न होती है। तन्त्रिका तन्त्र में भी यही उत्पन्न होती है; जिससे संवेदनाओं तथा ज्ञान का आदान-प्रदान होता है।

यान्त्रिक ऊर्जा- यन्त्रात्मक गतिविधियों में प्रयोग होने वाली ऊर्जा। शरीर भी एक यन्त्र के समान कार्य करता है। हम जब वाह्य वस्तुओं को गतिमान या उनके स्थितिज ऊर्जा को परिवर्तित करने का प्रयास करते हैं; तो यान्त्रिक ऊर्जा का ही रूप शरीर द्वारा प्रयोग होता है।

विकिरण ऊर्जा- अधिक परमाणु भार वाले अस्थिर पदार्थों से यह ऊर्जा विद्युत चुम्बकीय तरंगों के रूप में प्राप्त होती है। सूर्य से प्राप्त होने वाली ऊर्जा भी विकिरण ऊर्जा ही है। जिससे सम्पूर्ण जीवधारियांे का अस्तित्व है। साथ ही सूर्य की इस ऊर्जा से उत्पन्न प्रकाश का हमारे दृष्टिपटल पर उत्तेजक प्रभाव होता है और परावर्तित प्रकाश के कारण हमें वस्तु दिखायी देने लगती है।

इस प्रकार विभिन्न यौगिकों के टूटने से ऊर्जा मुक्त होती है। विभिन्न सूक्ष्म तत्त्वों के परमाणु यौगिकों के रूप मंे संगठित होकर शरीर का निर्माण एवं उसकी क्रियाओं का संचालन करते हैं। शरीर की सबसे छोटी इकाई कोशिका है। कोशिकाओं से मिलकर ऊतक, ऊतकों से मिलकर अंग, अंगों से मिलकर जटिल शरीर तन्त्र या संस्थान तथा इन शरीर तन्त्रों से सम्पूर्ण स्थूल शरीर का निर्माण होता है। ये सभी अन्नमय कोश में ही सम्मिलित माने जा सकते हैं।

यों तो वैज्ञानिक दृष्टि से यह अत्यंत विस्तृत विषय है; और इस पर अनेकानेक ग्रन्थ लिखे जा सकते हैं; किन्तु विषय अलग होने से हमारी कुछ सीमाएँ हैं। यहाँ पर हम शरीर तन्त्रों का मात्र उतना ही विवेचन करेंगे; जितना योगाभ्यास से मिलने वाले लाभों को समझने हेतु अपेक्षित है। यों तो योगाभ्यास के लाभ सभी शरीर तन्त्रांे को प्राप्त होते हैं; किन्तु तन्त्रिका, पाचन, श्वसन, रक्त परिसंचरण, उत्सर्जन, प्रजनन एवं अन्तःस्रावी तन्त्र पर पड़ने वाले प्रभावों द्वारा इन लाभों को अधिक स्पष्टता के साथ समझा जा सकता है। इसलिए इन शरीर तन्त्रों को हम थोड़ा अधिक विवेचित करेंगे। कोशिका शरीर की प्रारम्भिक इकाई है; इसलिए शरीर को समझने हेतु सर्वप्रथम हम कोशिका से प्रारम्भ करेंगे।

कोशिका- यह शरीर की सबसे छोटी इकाई है। मानव शरीर में करोड़ांे कोशिकाएँ हैं। कोशिका इतनी छोटी होती है कि इसे मात्र सूक्ष्मदर्शी द्वारा ही देखा जा सकता है। जीवन की मूलभूत जैविक क्रियाएँ कोशिका के ही भीतर होती हैं। जैसे- श्वसन, पाचन, उत्सर्जन, प्रजनन तथा चयापचय आदि। ये अलग-अलग आकार एवं प्रकार की होती हैं; लेकिन आधारभूत अवयव सभी कोशिकाओं में होते हैं। कोशिका कला, कोशिकाद्रव्य, केन्द्रक, माइटोकॉण्ड्रिया, गॉल्जीबॉडी तथा लाइसोसोम आदि अंग कोशिका में पाये जाते हैं। केन्द्रक सभी कोशिकीय गतिविधियों को निर्देशित एवं नियन्त्रित करता है। माइटोकॉण्ड्रिया में ऊर्जा का निर्माण होता है। इस प्रकार अन्यान्य जैविक गतिविधियाँ कोशिकीय स्तर पर चलती रहती हैं ।

कोशिका की बनावट : चित्र सं0 1

ऊतक- समान गुणों वाली, एक ही आकार तथा एक ही कार्य को सम्पन्न करने वाली कोशिकाओं के समूह को ऊतक कहते हैं। ये चार प्रकार के माने गये हैं-

उपकला ऊतक- जो त्वचा या बाहरी आवरण को बनाते हैं।

संयोजी ऊतक- जो अंगों को आपस में जोड़ते हैं।

पेशी ऊतक- जो पेशियों का निर्माण करते हैं।

तन्त्रिका ऊतक- जो शरीर एवं मस्तिष्क के बीच सूचनाओं, ज्ञान एवं प्रतिक्रियाओं का आदान-प्रदान करते हैं।

अंग- ऊतक मिलकर अंगों का निर्माण करते हैं। एक ही अंग में भिन्न-भिन्न प्रकार के ऊतक हो सकते हैं। ये अंग कार्यों का सम्पादन करते हैं।

शरीर तन्त्र- विभिन्न अंग मिलकर शरीर तन्त्रों का निर्माण करते हैं। ये तन्त्र विशिष्ट होते हैं। ये तन्त्र मानव को स्वस्थ, प्रगतिशील एवं कार्य-कुशल बनाये रखने के लिए सहयोगपूर्वक कार्य करते हैं। कोई एक तन्त्र भी अपना कार्य सही से न करे तो सम्पूर्ण व्यक्तित्व पर नकारात्मक प्रभाव होता है और व्यक्ति अस्वस्थ हो जाता है।

विभिन्न शरीर तन्त्र: संक्षिप्त परिचय एवं कार्यविधि

शरीर में विभिन्न तन्त्र हैं-त्वचीय या आच्छादीय तन्त्र, अस्थि या कंकाल तन्त्र, पेषीय तन्त्र, तन्त्रिका तन्त्र, अंतःस्रावी तन्त्र, रक्त परिसंचरण तन्त्र, लसीका तन्त्र, श्वसन तन्त्र, पाचन तन्त्र, उत्सर्जन तन्त्र तथा प्रजनन तन्त्र। अब हम इनकों एवं इनके कार्यों को संक्षेप में स्पष्ट करेंगे। सबसे बाहर जो दिखता है; वह आच्छादीय या त्वचीय तन्त्र है।

त्वचीय या आच्छादीय तन्त्र; (Integumentary System)

यह संस्थान सम्पूर्ण शरीर को ढकने एवं उसकी रक्षा का कार्य करता है। शरीर के तापमान का नियमन तथा उद्दीपनों को ग्रहण करना इसके अन्य कार्य हैं। त्वचा, बाल, नाखून के अतिरिक्त इसमें स्वेद या पसीने वाली तथा तैल ग्रन्थियाँ भी इसी तन्त्र का भाग हैं। पसीने वाली ग्रन्थियों के द्वारा शरीर में उपस्थित विकार या गन्दे पदार्थ बाहर निकलते हैं। तैल ग्रन्थियाँ त्वचा को चिकना बनाकर बाह्य सर्दी-गर्मी आदि से उसकी रक्षा करती हैं। त्वचा के नीचे एवं शरीर के भीतरी अंगों का निर्माण विभिन्न प्रकार की पेशियों से बना पेशीय तन्त्र करता है। यह संस्थान सम्पूर्ण शरीर को ढकने एवं उसकी रक्षा का कार्य करता है। शरीर के तापमान का नियमन तथा उद्दीपनों को ग्रहण करना इसके अन्य कार्य हैं। त्वचा, बाल, नाखून के अतिरिक्त इसमें स्वेद या पसीने वाली तथा तैल ग्रन्थियाँ भी इसी तन्त्र का भाग हैं। पसीने वाली ग्रन्थियों के द्वारा शरीर में उपस्थित विकार या गन्दे पदार्थ बाहर निकलते हैं। तैल ग्रन्थियाँ त्वचा को चिकना बनाकर बाह्य सर्दी-गर्मी आदि से उसकी रक्षा करती हैं। त्वचा के नीचे एवं शरीर के भीतरी अंगों का निर्माण विभिन्न प्रकार की पेशियों से बना पेशीय तन्त्र करता है।

त्वचीय तन्त्र सम्बन्धी समस्याएँ एवं रोग; tegumentary Problems and Disease)-अनुचित आहार-विहार, बाहरी प्रदूषण, अन्तःस्रावी तन्त्र की अनियमितता तथा आनुवंशिक विकृतियों आदि के कारण त्वचा के एलर्जी, रुखापन, कुष्ठ तथा सोरायसिस आदि जैसे रोग उत्पन्न होते हैं।

पेशीय तन्त्र; ( Muscular System )

अस्थि तन्त्र को ढकने वाला विभिन्न पेशियों से युक्त तन्त्र पेशी तन्त्र कहलाता है। शरीर में गति उत्पन्न करना तथा गर्मी बनाये रखना इस तन्त्र के विशेष कार्य है। पेशीय एवं कंकालीय तन्त्र को मिलाकर कभी-कभी गति तन्त्र भी कहा जाता है। कंकालीय, चिकनी तथा हृदय पेशियाँ इस तन्त्र का भाग हैं। इस तन्त्र में प्रावरणियों एवं कण्डराओं का भी समावेष होता है; जो पेशियों को हड्डियों से जोड़ती हैं। पेशियों के द्वारा निर्मित मांसल रचनाओं को एक विशेष आकार देने का कार्य अस्थि या कंकाल तन्त्र करता है।

पेशीय तन्त्र सम्बन्धी समस्याएँ एवं रोग; ( Muscular Problems and Disease) -ग़लत स्थितियों में उठने-बैठने, सोने, दौड़ने-भागने से यदि पेशियों में अनुचित खिंचाव, तनाव या सिकुड़न हो जाए तो पीड़ा एवं गम्भीर समस्याएँ भी उत्पन्न हो जाती हैं।

अस्थि या कंकाल तन्त्र:(Skeletol System)

शरीर को एक विशेष आकार, मजबूती प्रदान करने के साथ ही इसमें उपस्थित जोड़ शरीर को विभिन्न स्थानांे से मोड़कर गति प्रदान करते हैं। कंकालीय पेशियों तथा तन्त्रिका तन्त्र के सहयोग से जोड़ों में गति होती है। इसके अतिरिक्त हड्डियों के भीतर उपस्थित मज्जा रक्त का निर्माण भी करता है। अस्थियों या हड्डियों तथा उपास्थियों से मिलकर यह तन्त्र बनता है।

अस्थि तन्त्र सम्बन्धी समस्याएँ एवं रोग: ( Skeletol Problems and Disease )-अनुचित आहार-विहार, कुपोषण, कैल्शियम की वांछित मात्रा न मिल पाना तथा अन्तःस्रावी तन्त्र की अनियमितता आदि के कारण हड्डियों का यथोचित विकास न हो पाना तथा अस्थिक्षय जैसे रोग उत्पन्न हो जाते हैं। वचा के एलर्जी, रुखापन, कुष्ठ तथा सोरायसिस आदि जैसे रोग उत्पन्न होते हैं।

शरीर के सभी तन्त्रों को पोषण एवं वृद्धि प्रदान करने हेतु जिस पोषक पदार्थ की आवश्यकता होती है; वह पाचन तन्त्र उपलब्ध करवाता है; जिसके अंग एवं कार्य विधि निम्नांकित है।

