अध्याय 5: योग परम्परा में प्रमुख आसन / कविता भट्ट

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योगासन

योग परम्परा में यम, नियम तथा षट्कर्म के पश्चात् आसन का अभ्यास यथाक्रम आवश्यक है; किन्तु आजकल स्वास्थ्य लाभ को दृष्टिगत रखते हुए व्यक्ति सीधे आसन को ही अपनाता है। यह उपयोगी तो है; किन्तु इनका पूर्ण फल तभी प्राप्त हो सकता है जब ये पूर्व के अभ्यासों के पश्चात् किये जायें। फिर भी यदि सीधे आसन भी किये जायें तो भी शारीरिक एवं मानसिक लाभ तो प्राप्त होते ही हैं। यदि कोई ऐसी परिस्थिति हो कि षट्कर्म का अभ्यास न किया जा सके तो कुछ शारीरिक लाभों हेतु सीधे आसनों का अभ्यास भी किया जा सकता है।

षट्कर्म के उपरान्त नाड़ियों की शुद्धि हो जाती तथा शरीर का अंग प्रत्यंग विकाररहित हो जाता है। यम-नियम से व्यक्ति नैतिक एवं व्यक्तिगत अनुशासन में सुस्थिर हो जाता है। यदि इसकें पश्चात् आसन किये जायें तो व्यक्ति का शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक कल्याण निश्चित है। फिर भी पुनः यह कहना आवश्यक है कि आधुनिक युग की कठिन परिस्थितियों में जो व्यक्ति सीधे आसन से प्रारम्भ करते हैं; वे भी शारीरिक स्वास्थ्य लाभ के भागी तो बनते ही हैं। आश्चर्यजनक रूप से जब व्यक्ति को मनोशारीरिक स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होते हैं; तब वह स्वतः ही आध्यात्मिक लक्ष्यों की ओर भी अग्रसर होता है। ऐसा होने से नैतिकता एवं वैयक्तिक अनुशासनों के प्रति भी वह सचेत होने लगता है। इस प्रकार यम के कठिन सार्वभौम महाव्रत एवं नियम के सुस्थिर वैयक्तिक मापदण्डों को भी व्यक्ति स्वाभाविक रूप से ग्रहण करने लगता है। इन सभी तथ्यों के आधार पर आसनों का योगसाधना में अतिमहत्त्वपूर्ण स्थान है।

आसनों के महत्त्व को ध्यान में रखते हुए इस अध्याय में आसनों का अर्थ, परिभाषा, इनके अभ्यास के समय ध्यान रखने योग्य सावधानियों एवं अभ्यास की सीमाओं को विवेचित करेंगे। इसके साथ ही आसनों का वैज्ञानिक आधार प्रस्तुत करते हुए; यथोचित स्थान एवं आवृत्ति, अभ्यास में उपस्थित होने वाली बाधाओं तथा आसनों से प्राप्त होने वाले शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक लाभों को भी प्रस्तुत करेंगे।

आसन का अर्थ एवं परिभाषा

सामान्य व्यवहार में जब हम कहते हैं कि कृपया आसन ग्रहण करें; तो हमारा तात्पर्य उस साधन से होता है जिस पर व्यक्ति सुखदायक शारीरिक स्थिति बनाकर बैठ सके। दरी, कुर्सी एवं चैकी आदि बैठने के साधनांे को भी आसन कहा जाता है। यद्यपि सामान्य व्यवहार में यह साधन विशेष के लिए प्रयुक्त शब्द है; तथापि योग की शब्दावली में इसका अर्थ एवं परिभाषा कुछ भिन्न है। आसन शब्द संस्कृत की अस् धातु से व्युत्पन्न है जिसका अर्थ है, "आस्तेऽत्रआस्ते वा अनेन इत्यासनम्।" अर्थात् जिसके द्वारा स्थिरता एवं सुखपूर्वक बैठा जा सके; वह आसन है।

पातंजलयोगसूत्र में आसन की परिभाषा-पातंजलयोगसूत्र में आसन को परिभाषित करते हुए लिखा गया है, "स्थिरसुखमासनम्।" अर्थात् स्थिरतापूर्वक सुख का अनुभव करना ही आसन है।

यद्यपि उपर्युक्त अर्थ व परिभाषा से सामान्य व्यक्ति को यह प्रतीत होता है कि सुखपूर्वक तो किसी भी स्थिति में बैठा जा सकता है। तो फिर वह योग के सन्दर्भ में अनेक महान फलों को प्रदान करने वाली स्थिति कैसे हो सकती है? इसके अतिरिक्त चूंकि सामान्य दिनचर्या में तो हम नित्य-प्रति बैठने में अपने शारीरिक सुख को ध्यान में रखते हुए ही मुद्रा बनाते हैं। फिर योग के आसन शब्द हेतु शारीरिक स्थिति विशेष सामान्य से भिन्न कैसे है?

यहाँ योगासन में सामान्य अवस्था के आसनों से भिन्न लक्षणों को समझना आवश्यक हो जाता है। महर्षि पतंजलि का मानना है कि प्रयत्न की शिथिलता व अनन्त अर्थात् परमात्मा में समापत्ति (ध्यान लगाने) से ही आसन सिद्ध होता है। प्रयत्न की शिथिलता का अर्थ आलस्यपूर्वक बैठने से कदापि नहीं है। अपितु इसका अर्थ है कि जब हम जिस आसन को कर रहे हों, उसकी अन्तिम अवस्था में पहुँचने हेतु हम शरीर को कुछ शिथिल बल तो प्रयोग करें; किन्तु जब हम उस स्थिति में पहुँच जायें तो तब हमें उस स्थिति में स्वयं को शिथिलता, स्थिरता व सुखपूर्वक स्थित रहना होगा। शरीर, सिर एवं गर्दन को समान एवं अचल धारण करके और स्थिर होकर, अपनी नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि जमाकर किसी भी अन्य दिशा को न देखना इस विशेष शारीरिक स्थिति को आसन कहा जाता है।

आसनों की संख्या

पातंजलयोगसूत्र को राजयोग के नाम से जाना जाता है। जिसकी प्रकृति सूत्रात्मक होने के कारण उसमें आसनों के प्रकार तथा नाम आदि की चर्चा ही नहीं मिलती है। पातंजलयोगसूत्र पर लिखे गए विभिन्न भाष्यों यथा-व्यास भाष्य, तत्त्ववैशारदी एवं योगवात्र्तिक में तेरह (दण्ड, वीर, भद्र, स्वस्तिक, पद्म, सोपाश्रय, पर्यंक, क्रौंचनिषद्, हस्तिनिषद्, उष्ट्रनिषद्, समसंस्थान, स्थिरसुख एवं यथासुख) आसनों को निर्देशित किया गया है; किन्तु इनमें भी सूत्रात्मकता ही है। इसलिए प्रायोगिक प्रस्तुतीकरण न होना राजयोग की बड़ी कमी है। हठयोग में आसनों को विधिवत् निर्देशित करके इस कमी को दूर किया गया है। घेरण्ड संहिता, हठप्रदीपिका एवं वसिष्ठ संहिता आदि ग्रन्थों में आसनों को उनकी विधि आदि के साथ निर्देशित किया गया है; लेकिन आसनों की संख्या को लेकर इन ग्रन्थें में भी मतभेद ही है।

सामान्यतः शिव संहिता (हठयोग का प्राचीन ग्रन्थ एवं भगवान शिव के उपदेशों का संकलन) में माना गया है कि जीव की चैरासी लाख योनियों के ही समान चैरासी लाख आसन होते हैं। उनमें से भी चैरासी आसन श्रेष्ठ हैं। उन चैरासी आसनों में भी बत्तीस आसनों को अति विशिष्ट और अधिक शुभ समझना चाहिए। इस प्रकार हठयोग के प्रमुख ग्रन्थों में आसनों का निर्देश है; किन्तु संख्या अलग-अलग बतायी गयी है। फिर भी बत्तीस आसन प्रमुख माने गए हैं।

हठयोग में विवेचित बत्तीस विशिष्ट आसन-सिद्ध, पद्म, भद्र, मुक्त, वज्र, स्वस्तिक, सिंह, गोमुख, वीर, धनुर, मृत, गुप्त, मत्स्य, मत्स्येन्द्र, गोरक्ष, पश्चिमोत्तान, उत्कट, संकट, मयूर, कुक्कुट, कूर्म, उत्तानकूर्म, मण्डूक, उत्तानमण्डूक, वृक्ष, गरूड़, वृश, शलभ, मकर, उष्ट्र, भुजंग एवं योग आसन हैं।

शरीर संवर्धनात्मक आसन अन्य दो प्रकार के आसनों की तुलना में कुछ कठिन होते हैं; किन्तु ये शरीर संवर्धन तथा स्वास्थ्य प्राप्ति हेतु अत्यंत उपयोगी है। आसनों के अभ्यास हेतु सरल आसनों से अभ्यास प्रारम्भ करके ही कठिन की ओर बढ़ा जाता है; इसलिए इस अध्याय में हम अधिक सुलभ आसनों से प्रारम्भ करते हुए कुछ कठिन शरीर संवर्धनात्मक आसनों को भी उल्लिखित करेंगें। साथ ही ध्यानात्मक एवं शिथिलीकारक आसनों को भी स्पष्ट करेंगे; जिससे अभ्यास पूर्णरूपेण सिद्ध हों। आसनों का वर्गीकरण दो प्रकार से किया जा सकता है। पहला उद्देश्यांे की दृष्टि से तथा दूसरा विधि की दृष्टि से। पहले उद्देश्यों की दृष्टि से आसनों के वर्ग समझना आवश्यक है।

उद्देश्यों की दृष्टि से आसनों का वर्गीकरण

शारीरिक स्थितियों व उनसे उत्पन्न होने वाले प्रभावों के दृष्टिकोण से आसनों को मुख्यतः तीन वर्गों में रखा जा सकता है।

1.शरीर संवर्धनात्मक आसन-इन आसनों के अभ्यास का मुख्य उद्देश्य शारीरिक स्वस्थता, दृढ़ता, स्थिरता एवं शक्ति का विकास है; इसीलिए ये शरीर संवर्धनात्मक आसन कहलाते हैं। वृक्ष, गरूड़, वृष, शलभ, मकर, उष्ट्र, भुजंग आदि इस श्रेणी में आते हैं।

2.ध्यानात्मक आसन-इन आसनों में बैठकर ध्यान करना व्यक्ति का प्रमुख उद्देश्य होता है; इसीलिए ये ध्यानात्मक आसन कहलाते हैं। पद्म, गुप्त, वज्र, एवं सिद्ध आसन आदि इस श्रेणी में आते हैं।

3.शरीर शिथिलीकारक आसन-शरीर संवर्धनात्मक एवं ध्यानात्मक आसनों के पश्चात् शरीर शिथिलीकारक आसन शरीर को विश्राम देने हेतु किये जाते हैं।

अभ्यास की शारीरिक स्थितियों की दृष्टि से आसनों का वर्गीकरण:

1.बैठकर किये जाने वाले आसन-ये आसन बैठकर किये जाते हैं; सभी ध्यानात्मक आसन तथा कुछ शरीर संवर्धनात्मक आसन जैसे मत्स्येन्द्रासन तथा पश्चितोत्तानासन आदि इस वर्ग में हैं।

2.खड़े होकर किये जाने वाले आसन-इस वर्ग के सभी आसन शरीर संवर्धनात्मक आसन होते हैं।

3.पेट के बल लेटकर किये जाने वाले आसन-इस वर्ग में कुछ शरीर शिथिलीकारक जैसे-मकरासन एवं कुछ शरीर संवर्धनात्मक जैसे-भुजंगासन आदि हैं।

4.पीठ के बल लेटकर किये जाने वाले आसन-इस वर्ग में शिथिलीकारक जैसे शवासन एवं शरीर संवर्धनात्मक आसन जैसे-हलासन आदि हैं।