पाचन तन्त्र:( Digestive System )

बाहर से जो भोजन ग्रहण किया जाता है; वह बिना पचे शरीर के लिए अनुपयोगी है। पाचन तन्त्र के विभिन्न अंग भोज्य पदार्थों को सूक्ष्म कणों के रूप में परिवर्तित करके; उनमें विभिन्न पाचक रस तथा एन्जाइम्स मिलाते हैं। उसके पश्चात् ही भोजन शरीर के लिए ग्रहण करने योग्य एवं उपयोगी बनता है। पचा हुआ भोजन ही शरीर को पोषण एवं ऊर्जा प्रदान करता है। पाचन प्रक्रिया अत्यंत जटिल एवं लम्बी होती है। भोजन जब ग्रहण किया जाता है तो वह अनेक तत्त्वों से युक्त होता है; जैसे प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट एवं विटामिन आदि। ये पदार्थ जब तक कोशिकाओं द्वारा ग्रहण करने योग्य न बनें तब तक इनका कोई उपयोग नहीं है। आंतों में निरन्तर होने वाली गति तथा भोजन में मिश्रित होने वाले विभिन्न पाचक रस तथा एन्जाइम्स सभी तत्त्वों को तरल रूप में करके पचाकर इस लायक बनाते हैं कि वे कोशिकाओं द्वारा ग्रहण करने योग्य बन सकें। पाचक नली: (Digestive Tract) या पोषण नाल:(Alimentary Canal) में एन्जाइम्स के सहायता से पाचन क्रिया सम्पन्न होती है। यह पाचन नली मुंह के नीचे से लेकर गुदाद्वार तक फैली होती है और लगभग 9 मीटर या 30 फीट लम्बी होती है।

पाचन तन्त्र के प्रमुख अंग चित्र सं0 2

पाचन तन्त्र के अंग एवं उनकी क्रियाविधि

मुख: (Mouth)-दाँत, होंठ, जीभ एवं गालों से युक्त मुंह से ही पाचन क्रिया प्रारम्भ हो जाती है। दांत भोजन को चबाने, जीभ में उपस्थित ग्रन्थियाँ इसमें लार मिलाने और स्वाद लेने का कार्य करता है। तीन जोड़ी लार ग्रन्थियों से लार स्रावित होता है एवं मुंह में दांतों के द्वारा भोजन चबाते हुए उसमें मिलाया जाता है। फिर यह ग्रसनी में जाता है।

ग्रसनी:(Pharynx) -मुख गुहा के पीछे कीप जैसी संरचना ग्रसनी कहलाती है। यहाँ से ग्रासनली तथा श्वास प्रणाल; ज्तंबीमंद्ध प्रारम्भ होता है। ग्रसनी लगभग 5 इंच लम्बी होती है। यह श्वास लेने में वायु मार्ग तथा भोजन करने में भोजन निगलने दोनों कार्य करती है।

ग्रासनली:(Oesophagus) -यह लगभग 10 इंच लम्बी होती है। ग्रसनी से आमाशय तक होती है। भोजन यहीं से होते हुए आमाशय तक जाता है।

आमाशय :(Stomach)-यह आहार नली का सबसे चौड़ा अंग है। इसकी दीवारें सीरमी, पेशीय, अवश्लेष्मिक तथा श्लेष्मिक कला की बनी होती हैं। इसमें तीन प्रकार की ग्रन्थियाँ होती हैं-कॉर्डियक या जठरागमनीय, फंडिक या बुध्न तथा जठरनिर्गमीय या पाइलोरिक ग्रन्थियाँ। इन ग्रन्थियों के द्वारा क्रमषः क्षारीय रस, अम्लीय रस एवं श्लेष्मा स्रावित किया जाता है। इन विभिन्न रसों के मिलने से एवं आमाशय की पेशियों की गति से भोजन के विभिन्न पदार्थों का पाचन प्रारम्भ हो जाता है; किन्तु अम्ल, क्षार तथा श्लेष्मा यथोचित अनुपात में ही होने चाहिए; अन्यथा रोग उत्पन्न होते हैं। विभिन्न रसों के मिलने तथा आमाशयिक पेशियों की गति के कारण भोजन छोटे कणों में टूट जाता है। यहीं पर प्रोटीन का पाचन प्रारम्भ हो जाता है तथा जीवाणु भी नष्ट होते हैं। पचने की इस प्रारम्भिक अवस्था में भोजन काइम कहलाता है। यह पायलोरिक वॉल्व (जो मात्र छोटी आंत की ओर ही खुलता है) से होते हुए छोटी आंत में प्रवेष करता है।

छोटी आँत: (Small Intestine)-यह एक कुण्डलित नली है; जो लगभग 6 मीटर लम्बी होती है। इसके तीन भाग हैं-ग्रहणी;:(Duodenum), मध्यान्त्र: (Jejunum) तथा शेषान्त्र: (Ileum)। यहाँ पर काइम का पाचन एवं अवशोषण होता है। प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट , वसा तथा जल आदि का छोटी आँत की भित्तियों से होकर रक्त प्रवाह एवं लसीका तन्त्र में मिल जाना भोजन का अवषोषण कहलाता है। इन भित्तियों में विली या अंकुरनुमा संरचनाएँ होती हैं; जिनके चारों ओर रक्त वाहिकाओं का जाल फैला हुआ होता है। इस प्रकार भोजन अवशोषित होकर रक्त में मिल जाता है और सम्पूर्ण शरीर को पोषण प्रदान करने का कार्य करता है।

बड़ी आँत: (Large Intestine)-यह पाचन तन्त्र अन्तिम भाग है; जो छोटी आँत से प्रारम्भ होकर गुदा नली तक रहती है। बड़ी आँत में जल, लवण एवं कुछ विटामिन्स का अवषोषण होता है।

अग्न्याशय:(Pancreas)-यह गुलाबी, भूरी एवं मुलायम-सी 5 से 6 इंच लम्बी ग्रन्थि होती है। यह आमाशय के पीछे स्थित होती है तथा ड्यूडेनियम से प्लीहा तक फैली होती है। यह अग्न्याशयिक रस को स्रावित करती है; जिसमें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट एवं वसा को पचाने वाले क्रमषः ट्रिप्सिनोजन, एमाइलेज तथा लाइपेज नामक तीन प्रकार के एन्जाइम्स होते हैं। अतः इसके कारण ही इन प्रोटीन आदि तीनों भोज्य तत्त्वों का पाचन सम्भव हो पाता है।

यकृत: (Liver)-यह लगभग डेढ किलोग्राम का एवं उदरगुहा के दाहिने भाग में डायाफ्राम के नीचे स्थित होता है। कार्बनिक यौगिकों से एमिनो एसिड्स को अलग करना, इन्हें यूरिया में परिवर्तित करना, प्लाज्मा प्रोटीन का निर्माण, हिपेरिन के निर्माण द्वारा एमिनो एसिड्स का संष्लेषण, गैलेक्टोज एवं फ्रक्टोज को ग्लूकोज में परिवर्तित करना, वसीय अम्लों का ऑक्सीकरण, रक्त की मृत लाल कोशिकाओं को रक्त से अलग करना, प्लाज्मा मेम्ब्रेन के लिए आवश्यक संघटक का निर्माण, कार्बोहाइड्रेट्स एवं प्रोटीन को वसा में परिवर्तित करना, औषधियों एवं विषैले पदार्थों का विष हटाना, एण्टीबॉडीज-एण्टीटॉक्सीन्स का निर्माण करना, विटामिन ए का संष्लेषण तथा शरीर का तापमान बनाये रखने जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य करता है। इसके अतिरिक्त पित्त रस का स्रावण, विटामिन्स का संग्रहण एवं संचयन आदि कार्य भी करता है।

मलाशय:(Rectum)-बड़ी आंत का सबसे निचला भाग 6 इंच लम्बा कुछ फूला हुआ भाग मलाशय कहलाता है। यहाँ पर मल एकत्र रहता है।

गुदीय नली:(Anal Canal)-यह मलाषय की निरन्तरता में नीचे और पीछे की ओर चलती हुई गुदा पर खुलने वाली लगभग डेढ़ इंच लम्बी नली होती है। यह मल विसर्जन में सहयोग करता है।

गुदा या मलद्वार:(External Orifice)-मल इसके द्वारा बाहर विसर्जित होता है।

पाचन तन्त्र सम्बन्धी समस्याएँ एवं रोग :(Digestive Problems and Disease)-अनुचित आहार-विहार, शारीरिक श्रम की कमी, अत्यधिक मानसिक कार्य, तनाव तथा अन्तःस्रावी तन्त्र की अनियमितता आदि के कारण भोजन का यथोचित पाचन एवं अवषोषण नहीं हो पाता। अम्ल, क्षार या श्लेष्मा या पाचक रसों में से कोई भी कम या अधिक हो जाना इसका कारण है। इससे अनेक गम्भीर समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं; जो धीरे-धीरे रोग बन जाती हैं। कब्ज, गैस, खट्टे डकार, अपच, उल्टी और पेट में जलन आदि सभी समस्याएँ हो जाती हैं। यदि समस्याएँ लम्बे समय तक बनी रहती हैं तो पेप्टिक अल्सर आदि को जन्म देती हैं। इन्सुलिन आदि के कम स्रावण से मधुमेह या डायबटीज रोग हो जाता है।

पाचन तन्त्र से पोषक पदार्थ अवशोषित होकर रक्त में चला जाता है। फिर यह रक्त परिसंचरण तन्त्र द्वारा पूरे शरीर में भेजा जाता है। जो पदार्थ शरीर के लिए अनुपयोगी होते हैं या पच नहीं पाते हैं वे उत्सर्जी पदार्थ के रूप में बाहर निकल जाते हैं। इसके लिए शरीर में उत्सर्जन तन्त्र होता है; जिसको अतिसंक्षेप में निम्न प्रकार समझा जा सकता है।

उत्सर्जन तन्त्र:(Excretory System)

यह भी शरीर का मुख्य तन्त्र है; क्यांेकि यह शरीर में उपस्थित हानिकारक पदार्थाें को मल-मूत्र एवं पसीने आदि के रूप में बाहर निकालता है। इस तन्त्र के प्रमुख अंग दो गुर्दे या वृक्क:(Kidney दो मूत्र नलियांँ:(Ureters), एक मूत्राशय :(Urinary Bladder), एक मूत्रमार्ग: (Urethra) हैं। वृक्क छन्ने के आकार के होते हैं। ये रक्त में घुले हुए हानिकारक पदार्थों को रक्त से छानकर मूत्र के रूप में अलग कर देते हैं। यहाँ से जुड़ी हुई मूत्र नलिकाएँ इस मूत्र को मूत्राषय में भेज देती हैं। यहाँ से एक अन्य नलिका मूत्रमार्ग बनाती है; जो मूत्र को शरीर से बाहर निकाल देती है।

उपर्युक्त क्रिया के अतिरिकत व्यक्ति के शरीर में एक मलद्वार: (Anus) होता है; जिसे हम पाचन संस्थान में बता चुके है। भोजन में से पोषक पदार्थ रक्त में अवशोषित हो जाने के बाद जो हानिकारक एवं अनुपयोगी पदार्थ बचते हैं; वे ठोस एवं अर्धठोस मल पदार्थ के रूप में इस मार्ग से बाहर निकल जाते हैं। इसके अतिरिक्त त्वचा में उपस्थित असंख्य स्वेद या पसीना ग्रन्थियाँ एवं रोमछिद्र हैं; ये भी उत्सर्जन में सहयोगी हैं। ये भी रक्त में से अलग हुए पसीने को बाहर निकालकर शरीर के विकारों को दूर करती हैं।