आसनों का समय एवं आवृत्ति-शौच एवं स्नान आदि से निवृत्त होकर प्रातःकाल या सायंकाल आसन श्रेयस्कर हैं; लेकिन स्नान एवं आसन के मध्य कम से कम आधे घण्टे का अन्तर रखना आवश्यक है। सायंकाल आसन अच्छी प्रकार से होते हैं; क्योंकि पेशियों का लचीलापन बढ़ा हुआ होता है; परन्तु यदि सायंकाल आसन करने हों तो भोजन के उपरान्त लगभग चार घण्टे पश्चात् ही आसन करने चाहिए। मात्र वज्रासन भोजन के तुरन्त बाद किया जा सकता है तथा शरीर शिथिलीकारक आसनों में से भी मात्र शवासन ही किया जा सकता है। बाक़ी सभी आसन करने हेतु व्यक्ति का पेट पूरा खाली रहना चाहिए। यदि हल्के पेय पदार्थ का सेवन भी किया गया हो तो लगभग डेढ़ घण्टे उपरान्त ही आसनों का अभ्यास करना चाहिए। आसनों की आवृत्ति साधक की शारीरिक एवं मानसिक क्षमता, सामथ्र्य, परिस्थिति तथा गुरु के निर्देशानुसार ही होनी चाहिए। आसनों की आवृत्ति में थोड़ा बहुत बल तो प्रयोग किया जा सकता है; किन्तु अत्यधिक बल कदापि उचित नहीं। अन्तिम स्थिति में स्थिर रहना भी क्षमतानुसार ही होना चाहिए। वैसे प्रारम्भ में आसन योग्य गुरु के ही सान्निध्य में एवं उन्हीं के निर्देशानुसार होना चाहिए; पारंगत होने पर स्वयं ही किये जा सकते हैं। आसनों का अभ्यास करते हुए कुछ बाधाएँ उपस्थित हो सकती हैं; जिससे समस्त अभ्यास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इन बाधाओं को जानना आवश्यक है; जिससे इनका यथोचित निवारण किया जा सके। ये बाधाएँ इस प्रकार हैं।

आसनों के अभ्यास में उपस्थित होने वाली बाधाएँ

आसनों के अभ्यास में आने वाली बाधाएँ दो प्रकार की होती हैं; शारीरिक तथा मानसिक। इन बाधाओं को संक्षेप में इस प्रकार समझा जा सकता है। शारीरिक बाधाएँ इस प्रकार हैं-

शारीरिक बाधाएँ

1.स्थूलता-अनुचित खान-पान एवं अनुशासनरहित जीवन शैली से शरीर का भारी होना आसनों के अभ्यास में बड़ी बाधा है।

2.दीर्घसूत्रता-आलस्य अभ्यास के लिए किये जाने वाले प्रयत्न व परिश्रम से विमुख करता है; इसलिए आसन के अभ्यास में भी यह बाधक है।

3.अनुचित आहार-विहार-तामसिक व भारी भोजन, अनियमित दिनचर्या आदि से भी आसनों के अभ्यास में बाधाएँ उपस्थित होती हैं।

आसनों में उपस्थित होने वाली मानसिक बाधाएँ इस प्रकार हैं-

मानसिक बाधाएँ

1.चंचलता-अपने शरीर को स्थिर करने हेतु मन को अभ्यास के प्रति एकाग्र व दृढ़ करना होता है। चंचल चित्त होने से अभ्यास में बाधा उत्पन्न होती है।

2.अविरति-इन्द्रियों का अपने विषयों से अत्यधिक लगाव भी आसन में बाधा उपस्थित करता है। पाँच ज्ञानेन्द्रियों के विषय इसमें सम्मिलित हैं। जैसे-जीभ का स्वाद लेना, आँख का देखना, कान का सुनना, त्वचा का सर्दी या गर्मी अनुभव करना तथा नाक का सूंघना। जब इन ज्ञानेन्द्रियों का अपने विषयों के प्रति अत्यधिक लगाव हो तो आसन में बाधा उपस्थित होती है। व्यक्ति अपने स्वाद के अनुसार भोजन ग्रहण करता है चाहे वह स्वास्थ्य हेतु हानिकारक ही क्यांे न हो। इसी प्रकार त्वचा का कार्य सर्दी-गर्मी को अनुभव करना होता है; किन्तु आधुनिक काल में व्यक्ति इतना भौतिकवादी हो गया कि वह न गर्मी को सहन करने की क्षमता विकसित करता है; ना ही सर्दी को सहन करने की। वह वातानुकूलित कक्षों का आदि हो गया है। ऐसा होने से शारीरिक क्षमता में कमी आती है। इसी प्रकार अन्य ज्ञानेन्द्रियाँ भी अपने विषयों में अधिक संलग्न हो जाती हैं; जबकि ज्ञानेन्द्रियों का मुख्य उद्देश्य मात्र बाह्य उद्दीपनों को ग्रहण करना है; उनमें पूर्णतः संलग्न होना नहीं है।

3.भ्रान्ति-आसनों के लाभों के प्रति भ्रान्ति अर्थात् मिथ्याज्ञान भी आसनों के अभ्यास में बाधा उत्पन्न होती है।

4.संदेह-अभ्यासों के सम्बन्ध में उपस्थित विभिन्न संदेह भी आसनों में बाधा उपस्थित करते हैं।

आसन को हम तप हेतु शारीरिक दृढता एवं द्वन्द्वसहिष्णुता तथा लम्बे समय तक ध्यान में बैठने हेतु आवश्यक स्थिरता के विकास हेतु आवश्यक प्रक्रिया मान सकते हैं। आसन में लम्बे समय तक एक ही शारीरिक स्थिति में रहने से हमारी मात्र शारीरिक ही नहीं अपितु द्वन्द्वों को सहने की मानसिक प्रतिबद्धता को भी विकसित करते हैं।

आसनों को करते हुए आवश्यक लक्षण-

1.अभ्यस्त होने पर आसन में बने रहने हेतु प्रयास न करना पड़े।

2.श्वास-प्रश्वास सामान्य रूप से चलते रहें।

3.साधक को सर्दी-गर्मी आदि द्वन्द्वों के प्रति एक समान रहना चाहिए।

4.आत्मचिंतन करना।

5.आसनों से होने वाले लाभों में विश्वास होना चाहिए।

6.गुरु का आदर एवं गुरु की आज्ञा का पालन करना।

7.ईश्वर-प्रणिधान।

आसनों के अभ्यास हेतु स्थान-आसन करने हेतु किसी भी कक्ष, बरामदे, पार्क तथा मैदान आदि का उपयोग किया जा सकता है; किन्तु उसमें निम्न विशेषताएँ होनी आवश्यक हैं-

1.स्थान शान्त, एकान्त, प्रदूषण रहित, स्वच्छ वायुयुक्त, प्रकाशयुक्त होना चाहिए।

2.वहाँ पर मक्खी-मच्छर आदि ना हों।

3.वहाँ पर हवा, धूप, गर्मी तथा सर्दी आदि बहुत तेज ना हो।

4.किसी भी प्रकार का कोई भी व्यवधान न हो।

5.स्थान का धरातल नितान्त समतल एवं कंकड़ आदि से रहित हो।

आसनों को करते हुए आवश्यक सावधानियाँ-आसन करते हुए निम्न सावधानियाँ आवश्यक हैं-

1.प्रारम्भ में योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही अभ्यास करना चाहिए; पारंगत होने पर स्वयं किये जा सकते हैं।

2.शारीरिक एवं मानसिक स्थिति, क्षमता, देश, काल तथा परस्थिति का ध्यान रखना आवश्यक है।

3.आसन करने हेतु चटाई का प्रयोग करना चाहिए; बिना चटाई के भूमि पर आसन नहीं करने चाहिए।

4.वस्त्र ढीले एवं आरामदायक होने चाहिए।

5.आसनों में अल्प बल प्रयोग अपेक्षित है; किन्तु अपनी क्षमता एवं सामथ्र्य को ध्यान में रखना आवश्यक है। अत्यधिक बल का प्रयोग वर्जित है।

6.आसन की अन्तिम स्थिति में भी क्षमतानुसार ही रहना चाहिए।

7.आसन करते हुए शरीर में कम्पन तथा कमजोरी अनुभव नहीं होने चाहिए। जब हों तो आवश्यकतानुसार बीच में शिथिलीकारक आसन किये जाने चाहिए।

8.श्वास-प्रश्वास गुरु के निर्देशानुसार गहन या उथला हो सकता है; किन्तु सामान्य रूप से सांसें सामान्य गति से चलती रहनी चाहिए।

9.जो आसन जिस किसी रोग विशेष या परस्थिति विशेष में वर्जित हो; वह कदापि उस अवस्था में नहीं करना चाहिए।

10.अतिउत्साह में बलप्रयोग, शीघ्रता एवं उत्तेजना आसनों में वर्जित है।

11.अन्तिम स्थिति में स्थिर रहने की अवधि धीरे-धीरे ही बढ़ानी चाहिए।

12.कुछ गुरु निर्दिष्ट आसनों को छोड़कर; अधिकांश आसन आँखें बन्द करके ही करने चाहिए।

13.साँसों के आने-जाने पर ही मन को स्थिर करना चाहिए; ऐसा करने से ध्यान की स्थिति विकसित होती है। साँसें सामान्य गति से चलती रहनी चाहिए।

14.आसनों से तुरन्त पहले या तुरन्त बाद स्नान एवं भोजन वर्जित है। आसनों के उपरान्त जब पसीना स्वयं ही सूख जाये तथा शरीर की गर्मी कम हो जाय तभी नहाना चाहिए।

15.सात्त्विक भोजन ही ग्रहण करें; भोजन एवं दिनचर्या योग के सामान्य नियमों के समान पूर्णरूपेण पालनीय है। इनकी उपेक्षा घातक हो सकती है।

16.आसनों का अभ्यास करते हुए मादक-नशीले पदार्थ, धूम्रपान, तामसिक आहार एवं मांसाहार आदि वर्जित है। चाय-कॉफी आदि का भी अत्यधिक सेवन वर्जित है।

17.मैथुन स्वाभाविक एवं प्राकृतिक होना चाहिए; वह भी मात्र उतना ही होना चाहिए; जितना नितांत आवश्यक है। अस्वाभाविक एवं अप्राकृतिक मैथुन वर्जित है।

सीमाएँ-

1.प्रारम्भ में गुरु का मार्गदर्शन अत्यंत आवश्यक है।

2.किसी गम्भीर शारीरिक रोग से ग्रस्त व्यक्ति उस रोग में वर्जित आसन न करें। गुरु के निर्देशों का पालन करें; जो अपेक्षित हो वही करें। अन्यथा अत्यंत घातक परिणाम हो सकते हैं।

3.किसी रोग के पश्चात् आसन पुनः तभी प्रारम्भ करने चाहिए जब आसन हेतु आवश्यक शक्ति व्यक्ति को प्राप्त हो जाय।

4.शल्य चिकित्सा (ऑपरेशन) वाले व्यक्ति गुरु द्वारा निर्धारित अवधि तक आसन न करें। स्वस्थ होने पर भी गुरु के ही निर्देशानुसार करना चाहिए।

5.स्त्रियों को मासिक धर्म तथा गर्भावस्था के दिनों में आसनों का अभ्यास नहीं करना चाहिए। प्रसव के उपरान्त आसनों का अभ्यास प्रारम्भ करने हेतु योगगुरु के निर्देशानुसार ही अभ्यास करने चाहिए।

6.बारह वर्ष से कम आयु के बालक-बालिकाओं को मात्र भुजंग, अर्धशलभ, धनुर, पश्चिमोत्तान, हल, ताड़ तथा वृक्ष जैसे आसनों एवं योगमुद्रा का ही अभ्यास करना चाहिए।

7.जिस आसन की जो सीमाएँ निर्धारित हों; उनका ध्यान रखना आवश्यक है; अन्यथा अभ्यास घातक हो सकता है।

आसनों के वैज्ञानिक आधार

पाचन तन्त्रीय आधार-आधुनिक काल में शारीरिक श्रम के अभाव में पाचन तन्त्र की अस्वस्थता सामान्य बात है। यदि पाचन तन्त्र सही ना हो तो व्यक्ति गम्भीर रोगों का शिकार हो जाता है। यदि रोग न भी हों तब भी सामान्य रूप से आसन करना दीर्घ काल तक स्वस्थ बने रहने हेतु अत्यंत उपयोगी होते हैं। इसका वैज्ञानिक आधार यह है कि आसनों के अभ्यास में पेट की पेशियों के यथोचित संकुचन (सिकुड़ने) -प्रसारण (फैलने) से भीतरी अंगों की मालिश होती है तथा उनमें शुद्ध वायु का संचरण होने से उन्हें भरपूर रक्त मिलता है। ऐसा होने से पाचन अंगों एवं ग्रन्थियों से स्रावित होने वाले पाचक रसों में वृद्धि होती है। ऐसा होने से पाचन प्रणाली सुचारु होती है। गैस, अपच, कब्ज, कम भूख, अधिक भूख, अम्लता, पेट एवं गले में जलन जैसी समस्याएँ समाप्त होती है। पाचन तन्त्र मजबूत, स्वस्थ एवं सक्षम बनता है; जिससे सम्पूर्ण शरीर एवं मन भी स्वस्थ होते हैं।

गहन श्वास-प्रश्वास तथा श्वास रोकने सम्बन्धी आधार-आसनों में गहन एवं लयबद्ध श्वसन से फेफड़ों की क्षमता बढ़ती है। अंग-प्रत्यंग शुद्ध वायु का संचरण होने से सम्पूर्ण शरीर हृष्ट-पुष्ट तथा स्वस्थ होता है। जितने समय आसन की अन्तिम स्थिति में रहते हैं; तीव्र श्वसन होता है; जिससे उपापचय की दर भी बढ़ती है। कैलोरीज का जारण होता है। यदि श्वास रोकने वाला कोई अभ्यास हो तो उसमें भी इसी प्रकार के प्रभाव होते हैं।

संतुलित उपापचय-योगासनों से उपापचय दर संतुलित होती है; जिससे शरीर पर अत्यंत सकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं।

अंग-प्रत्यंग यथोचित रक्त परिसंचरण सम्बन्धी आधार-श्वास-प्रश्वास की गहनता एवं लयबद्धता से समस्त अंगों में रक्त-परिसंचरण सुचारु होता है। शिथिलता दूर होती है। स्वस्थता प्राप्त होती है।

पेशीय संकुचन-प्रसारण सम्बन्धी आधार-पेशियों के संकुचन-प्रसारण द्वारा इनकी यथोचित मालिश व व्यायाम होता है; जिससे पेशियाँ स्वस्थ एवं मज़बूत बनती हैं। जब किसी पेशी का संकोच होता है; तब वहाँ पर रक्त का संचरण धीमा हो जाता है; लेकिन उसके पश्चात् जब पेशियाँ फैलती हैं तो वही रक्त बहुत तीव्रता से धमनियों में दौड़ता है और कई गुना तेजी से अपना कार्य करता है।

अस्थियों एवं जोड़ों का व्यायाम-जोड़ों के मुड़ने से उनमें रक्त-परिसंचरण सुचारु होता है; जिससे वहाँ उपस्थित व्यवधान समाप्त हो जाते हैं। इससे जोड़ों की पीड़ा एवं विकार आदि समाप्त होकर जोड़ सक्रिय, मज़बूत एवं स्वस्थ बनते हैं। हड्डियों को दृढ़ता एवं मजबूती प्राप्त होती है।

मेरुरज्जु के लचीलेपन का आधार-आसनों के अभ्यास में मेरुरज्जु के आगे एवं पीछे मुड़ने से इसमें लचीलापन आता है। इससे नाड़ी तन्त्र स्वस्थ एवं सक्रिय होता है।

नाड़ियों एवं तन्त्रिका संस्थान की सक्रियता का आधार-आसनों के अभ्यास से श्वसन सुचारु होता है इससे नाड़ियों में रक्त परिसंचरण तेजी से होता है। इससे नाड़ियों या तन्त्रिकाओं में अधिक शुद्ध रक्त जाता है। इस प्रकार तन्त्रिका संस्थान सक्रिय एवं स्वस्थ होता है।

शारीरिक लाभ:

1.स्थिरता एवं दृढ़ता-आसनों के अभ्यास से कठिनाइयों हेतु सहनशक्ति में वृद्धि होती है। किसी भी शारीरिक सुख-दुख अथवा अनुकूलता-प्रतिकूलता से विचलित न होने हेतु सहन करने की क्षमता का विकास करना होता है। कठिनाइयों एवं चुनौतियों का सामना करने के लिए व्यक्ति के शरीर को शक्तिसम्पन्न, विचलनों के प्रति तटस्थ, स्थिर व आरोग्य युक्त होना आवश्यक है। आसनों से ये सभी कुछ प्राप्त होता है। आसनों के अभ्यास के समय शरीर के जिन अंगों का संकुचन व प्रसारण होता है, उन अंगों में आरम्भी अभ्यास के समय पीड़ा का अनुभव होता है। धीरे-धीरे उस पीड़ा के प्रति हमारा मन-मस्तिश्क अभ्यस्त हो जाता है। इस अभ्यास का परिणाम यह होता है कि पीड़ा को सहन करने की क्षमता का विकास होता है। इस प्रकार शरीर स्थिर, दृढ़ व शक्तिसम्पन्न होता है।

2.आरोग्य-आसनों के वैज्ञानिक आधारों को विवेचित करते हुए हमने स्पष्ट किया है कि आसनों से विभिन्न शरीर तन्त्रों को लाभ प्राप्त होता है। इस प्रकार समस्त शरीर तन्त्रों की स्वस्थता व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यक्तित्व की स्वस्थता का आधार बनती है।

3.रोग-प्रतिरोधक क्षमता का विकास-आसनों के अभ्यास से शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास होता है।

4.अनावश्यक मोटापे से मुक्ति-आसनों के अभ्यास द्वारा चयापचय दर बढती है। ऐसा होने से शरीर में उपस्थित अनावश्यक वसा का जारण होता है तथा मोटापे से मुक्ति मिलती है।

5.अत्यधिक कमजोर व्यक्तियों को लाभ-जिन व्यक्तियों को कम भूख लगती है या जिनका भोजन सही से पच नहीं पाता; वे अत्यंत कमजोर होते हैं। आसनों के द्वारा भूख संतुलित होकर पाचन भी यथोचित हो जाता है। ऐसा होने पर व्यक्ति के द्वारा ग्रहण किया गया भोजन यथोचित ढंग से पचता है; जिससे पूरा पोषण शरीर को प्राप्त हो पाता है। इस प्रकार आसर्नो के अभ्यास से कमजोर व्यक्ति भी

6.शारीरिक सामथ्र्य का विकास-आसनों से शरीर को दृढ़ता एवं मजबूती मिलने से शारीरिक सामथ्र्य में भी वृद्धि होती है।

मानसिक लाभ

शारीरिक स्वस्थता से मानसिक स्वस्थता योगासनों के अभ्यास से शरीर स्वस्थ होता है; और पुरानी कहावत है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का निवास होता है। जब योगासन किए जाते हैं तो अन्तःस्रावी रसों एवं तन्त्रिकाओं की कार्य प्रणाली में लयबद्धता व सामंजस्य बनता है। संतुलित अन्तःस्रावी रस सकारात्मक प्रभाव उत्पन्न करते हैं। मन स्वस्थ, प्रफुल्ल, सकारात्मक एवं आशावादी बनता है। ऐसा होने से तनाव, अवसाद, दुष्चिंता, चिड़चिड़ापन, नकारात्मकता एवं निराशा आदि दूर होते हैं। व्यक्ति शान्त, हर परस्थिति में प्रसन्न, अंतर्मुखी, गम्भीर तथा दीर्घकालीन योजनाओं वाला हो जाता है। ऐसा इसलिए होता है कि नकारात्मक भावों में व्यर्थ जाने वाली ऊर्जा अब सकारात्मक गतिविधियों में सक्रिय हो जाती है। मन सकारात्मक क्रियाओं में गतिशील हो जाता है। मानसिक आनन्द की अनुभूति होती है। यदि व्यक्ति किसी गम्भीर मानसिक रोग से ग्रस्त हो तो वह भी धीरे-धीरे स्वस्थ हो जाता है। यदि सामान्य रूप से स्वस्थ व्यक्ति आसन करे तो वह और भी अधिक सकारात्मक एवं क्रियाशील हो जाता है।

आध्यात्मिक लाभ

शरीर एवं मन के पूर्णतः स्वस्थ रहने के परिणामस्वरूप व्यक्ति को आत्मिक आनन्द की अनुभूति होती है। कुछ अभ्यासों को छोड़कर अन्य सभी आसनों का अभ्यास करते हुए व्यक्ति की आँखें अधिकांशतः बन्द ही रहती हैं। ऐसा होने से आत्मचिंतन एवं मनन का भाव विकसित होता है। एकाग्रता एवं चैतन्य शक्ति के स्तर में वृद्धि होती है। धीरे-धीरे व्यक्ति आत्मिक आनन्द में ही रम जाता है। अपने स्वरूप के चिंतन आदि में व्यस्त रहने से व्यक्ति के सभी नकारात्मक भाव समाप्त हो जाते हैं तथा सकारात्मक चिंतन के भाव विकसित होते हैं।

प्रमुख आसनों की विधियाँ एवं लाभ आदि

शरीर संवर्धनात्मक आसन

विपरीतकरणी आसन

अर्थ-विपरीत का अर्थ है-उल्टा एवं करणी अर्थात् करना इस आसन को मुद्राओं एवं तान्त्रिक विधियों के रूप में भी प्रयोग में लाया जाता है। इसमें कमर से नीचे वाला पूरा भाग ऊपर उठाया जाता है और ऊपर वाला भाग नीचे रहता है। इससे शरीर की विशेष स्थिति बनती है। इसकी विधि निम्नांकित है-

विधि एवं शारीरिक स्थितियाँ

1.पीठ के बल भूमि पर लेट जायें; पैर फैले एवं आपस में सटे हुए हों; बाहें शरीर से लगकर सीधी फैली हुई हो। आँखें बन्द एवं चेहरा तनावरहित कर लें।

2.कमर तक का भाग भूमि पर सीधा पड़ा रहेगा एवं टांगों को बिना मोड़े अर्थात् सीधे ऊपर की ओर ले 30 डिग्री तक जाएँ; फिर 60 डिग्री तक, फिर 90 डिग्री तक ले जाकर रोक लेना चाहिए।

3.पैरों को सिर की ओर नीचा करके धड़ को आसानी से उठाना चाहिए। शरीर के भार को सिर के पिछले भाग, कंधों, कोहनियों और हाथों पर रखना चाहिए। हथेलियों के अंगूठे कमर पर बाहर की ओर तथा उंगलियाँ भीतर की ओर रहनी चाहिए।

4.पैर पूरे सीधे रखते हुए उनका भार हाथों पर डालते हुए; भूमि के लम्बवत् अर्थात् 90 डिग्री तक ले आयें। ग्रीवा सामने मुड़ी हुई होगी परन्तु ठुड्डी सीने को स्पर्श न करें; बल्कि गले के बीच में तिकोन स्थान पर स्थित हो। यह पूर्ण स्थिति है।

5.जितनी देर रह सकते हैं; इसी अन्तिम स्थिति में रहना चाहिए।

6.फिर गहरी साँस भरें तथा उसके बाद पूरी सांस छोड़ते हुए पैरों को आगे ले जाकर हाथों से भार हटायें। भार हटाकर हथेलियों को भूमि पर रखें। फिर टांगों से 90 डिग्री का काण बनाते हुए उन्हें सीधा ऊपर करें एवं श्वास छोड़ते हुए धीरे-धीरे जैसे अन्तिम अवस्था में जाने के लिए किया था उसके विपरीत पूर्व अवस्था में आ जायें।