उत्सर्जन तन्त्र सम्बन्धी समस्याएँ एवं रोग: (The Excretory Problems and Disease) -अनुचित आहार-विहार, पानी कम पीना, तनाव, अनिद्रा, अत्यधिक मानसिक कार्य, शारीरिक श्रम की कमी तथा अन्तःस्रावी तन्त्र की अनियमितता आदि के कारण अनुपयोगी पदार्थों का यथोचित उत्सर्जन नहीं हो पाता। मल कड़ा होकर आंतों की दीवारों तथा मलाषय में जम जाता है। इसके अतिरिक्त जितना मूत्र विसर्जन होना चाहिए; उतना नहीं हो पाता। मूत्र जलन के साथ होता है। हर्निया, कब्ज, पथरी, अल्सर तथा बवासीर आदि उत्सर्जन सम्बन्धी गम्भीर रोग हो जाते हैं।

शुद्ध रक्त को समस्त शरीर में पहुँचाने का कार्य रक्त परिसंचरण तन्त्र करता है; इसके अंग एवं कार्यविधि संक्षेप में निम्नांकित हैं।

रक्त परिसंचरण तन्त्र: (Blood Circulatory System)

रक्त परिसंचरण तन्त्र का कार्य है पोषक पदार्थों एवं ऑक्सीजन को प्रत्येक कोशिका तक पहुँचाना। इसको समझने हेतु इसके प्रमुख भागों एवं कार्यों का संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार है।

रक्त: (Blood)-मानव रक्त संयोजी ऊतक है। सामान्य वयस्क व्यक्ति में कुल वज़न का 7 से 9 प्रतिशत रक्त होता है। स्वस्थ वयस्क पुरुष में 5 से 6 लीटर एवं स्वस्थ वयस्क स्त्री में 4 से 5 लीटर रक्त होता है। रक्त में प्लाज्मा, लाल रक्त कणिकाएँ, श्वेत रक्त कणिकाएँ तथा बिंबाणु या प्लेटलेट्स होती हैं। लाल रक्त कोशिकाओं में उपस्थित हिमोग्लोबिन ऑक्सीजन से मिलकर ऑक्सीहिमोग्लोबिन बनाता है; जो रक्त के साथ अंग प्रत्यंग जाकर ऑक्सीजन को छोड़ देता है। यहाँ से कार्बन डाई ऑक्साइड को लेकर रक्त के साथ फेफड़ों में जाने पर कार्बन डाई ऑक्साइड को वहाँ छोड़कर पुनः ऑक्सीजन को लेकर हृदय में पहुँचता है। पुनः हृदय पम्प करके इसको शरीर में भेजता है। इस प्रकार यह क्रम निरन्तर आजीवन चलता रहता है। श्वेत रक्त कणिकाओं का कार्य होता है-लिम्फोसाइट्स एन्टीबॉडीज का निर्माण; जो रोगों से शरीर की रक्षा करते हैं। इसके अतिरिक्त रक्त में उपस्थित प्लेटलेट्स का कार्य होता है-चोट लगने पर थक्का बनाना।

रक्त भोजन से अवशोषित पोषक पदार्थ तथा ऑक्सीजन को शरीर के प्रत्येक भाग में पहुँचाने, कार्बनडाईऑक्साइड को फेफड़े में शुद्धिकरण के लिए पहुँचाने, व्यर्थ पदार्थों का पसीने आदि द्वारा उत्सर्जन, ताप का समान वितरण, हॉर्मोन्स का संचरण, कोशिकाओं की मरम्मत व निर्माण, रोगप्रतिरोध, ब्लड प्रेषर पर नियन्त्रण तथा थक्का बनाकर रक्त के बाहर बहने को रोकने जैसे कार्य करता है।

हृदय:(Heart)-यह रक्त परिसंचरण का महत्त्वपूर्ण अंग है। यह पेशीय, खोखला, शंकु के आकार का तथा संकुचनशील होता है। यह स्टर्नम के पीछे दोनों फेफड़ों के मध्य एवं हल्के से तिरछेपन के साथ बाईं ओर सीने में स्थित होता है। यह चार चेम्बर्स या कक्षों में विभाजित रहता है। इनको दाहिना अलिन्द, दाहिना निलय तथा बांयाँ अलिन्द और बांयाँ निलय कहते हैं। ऊपर की ओर वाले दोनों कक्ष अलिन्द एवं नीचे वाले दोनों कक्ष निलय बोलते हैं। रक्त एक ही दिषा में जाए इसके लिए इन कक्षों में विशेष वॉल्व होते हैं। जब रक्त को पम्प किया जाता है; तो शरीर में जाने के लिए यह सर्वप्रथम महाधमनी में जाता है। हृदय अनुकम्पी एवं परानुकम्पी दोनों प्रकार के तन्त्रिका तन्त्रों से संचालित होता है। हृदय फेफड़े से आये हुए शुद्ध रक्त को पम्प करके धमनियों के माध्यम से समस्त शरीर में पहुँचाता है। पम्प करते हुए ही धड़कन अनुभव होती है। स्वस्थ मनुष्य का हृदय एक मिनट में 72 से 75 बार धड़कता है। धड़कने पर लब-डप की ध्वनि उत्पन्न होती है। इस ध्वनि को चिकित्सक स्टेथोस्कोप द्वारा सुनकर हृदय और अन्य रोगांे का पता लगाते हैं। इस गति को हाथ की कलाई में नब्ज या नाड़ी परीक्षण द्वारा भी परखा जाता है। रक्त परिसंचरण बिना रक्त वाहिनियों के सम्भव नहीं है; जो इस प्रकार समझी जा सकती हैं।

हृदय चित्र सं0 3


रक्त वाहिनियाँ :(Blood Vessel)-ये अतिसूक्ष्म नलिकाएँ हैं; जो रक्त को हृदय से समस्त शरीर में ले जाती एवं वापस लाती हैं। ये चार प्रकार की होती हैं-महाधमनी, धमनिकाएँ, केशिकाएँ, शिरिकाएँ, शिराएँ एवं महाशिराएँ। फुफ्फुसीय धमनी के अतिरिक्त समस्त धमनियों में शुद्ध ऑक्सीजन युक्त रक्त बहता है; और इनका कार्य होता है-समस्त शरीर को शुद्ध रक्त पहुँचाना। ये अतिसूक्ष्म होकर यह कार्य करती हैं; इन्हीं अतिसूक्ष्म शाखाओं को केशिका कहते हैं। अशुद्ध रक्त का संवाहन करने वाली वाहिनियों को शिरा कहते हैं। मात्र फुफ्फुसीय शिरा के अतिरिक्त सभी शिराओं में अशुद्ध या कार्बनडाईऑक्साइड युक्त रक्त बहता है। धमनियों के संस्थान को धमनी तन्त्र एवं शिराओं के संस्थान को शिरा तन्त्र कहा जाता है।

रक्तचाप : (Blood Pressure) -रक्त के द्वारा उसकी वाहिकाओं की दीवारों पर पड़ने वाले दबाव को रक्तचाप कहते हैं। यह दो प्रकार का होता है-सिस्टोलिक एवं डायस्टोलिक। निलय के सिकुड़ने के दौरान रक्त को महाधमनी में धकेलने के लिए उत्पन्न उच्चतम दबाव को सिस्टोलिक ब्लड प्रेषर कहते हैं। यह सामान्यतः 100 से 140 के बीच होना चाहिए। रक्त को महाधमनी में धकेलने के बाद जब हृदय विश्राम करता है तो धमनियों के भीतर उपस्थित रक्त से उनकी दीवारों पर पड़ने वाले दबाव को न्यूनतम या डायस्टोलिक ब्लड प्रेषर कहते हैं। यह सामान्य रूप से 70 से 90 के बीच रहता है। रक्तचाप इन मापदण्डों के अनुसार सामान्य ही रहना चाहिए; थोड़ा-बहुत आस-पास चल सकता है; किन्तु अधिक अन्तर होने पर यह उच्चरक्तचाप और निम्न रक्त चाप की श्रेणी में आता है। उच्च एवं निम्न दोनों ही प्रकार का रक्तचाप घातक है और अस्वस्थता का प्रतीक है।

रक्त परिसंचरण तन्त्र सम्बन्धी समस्याएँ एवं रोग(The Blood Circulatory Problems and Disease) -अनुचित आहार-विहार, तनाव, अनिद्रा, अत्यधिक मानसिक कार्य, शारीरिक श्रम की कमी या अधिकता से उत्पन्न मोटापा या कमजोरी, तथा अन्तःस्रावी तन्त्र की अनियमितता आदि के कारण शरीर में वसा आदि की अधिकता से धमनियाँ व शिराएँ संकुचित हो जाती हैं या दुर्बल हो जाती हैं। उच्च रक्तचाप, निम्न रक्तचाप तथा हृदय रोग हो जाते हैं।

रक्त पाचन तन्त्र से प्राप्त पोषक पदार्थों के साथ ही श्वसन तन्त्र से प्राप्त ऑक्सीजन एवं अन्तःस्रावी ग्रन्थियों से निकलने वाले अन्तःस्रावी रसों आदि को भी समस्त शरीर में ले जाता है। इन क्रियाओं को समझने हेतु अब श्वसन एवं अंतःस्रावी तन्त्र को भी संक्षेप में समझना होगा; इसलिए अब इनके विभिन्न अंगों एवं कार्यविधि को प्रस्तुत करेंगे।

श्वसन तन्त्र (Respiratory System)

वह शरीर तन्त्र जो समस्त शरीर की विभिन्न जैविक क्रियाओं को निरन्तर बनाये रखने हेतु ऑक्सीजन को ग्रहण करना, उसको रक्त में मिलाना तथा प्रत्येक कोशिका में ऊर्जा का निर्माण करना आदि सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य करता है; श्वसन तन्त्र कहलाता है।

श्वसन तन्त्र: चित्र सं0 4

अंकित चित्र के अनुसार श्वसन तन्त्र के अंग-नाक, ग्रसनी, स्वरयन्त्र, श्वास प्रणाल, श्वासनलियाँ, फुफ्फुस, वायुकोशीय नलियाँ एवं वायुकोशिकाएँ। सामान्य रूप से आधुनिक विचार में नाक को अंतरंग श्वसन में सहयोगी नहीं माना जाता; किन्तु यौगिक विचारधारा के अनुसार इसका अपना महत्त्व है। इसलिए नाक से श्वसन का वर्णन प्रारम्भ करेंगे।

नाक(Nose) -नाक के बाहरी सामने की ओर वाले भाग को नासाग्र एवं पीछे के भीतर की ओर खुलने वाला भाग मुखगुहा के ऊपर की ओर कठिन तालु में खुलता है। नाक का प्रारम्भिक भाग एक विभाजक पटल से दो नासाछिद्रों में विभाजित रहता है। इन नासाछिद्रों की आन्तरिक त्वचा में बाल निकले होते हैं; जिससे धूलकण तथा सूक्ष्म जीव आदि भीतर न जा सकें और भीतरी श्वसनांगों की रक्षा हो सके। नाक के बीच की हड्डी द्वारा विभाजित नासाछिद्र आगे जाकर; दो अण्डाकार गुहाओं में चला जाता है। ये गुहाएँ पीछे की ओर जाकर गले में जाकर खुलती हैं। नाक का कार्य होता है; बाहरी वातावरण से ऑक्सीजन ग्रहण करना एवं भीतर से निकली हुई कार्बन डाई ऑक्साइड को बाहरी वातावरण में छोड़ना। इसके अतिरिक्त गन्ध नाड़ियाँ या ऑलफैक्टरी नर्व (जो नासा गुहाओं के ऊपरी एक तिहाई भाग को घेरे हुए होती हैं) से गन्ध संवेदना होती है।