7.गहरी श्वास भरकर शवासन में विश्राम करना चाहिए।

पूर्वाभ्यास-द्विपादउत्तानापादासन।

उत्तर अभ्यास-हलासन, सर्वांगासन, कर्णपीड़ासन, मत्स्यासन, चक्रासन।

लाभ

शारीरिक लाभ-पूरा रक्त परिसंचरण सिर की ओर होने से तन्त्रिका तन्त्र की सक्रियता बढती है। इसके साथ ही आंख, नाक, कान तथा गला आदि सभी ऊपरी अंगों की सक्रियता भी बढ़ती है। सामान्य खड़े होने की अवस्था में हमेशा फेफड़े तथा हृद्य आदि श्वसन अंग गुरुत्वाकर्षण के विपरीत दिशा में कार्य करते हैं; जिससे उनको अधिक कार्य करना पड़ता है। विपरीत करणी आसन से कुछ देर के लिए सिर वाले भाग के नीचे होने से इन सभी अंगों का कार्य बिना तनाव आये अधिक अच्छे से होता है; साथ ही शीर्ष प्रदेश को अधिक ऑक्सीजन भी मिलती है। इससे ये सभी अंग मज़बूत एवं अधिक स्वस्थ हो जाते हैं। गर्दन की नाड़ियों आदि को विशेष लाभ होता है। यह शिराओं एवं धमनियों के दोष दूर करके रक्त परिसंचरण को सुचारु करने हेतु उत्तम अभ्यास है। इससे चेहरे की ओर रक्त परिसंचरण होने से झुर्रियाँ आदि नहीं होती। इस कारण यह एन्टी एजिंग अर्थात् वृद्धावस्था को दूर रखने में सहयोगी आसन है। पाचन तन्त्र में रक्त का परिसंचरण अच्छी प्रकार होने से इस तन्त्र से सम्बन्धित समस्याएँ दूर होती हैं। सिरदर्द दूर होता है; किन्तु जिस समय सिर में दर्द हो रहा हो; उस समय इसका अभ्यास नहीं करना चाहिए। पिट्यूटरी, पीनियल तथा थॉयरॉयड ग्रन्थियों को विशेष लाभ प्राप्त होने से हॉर्माेनल संतुलन बनता है। जिन लोगों को विस्मृति होती है; उनके लिए यह आसन अत्यंत लाभकारी है। 10 से 15 मिनट तक करने पर उपापचय दर को बढ़ाता है; जिससे समस्त शरीर तन्त्रों को लाभ होता है। अस्थमा, सिरदर्द, मासिक धर्म की अनियमितता, मोटापा, हाइपर एवं हाइपो थॉयरॉयड तथा प्रजनन तन्त्र की असामान्यता आदि जैसी समस्याएँ दूर होती हैं।

मानसिक लाभ-तनाव, घबराहट, चिडचिड़ापन, क्रोध, अवसाद, विस्मृति तथा अनिद्रा आदि समस्याएँदूर होती है। मानसिक सुख-शान्ति-प्रसन्नता प्राप्त होती है।

आध्यात्मिक लाभ-अभ्यस्त होने पर अधिक अभ्यास करने से प्राणिक ऊर्जा के प्रवाह से इड़ा तथा पिंगला नाड़ियों की शुद्धि होने से चक्र एवं कुण्डलिनी जागरण जैसे विशेष आध्यात्मिक लाभ मिलते हैं।

सावधानियाँ एवं सीमाएँ-

1. पैर भूमि से 90 डिग्री एवं पीठ तथा कमर 45 डिग्री का कोण बनाते हुए एकदम सीधे रहने चाहिए। ठुड्डी कंठप्रदेश के बीचों बीच जो तिकोन स्थान है; वहाँ पर लगनी चाहिए।

2. सिरदर्द, मासिक धर्म, गर्भावस्था, उच्च रक्तचाप, हृद्याघात, मस्तिष्कीय कमजोरी, स्पॉन्डिलायटिस, बढे़ हुए यकृत, थॉयरॉयड, प्लीहा आदि में न करें।

चित्र सं0 1 विपरीतकरणी आसन में अन्तिम शारीरिक स्थिति

पर्वतासन

अर्थ-पर्वत का अर्थ है-पहाड़; इस आसन में शारीरिक स्थिति पहाड़ के आकार की होती है और जिस प्रकार पहाड़ का शिखर उत्थित एवं सीधा होता है; उसी प्रकार शरीर होता है। इसलिए यह पर्वतासन कहलाता है।

विधि एवं शारीरिक स्थितियाँ

1.सीधे खड़े होकर; दोनों हाथों को ऊपर उठाते हैं। आंखें बन्द रहेंगी एवं चेहरा तनावरहित रहेगा। फिर धीरे-धीरे सांस छोड़ते हुए; हाथों को सिर के ऊपर ले जाते हैं। हाथ भूमि से लम्बवत् अर्थात् 90 डिग्री का कोण बनाते हुए रहने चाहिए।

2.अब हाथों को सामने की ओर भूमि पर झुकते हुए; पैरों और हथेलियों में दो फीट तक का अन्तर बनाते हुए; कोहनियों से सीधा रखते हुए एवं भुजाओं को पूरा तानकर सामने लाकर दोनों हथेलियों को आमने सामने करके भूमि पर टिकाते हैं। नितम्ब वाले भाग को पर्वत की चोटी के समान ऊपर की ओर करते हैं।

3.अन्तिम स्थिति में एक से दो मिनट रहना चाहिए; सांसें सामान्य गति से चलती रहेंगी। तत्पश्चात् सांस भरते हुए पूर्वस्थिति में लौट जाना चाहिए। 3 से 5 आवृत्तियाँ करनी चाहिए।

पूर्वाभ्यास-ताड़ासन।

उत्तर अभ्यास-शरणागत मुद्रा।

लाभ

शारीरिक लाभ-गैस, कब्ज एवं अपच आदि पाचन एवं दमा आदि श्वसन समस्याओं में लाभ प्राप्त होता है।

मानसिक लाभ-मानसिक स्वास्थ्य, सुख-शान्ति प्राप्त होती है।

आध्यात्मिक लाभ-मेरुरज्जु का पूर्णरूपेण तान होता है; जिससे सुषुम्ना नाड़ी में चेतना का विस्तार, चक्र जागरण एवं प्राणोत्थान होता है।

सावधानियाँ एवं सीमाएँ-जिन व्यक्तियों के घुटने में दर्द हो; उन्हंे नहीं करना चाहिए।

चित्र सं0 2 पर्वतासन में अन्तिम शारीरिक स्थिति

आकर्ण धनुरासन

अर्थ-आकर्ण का अर्थ है कान तक एवं धनुरासन अर्थात् जिस आसन में शरीर की आकृति धनुष के समान बन जाती है। इस आसन में पैर को अंगूठे से पकड़कर धनुष की प्रत्यंचा के समान खींचते हुए कान लाने का प्रयास किया जाता है। इसलिए इसे आकर्ण धनुरासन कहा जाता है।

विधि एवं शारीरिक स्थितियाँ

1.दण्डासन में बैठें, बांयें पैर को घुटने से मोड़ें और दाहिनी जंघा के मूल में स्थित करें। दाहिना पैर सीधा ही रहेगा।

2.अब दाहिने हाथ से बाएँ पैर के अंगूठे को अच्छी प्रकार से पकड़ लें। बाएँ हाथ से दाहिने पैर के अँगूठे को पकड़ें।

3.गहरी सांस भरते हुए, बांये पैर को दाहिने हाथ से पकड़कर उसे दाहिने कान तक पूरी सामथ्र्य से खींचना चाहिए।

4.अन्तिम स्थिति में सांस सामान्य रूप से चलती रहनी चाहिए और कठिन होने के कारण अधिक देर तक इस स्थिति में नहीं रहा जा सकता, फिर भी 30 सेकंड तक अन्तिम स्थिति में रहने का प्रयास करना चाहिए।

5.। धीरे से सांस भरकर फिर छोड़ते हुए पैर नीचे लाकर, पूर्व स्थिति में आ जाना चाहिए।

6.फिर दूसरी ओर से भी यह अभ्यास दोहराना चाहिए।

पूर्वाभ्यास-दण्डासन।

उत्तर अभ्यास-एक पादस्कन्धासन एवं द्विपाद स्कन्धासन।

लाभ

शारीरिक लाभ-पेट के निचले भागों का संकुचन एवं प्रसारण होने से उनमें तीव्र रक्त संचार होता है; जिससे पाचन तन्त्र एवं प्रजनन तन्त्र को लाभ प्राप्त होता है। गैस, कब्ज एवं अपच आदि में लाभकारी अभ्यास। पेट एवं कमर की चर्बी घटाने में उपयोगी आसन। टांग, घुटनों, जोड़ों एवं भुजाओं की पेशियों के लिए अत्यंत लाभकारी।

मानसिक लाभ-मानसिक स्थिरता एवं प्रसन्नता।

आध्यात्मिक लाभ-नाड़ियों का शुद्धिकरण।

सावधानियाँ एवं सीमाएँ-

1.यदि टाँगों एवं हाथों में अधिक खिंचाव एवं तनाव अनुभव हो रहा हो तो देर तक अन्तिम अवस्था में रहने का प्रयास नहीं करना चाहिए।

चित्र सं0 3 आकर्ण धनुरासन में अन्तिम शारीरिक स्थिति

चक्रासन

अर्थ-चक्र का अर्थ है-गोल चक्का। इसमें शरीर की आकृति गोल चक्के के समान दिखती है; इसलिए इसे चक्रासन कहा जाता है। यह दो प्रकार से किया जाता है-शरीर को पीछे की ओर मोड़कर एवं दाहिने-बाँयें मोड़कर। पीछे की ओर मोड़ने में भी एक लेटकर तथा दूसरा खड़े होकर किया जाता है। पहले शरीर को पीछे की ओर मोड़कर किये जाने वाले चक्रासन की विधि जानेंगे।

विधि एवं शारीरिक स्थितियाँ

शरीर को पीछे की ओर मोड़कर किया जाने वाला चक्रासन

पहली विधि-खड़े होकर शरीर को पीछे की ओर मोड़ना

1.दोनों पैरों में 10 से 15 इंच की दूरी बनाते हुए खड़े हो जाना चाहिए।

2.दोनों हाथों को सीधा ऊपर उठा लेना चाहिए।

3.धीरे-धीरे कमर को पीछे की ओर मोड़ते हुए सिर और हाथों को पीछे की ओर ले जाते हुए हाथों के अग्रभाग से ज़मीन को छूकर फिर धीरे से हथेलियों को पूरा भूमि पर चिपका देना चाहिए।

4.साममर्थ्यानुसार अन्तिम स्थिति में 1 से 2 मिनट तक रुके रहें। ऐसा ही दूसरी ओर से भी करें। 4 से 6 आवृत्तियाँ करनी चाहिए।

दूसरी विधि-भूमि पर लेटकर शरीर को पीछे की ओर मोड़ना

1.भूमि पर पीठ के बल लेट जायें।

2. पैरों के बीच में एक फुट का अन्तर कर लेना चाहिए।

3. फिर हाथेलियों को दोनों कंधों के बराबर में भूमि से सटा लेना चाहिए।

4. घुटनों से मोड़कर पैरों को नितम्ब के पास ले आना चाहिए।

5. फिर शरीर के बीच वाले भाग को भूमि से ऊपर उठा लेना चाहिए।

6. चक्र जैसी आकृति बनने पर शरीर का पूरा भाग हथेलियों एवं पैरों पर आ जायेगा।

7. सामर्थ्यानुसार अन्तिम स्थिति में 1 से 2 मिनट तक रुके रहें। ऐसा ही दूसरी ओर से भी करें। 4 से 6 आवृत्तियाँ करनी चाहिए।

लाभ

शारीरिक लाभ-तन्त्रिका, पाचन, श्वसन को रक्त परिसंचरण तन्त्र को विशेष लाभ होते हैं। अन्तःस्रावी तन्त्र को लाभ होने से हॉर्मोन्स का संतुलन एवं नियमन होता है। रीढ़रज्जु लचीला होता है। पेट, हाथ एवं पैर की पेशियाँ मज़बूत होती हैं। पेट एवं कमर की चर्बी घटती है।

मानसिक लाभ-सिर की ओर रक्त संचार होने स्मरण शक्ति में वृद्धि होती है। मन को प्रसन्नता एवं आत्मविश्वास प्राप्त होता है। अवसाद, क्रोध एवं चिड़चिड़ापन आदि जैसी समस्याओं का निदान होता है।

आध्यात्मिक लाभ-कुंडलिनी एवं चक्र जागरण।

सावधानियाँ एवं सीमाएँ-सिरदर्द तथा कान बहना अथवा किसी अन्य गम्भीर रोग से पीड़ित व्यक्ति न करें। कठिन अभ्यास है इसलिए गुरु के निर्देशानुसार ही करें।

चित्र सं0 4 चक्रासन में शरीर की अन्तिम स्थिति

अब खड़े होकर शरीर को पीछे की ओर किये जाने वाले चक्रासन की विधि जानेंगे।

खड़े होकर शरीर को दाहिने-बाँयें मोड़कर किया जाने वाला चक्रासन

पहली विधि-एक हाथ उठाकर किया जाने वाला चक्रासन

1. दोनों पैरों को आपस में मिलाकर सीधे खड़े होना चाहिए तथा दोनों हाथ जंघाओं पर दाहिने-बाँयीं ओर हथेली खुली हुई हों।