ग्रसनी(Pharynx) -जहाँ पर नासागुहाएँ खुलती हैं; वहाँ से ग्रसनी का आरम्भ होता है। इसका भीतरी भाग दो छिद्रों में समाप्त होती है; जिसका एक भाग ग्रास नलिका तथा दूसरा भाग स्वरयन्त्र का होता है। नाक के पिछले द्वार से लेकर ग्रास नलिका तक का जो भाग नलिका जैसा होता है; वही ग्रसनी कहलाती है। इस प्रकार ग्रसनी के पांच द्वार होते हैं-दो नाक के, एक मुख का, एक ग्रास नलिका का तथा एक स्वर यन्त्र का। इसके अतिरिक्त ग्रसनी के पार्ष्व में दो छिद्र भी होते हैं; जो मृदु तालु के ऊपर प्रत्येक एक ओर स्थित होते हैं। ग्रसनी श्वसन मार्ग के लिए प्रयुक्त होती है; साथ ही यह भोजन निगलने में भी सहयोगी है। श्वास ग्रहण करते हुए नासारन्ध्रों से ली गयी वायु ग्रसनी के नासा भाग और मौखिक भाग में से होती हुई; नीचे जाकर फुफ्फुसांे में प्रवेष करती है।

स्वरयन्त्र(Larynx)-स्वरयन्त्र ग्रास नलिका के ऊपर स्थित होता है। इसे ध्वनि पेटिका भी कहा जाता है। निगलते समय स्वरयन्त्र उपर उठाया जाता है; और फिर जीभ का पिछला हिस्सा उसके द्वार पर नीचे जाती है। जब निगलने की क्रिया समाप्त हो जाती है; तो स्वरयन्त्र नीचे की ओर आता है। इस प्रकार श्वसनमार्ग में वायु का आवगमन निर्बाध होता है।

श्वासप्रणाल (Trachea) -यह स्वरयन्त्र के नीचे से आरम्भ होकर फेफड़ों के शीर्षभाग तक जाता है। जहाँ पर यह दो भागों में बंट जाता है; जो श्वसनी कहलाती हैं। इसमें उपस्थित चषक कोशिकाएँ श्लेष्म स्रावित करती हैं; जिससे यह चिकना बना रहता है। श्वसन मार्ग में वायु द्वारा जो बाहरी प्रदूषित कण तथा सूक्ष्मजीवाणु आदि प्रवेश करते हैं; यह उन्हें रोक लेता है। फिर इसमें उपस्थित रोमिकाओं की सहायता से ये कण आदि ग्रसनी में बाहर की ओर धकेल दिये जाते हैं; एवं बाहर निकाल दिये जाते हैं। श्वास प्रणाल के आगे कण्ठनलिका होती है।

श्वसनियाँ तथा श्वसनिकाएँ(Bronchus and Brochioles)-कण्ठनलिका वक्षस्थल में पहुँचकर दो शाखाओं में विभाजित हो जाती है। इन्हें ही श्वसनी कहते हैं। बाईं वाली श्वसनी बांये फुफ्फुस (फेफड़े) में तथा दाहिनी वाली दाहिने फेफड़े में प्रवेश करती है। ये श्वसनी ही आगे चलकर शाखा प्रषाखाओं के रूप में फेफड़े के अन्दर फैल जाती हैं। आगे की ओर कुछ फूलकर ये वायु-कोष्ठिकाओं में परिणत हो जाती हैं। तत्पश्चात् आगे का मार्ग बन्द हो जाता है। ये सभी शाखाएँ अंगूर के गुच्छों के समान फेफड़े के भीतर व्याप्त होती हैं। यहीं भीतर रक्त वाहिकाएँ और नाड़ियाँ सब फैली होती हैं।

फुफ्फुस, वायुकोशीय नलियाँ एवं वायुकोशिकाएँ (Lungs, Alveolar Ducts and Alveolies) -वायु-कोष्ठिकाओं, रक्त वाहिकाओं तथा नाड़ियों से मिलकर छाती में दाहिने एवं बांयें जिन दो स्पंज के समान अंगों का निर्माण होता है; वे फुफ्फुस या फेफड़े कहलाते हैं। इसका आधार वक्षीय गुहा में डायफ्राम पर स्थित रहता है। फेफड़ों का सबसे बाहरी भाग फुफ्फुसावरण कहलाता है। इनके भीतर उपर्युक्त सभी और रक्त वाहिकाएँ अत्यंत पतली होकर केशिकाओं के रूप में फैली होती हैं। जो बाहर से आने वाली शुद्ध वायु या ऑक्सीजन को सोखकर मुख्य शिरा तक पहुँचाती हैं और अशुद्ध वायु या कार्बन डाइ ऑक्साइड को बाहर भेजने हेतु छोड़ देती हैं। शुद्ध वायु फेफड़े के द्वारा ग्रहण की जाती है और रक्त द्वारा हृदय को भेज दी जाती है। तत्पश्चात् यह वायु हृदय द्वारा पम्पिंग करके सम्पूर्ण शरीर में भेज दी जाती है। जब बाहर से ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं तो फेफड़े फैलते हैं और साँस छोड़ते हुए सिकुड़ते हैं। स्वस्थ व्यक्ति में बाएँ फेफड़े का भार लगभग 560 ग्राम एवं दाहिने का लगभग 620 ग्राम होता है। सामान्य श्वसन में लगभग 500 मिली वायु ग्रहण की जाती है; जबकि गहन श्वसन में लगभग 2500 मिली वायु ग्रहण की जा सकती है। जब गहरी श्वास छोड़ी जाती है; तो व्यक्ति लगभग 1300 मिली कार्बन डाई ऑक्साइड बाहर छोड़ता है; जबकि सामान्य श्वसन में यह मात्र 500 मिली तक ही छोड़ी जाती है। पल्मोनरी या फुफ्फुसीय धमनी हृदय के दाहिने निलय से अशुद्ध या ऑक्सीजन रहित रक्त को फेफड़े में लाती है। यह भी दो शाखाओं में बँटकर श्वसनी के साथ आगे बढ़ती है। जैसे-वायु कोशिकाएँ फेफड़े में फैली होती हैं; उन्हीं के साथ रक्त केशिकाएँ भी फैली होती हैं। जहाँ ये शिराओं से मिलती हैं; इन शिराओं में बाहर से आयी हुई ऑक्सीजन युक्त रक्त होता है। ये शिराएँ भी फेफड़े से बाहर या ऊपर की ओर निकलती हुई दो बड़ी पल्मोनरी शिराओं के रूप में थोड़ा मोटी हो जाती हैं। ये पल्मोनरी या फुफ्फुसीय शिरा हाइलम से होकर बाहर निकलते हुए शुद्ध या ऑक्सीजन युक्त रक्त को हृदय के बाँयें अलिन्द में पहुँचाती है। यहाँ से यह रक्त बाँयें निलय में जाकर महाधमनी और उसकी शाखाओं द्वारा सम्पूर्ण शरीर में फैल जाता है।

डायफ्राम: (Diaphram) -श्वसन क्रिया में यह पेशीय अंग अत्यंत सहयोगी है। साँस भीतर भरते हुए यह सिकुड़कर नीचे को जाता है तथा फेफड़े फैलते हैं। इसी प्रकार जब सांस बाहर छोड़ी जाती है; तो यह-यह फैलकर फेफड़े को सिकुड़ने में सहायक है। सांस दो प्रकार से भीतर भरी जाती है; उदरीय अर्थात् जब पेट के भीतर वायु ग्रहण करना एवं फुफ्फुसीय अर्थात् जब फेफड़े में वायु ग्रहण करना। योग के अन्तर्गत प्राणायाम करते हुए फुफ्फुसीय साँस का महत्त्व है; कुछेक में उदर में भी सांस भरी जाती है। उदर को फ़ैलाना एवं सिकोड़ना आसनों के समय होता है। यह पेशी दोनों ही प्रकार से सांस ग्रहण करने में सहयोगी है। श्वसन में सांसों की लयबद्धता डायफ्राम से ही सम्भव है।

श्वसन की विधि; (Mechanism of Respiration)

श्वसन क्रिया के दो चरण हैं-

श्वास लेना या प्रश्वास : (Inspiration)-मस्तिष्क केन्द्रों एवं मेरुरज्जु के संयुक्त तन्त्रिकीय नियन्त्रण द्वारा डायफ्राम एवं इन्टरकॉस्टल पेशियाँ उद्दीप्त होती हैं। ऐसा होने पर ये एक साथ सिकुड़ते हैं तथा वक्षीय गुहा का आयतन बढ़ता है। आयतन बढने से दाब कम हो जाता है; अधिक दाब से कम दाब की ओर गति करते हुए बाहर की वायु इस स्थान को भरने के लिए नासिका से अन्दर आती है। नासागुहा एवं श्वसन मार्ग के अन्य अंगों को छूते हुए वायु भीतर प्रवेश करती है। इसे श्वास लेना या प्रश्वास कहते हैं।

श्वास छोड़ना या निःष्वास (Expiration) -तन्त्रिकीय नियंत्रण द्वारा डायफ्राम एवं इन्टरकॉस्टल पेशियों के एक साथ फैलने से वक्षीय गुहा का आयतन घटता है। आयतन घटने से दाब अधिक हो जाता है; अधिक दाब से कम दाब की ओर गति करते हुए फेफड़ों के भीतर की वायु श्वसन मार्ग के अन्य अंगों को छूते हुए बाहर निकल जाती है। इसे श्वास छोड़ना या निःष्वास कहते हैं।

श्वसन तन्त्र सम्बन्धी समस्याएँ एवं रोग(The Respiratory Problems and Disease) -अनुचित आहार-विहार, मदिरापान तथा धूम्रपान, तनाव, अनिद्रा, अत्यधिक मानसिक कार्य, शारीरिक श्रम की कमी, अन्तःस्रावी तन्त्र की अनियमितता आदि के कारण श्वसन मार्ग में बाधा, कुपिकाओं का सिकुड़ना आदि विकृतियाँ आ जाये तो अस्थमा तथा ट्यूबरक्लोसिस या टी0बी0 जैसे गम्भीर रोग हो जाते हैं।

श्वसन के प्रकार(Types of Respiration)

बाह्य या फुफ्फुसीय श्वसन (External or Pulmonary Respiration)-भौतिक विज्ञान के अनुसार गैस हमेषा उच्च दाब से कम दाब की ओर जाती है। वायु का आदान-प्रदान इसी नियम के आधार पर होता है। फेफड़े के फैलने एवं सिकुड़ने की प्रक्रिया हम पहले ही बता चुके हैं। वायु के भीतर-बाहर आते-जाते ही वायु का आदान-प्रदान होता है। शरीर के भीतर वायु या गैस का आदान-प्रदान फेफड़ों के भीतर उपस्थित वायुकोषों एवं इनके चारों ओर उपस्थित रक्त केशिकाओं से होता हैं। बाहर से आयी हुई शुद्ध या ऑक्सीजन युक्त वायु वायुकोषों में प्रवेश करती है; इनके चारों ओर रक्त केशिकाओं में उपस्थित लौहयुक्त हिमोग्लोबिन ऑक्सीजन को लेकर ऑक्सीहिमोग्लोबिन बनकर शुद्ध वायु को हृदय तक पहुँचाता है। जहाँ से यह शुद्ध रक्त समस्त शरीर में जाता है। रक्त केशिकाओं के द्वारा कार्बनडाईऑक्साइड युक्त अशुद्ध वायु वायुकोषों में छोड़ दी जाती है। जहाँ से यह बाहर निकल जाती है।

आन्तरिक या कोशिकीय श्वसन (Internal or Cellular Respiration)-हृदय में आया हुआ शुद्ध या ऑक्सीहिमोग्लोबिन युक्त रक्त ऊतकों और कोशिकाओं में जाता है; क्योंकि उस समय वहाँ का दाब कम होता है। इसी ऑक्सीजन युक्त रक्त के द्वारा प्रत्येक कोशिका में ऊर्जा का संचार होता है। यहीं पर रक्त के साथ आये हुए पचे हुए भोज्य पदार्थ को ऑक्सीकृत करके ऊर्जा में बदल दिया जाता है। यह कार्य माइटोकॉण्ड्रिया द्वारा किया जाता है। कोशिका का यही अंगक आन्तरिक श्वसन करता है। प्रत्येक कोशिका में उपस्थित अनेक माइटोकॉण्ड्रिया उस कोशिका की सभी जैविक क्रियाओं हेतु यह आन्तरिक श्वसन प्रक्रिया निरन्तर करते रहते हैं।

अंतःस्रावी तन्त्र (Endocrine System)-यह एक प्रमुख शरीर तन्त्र है जो तन्त्रिका तन्त्र के साथ मिलकर समस्त जैविक क्रियाओं का नियमन करता है। इस तन्त्र की कोशिकाओं या ऊतकों द्वारा विशेष रसायन स्रावित होते हैं; जिन्हें हॉर्माेन्स कहा जाता है। इन उत्पादक ऊतकों को अन्तःस्रावी या वाहिकाविहीन ग्रन्थि कहा जाता है। ये ग्रन्थियाँ एक्स्ट्रासेल्युलर स्थानों में अपने स्राव छोड़ती हैं; जहाँ से यह स्राव रक्त में मिलकर सम्बन्धित अंग तक पहुँचकर उसकी क्रियाओं का नियमन एवं संतुलन करता है। ये स्राव शरीर की आवश्यकताओं के अनुसार कम या अधिक मात्रा में स्रावित होते रहते हैं। यदि किन्हीं दबावों की स्थिति में यह मात्रा अत्यधिक या अतिन्यून हो जाए तो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। अन्तःस्रावी ग्रन्थियों की स्थिति शरीर में निम्नांकित चित्र द्वारा समझी जा सकती है।

अंतस्रावी ग्रन्थियों की शरीर में स्थिति चित्र 5

अन्तःस्रावी ग्रन्थियों को उनके कार्य के अनुसार निम्न प्रकार समझ सकते हैं-

1. पिट्यूटरी ग्रन्थि (Pitutary Gland)-इसे मास्टर ग्रन्थि या हाइपोफाइसिस भी कहते हैं; क्यांेकि यह अन्य ग्रन्थियों का नियन्त्रण भी करती है। यह हाइपोथेलैमस के नीचे भूरे से रंग की, लगभग मटर के दाने के बराबर होती है। यह निम्न हॉर्मोन्स को स्रावित करती है-

वृद्धि हॉर्मोन-यह समस्त शरीर की वृद्धि को नियमित एवं नियन्त्रित करता है।

प्रोलैक्टिन-गर्भावस्था के दौरान स्तनों में नलियों का विकास एवं दुग्ध उत्पादन करता है।

थॉयरायड उद्दीपक-यह थॉयरॉयड ग्रन्थि की वृद्धि एवं क्रियाशीलता को नियमित करता है।

एड्रिनोकॉर्टिकोट्रॉपिक-इससे स्टीरॉयड हॉर्मोन का स्राव व उत्पादन बढ जाता है।

ल्यूटीनाइजिंग-सेक्स हॉर्माेन्स को उद्दीप्त करता है।

फॉलीकल उद्दीपक-यह स्त्रियों में मासिक धर्म के समय ओवेरियन फॉलिकल्स की वृद्धि व उनकी परिपक्वता को उद्दीप्त करता है। पुरुषों में यह वृषणों की शुक्राणु बनाने वाली कोशिकाओं को उद्दीप्त करता है और इनके निर्माण को भी नियन्त्रित करता है।

मेलेनोसाइट उद्दीपक-मनुष्यों में इसकी क्रिया अनिश्चित है।

एण्टीडायरॉटिक या वैसोप्रोसीन-यह मूत्र के विसर्जन को उद्दीप्त करता है।

ऑक्सीटोसिन-नवजात शिशु के स्तनपान करने के संवेदनों को ग्रहण करके यह स्तनों में दुग्धप्रवाह का कार्य करता है।

2. थॉयरॉयड ग्रन्थि (Thyroid Gland)-यह गर्दन में श्वास प्रवाल या ट्रैकिया के सामने निचले सर्वाइकल व प्रथम थोरेसिक वर्टिब्रा के स्तर पर स्थित होती है। यह अत्यधिक वाहिकीय ग्रन्थि है; जिसका भार लगभग 25 ग्राम होता है। इससे थॉयरॉक्सिन हॉर्मोन स्रावित होता है। इस ग्रन्थि के अतिसक्रिय होने से हार्मोन के अधिक स्राव से हाइपरथॉयरॉयडिज्म हो जाता है; जिससे चिन्ता, बेचैनी, अच्छी भूख के बावजूद वज़न में कमी, नाड़ी की गति बढना, गर्मी अनुभव होना, कम्पन तथा धड़कन बढने जैसे लक्षण दिखते हैं। ऐसी स्थिति रोगों को जन्म देती है। इस ग्रन्थि से यदि कम स्राव हो तो हाइपोथॉयरॉयडिज्म हो जाता है। ऐसा होने से शरीर का वज़न बढना, तापमान कम होना, ठण्ड सहन न कर पाना, त्वचा रूखी होना, मासिक धर्म बिल्कुल न होना या अत्यधिक होना जैसी समस्याएँ हो जाती हैं। यदि कोई महिला गर्भावस्था में हाइपोथॉयरॉयडिज्म से ग्रस्त हो तो गर्भ में पल रहे शिशु का विकास नहीं हो पाता।

3. पैराथॉयरॉयड ग्रन्थि (Parathyroid Gland)-ये थॉयरॉयड ग्रन्थि की पिछली सतह में; संख्या में चार; मसूर के दाने के आकार वाली होती हैं। इनसे पैराथॉर्मोन हार्मोन स्रावित होता है; जो कैल्शियम एवं फॉस्फोरस के वितरण तथा चयापचय को प्रभावित करता है। इसमें शिथिलता आने से रक्त में कैल्शियम की मात्रा में कमी आ जाती है। जिससे पेशीय कड़ापन, ऐंठन तथा श्वास की गति तीव्र हो जाती है। इसकी अतिक्रिया से फॉस्फोरस की मात्र कम किन्तु कैल्शियम की मात्रा अधिक हो जाती है। ऐसा होने से रक्त में कैल्शियम अधिक हो जाता है; जिससे पेशियों में स्फूर्ति कम तथा गुर्दे में पथरी जैसी शिकायत हो जाती है।

4. एड्रीनल या सुप्रारीनल ग्रन्थि (Adrenal or Suprarenal Gland)-संख्या में दो ये ग्रन्थियाँ गुर्दे या वृक्क के ऊपरी सामने के भाग में स्थित होती हैं। इसके स्राव निम्न हैं-

मिनरलोकॉर्टिकॉयड्स-यह खनिजों की सान्द्रता को नियन्त्रित करते हैं। इनमें उपस्थित एल्डोस्टीरॉन की अधिकता से उच्चरक्तचाप, रक्त में पोटेशियम की कमी, कमजोरी तथा अपसंवेदनाएँ हो जाती हैं।

ग्लूकोकॉर्टिकॉयड्स-ये रक्त शर्करा की सान्द्रता, चयापचय का नियन्त्रण, तनाव को कम करना जैसे कार्य करते हैं।

गोनाडोकॉर्टिकॉयड्स या सेक्स हॉर्मोन-ये महिलाओं एवं पुरुषांे की सेक्स एवं प्रजनन क्षमता का नियमन करते हैं।

5. अग्न्याशयिक द्वीपिकाएँ या लैंगरहैंस के द्वीप (Pancreatic islets or Islets of Langerhans) -यह 12 से 15 सेमी लम्बा मांसल अंग है। यह आमाशय के पीछे स्थित रहता है। इसका सिर ग्रहणी के मोड़ तथा पूंछ प्लीहा को छूती है तथा मध्य भाग फैला रहता है। यह पाचक रस निकालकर बहिःस्रावी एवं अन्तःस्रावी दोनों प्रकार की ग्रन्थि के रूप में कार्य करती है। इसमें दो लाख से लेकर बीस लाख तक छोटी द्वीपिकाएँ होती हैं। इनमें एल्फा, बीटा, डेल्टा तथा एफ कोशिकाएँ होती हैं।

एल्फा कोशिकाएँ ग्लूकोगॉन हॉर्मोन स्रावित करती हैं; जो यकृत को उद्दीप्त करके ग्लाइकोजन को ग्लूकोज में परिवर्तित करता है। ऐसा होने से रक्त में शर्करा की मात्रा बढ़ जाती है। इससे मधुमेह या डायबटीज रोग हो जाता है। बीटा नामक कोशिकाएँ इन्सुलिन हॉर्मोन स्रावित करती हैं। यह रक्त में उपस्थित ग्लूकोज को ग्लाइकोजन में परिवर्तित कर देता है। इससे रक्त में शर्करा की मात्रा नियन्त्रित रहती है। डेल्टा नामक कोशिकाएँ सोमेटोस्टेटिन हॉर्मोन स्रावित करती हैं। यह पिट्यूटरी से निकलने वाले वृद्धि हॉर्मोन में बाधा डालकर अतिशय वृद्धि को रोकता है। साथ ही ग्लूकोगॉन एवं इन्सुलिन का संतुलन बनाये रखता है। एफ कोशिकाएँ पॉलीपेप्टाइड स्रावित करती हैं; इसके कार्य अभी भी खोजे नहीं जा सके।

6. पिनियल ग्रन्थि या बॉडी (Pineal Gland or Body)-यह प्रमस्तिष्कीय अर्धगोलार्धों के मध्य स्थित मटर के दाने के आकार की भूरे रंग की ग्रन्थि है। इसका कार्य अज्ञात है; किन्तु यौवनावस्था के उपरान्त इसका अपक्षय हो जाता है।

7. थायमस ग्रन्थि (Thymus Gland)-यह वक्षगुहा में ट्रैकिया के पास स्थित होती है। इसका कार्य अज्ञात है। यह शिशु की दो वर्ष की अवस्था तक आकार में बढ़ती रहती है; किन्तु उसके बाद सिकुड़ती जाती है तथा युवावस्था में मात्र तन्तुमय रह जाती है।

8. गोनेड्स या जनन ग्रन्थियाँ (Gonads)-पुरुषों में वृषण एवं स्त्रियों में डिम्ब ग्रन्थियों को जनन ग्रन्थि कहा जाता है। वृषण से टेस्टोस्टीरॉन एवं डिम्ब से एस्ट्रोजन व प्रोजेस्ट्रान हॉर्मोन निकलते हैं।