2. दाहिने हाथ को कंधे की सीध में ऊपर उठायें और भुजा कान से सटी हुई हो, कोहनी सीधी, हाथ पूरा सीधा एवं आकाश की ओर हो।

3. फिर धीरे-धीरे शरीर को कमर से बांयें कंधे की ओर मोड़ लें; लेकिन घुटने मुड़ने नहीं चाहिए।

4. इस प्रकार अन्तिम स्थिति में शरीर बीच से मुड़ा हुआ होगा एवं सांसे सामान्य गति से चलती रहेंगी।

5. ऐसा ही दूसरी ओर से भी करें।

6. सामर्थ्यानुसार अन्तिम स्थिति में 1 से 2 मिनट तक रुके रहें। ऐसा ही दूसरी ओर से भी करें। 4 से 6 आवृत्तियाँ करनी चाहिए।

दूसरी विधि-दोनों हाथ उठाकर किया जाने वाला चक्रासन

1. दोनों हाथों को कंधे की सीध में ऊपर उठायें और सिर के ऊपर सीधे करके नमस्कार मुद्रा के समान आपस में हथेलियों को मिला लें।

2.फिर कमर से शरीर को दाहिनी ओर मोड़ें, हाथ पैर सीधे रहेंगे। हाथ आकाश की ओर रहेंगे। सांसे सामान्य गति से चलती रहेंगी। सामर्थ्यानुसार अन्तिम स्थिति में 1 से 2 मिनट तक रुके रहें। ऐसा ही दूसरी ओर से भी करें। 4 से 6 आवृत्तियाँ करनी चाहिए।

लाभ

शारीरिक लाभ-तन्त्रिका, पाचन, श्वसन, पेशी तथा रक्त परिसंचरण तन्त्र को विशेष लाभ होते हैं। अन्तःस्रावी तन्त्र को लाभ होने से हॉर्मोन्स का संतुलन एवं नियमन होता है। रीढ़रज्जु लचीला होता है। पेट, हाथ एवं पैर की पेशियाँ मज़बूत होती हैं। पेट एवं कमर की चर्बी घटती है।

मानसिक लाभ-सिर की ओर रक्त संचार होने स्मरण शक्ति में वृद्धि होती है। मन को प्रसन्नता एवं आत्मविश्वास प्राप्त होता है। अवसाद, क्रोध एवं चिड़चिड़ापन आदि जैसी समस्याओं का निदान होता है।

आध्यात्मिक लाभ-कुंडलिनी एवं चक्र जागरण।

सावधानियाँ एवं सीमाएँ-सिरदर्द तथा कान बहना अथवा किसी अन्य घातक रोग से पीड़ित व्यक्ति न करें। कठिन अभ्यास है इसलिए गुरु के निर्देशानुसार करें।

चित्र सं0 5 दोनों हाथ उठाकर चक्रासन में अन्तिम शारीरिक स्थिति

पश्चिमोत्तानासन

अर्थ-पश्चिम-उत्तान अर्थात् पीछे की ओर से शरीर को तानना। इस आसन में पीठ की ओर वाले भाग को ताना जाता है और आगे की ओर वाले भाग को संकुचित किया जाता है। इसलिए इसे पश्चिमोत्तान आसन कहा जाता है।

विधि एवं शारीरिक स्थितियाँ-

1.सामान्य स्थिति में बैठकर, आंखें बन्द और चेहरा तनावरहित कर लेंगे। पैरों को सीधे आगे फैलाते है; दोनों पैर आपस में मिले रहेंगे। शरीर का ऊपरी भाग लम्बवत् अर्थात् भूमि से 90 डिग्री का कोण बनाते हुए होना चाहिए।

2. साँस भीतर लेते हुए हाथों को पूरा तान देते हुए ऊपर ले जाते हैं।

3.पेट को पूरा खाली करके, सांस छोड़ते हुए, पीठ को सीधा रखते हुए पैरों के अंगूठे को छूने का प्रयास करते हैं। पीठ को सीधी रखते हुए ही छाती को घुटनों पर एवं माथे को उससे नीचे के भाग में टांगों के सामने वाले भाग पर टिका देते हैं। पूरा ध्यान निचले पेट एवं पुच्छ कशेरुक पर एकाग्र होना चाहिए।

4.अन्तिम स्थिति में भी पैर घुटनों से मुड़ने नहीं चाहिए; भूमि पर टिके रहने चाहिए। इसके साथ ही कोहनियाँ भी भूमि पर टिकी रहनी चाहिए।

5.उपर्युक्त अन्तिम स्थिति के पश्चात्; अपनी सामर्थ्यानुसार कुछ देर इसी स्थिति में रहकर फिर पूर्व स्थिति में आ जाते हैं। हथेलियों को आपस में रगड़कर बन्द पलकों पर रखते हुए चेहरे को धीरे से मलते हुए आंखें खोलते हैं।

पूर्वाभ्यास-दण्डासन।

उत्तर अभ्यास-उग्रासन।

लाभ

शारीरिक लाभ-इस आसन को करते हुए पेट की पेशियों पर दबाव बनता है; कमर की पेशियाँ तन जाती हैं। मेरुरज्जु का विशेष रूप फैलना और साथ ही गहरा श्वास-प्रश्वास दोनों ही विशेष प्रभाव उत्पन्न करते हैं। ऐसा होने से पाचन, प्रजनन, श्वसन, पेशी एवं तन्त्रिका तन्त्र को विशेष लाभ होता है। इसलिए इनसे सम्बन्धित रोग दूर होते हैं। महिलाओं के मासिक धर्म की अनियमितता भी दूर होती है। यह अपच, गैस, मधुमेह, यकृत (लिवर) एवं वृक्क (किडनी) आदि की समस्याओं को दूर करने हेतु उपयोगी आसन है।

मानसिक लाभ-रक्त का संचरण मस्तिष्क की ओर होने से मानसिक सुदृढ़ता, सकारात्मकता एवं सक्रियता उत्पन्न होती है।

आध्यात्मिक लाभ-पश्चिमोत्तान की अन्तिम स्थिति में पुच्छ कशेरुक के आस-पास सनसनाहट-सी प्रतीत होती है; जिससे पता चलता है कि इस क्षेत्र में रक्त का प्रवाह एवं वायु का संचरण बढ़ जाता है। यह क्षेत्र मूलाधार चक्र एवं कुण्डलिनी शक्ति से सम्बन्धित है। इयलिए इस क्रिया से चक्र एवं कुण्डलिनी जागरण जैसे आध्यात्मिक लाभ होते हैं।

सावधानियाँ एवं सीमाएँ-स्लिप डिस्क, सायटिका से पीड़ित एवं जिनका कुछ समय पूर्व ही पेट का ऑपरेशन हुआ हो; ऐसे व्यक्ति इस आसन को न करें। गुरु के सान्निध्य में करें; पारंगत होने पर ही स्वयं कर सकते हैं।

पूर्वाभ्यास-अर्धपश्चिमोत्तान एवं वज्रासन-योगमुद्रा।

उत्तर अभ्यास-अर्धपद्मबद्धासन एवं उग्रासन।

चित्र सं0 6 पश्चिमोत्तान आसन में अन्तिम शारीरिक स्थिति

सुप्तपवनमुक्तासन

अर्थ-सुप्त अर्थात् सोयी हुई; यह शब्द पेट में जमी हुई दूषित वायु हेतु प्रयोग किया गया है; पवनमुक्त अर्थात् जिससे पेट की दूषित वायु मुक्त होकर बाहर निकल जाय। ऐसा होने से यह आसन सुप्तपवनमुक्तासन कहलाता है।

विधि एवं शारीरिक स्थितियाँ

1.पीठ के बल लेट जायें, टांगें सीधी तथा दोनों पैर एवं घुटने आपस में मिले हुए हों। दोनों हाथ जंघाओं से सटे हुए एवं हथेलियों भूमि पर बिछी हुई हों।

2.अब पेट को सिकोड़ते हुए; सांस बाहर छोड़ते हुए; घुटनों को मोड़कर पैरों को स्वाभाविक स्थिति में ऊपर आने दें। फिर दोनों हाथों की उंगलियों को आपस में फंसाकर घुटनो के थोड़ा-सा नीचे कस लें।

3. अब सिर को आगे की ओर लाते हुए गर्दन जितनी मुड़ सकती है; मोड़ लें।

4. सांस सामान्य गति से चलती रहेगी एवं इस अन्तिम स्थिति में सामथ्र्यानुसार आधा या एक मिनट रुकें।

5. फिर धीरे-धीरे हाथों को ढीला करके पूर्वस्थिति में लायें। सांस भरते हुए पैर पूर्वस्थिति में आ जायेंगे। यह एक आवृत्ति हुई 4 से 6 आवृत्तियाँ आवश्यकतानुसार की जा सकती हैं।

पूर्वाभ्यास-उत्तानपाद आसन।

उत्तर अभ्यास-हलासन।

लाभ

शारीरिक लाभ-पाचन तन्त्र, उत्सर्जन तन्त्र, श्वसन तन्त्र को विशेष लाभ होता है। कब्ज, गैस, मन्दाग्नि एवं अपच आदि दूर होते हैं। फेफड़ों की क्षमता बढ़ती है। हाथ एवं पैरों की पेशियों को मजबूती प्राप्त होती है। गैस बढ़ने के कारण जिन्हें सिरदर्द की समस्या रहती है; उनका सिरदर्द ठीक हो जाता है।

मानसिक लाभ-तनाव दूर होकर एकाग्रता, प्रसन्नता एवं सकारात्मकता में वृद्धि होती है।

आध्यात्मिक लाभ-मूलाधार, विशुद्ध एवं स्वाधिष्ठान चक्रों की सक्रियता में वृद्धि होती है।

सावधानियाँ एवं सीमाएँ-हर्निया, सर्वाइकल स्पॉन्डलायटिस, कमरदर्द तथा पेट के किसी गम्भीर रोग से ग्रस्त व्यक्ति न करें। अन्तिम स्थिति में सामथ्र्यानुसार ही रहें।

चित्र सं0 7 सुप्तपवनमुक्तासन में अन्तिम शारीरिक स्थिति

भूनमनासन

अर्थ-इस आसन में भूमि को प्रणाम करने जैसी शारीरिक स्थिति बनती है; इसलिए यह भूनमन आसन कहलाता है।

विधि एवं शारीरिक स्थितियाँ

पूर्वाभ्यास-पादहस्तासन।

उत्तर अभ्यास-ताड़ासन।

विधि-

विभिन्न स्थितियाँ

1. दण्डासन में बैठें।

2. आगे से दोनों पैरों को फैला लें तथा दोनों पैरों के अंगूठे को हाथों से पकड़ लें।

3. अब सांस छोड़ते हुए आगे झुककर ठुड्डी को भूमि पर लगा लें।

4. अन्तिम स्थिति में सामथ्र्यानुसार अधिकतम दो मिनट रुकें; फिर सांस भरते हुए वापस पूर्वस्थिति में आ जायें।

लाभ

शारीरिक लाभ-रीढ़ रज्जु में लोच आता है; तन्त्रिकाएँ स्फूर्त होती हैं। पेट की पेशियों के संकुचन से भूख बढ़ती है। कब्ज तथा गैस आदि पाचन तन्त्र तथा अस्थमा आदि श्वसन समस्याओं से मुक्ति मिलती है; किन्तु यह रोग की अवस्था पर निर्भर करेगा। कमर तथा पेट के आस-पास की चर्बी हटती है। थॉयरॉयड आदि से सम्बन्धित समस्याएँ दूर होती हैं।

मानसिक लाभ-तनाव, अवसाद, चिड़चिड़ापन, क्रोध, मानसिक व्यग्रता आदि समस्याओं में लाभकारी है।

आध्यात्मिक लाभ-नाड़ी शुद्धि एवं चक्र जागरण।

सावधानियाँ एवं सीमाएँ-अभ्यास करते समय; जिस पैर की ओर झुकते हैं; मात्र वही पैर घुटने से मुड़ेगा; दूसरा पैरा घुटने से पूरा सीधा रहेगा। जो व्यक्ति कान बहने, उच्चरक्तचाप, हृद्याघात, प्रजनन तन्त्र के संक्रमण तथा स्लिप डिस्क आदि से पीड़ित हैं वे ना करें।