अन्तःस्रावी तन्त्र सम्बन्धी समस्याएँ एवं रोग (The Endocrine Problems and Disease) -अनुचित आहार-विहार, मदिरापान तथा धूम्रपान, तनाव, अनिद्रा, आनुवंशिकता, अत्यधिक मानसिक कार्य, शारीरिक श्रम की कमी या अधिकता अन्तःस्रावी तन्त्र की अनियमितताओं को जन्म देती है। यह तन्त्र तन्त्रिका तन्त्र के साथ मिलकर समस्त शरीर को अनुषासित ढंग से क्रियान्वित रखता है। इस तन्त्र की ग्रन्थियों में से कोई भी ग्रन्थि यदि सही कार्य न करे तो अनेक समस्याएँ हो जाती है; जो कालान्तर में बड़े रोगों को जन्म देती हैं। इन रोगों की चर्चा हम प्रत्येक ग्रन्थि के साथ कर चुके हैं। अन्तःस्रावी ग्रन्थियों की अनियमितता से प्रजनन तन्त्र भी अत्यधिक प्रभावित होता है; संक्षेप में इसे समझते हैं।

प्रजनन तन्त्र (Reproductive System)

मानव एवं अन्य प्रत्येक जीवधारी जिस क्षमता के द्वारा अपने ही जैसे अन्य जीव को उत्पन्न करने की क्षमता रखता है; इसे प्रजनन कहते हैं। प्रजनन तन्त्र के अंग पुरुषों एवं स्त्रियों में भिन्न-भिन्न होते हैं; ये निम्नांकित हैं।

पुरुष जननांग (Male Reproductive Orgens)-पुरुषों प्रजनन तन्त्र में वृषण (Testes) अधिवृषण; (Epididymis), शुक्रवाहिकाएँ (Ductus Deferens) , वृषण रज्जु(Spermatic Cords), दो शुक्राशय: (Seminal Vesicles), दो स्खलनीय वाहिकाएँ (Ejaculatory Ducts), एक प्रोस्टेट ग्रन्थि ,(Prostate Gland , दो काउपर वल्वोयूरेथल एवं एक शिश्न (Penis) वृषण में शुक्रजनक नलिकाओं के द्वारा प्रति सेकण्ड हजारों शुक्राणुओं का उत्पादन होता है; जो अन्य स्रावों के साथ मिलकर वीर्य का निर्माण करते हैं। पुरुष के प्रजनन अंगों से वीर्य के साथ निकले शुक्राणु ही सम्भोग के द्वारा स्त्री के डिम्ब या अण्डों से मिलकर; उसका निषेचन करके नये जीव हेतु भू्रण का निर्माण करता है।

स्त्री जननांग (Female Reproductive Orgens)-महिलाओं में बाहरी रूप से सम्भोग योनि (Vagina) , एवं स्तन (Mammary Glands) प्रजनन सम्बन्धी अंग हैं। आन्तरिक प्रजनन अंग डिम्ब ग्रन्थि या अण्डाशय (Ovaries), गर्भाशयिक नलियाँ या डिम्बवाहिनियाँ( Uterine Tubes or Fallopian ) गर्भाशय (Uterus)हैं। अण्डाशय में डिम्ब या अण्डा बनता है; जो सम्भोग के द्वारा पुरुष शुक्राणु से मिलकर निषेचित होकर गर्भाशय में स्थित हो जाता है। इसकी सुरक्षा हेतु गर्भाशय में सुरक्षा परतें बनती रहती हैं। यदि अण्डा निषेचित नहीं होता है, तो प्रत्येक माह मासिक चक्र के रूप में यह रक्तस्राव द्वारा योनि से होते हुए बाहर निकल जाता है।

प्रजनन तन्त्र सम्बन्धी समस्याएँ एवं रोग(Reproductive Problems and Disease)-अन्तःस्रावी ग्रन्थियों की अनियमितता एवं अनुचित आहार-विहार के कारण प्रजनन ग्रन्थियों से सम्बन्धी समस्याएँ यथा-शुक्राणुओं की कमी, बांझपन तथा मासिक चक्र की अनियमितता आदि होती हैं।

सभी तन्त्र तन्त्रिका तन्त्र के निर्देषों के आधार पर ही कार्य करते हैं; इसलिए अब तन्त्रिका तन्त्र को संक्षेप में प्रस्तुत करेंगे।

तन्त्रिका तन्त्र(Nervous System)

सम्पूर्ण शरीर की क्रियाओं एवं प्रतिक्रियाओं का नियन्त्रण, नियमन एवं समन्वयन तन्त्रिका तन्त्र के मुख्य कार्य हैं। इसमें समाहित विभिन्न तन्त्रिकाएँ संवेदी अंगों से संवेदनाओं की प्राप्ति करके सुषुम्ना या स्पाइनल कॉर्ड के माध्यम से उन्हें मस्तिष्क तक पहुँचाती हैं। मस्तिष्क उनका विश्लेषण करता है और आवश्यकतानुसार निर्देश देता है। निर्देश को तन्त्रिकाओं द्वारा सम्बन्धित अंग तक पहुँचाया जाता है। तत्पश्चात् सम्बन्धित अंग उसी प्रकार की प्रतिक्रिया देता है। इस प्रकार यह तन्त्र असंख्य कोशिकाओं में सामंजस्य बनाये रखता है। तन्त्रिका तन्त्र तन्त्रिका ऊतकों से बना होता है इनमें तन्त्रिका कोशिकाएँ या न्यूरॉन्स, तन्त्रिका तन्तुओं या नर्व फाइवर्स और संयोजी ऊतक या न्यूरॉग्लिया का समावेश होता है।

तन्त्रिका कोशिका की बनावट: चित्र सं0 6

इस तन्त्र के तीन भाग-केन्द्रीय, परिधीय एवं स्वायत्त। इन्हें इस प्रकार समझ सकते हैं।

1. केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र (Central Nervous System) -इसके दो भाग होते हैं-मस्तिष्क (Brain) तथा सुषुम्ना(Spinal Cord) इन्हें संक्षेप में इस प्रकार समझ सकते हैं-

मस्तिष्क(Brain)-यह कपाल गुहा या खोपड़ी के भीतर दो गोलार्धों के रूप में स्थित होता है। इसके तीन भाग होते हैं-अग्रमस्तिष्क (Forebrain), मध्यमस्तिष्क (Midbrain) तथा पश्चमस्तिष्क(Hindbrain)

मस्तिष्क चित्र सं0 7

अग्रमस्तिष्क(Forebrain-इसके प्रमस्तिष्क Cerebrum) ए बेसल गैंग्लिया(Basel Ganglia), ळंदहसपंद्धए थैलेमस (Thalamus) एवं हाइपोथैलेमस((Hypothalamus) जैसे अंग हैं। प्रमस्तिष्क और इसके विशेष संवेदी क्षेत्र ज्ञानात्मक क्रियाओं का नियन्त्रण, सीखना, सोचना, समझना तथा चलना आदि का नियन्त्रण करते हैं। गति, समस्थिति, प्रसारण, श्वसन, ताप-नियमन, पाचन, भावना, अन्तःस्रावी ग्रन्थियों का नियमन तथा समस्त तन्त्रिका आवेगों का नियमन आदि अग्रमस्तिष्क के विभिन्न अंगों द्वारा संचालित होता है। हाइपोथैलेमस का नियमन योगाभ्यासों के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है; इसलिए इसे थोड़ा अधिक स्पष्ट करेंगे।

हाइपोथैलेमस: शरीर एवं मन की महत्त्वपूर्ण मिलनस्थली Hypothalamus : The Place for Psycho-Physical Harmoney)-यह मस्तिष्क का एक छोटा-सा अंग है; जिसका आकारिक एवं कार्यकारिक सम्बन्ध पीयूष ग्रन्थि से है। तन्त्रिकाओं द्वारा शरीर से जो सूचनाएँ एकत्र करके इसे भेजी जाती हैं; यह उनका विश्लेषण करके आवश्यक शारीरिक परिवर्तन निर्धारित करके उससे सम्बन्धित कोशिकाओं को कार्य करने हेतु निर्देशित करता है। हाइपोथैलेमस में ही शरीर एवं मन के संतुलन हेतु इनका मिलन होता है। हाइपौथेलेमस में निर्मित विशेष हार्मोन्स शरीर में उपस्थित सभी चयापचय क्रियाओं एवं अन्तःस्रावी ग्रन्थियों का निर्देशन एवं नियमन करता है। इस दृष्टि से इसके कार्य निम्नांकित हैं-

1. चयापचय के अन्तर्गत शारीरिक तापमान, रक्तचाप, द्रव एवं निद्रा आदि गतिविधियों का नियमन करना।

2. भावनात्मक गतिविधियों जैसे-भय, क्रोध तथा घृणा आदि का भी आंशिक नियमन करना।

3. हॉर्मोनल संस्थान की समस्त अन्तःस्रावी ग्रन्थियों का नियमन करना।

4. शारीरिक एवं मानसिक अवस्थाओं एवं इनके संतुलन पर नियंत्रण बनाये रखना।

5. हाइपोथैलेमस, तन्त्रिकाएँ, हॉर्मोन्स एवं रोग प्रतिरोधी तन्त्र सभी आपस में सहयोगी हैं। इसलिए रोग प्रतिरोध में भी हाइपोथैलेमस की अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

अग्रमस्तिष्क के तथा पश्चामस्तिष्क के बीच में मध्यमस्तिष्क है; जो इस प्रकार समझा जा सकता है।

मध्यमस्तिष्क(Midbrain) =यह अग्र मस्तिष्क एवं पष्च मस्तिष्क के बीच और मस्तिष्क स्तम्भ के ऊपर स्थित रहता है। यह देखने एवं सुनने की क्रियाओं को सम्पन्न करवाता है। इसमें पीनियल बॉडी भी स्थित होती है।

मध्यमस्तिष्क के पीछे पश्चमस्तिष्क होता है; जो इस प्रकार समझा जा सकता है।

पश्चमस्तिष्क (Hindbrain)यह मस्तिष्क का सबसे पीछे का भाग होता है। इसमें पॉन्स, मेड्यूला ऑब्लांगेटा और अनुमस्तिष्क का समावेश रहता है। हृद्यगति नियमन, श्वसन, नींद, लार का स्रावण, शरीर की मुद्रा, इसका संतुलन, पेशियों का तनाव, सन्धियों की स्थिति से सम्बन्धित समस्त क्रियाओं का नियमन इस भाग के द्वारा होता है।

सम्पूर्ण मस्तिष्क की गुहाओं को वैन्ट्रिकल कहते हैं। इसमें दो लेटरल वैन्ट्रिकल, तृतीय वैन्ट्रिकल तथा चतुर्थ वैन्ट्रिकल होते हैं। इनमें सेरिब्रो-स्पाइनल द्रव भरा होता है। यह मस्तिष्क और स्पाइनल कॉर्ड की बाहरी झटकों से रक्षा करता है। चारों ओर दबाव को स्थिर बनाये रखता है। व्यर्थ और विषाक्त पदार्थों को बाहर ले जाता है। मस्तिष्क को पोषक तत्त्व एवं ऑक्सीजन पहुँचाता है।

तन्त्रिका तन्त्र चित्र सं0 8

सुषुम्ना(Spinal Cord) -इसे मेरुरज्जु या रीढ की हड्डी भी कहते हैं। यह मस्तिष्क के निचले भाग मेड्यूला ऑब्लांगेटा से निकलकर नितम्बों के बीच तक जाती है। वयस्क व्यक्ति में इसकी लम्बाई लगभग 45 सेमी0 होती है। इसकी सम्पूर्ण लम्बाई से स्पाइनल तन्त्रिकाओं (Spinal Nerves) के जोड़े निकलते हैं। यहाँ पर संक्षेप में स्पाइनल तन्त्रिकाओं को भी स्पष्ट कर लेना चाहिए; क्योंकि इनसे बनने वाले तन्त्रिका गुच्छों; च्समगनेद्ध की योग में बताए गए चक्रों से तुलना की जाती है। स्पाइनल तन्त्रिकाओं में 8 सर्वाइकल, 12 थोरेसिक, 5 लम्बर, 5 सैक्रल और 1 कॉक्सीजियल नर्व्स होती हैं। ये पांच प्रकार के तन्त्रिका गुच्छों (Plexus) को बनाती हैं; जो इन्हीं नामों से जाने जाते हैं। ये संवेदनाओं एवं प्रतिक्रियाओं एवं क्रिया-कलापों का निर्वहन करती हैं। इसलिए ये अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।

सुषुम्ना के कशेरुक चित्र सं0 9

मनुष्य की पेशीय गति, शरीर की मुद्रा, संतुलन एवं संवेदनाओं के आदान-प्रदान आदि का मुख्य कार्य मेरुरज्जु के माध्यम से होता है।

2. परिधीय तन्त्रिका तन्त्र(Peripheral Nervous System) -तन्त्रिका तन्त्र के इस भाग में मस्तिष्क से निकलने वाली 12 जोड़ी क्रेनियल या कपालीय तन्त्रिकाओं एवं 31 जोड़ी स्पाइनल तन्त्रिकाओं का समावेश होता है। जिनमें से शाखाएँ निकलकर शरीर के विभिन्न अंगों एवं ऊतकों में पहुँचती हैं। तन्त्रिकाओं के तीन प्रकार हैं

संवेदी या अभिवाही तन्त्रिकाएँ (Sensory or Afferent Nerves) -ये आवेगों को शरीर से स्पायनल कॉर्ड तथा वहाँ से मस्तिष्क में ले जाती हैं। उद्दीपन मिलने पर आवेग उत्पन्न होता है; जो मस्तिष्क में संचारित होता है; जहाँ अनुभूति का ज्ञान होता है।

प्रेरक या अपवाही तन्त्रिकाएँ(Motor or Efferent Nerves) -ये तन्त्रिकाएँ आवेगों को मस्तिष्क एवं स्पायनल कॉर्ड से बाहर की ओर ले जाती हैं। ये दो प्रकार की होती है-सोमैटिक तथा ऑटोनॉमिक। सोमैटिक तन्त्रिकाएँ कंकालीय पेशी संकुचन में तथा ऑटोनॉमिक तन्त्रिकाएँ हृदय तथा चिकनी पेशी संकुचन एवं ग्रन्थीय स्राव उत्पन्न करने की भूमिका निभाती हैं।

मिश्रित तन्त्रिकाएँ (Mixed Nerves) -स्पायइनल कॉर्ड में संवेदी एवं प्रेरक तन्त्रिकाएँ भिन्न-भिन्न पथों में व्यवस्थित रहती हैं। स्पाइनल कॉर्ड से बाहर ये दोनों प्रकार की तन्त्रिकाएँ जब संयोजी ऊतक के उसी आवरण में बन्द रहती हैं; तो मिश्रित तन्त्रिकाएँ कहलाती हैं। ये ऑलफैक्टरी, ऑप्टिक, ऑक्यूलोमोटर, फैशियल और क्रेनियल आदि अनेक प्रकार की होती हैं।

3. स्वायत्त तन्त्रिका तन्त्र (Autonomic Nervous System) -इसका मुख्य कार्य है-प्रतिवर्ती क्रिया; त्मसिमग। बजपवदद्ध अर्थात् किसी बाहरी उद्दीपन-दर्द, ताप या स्पर्श आदि के कारण अपने आप एकाएक होने वाली अनुक्रिया। यह भी दो प्रकार का होता है-अनुकम्पी(Sympathetic Autonomic Nervous System) तथा परानुकम्पी ( Para-Sympathetic Autonomic Nervous System)

अनुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र (Sympathetic Autonomic Nervous System) के कार्य-पुतलियों का फैलना, आंसू निकलना, स्राव कम होना, लार चिपचिपी होना, श्वासनलियों का फैलना, हृद्यगति बढना, रक्तदाब बढना, ऐच्छिक पेशियों को रक्त मिलना, पाचक रसों का उत्पादन कम होना, ग्लाइकोजन का ग्लूकोज में परिवर्तन, इन्सुलिन हार्माेन का स्राव कम होना, मूत्र रुकना, पसीना बढ जाना, जननांग सिकुड़ना तथा रक्त वाहिनियों का संकुचन आदि। तन्त्रिकाओं की सूचना द्वारा हार्मोन को उत्तेजित करके वातावरण एवं परस्थितियों से संघर्ष में सहायता करना। जैसे अचानक यदि कोई असुरक्षा अनुभव हो तो हृद्यगति बढ़ जाना, रक्तचाप बढना आदि सभी प्रतिक्रियाएँ व्यक्ति को तनावपूर्ण स्थितियों के लिए तैयार करती हैं।

परानुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र( Para-Sympathetic Autonomic Nervous System) के कार्य-पुतलियों का सिकुड़ना, पलकें बन्द होना, स्राव बढ़ना, लार पतली होना, श्वासनलियों का संकुचन, हृद्यगति कम होना, रक्तदाब घटना, ऐच्छिक पेशियों को रक्त कम मिलना, पाचक रसों का उत्पादन बढना, ग्लूकोज का ग्लूकोज में परिवर्तन, इन्सुलिन हार्माेन का स्राव बढ़ना, मूत्र निकलना, पसीना बढ जाना, स्त्री-पुरुष जननेन्द्रियों का नियन्त्रण तथा रक्त वाहिनियों का प्रसारण आदि। तनाव के परिणामांे एवं उनके प्रति शरीर की प्रतिक्रियाओं को सहज एवं संतुलित बनाना। ऐसा होने पर रक्त संचरण एवं हृद्यगति आदि स्वाभाविक होने लगता है। ये सभी कुछ परानुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र पर निर्भर है।

विपरीत परस्थितियों में भी शांति एवं संतुलन बनाये रखने हेतु अनुकम्पी एवं परानुकम्पी तन्त्रांे में यथोचित संतुलन बनाये रखना आवष्यक है। स्वस्थ रहने हेतु आवष्यक यह संतुलन रक्त स्तम्भन या हीमोस्टेसिस कहलाता है; यह स्वस्थ रहने हेतु भी आवष्यक है; किन्तु कुछ बाह्य तथा आन्तरिक कारणों से यह असंतुलित हो जाता है। योगाभ्यास के दृष्टिकोण से इसे जानना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है; इसलिए पहले दबाव के प्रकारों एवं कारकों तथा उसके पश्चात् समस्थिति को स्पष्ट करेंगे।

दबाव के प्रकार एवं कारक (The Causes of Stress)

ऐसे कारक जो शरीर की समस्थिति को असंतुलित करके व्यक्ति को अस्वस्थ करते हैं; उन्हें दबाव उत्पन्न करने वाले कारक कहते हैं। इनके अनेक प्रकार हैं-

भौतिक दबाव कारक(Physical Stressors) -बाह्य वातावरण सम्बन्धी कारक जैसे-गर्मी तथा शोरगुल आदि।

रासायनिक दबाव कारक (Chemical Stressors) -रसायनों सम्बन्धी कारक जैसे-दूषित तथा अनुचित खाद्यपदार्थ एवं असंतुलित हॉर्माेन्स आदि।

सूक्ष्मजैविक दबाव कारक(Microbiological Stressors) -बाहर से आये सूक्ष्म जीव जैसे-वायरस या वैक्टीरिया आदि।

शरीर-क्रिया वैज्ञानिक दबाव कारक (Physiological Stressors)-शरीर की क्रियाओं में होने वाली गड़बड़ियों के कारण उत्पन्न ट्यूमर्स या असामान्य क्रियाएँ आदि।

मनोवैज्ञानिक दबाव कारक (Psychological Stressors)-मनोवैज्ञानिक नकारात्मक भावावेग जैसे-क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष, अवसाद, दुष्चिंता, तनाव तथा निराषा आदि के कारण उत्पन्न होने वाली मानसिक असंतुलन। ये शरीर पर भी बुरा प्रभाव डालते हैं; क्योंकि इनसे सम्पूर्ण व्यक्तित्व प्रभावित होता है।

अत्यधिक दबाव होने पर मनोषारीरिक रोग, अक्षमता तथा असामान्य व्यवहार आदि हो जाते हैं। अधिक समय तक और अधिक दबाव बने रहने पर रोग-प्रतिरोधक क्षमता भी समाप्त हो जाती है। स्थिति गम्भीर होने पर मृत्यु तक भी हो सकती है। इन दबावों से स्वयं पर प्रभावी नहीं होने देना चाहिए; इसलिए समस्थिति आवष्यक है।

समस्थिति (Homeostasis)

समस्थिति का अर्थ है-ऐसी मनोषारीरिक स्थिति जिसमें शरीर के सभी तन्त्र यथोचित कार्य करते रहें तथा बाहरी वातावरण के अनुकूल बने रहे। तन्त्रिका तन्त्र अनेक अन्तःस्रावी ग्रन्थियों, रक्तदाब, श्वास-प्रश्वास , तापमान तथा हृद्यगति आदि का नियमन करते हुए यथोचित संतुलन एवं प्रसामान्यता की स्थिति बनाये रखता है। यदि समस्त संस्थान अच्छे सामंजस्य के साथ कार्य कर रहे हों तो समझना चाहिए कि समस्थिति है। यदि कोई भी तन्त्र अपने कार्य में किसी भी प्रकार की अनियमितता कर रहा हो तो समझना चाहिए कि किसी न किसी कारण दबाव की स्थिति है। इस प्रकार समस्थिति को बनाये रखने हेतु यथोचित उपाय करने चाहिए। अच्छा आहार-विहार एवं योगाभ्यास द्वारा समस्थिति को बनाये रखा जा सकता है।

तन्त्रिका तन्त्र सम्बन्धी समस्याएँ एवं रोग (The Endocrine Problems and Disease)-अनुचित आहार-विहार, मदिरापान तथा धूम्रपान, तनाव, अनिद्रा, आनुवंशिकता, अत्यधिक मानसिक कार्य, शारीरिक श्रम की कमी या अधिकता अन्तःस्रावी तन्त्र की अनियमितताओं को जन्म देती है। तन्त्रिका तन्त्र अन्तःस्रावी तन्त्र के साथ मिलकर समस्त शरीर को अनुषासित ढंग से क्रियान्वित रखता है। तन्त्रिका तन्त्र की गड़बड़ियों से विस्मृति, अनेक समस्याएँ हो जाती है; जो कालान्तर में बड़े रोगों को जन्म देती हैं। इन रोगों की चर्चा हम प्रत्येक ग्रन्थि के साथ कर चुके हैं।

लसीका तन्त्र (Lymphatic Systemy)