चित्र सं0 8 भूनमनासन में अन्तिम शारीरिक स्थिति

पादांगुष्ठासन

अर्थ-पादांगुष्ठ अर्थात् पैर का अंगूठा। इस आसन में शरीर का संतुलन बनाते हुए पैर के अंगूठे पर पूरा भार डाला जाता है; इसलिए यह पादांगुष्ठ आसन कहलाता है।

विधि एवं शारीरिक स्थितियाँ

1. सीधे खड़े हों पैरों के पंजे एवं एड़ियाँ मिले हुए रहेंगे।

2. हाथों को उठाकर हथेलियों को सामने की ओर खुला हुआ रखेंगे।

3. साँस छोड़ते हुए झुकते हुए आगे की ओर जाएँगे।

4. हाथों से पैरों के अँगूठे पकड़कर माथा टाँगों पर टिकाते हैं; लेकिन घुटने नहीं मुड़ने चाहिए।

5. अन्तिम स्थिति में सांसें सामान्य गति से चलती रहेंगी; 1 मिनट तक रुककर फिर धीरे-धीरे सांस भरते हुए पूर्वस्थिति में आते हैं।

पूर्वाभ्यास-पश्चिमोत्तानासन।

उत्तर अभ्यास-शवासन।

लाभ

शारीरिक लाभ-शारीरिक संतुलन, पैर, पंजे एवं जोड़ मज़बूत होते हैं।

मानसिक लाभ-मानसिक संतुलन, दृढ़ता एवं एकाग्रता। चिंता एवं अतितनाव दूर होते हैं।

आध्यात्मिक लाभ-ब्रह्मचर्य हेतु उपयोगी।

सावधानियाँ एवं सीमाएँ-जिन व्यक्तियों के पैरों एवं जोड़ों में दर्द हो उन्हंे नहीं करना चाहिए।

चित्र सं0 9 पादांगुष्ठासन में अन्तिम शारीरिक स्थिति

संकटासन

अर्थ-संकट में किसी शक्तिमान की शरणागत होने जैसी मुद्रा होती है; संकटासन में।

विधि एवं शारीरिक स्थितियाँ

1. सीधे खड़ें हों; दाहिने पैर को घुटने से मोड़ते हुए बांये पैर की पिंडली से पीछे की ओर लिपटा लें। एड़ी से ऊपर के भाग को लिपटा हुआ होना चाहिए।

2. फिर इस स्थिति में दोनों टांगांे एवं पिंडलियों से आपस में लिपटे हुए रहेंगे। इसी स्थिति में धीरे से नीचे बैठ जायें; बांयी हथेली को दाहिने घुटने एवं दाहिनी हथेली को बांयें घुटने पर स्थिर कर लेना चाहिए। यह अन्तिम स्थिति है।

3. धीरे-धीरे खड़े होते हुए वापस पूर्वस्थिति में आ जाना चाहिए।

पूर्वाभ्यास-देर तक सीधे खड़े होना।

उत्तर अभ्यास-गरुड़ासन।

लाभ

शारीरिक लाभ-पैरों के जोड़ों एवं टांगांे की पेशियों को बल मिलता है। गठिया एवं सायटिका में लाभकारी।

मानसिक लाभ-मन को स्थिरता, एकाग्रता एवं आत्मविश्वास प्राप्त होता है।

आध्यात्मिक लाभ-यह आत्मिक ऊर्जा विकसित करने हेतु उपयोगी अभ्यास है।

सावधानियाँ एवं सीमाएँ-आर्थरायटिस के रोगी योगगुरु के सान्निध्य में करें।

चित्र सं0 10 संकटासन में अन्तिम शारीरिक स्थिति

उत्कटासन

अर्थ-उत्कट का अर्थ है कठिन, सामर्थ्यवान या प्रभावी। इस आसन में किसी भी स्थिति से प्रतिक्रिया की जाती है; इसलिए इसे उत्कटासन कहा जाता है।

पूर्वाभ्यास-उकड़ू बैठना।

उत्तर अभ्यास-गोरक्षासन।

विधि एवं शारीरिक स्थितियाँ

1. सीधे खड़े होकर; दोनों पैरों के बीच में थोड़ा-सा अन्तर कर लेते हैं।

2. घुटने मोड़कर शरीर का भार दोनों पैरों पर रख लेते हैं। उकड़ू बैठते हैं। जांघे और पिंडलियाँ आपस में मिली रहती हैं अर्थात् जांघों का भार भी पिंडलियों पर रहेगा। आगे से घुटने फैले हुए रहेंगें।

3. फिर दोनों पैरों को की एड़ियों पीछे से उठाकर शरीर का भार दोनों पंजों पर रख लेते हैं।

4. हथेलियाँ दोनों घुटनों पर रख लेते हैं। गर्दन एवं कमर सीधी रहेगी।

5. जितनी देर हो सके आराम से इस आसन में बैठना चाहिए; सांसें सामान्य गति से चलती रहती हैं। 4 से 6 आवृत्तियाँ की जा सकती हैं।

लाभ

शारीरिक लाभ-शारीरिक संतुलन बनता है। यह जंघाओं की पेशियों को मजबूती प्रदान करता है।

मानसिक लाभ-एकाग्रता का भाव विकसित होता है।

आध्यात्मिक लाभ-मूलाधार चक्र को लाभ होता है।

सावधानियाँ एवं सीमाएँ-संतुलन बिगड़ना नहीं चाहिए।

चित्र 11 उत्कटासन में अन्तिम शारीरिक स्थिति

वृक्षासन

अर्थ-संस्कृत शब्द वृक्ष का अर्थ है-पेड़; यह आसन खड़े होकर किया जाता है तथा इसमें वृक्ष के ही समान स्थिरता होती है; इसलिए यह वृक्षासन कहलाता है।

विधि एवं शारीरिक स्थितियाँ

1. दोनों पैरों को आपस में मिलाकर सीधे खड़े हो जाना चाहिए।

2. बांये पैर को उठाते हुए; उसका तलुआ दाहिने पैर के जंघामूल पर स्थित करना चाहिए एवं स्थिर होने का प्रयास करना चाहिए।

3. फिर दोनों हाथों को मिलाकर नमस्कार मुद्रा में खड़े होना चाहिए। पूरा शरीर लम्बवत् अर्थात् भूमि से 90 डिग्री का कोण बनाते हुए स्थिर होना चाहिए।

4. आंखें खुली ही रहेंगी तथा दृष्टि को सीधा रखते हुए किसी एक बिन्दु पर स्थिर करने का प्रयास करना चाहिए।

5. इस प्रकार उपर्युक्त अन्तिम स्थिति में अधिकतम सामथ्र्यानुसार खड़े रहना चाहिए।

6. फिर पूर्व स्थिति में आकर; दूसरे पैर से भी यह प्रक्रिया दोहरानी चाहिए।

पूर्वाभ्यास-सामान्यतः यह आसन अभ्यासांे के अन्त में सारे आसन एवं प्राणायामों के उपरान्त शरीर को पुनः सामान्य स्फूर्ति हेतु तनाव आदि दूर करने को करना चाहिए। इसलिए लेटकर और बैठकर किये जाने वाले आसन पूर्वाभ्यास ही हुए।

उत्तर अभ्यास-यदि आवश्यक हो तो शवासन का अभ्यास करना चाहिए।

लाभ

शारीरिक लाभ-स्थिरता एवं दृढ़ता प्राप्त होती है। शारीरिक तनाव आदि दूर होते हैं।

मानसिक लाभ-मानसिक तनाव आदि दूर होता है एवं एकाग्रता विकसित होती है।

आध्यात्मिक लाभ-ध्यान आदि हेतु आवश्यक शारीरिक स्थिरता एवं मानसिक एकाग्रता प्राप्त होती है।

सावधानियाँ एवं सीमाएँ-अति-शारीरिक दुर्बलता एवं घुटने के ऑपरेशन वालों को नहीं करना चाहिए।

चित्र 12 वृक्षासन में अन्तिम शारीरिक स्थिति

कालभैरवासन

अर्थ-सम्भवतः कि। -सी योगी के नाम पर इस आसन का नामकरण किया गया होगा।

पूर्वाभ्यास-एकपाद स्कन्धासन।

उत्तर अभ्यास-शवासन।

विधि एवं शारीरिक स्थितियाँ

1. दोनों पैरों को यथाशक्ति पूरा फैलाकर खड़े हों।

2. दाहिनी हथेली को दाहिने पैर के भीतर की ओर तलुवे के पास रखें।

3. बाँयें हाथ को ऊपर उठायें।

4. फिर दाहिने पैर को मोड़कर दाहिने कंधे से पीछे की ओर ले जाकर बाँये कंधे पर स्थिर करने का प्रयास करें।

5. यह अन्तिम स्थिति है; इस स्थिति में यथाशक्ति रुकने का प्रयास करें। फिर पूर्वस्थिति में लौटकर दूसरी ओर से भी यह आसन करें।

6. अन्तिम स्थिति में सांसें सामान्य गति से चलती रहनी चाहिए।

लाभ

शारीरिक लाभ-श्वसन, पाचन, तन्त्रिका, पेशी एवं रक्त परिसंचरण तन्त्रों को विशेष लाभ होता है। कमर एवं पेट की चर्बी हटती है। पैर एवं हाथों की पेशियों को मजबूती प्राप्त होती है। शारीरिक संतुलन बनता है।

मानसिक लाभ-एकाग्रता एवं स्थिरता में वृद्धि होती है। मानसिक तनाव एवं अवसाद समाप्त होता है।

आध्यात्मिक लाभ-चक्र जागरण।

सावधानियाँ एवं सीमाएँ-क्षमतानुसार ही करना चाहिए; क्योंकि यह एक कठिन अभ्यास है।

चित्र 13 कालभैरवासन में अन्तिम शारीरिक स्थिति

अश्वत्थासन

अर्थ- अश्वत्थ का अर्थ पीपल होता है; इस आसन में हाथ पीपल की शाखाओं एवं पैर जड़ों के समान सुस्थिर रहते हैं; इसीलिए इस वृक्ष के नाम पर इस आसन का नामकरण किया गया है।

विधि एवं शारीरिक स्थितियाँ


1. दोनों पैरों को आपस में मिलाकर सीधे खड़े हों।

2. अपने दाहिने हाथ को सीधा सिर के ऊपर उठायें; जिससे हथेली सामने रहे।

3. बाँयें हाथ को कंधे की सीध में उठायें और सीधा भूमि की समानान्तर फैलायें।

4. अब दाहिने पैर को उठाकर घुटने से बिना मोड़े सीधे पीछे की ओर ले जायें और सिर को हल्का-सा पीछे ले जाते हुए गर्दन को थोड़ा पीछे की ओर खींचें।

5. अन्तिम स्थिति में यथाशक्ति रहें; फिर पूर्व स्थिति में लौट जायें तथा फिर दूसरी ओर से भी ऐसा ही अभ्यास करें। 4 से 6 बार कर सकते हैं।

पूर्वाभ्यास-वृक्षासन।

उत्तर अभ्यास-नटराजासन।

लाभ

शारीरिक लाभ-कमर दर्द, सर्वाइकल स्पॉन्डलायटिस एवं उच्च रक्तचाप को दूर करने में उपयोगी। हाथ एवं पैर की पेशियों को मजबूती प्राप्त होती है। अन्तःस्रावी ग्रन्थियों की कार्य प्रणाली में सुधार होता है।

मानसिक लाभ-मानसिक क्रियाशीलता एवं एकाग्रता।

आध्यात्मिक लाभ-विशुद्ध चक्र की क्रियाशीलता।

सावधानियाँ एवं सीमाएँ-जिनको तेज सिर चकराने की समस्या हो वे न करें। यथाशक्ति ही अन्तिम स्थिति में रहें।

चित्र 14 अश्वत्थासन में अन्तिम शारीरिक स्थिति

विकटासन

अर्थ-विकट अर्थात् कठिन; इस आसन में अधिक देर तक अन्तिम स्थिति में बने रहना कठिन है; इसलिए इसे विकटासन कहते हैं।

विधि एवं शारीरिक स्थितियाँ

1. घुटनों के बल बैठें; दाहिने पैर को अपने ही स्थान पर रहनें दें। बाँयें पैर को टांग से सीधा रखते हुए; पीछे की ओर फैला लें।

2. अब दाहिने पैर के पंजे पर शरीर टिकाते हुए उसी पर दाहिने भाग का भार डालें। एड़ी प्रजननांग के सामने छूते हुए रहेगी।