यह सूक्ष्म वाहिकाओं से बना तन्त्र है; लेकिन इसका रक्त परिसंचरण तन्त्र के समान कोई बन्द परिपथ नहीं है। यह कोशिकाओ के चारों ओर रहने वाले अतिरिक्त तरल एवं प्रोटीन को एकत्र कर लेता है और इसे लिम्फ अर्थात् लसीका के रूप में रक्त में पहुँचा देता है। यह सूक्ष्मजीवाणुओं तथा अन्य हानिकारक पदार्थों को समाप्त कर देता। प्लीहा इस तन्त्र की एक नलिकाविहीन ग्रन्थि है जो उदरीय गुहा के बाईं ओर स्थित होती है। यह लिम्फोसाइट्स तथा मोनोसाइट्स का निर्माण करती हैं। प्लीहा की भक्षक कोशिकाएँ रक्त में उपस्थित मृत लाल एवं सफेद रक्त कणिकाओं का भक्षण करके रक्त को स्वच्छ बना देती हैं। हृदय के पास ही स्थित थायमस ग्रन्थि अपने स्राव के द्वारा नये जन्मे शिशु में रोगप्रतिरोधक क्षमता को बनाये रखती है। युवावस्था तक की अवस्था तक यह अधिक सक्रिय रहती है। गले में दोनों ओर स्थित टॉन्सिल भी लसीका तन्त्र का भाग हैं; जो गले के संक्रमण को रोकने का कार्य कर देते हैं।

लसीका तन्त्र सम्बन्धी समस्याएँ तथा रोग(Lymphatic Problems and disease)-अनुचित आहार-विहार तथा वातावरणीय प्रदूषण के कारण टॉन्सिल्स में भी संक्रमण हो जाता है। अधिक संक्रमण सूजन आदि को जन्म देता है।

इस प्रकार उपर्युक्त समस्त शरीर तन्त्र व्यक्ति के व्यक्तित्व का भाग हैं और विभिन्न बाहरी तथा आन्तरिक व्यवधानांे के कारण उत्पन्न होने वाली अनियमितता के कारण यदि कोई भी शरीर तन्त्र अस्वस्थ हो जाए तो व्यक्ति अस्वस्थ हो जाता है। इसलिए समस्थिति को बनाये रखना आवष्यक है। इस समस्थिति को बनाये रखने हेतु योगाभ्यास की आवष्यकता है; इसका विवेचन हम अगले अध्याय में करेंगे; किन्तु योगाभ्यास के परिप्रेक्ष्य में उपापचय की जानकारी भी होनी चाहिए। इसलिए उपापचय को अतिसंक्षेप में समझेंगे।

उपापचय या चयापचय (Metabolism) -जीवन एवं स्वास्थ्य के लिए शरीर की सभी जीवित कोशिकाएँ हर समय क्रियाओं के अन्तर्गत बहुत सारे रासायनिक एवं ऊर्जा रूपान्तरण के कार्य करती हैं। बड़े पैमाने पर समस्त कोशिकीय कार्यों को उपापचय(Metabolism) कहते हैं। जीवित रहने एवं समस्थिति हेतु यथोचित उपापचय आवष्यक है। उपापचय के दो भाग हैं-उपचय(Anabolism) (Catabolism) एवं अपचय (Catabolism)। उपचय अर्थात् समस्त जैव-रासायनिक क्रियाओं द्वारा शरीर हेतु नयी कोशिकाओं का निर्माण, विकास एवं मरम्मत। अपचय अर्थात् विविध जैव-रासायनिक क्रियाओं द्वारा शरीर में उपस्थित कोशिकाओं के टूटने से ऊर्जा का निर्माण।

शरीर की पूर्ण विश्रामावस्था में अर्थात् भोजन के लगभग 12 घण्टे पष्चात् शरीर में होने वाले परिवर्तनों को आधारी उपापचय (Besal Metabolism) कहते हैं। यह मात्र अतिआवष्यक जैविक क्रियाओं जैसे-श्वसन एवं रक्त परिसंचरण आदि हेतु आवष्यक है। एक स्वस्थ व्यक्ति को इस अवस्था में प्रतिदिन 1500 से 1800 कैलोरी ऊर्जा की आवष्यकता होती है। आहार-विहार सम्बन्धी अनेक कारकों से मनुष्य में यह दर परिवर्तित होती है; इसलिए इस दषा में शरीर की ऊर्जा उत्पन्न करने सम्बन्धी क्षमता को मापा जाता है। इसे शरीर के सतही क्षेत्रफल के प्रति वर्ग मीटर प्रतिघण्टा कैलोरियों (Basic Metabolism Rate = Calory/meter2/hour) में व्यक्त किया जाता है। अनुचित आहार-विहार तथा कुछ अन्य कारण उपापचय को असंतुलित कर देते हैं; जिससे अनेक शारीरिक एवं मानसिक रोग उत्पन्न हो जाते हैं। उपापचय शरीर सतह के क्षेत्रफल, आयु, शारीरिक परिश्रम, स्वभाव, शरीर के तापमान, भोजन, उपवास तथा हॉर्मोन्स आदि जैसे कारकों पर निर्भर करता है।

योगाभ्यास में यथोचित शाकाहारी-सात्त्विक भोजन, आसन आदि द्वारा शारीरिक श्रम, उपवास तथा हॉर्मोन्स के संतुलन द्वारा व्यक्ति के शरीर की उपापचय दर उसके अनुकूल रहती हैं। इसलिए समस्थिति एवं यथोचित उपापचय हेतु योगाभ्यास आवश्यक है।

पाँचों ज्ञानेन्द्रियों को उनकी क्रियाविधि के साथ जानना आवष्यक है। संवेदनाएँ ग्रहण करके मस्तिष्क तक सूचना पहुँचाने का कार्य ये ज्ञानेन्द्रियाँ ही करती हैं। संवेदनाओं को ग्रहण करना एवं उनसे सुख-दुःख का अनुभूति योग में प्रत्याहार, धारणा तथा ध्यान के दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण है। इनके द्वारा प्राप्त संवेदनों से साधक का तटस्थ होना आवष्यक है; इसलिए अब ज्ञानेन्द्रियों को संक्षेप में जानेंगे।

त्वचा या स्पर्षेन्द्रिय (Skin) -स्पर्श के अन्तर्गत गर्मी, ठंडक, दाब, पीड़ा, सूखा, गीला तथा चिकना आदि की अनुभूति होती है। यह सम्पूर्ण शरीर को बाहर से ढककर शरीर की रक्षा करती है। इसमें तन्त्रिका तन्तुओं के अन्तिम नोकों का एक जाल-सा फैला होता है; ये रिसेप्टर्स कहलाते हैं। ये विभिन्न बाहरी संवेदनाओं को ग्रहण करके मस्तिष्क तक पहुँचाने का कार्य करते हैं। त्वचा में विभिन्न स्थानांे पर बाल होते हैं; जिनको छूने से संवेदना होती है। इन्हें स्पर्श बिन्दु कहते हैं। इसी प्रकार ताप, शीत बिन्दु आदि भी त्वचा में उपस्थित होते हैं। इसके अतिरिक्त त्वचा के गहराई में पसीना स्रावित करने वाले स्वेद ग्रन्थियाँ भी होती हैं। ये शरीर में उपस्थित हानिकारक पदार्थों को पसीने के साथ शरीर से बाहर निकालने का कार्य करती हैं

त्वचा चित्र सं0 10

स्वेद ग्रन्थि चित्र सं0 11

जीभ या स्वादेन्द्रिय(Tounge)-जीभ के द्वारा विभिन्न प्रकार का स्वाद ग्रहण किया जाता है। इसमें खट्टे, मीठे, कटु तथा तीखे पदार्थों का स्वाद ग्रहण करने के लिए विभिन्न प्रकार की स्वाद कलिकाएँ होती हैं। ये कलिकाएँ भी संवेदनों को ग्रहण करके मस्तिष्क तक पहुँचाती हैं। जीभ आगे से स्वतन्त्र एवं पीछे से जुड़ी हुई होती है। यह स्वाद लेने के साथ ही भोजन में लार को मिलाने का कार्य भी करती है। साथ ही भोजन को निगलने में सहयोग भी करती है। जीभ से ग्रहण संवेदनों को विभिन्न तन्त्रिकाओं द्वारा मस्तिष्क को पहुँचाया जाता है तथा फिर मस्तिष्क के निर्णय के आधार पर वास्तविक स्वाद का पता चलता है।

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नाक या घ्राणेन्द्रिय; छवेमद्ध-नाक का कार्य है-गंध को अनुभव करना। गंध को अनुभव करने हेतु पदार्थ का गैसीय रूप में होना आवष्यक है। ये कण नाक में उपस्थित श्लेष्मा में घुल जाते हैं और घ्राण कोशिकाओं को उद्दीप्त करते हैं। यहाँ उपस्थित तन्त्रिकाएँ संवेदनों को ग्रहण करके मस्तिष्क तक भेजती हैं। इस पर मस्तिष्क गन्ध सम्बन्धी ज्ञान देता है।

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कान या श्रवणेन्द्रिय(Ears)-कान के कार्य हैं-ध्वनि की संवेदना ग्रहण करना, उसे सुनना, शरीर का संतुलन बनाना। इसके तीन भाग होते हैं-बाह्य, मध्य एवं आंतरिक कान। ध्वनि के तरंगों के कारण वायु में प्रकम्पन होने पर ध्वनि की संवेदना उसकी तीव्रता पर निर्भर करती है। बाहरी कान की कर्णपाली ध्वनि तरंगों को संग्रहित करती है। यह कर्ण कुहर से होते हुए कर्णपटह तक पहुँचती हैं। यहाँ पर उपस्थित अस्थियों से होते हुए यह मेम्ब्रेन तक पहुँचती है। यहाँ उपस्थित रिसेप्टर्स ध्वनि के संवेदन को ग्रहण करके मस्तिष्क तक पहुँचाते हैं। मस्तिष्क ध्वनि की पहचान सम्बन्धी ज्ञान देता है। इसके साथ ही मध्यकर्ण शरीर का संतुलन बनाने में सहयोगी है।

कान चित्र सं0 14

आँख या दर्शनेन्द्रिय(eyes)-आँख का कार्य होता है-बाहर उपस्थित वस्तुओं को देखकर उनका ज्ञान मस्तिष्क तक पहुँचाना। जिस प्रकार कैमरे में उल्टा प्रतिबिम्ब बनता है; उसी प्रकार आँख के रेटिना में भी उल्टा प्रतिबिम्ब ही बनता है। यहाँ से संवेदनाएँ मस्तिष्क तक जाती हैं; मस्तिष्क संवेदनाओं को स्पष्ट करके प्रकाश के माध्यम से वस्तुओं का ज्ञान करवाता है।

आँख चित्र सं0 14

इस प्रकार ज्ञानेन्द्रियाँ संवेदनाओं को ग्रहण करके बाहरी उद्दीपनों को ग्रहण करती हैं। इस प्रकार यह बाहरी वातावरण एवं वस्तुओं आदि का ज्ञान प्राप्त करने हेतु आवश्यक अंग हैं। यह ज्ञान आवष्यक है; किन्तु यदि किसी ज्ञानेन्द्रिय को अपने विषय से अत्यधिक संलग्नता हो तो यह योगमार्ग में बाधक है। इसलिए योगाभ्यास में इन ज्ञानेन्द्रियों को अनुशासित करने का निर्देश दिया गया है।

मानव के व्यक्तित्व से जुड़े विविध पक्षों को जानने के उपरान्त व्यक्तित्व की स्वस्थता हेतु योगाभ्यास की आवश्यकता तथा इसकी पूर्वापेक्षाओं को जानना अनिवार्य है। अगले अध्याय में हम इन्हीं बिन्दुओं को स्पष्ट करेंगे।