3. अब बाँयें पैर के पंजे को सामने मोड़ते हुए पेट की ओर सामने चिपका लेंगे।

4. अन्तिम स्थिति में दाहिना हाथ दाहिने घुटने तथा बाँयाँ हाथ बाँयें घुटने पर रहेगा।

5. कमर एवं गर्दन सीधे रहेंगे।

पूर्वाभ्यास-उत्कटासन।

उत्तर अभ्यास-शवासन।

लाभ

शारीरिक लाभ-किडनी आदि अंगों को लाभ प्राप्त होता है। मेरुरज्जु लचीला होता है। हाथ पैरों की पेशियों को मजबूती मिलती है।

मानसिक लाभ-एकाग्रता प्राप्त होती है।

आध्यात्मिक लाभ-चैतन्य के स्तर में वृद्धि।

सावधानियाँ एवं सीमाएँ-जिन्हें घुटनों में समस्या हो; वे न करें।

चित्र 15 विकटासन में अन्तिम शारीरिक स्थिति

उत्थित पद्मासन

अर्थ-उत्थित पद्मासन अर्थात् पद्मासन में ऊपर उठना।

विधि एवं शारीरिक स्थितियाँ

1. पद्मासन में बैठें, फिर दोनों हाथों की हथेलियों को भूमि पर टिका दें।

2. उँगलियों को फैलाते हुए; पैरों और घुटनों के बीच वाले भागों को बाहर से कोहनियों के ऊपर टिकाते हैं।

3. फिर पूरे शरीर का भार हाथों पर डालते हुए शरीर को ऊपर उठाते हैं।

4. इस अन्तिम स्थिति में कुछ देर तक रहना चाहिए; फिर पूर्वस्थिति में लौट जाना चाहिए।

पूर्वाभ्यास-पद्मासन।

उत्तर अभ्यास-शवासन।

लाभ

शारीरिक लाभ-पद्मासन के समस्त लाभों के अतिरिक्त इस आसन से कोहनी, कंधे, कलाई तथा पैरों को मजबूती प्राप्त होती है।

मानसिक लाभ-एकाग्रता एवं संतुलन प्राप्त होकर अवसाद एवं तनाव की समाप्ति होती है।

आध्यात्मिक लाभ-चक्र एवं कुण्डलिनी जागरण।

सावधानियाँ एवं सीमाएँ-जिनको पेट एवं जोड़ों से सम्बन्धित गम्भीर समस्या हो; उन्हें यह आसन नहीं करना चाहिए।

चित्र 16 उत्थित पद्मासन में अन्तिम शारीरिक स्थिति

कुक्कुटासन

अर्थ-कुक्कुट का अर्थ है- मुर्गा

विधि एवं शारीरिक स्थितियाँ

1. पद्मासन में स्थिर हो जाना चाहिए।

2. दाहिने हाथ को दाहिने पैर की जंघा एवं पिंडली के बीच में से प्रवेश करवाना चाहिए।

3. बाँयें हाथ को बाँएँ पैर की जंघा एवं पिंडली के बीच में से प्रवेश करवाना चाहिए।

4. दोनों हथेलियों को भूमि पर टिकाना चाहिए तथा हाथों के सहारे पूरे शरीर को ऊपर उठाना चाहिए।

पूर्वाभ्यास-पद्मासन।

उत्तर अभ्यास-शवासन।

लाभ

शारीरिक लाभ-हाथ एवं पैरों की मजबूती। भुजा, कंधे, कोहनी और कलाइयों को मजबूती प्राप्त होती है। छाती एवं पेट की पेशियों को मजबूती प्राप्त होती है।

मानसिक लाभ-मानसिक संतुलन, स्थिरता एवं एकाग्रता।

आध्यात्मिक लाभ-मूलाधार चक्र जागरण एवं कुण्डलिनी जागरण।

सावधानियाँ एवं सीमाएँ-जिनको पेट, हाथ-पैरों के जोड़ों में दर्द अथवा कोई गम्भीर रोग हो; उन्हंे नहीं करना चाहिए।

चित्र 17 कुक्कुटासन में अन्तिम शारीरिक स्थिति

कर्णपीड़ासन

अर्थ-कर्णपीड़ा अर्थात् कानों तक पीड़ा का अनुभव होने के कारण इसे कर्णपीड़ासन कहा गया है।

विधि एवं शारीरिक स्थितियाँ

1. पीठ के बल लेट जायें। आंखें बन्द, चेहरा शान्त, दोनों पैर आपस में मिलें हुए रहेंगे एवं हाथ जांघों के बगल में सटे हुए रहेंगे।

2. अब पैरों को घुटनों से सीधा रखते हुए ऊपर उठायें; 90 डिग्री के कोण पर थोड़ी देर रुकें।

3. सांस छोड़ते हुए; पैरों के अग्र भाग को पूरा पीछे ले जाते हुए; पंजों को भूमि पर टिका दें। घुटने बिल्कुल सीधे रहेंगे। हाथ अपने स्थान पर ही रहेंगे।

4. अब दोनों घुटनों को मोड़कर दोनों कानों के बगल तक लाने का प्रयास करना चाहिए।

5. फिर दोनों हाथों की उंगलियों को आपस में मिलाकर उंगलियों को आपस में जकड़ लेना चाहिए। यह अन्तिम स्थिति है।

6. अन्तिम स्थिति में सांस सामान्य रूप से चलती रहनी चाहिए; इस स्थिति में थोड़ी देर रहकर फिर पूर्वावस्था में आ जाना चाहिए।

7. शवासन में विश्राम करना चाहिए।

पूर्वाभ्यास-उत्तानपाद आसन, हलासन।

उत्तर अभ्यास-शवासन।

लाभ

शारीरिक लाभ-पाचनांगों पर दबाव पड़ने से उनकी कार्यप्रणाली में सुधार आता है। गैस, कब्ज, अपच आदि समस्याएँ दूर होती हैं। पीठ की मांसपेशियाँ मज़बूत एवं स्फूर्त होती हैं। दीर्घ एवं गहन श्वसन से श्वसन तन्त्र हेतु उपयोगी है। उत्सर्जन, प्रजनन, रक्त परिसंचरण एवं पेशी तन्त्र को लाभ होता है। तन्त्रिका तन्त्र स्फूर्त होता है एवं सिरदर्द आदि की समस्या समाप्त होती है।

मानसिक लाभ-सिर की ओर रक्त-परिसंचरण सुचारु होने से अनिद्रा, तनाव, अवसाद, क्रोध एवं चिड़चिड़ापन आदि समस्याएँ दूर होती है। मानसिक शान्ति एवं स्थिरता प्राप्त होती है।

आध्यात्मिक लाभ-चक्र एवं कुण्डलिनी जागरण।

सावधानियाँ एवं सीमाएँ-उच्चरक्तचाप, हृद्यरोग तथा घुटने में दर्द आदि से पीड़ित व्यक्ति न करें।

चित्र 18 कर्णपीड़ासन में अन्तिम शारीरिक स्थिति

टिट्टिभासन

अर्थ-टिट्टिभ का अर्थ है टिटिहरी। इस आसन को करते हुए जुगनूं जैसी स्थिति बनती है; इसलिए इस टिट्टिभ आसन कहते हैं।

विधि एवं शारीरिक स्थितियाँ

1. दण्डासन में बैठते हैं।

2. पैरों को आगे से फैलाकर डेढ से दो फीट का अन्तर कर लेते हैं।

3. दोनों हाथों की हथेलियों को दोनों जांघों के बीच में भूमि पर रखते हुए पूरे शरीर का भार हाथों पर डालते हुए शरीर को ऊपर उठाते हैं।

4. गर्दन एवं कमर सीधी आँखें खुली हुई किसी एक बिन्दु पर स्थिर होंगी तथा सांसें सामान्य गति से चलती रहेंगी। यह अन्तिम स्थिति है। इसमें आधा से एक मिनट तक रुकने का प्रयास करना चाहिए; किन्तु यह कठिन अभ्यास है। इसलिए संतुलन बनने तक ही करना चाहिए।

5. अन्तिम स्थिति में कुछ देार रहकर वापस पूर्व स्थिति में लौट जाना चाहिए।

पूर्वाभ्यास-कुक्कुट आसन।

उत्तर अभ्यास-तौलुंगासन।

लाभ

शारीरिक लाभ-हाथों एवं पैरों की पेशियाँ अत्यंत मज़बूत हो जाती हैं। स्फूर्ति आती है। रक्त परिसंचरण एवं श्वसन तन्त्र को विशेष लाभ होता है।

मानसिक लाभ-स्थिरता एवं एकाग्रता।

आध्यात्मिक लाभ-मानसिक संतुलन होने से ध्यान आदि हेतु पृष्ठभूमि तैयार होती है।

सावधानियाँ एवं सीमाएँ-जिनके हाथों में दर्द हो या कमजोर हों उन्हें नहीं करना चाहिए।

चित्र 19 टिट्टिभासन में अन्तिम शारीरिक स्थिति

जानुशीर्षासन या जानुसिरासन

अर्थ-जानु अर्थात् घुटना एवं शीर्ष अर्थात् सिर। इस आसन में सिर के अग्रभाग को घुटने पर लगाया जाता है; इसलिए इसे जानुसिरासन कहा जाता है।

विधि एवं शारीरिक स्थितियाँ

1. दण्डासन में बैठकर आंखे बन्द एवं चेहरा तनावरहित व शान्त कर लेना चाहिए।

2. दाहिना पैर घुटने से मोड़कर उसका तलुआ; बांयीं जंघा के मूल में भीतर की ओर लगाना चाहिए।

3. आगे झुककर बाएँ अँगूठे को दोनों हाथों से पकड़कर; सामान्य श्वास लीजिए।

4. बांयें पैर के घुटने को कड़ा रखते हुए; सांस लेते हुए सिर को ऊपर की ओर उठाते हुए ऐसे स्थिति बनानी चाहिए कि सिर एवं बांये पैर में 45 डिग्री का कोण बने। इस स्थिति में 15 से 20 सेकंड रुकना चाहिए।

5. साँस छोड़ते हुए; धड़ को आगे झुकाना चाहिए तथा कोहनी मोड़ते हुए अधिकाधिक आगे झुकना चाहिए तथा माथा, ठुड्डी एवं नाक को बाएँ पैर पर टिका देना चाहिए। पीठ बिल्कुल सीधी होनी चाहिए। यह अन्तिम अवस्था है। सामान्य साँस लेते एवं छोड़ते हुए; इस अवस्था में यथाशक्ति अथवा 1 मिनट तक रुकना चाहिए।

6. फिर ऐसे ही बांया पैर मोड़कर दूसरी ओर से भी दोहराना चाहिए।

7. दण्डासन में वापस आ जायें।

पूर्वाभ्यास-दण्डासन।

उत्तर अभ्यास-पश्चिमोत्तानासन।

लाभ

शारीरिक लाभ-बूढ़े लोग जिनके घुटनों में दर्द हो; उनको इस अभ्यास से लाभ होता है। यकृत, प्लीहा एवं अग्राशय की मालिश होने से पाचन क्रिया को विशेष लाभ होता है। फलस्वरूप अपच, मंदाग्नि, कब्ज एवं गैस आदि रोग दूर होते हैं। मल-मूत्र अंगों को लाभ होने से उत्सर्जन प्रक्रिया सुचारु होती है। हॉर्मोन्स में सुधार होने से प्रजनन तन्त्र को लाभ होता है। सांसों के गहरे होने से श्वसन तन्त्र के रोगों जैसे-अस्थमा आदि में लाभ होता है। अन्तःस्रावी ग्रन्थियों को भी लाभ होता है। पीलिया का रोगी स्वस्थ होने के उपरान्त यदि यह आसन करे तो यकृत बिल्कुल सही हो जाता है। उच्चरक्तचाप, आधा सिर में दर्द तथा महिलाओं को मासिक धर्म के समय होने वाला पेटदर्द आदि ठीक हो जाते हैं।

मानसिक लाभ-मन शान्त एवं स्थिर होने से तनाव, अवसाद तथा चिंता आदि रोग दूर होते हैं।

आध्यात्मिक लाभ-मेरुरज्जु के पुच्छ भाग में रक्त का संचार बढ़ने से विशेष सनसनाहट-सी होती है; जिससे पता चलता है कि कुण्डलिनी जागरण हेतु यह आसन विशेष रूप से उपयोगी है।

सावधानियाँ एवं सीमाएँ-सामथ्र्यानुसार ही अन्तिम अवस्था में रहना चाहिए। जिनके घुटने, पेट व गर्भाशय का ऑपरेशन हो चुका हो वे तुरन्त न करें।

चित्र 20 जानुशीर्षासन या जानुसिरासन में अन्तिम शारीरिक स्थिति

भुजंगासन

अर्थ-भुजंग अर्थात् सांप; इस आसन में शरीर की अन्तिम स्थिति फ़न उठाये हुए सांप जैसी होने के कारण; इसे भुजंगासन कहते हैं।

विधि एवं शारीरिक स्थितियाँ

1. पेट के बल लेट जायें। हाथ जांघों के बराबर में शरीर से सटे रहेंगे।

2. हाथों की हथेलियेां को छाती के बराबर में बगल में टिकाते हुए धीरे-धीरे पहले माथा उठाकर ठुड्डी को भूमि पर टिकाना चाहिए।

3. फिर सांस बाहर छोड़ते हुए; धीरे-धीरे छाती और पेट का नाभि तक का भाग ऊपर उठाते हुए; सिर को पीछे की ओर ले जाना चाहिए।

4. यह स्थिति फ़न उठाये हुए सांप जैसी होती हैे; शरीर का पूरा भार नाभि वाले भाग पर होना चाहिए। इस स्थिति में सांस को सामान्य गति से चलते रहना चाहिए और लगभग एक मिनट अथवा सामथ्र्यानुसार इसी स्थिति में-में कुछ देर रुकना चाहिए।

5. फिर दोनों पैरों को घुटनों से मोड़कर पंजे उठाते हुए उन्हें सिर पर लगाने का प्रयास करना चाहिए। यह पूर्ण स्थिति है; किन्तु यदि यह स्थिति सम्भव न हो तो पैरों को पीछे ही फैले रहने देना चाहिए।

6. धीरे-धीरे पूर्वस्थिति में वापस आ जाना चाहिए। कुछ समय के लिए शवासन में विश्राम करना चाहिए।

पूर्वाभ्यास-शलभासन।

उत्तर अभ्यास-धनुरासन।

लाभ

शारीरिक लाभ-श्वसन, पाचन, प्रजजन एवं उत्सर्जन तन्त्रों को लाभ होता है। थॉयरॉयड, दमा, मासिक धर्म अनियमितता तथा कमरदर्द आदि दूर होते हैं। कब्ज, अपच, गैस, अग्निमांद्य तथा पथरी आदि में लाभकारी।

मानसिक लाभ-तनाव, अवसाद, क्रोध, चिड़चिड़ापन तथा अनिद्रा दूर होते हैं।

आध्यात्मिक लाभ-चक्र एवं कुण्डलिनी जागरण।

सावधानियाँ एवं सीमाएँ-पेट के गम्भीर रोगों से पीड़ित एवं जिनका कुछ समय पूर्व ही ऑपरेशन हुआ हो; वे व्यक्ति न करें।

चित्र 21 भुजंगासन (पूर्ण) में अन्तिम शारीरिक स्थिति

शलभासन

अर्थ-शलभ का अर्थ है-टिड्डी; इस आसन में शरीर की स्थिति पूँछ उठायी हुई टिड्डी के समान होता है; इसलिए यह शलभासन कहलाता है।

विधि एवं शारीरिक स्थितियाँ

1. पेट के बल लेटकर, हथेलियों को ऊपर की ओर करके, मुठ्ठी बाँध लेनी चाहिए।

2. मुठ्ठियों का पिछला भाग भूमि पर रखा जाता है।

3. मुख को उठाकर मात्र ठुड्डी को भूमि पर रखा जाता है।

4. गहरी सांस भीतर भरकर, पूरा शरीर कड़ा करके पैरों को ऊपर उठाया जाता है।

5. पैरों को उठाकर सांस को रोक लिया जाता है; शरीर का पूरा दबाव मुठ्ठियों को प्रतीत होता है। यहाँ तक अर्धशलभासन कहलाता है।

6. पूर्ण शलभासन के लिए हथेलियों की उंगलियों को आपस में फंसाकर सिर के पीछे लगाकर सिर को सहारा देेंगे। इसके बाद आगे का भाग भी नाभि तक उठा लेंगे। यह बहुत कठिन है; यदि सम्भव न हो तो अर्धशलभ ही करना चाहिए।

7. जितनी देर पैर उठे हुए रहते हैं; सांस को रुके ही रहना चाहिए तथा आँखें बन्द रहेंगी।

8. जब ऐसा लगे कि अब सांस नहीं रोकी जा सकती; तब धीरे से टांगों को नीचे लाकर पेशियों को शिथिल कर लिया जाता है।

9. जब सांस सामान्य हो जाय तो फिर से दोहराना चाहिए। इस प्रकार 3 से 7 बार सामथ्र्यानुसार करना चाहिए।

पूर्वाभ्यास-धनुरासन।

उत्तर अभ्यास-वृश्चिक आसन।

लाभ

शारीरिक लाभ-पाचन, श्वसन, उत्सर्जन एवं रक्त परिसंचरण तन्त्र को विशेष लाभ। भुजंगासन के सभी लाभ इसमें भी प्राप्त होते हैं।

मानसिक लाभ-मानसिक स्थिरता एवं स्वस्थता।

आध्यात्मिक लाभ-चक्र जागरण।

सावधानियाँ एवं सीमाएँ-पेट, फेफड़े, हृद्य एवं नये हुए ऑपरेशन वाले व्यक्ति न करें। सामान्य व्यक्ति सामथ्र्यानुसार ही करें।

चित्र 22 अ। शलभासन (अर्ध) में अन्तिम शारीरिक स्थिति

चित्र 22 ब। शलभासन (पूर्ण) में अन्तिम शारीरिक स्थिति

उत्तानपादासन

अर्थ-उत्तान अर्थात् ऊपर को तानना, पाद अर्थात् पैर; पैरों को उठाकर ताने जाने के कारण इसे उत्तादपादासन कहते हैं।

विधि एवं शारीरिक स्थितियाँ

1.पीठ के बल लेटना चाहिए।

2. दोनों पैर सीधे फैले हुए; आपस में मिले होने चाहिए; हाथों की हथेलियाँ जांघांे के बगल में; सीधे एवं भूमि पर रखी होनी चाहिए।

3. साँस भरते हुए; पैरों को घुटने से सीधे रखते हुए ही ऊपर उठाएँ।

4. पैर 90 डिग्री के समान भूमि से लम्बवत् होने चाहिए तथा हाथ अपने ही स्थान पर रहेंगे। यह अन्तिम स्थिति है, गहरी सांसें चलती रहेंगी एवं आंखें बन्द रहेंगी। इस स्थिति में यथाशक्ति स्थिर रहकर सांस छोड़ते हुए पुनः पूर्वस्थिति में लौट आयेंगे। 4 से 6 आवृत्ति कर सकते हैं।

पूर्वाभ्यास-एकपादउत्तानासन।

उत्तर अभ्यास-हलासन।

लाभ

शारीरिक लाभ-पेट की पेशियों पर बल पड़ने के कारण पाचन संस्थान को विशेष लाभ होता है। गहरी सांसों के आने-जाने से श्वसन तन्त्र को भी विशेष लाभ होता है। पैरों की पेशियों में खिंचाव होने से पैरों की पेशियों को लाभ होता है। पेट पर बल पड़ने से इस भाग की चर्बी घटती है।

मानसिक लाभ-मानसिक स्थिरता एवं स्वस्थता प्राप्त होती है।

आध्यात्मिक लाभ-पुच्छ कशेरुक पर रक्त संचार बढ़ने से कुण्डलिनी जागरण हेतु उपयोगी।

सावधानियाँ एवं सीमाएँ-पेट के गम्भीर रोग एवं ऑपरेशन वाले व्यक्ति न करें।

चित्र 23 उतानपादासन में अन्तिम शारीरिक स्थिति

ताड़ासन

अर्थ-ताड़ एक पेड़ का नाम है; जो बहुत ऊँचा होता है; इस आसन को खड़े होकर किया जाता है तथा इसमें शरीर को पूरा खींचते हुए ताड़ के समान सीधा किया जाता है। इस आसन से ऊँचाई भी बढ़ती है। इस दृष्टि से इसे ताड़ासन कहा जाता है।

विधि एवं शारीरिक स्थितियाँ

1. सीधे खड़े होते हैं। दोनों पैरों में लगभग अपने ही कंधे के बराबर दूरी बनाते हैं।

2. गहरी सांस भरते हुए; दोनों हाथों की हथेलियों को पूरा खोलकर तथा कोहनियों से सीधा रखते हुए पूरा ऊपर उठाते हैं।

3. फिर पंजों पर खड़े होते हुए; पूरे शरीर को तानते हुए; पूरा भार पंजों पर ही डालते हैं। यह अन्तिम स्थिति है। इसमें सामान्य सांस चलती रहेगी तथा आंखें खुली रहेंगी। जितनी देर हो सके इसमें बने रहते हैं।

4. फिर पूरा साँस छोड़ते हुए; हाथों को नीचे ले आते हैं; पूरे पैरों को भूमि पर टिकाकर पूर्वावस्था में खड़े हो जाते है। इसको 5 से 10 बार दोहराया जाता है।

पूर्वाभ्यास-वृक्षासन।

उत्तर अभ्यास-

लाभ

शारीरिक लाभ-किशोरों के शरीर की ऊँचाई बढ़ती है। शरीर का सम्पूर्ण विकास होता है। स्थिरता बढ़ती है। एकाग्रता बढ़ती है।

मानसिक लाभ-व्यक्ति तनावरहित होता है तथा उसकी एकाग्रता बढ़ती है। मानसिक शान्ति मिलती है।

आध्यात्मिक लाभ-एकाग्रता के बढ़ने से ध्यान हेतु पृष्ठभूमि तैयार होती है।

सावधानियाँ एवं सीमाएँ-अन्तिम स्थिति में रुकने की समय सीमा एवं आवृत्तियाँ अपनी सामर्थ्यानुसार रखनी चाहिए।

चित्र 24 ताड़ासन में अन्तिम शारीरिक स्थिति

गरुड़ासन

अर्थ-एक पक्षी

विधि एवं शारीरिक स्थितियाँ

1. खड़े होकर शरीर का सारा बोझ दाहिने पैर पर डालें एवं बांयें पैर को उठाते हुए मोड़कर दाहिने घुटने से लिपटाकर पीछे की ओर ले जायें।

2. बाेँ पैर का पंजा दाहिने पैर की एड़ी से ऊपर के भाग पर लिपटा हुआ होना चाहिए।

3. दाहिने हाथ को कोहनी से मोड़कर हथेली को चेहरे के सामने की ओर करके दूसरे हाथ कोहनी से मोड़कर; इस हाथ की हथेली के भीतर की ओर से मोड़ते हुए तिरछे में हाथ जोड़ लें। यह अन्तिम स्थिति है; सामथ्र्यानुसार इसमें खड़ें रहें। सांसे सामान्य रूप से चलती रहेंगी एवं आंखें खुली रहेंगी।

4. फिर दूसरे पैर एवं हाथ से भी यह दोहरायें। इस प्रकार 4 से 6 बार दोहराना चाहिए।

5. धीरे-धीरे इसी प्रकार वापस पूर्वस्थिति में आ जाना चाहिए।

पूर्वाभ्यास-देर तक सीधे खड़े होना एवं संकटासन।

उत्तर अभ्यास-भूनमनासन।

लाभ

शारीरिक लाभ-पैरों के जोड़ों एवं टांगांे की पेशियों को बल मिलता है। हाथों की पेशियाँ सुदृढ़ होती हैं। गठिया एवं सायटिका में लाभकारी।

मानसिक लाभ-मन को स्थिरता, एकाग्रता एवं आत्मविश्वास प्राप्त होता है।

आध्यात्मिक लाभ-यह आत्मिक ऊर्जा विकसित करने हेतु उपयोगी अभ्यास है।

सावधानियाँ एवं सीमाएँ-आर्थरायटिस के रोगी योगगुरु के सान्निध्य में करें।

चित्र 25 गरुड़ासन में अन्तिम शारीरिक स्थिति"""

त्रिकोणासन

अर्थ-इस आसन की अन्तिम स्थिति में खड़े होकर त्रिकोण-सा बनता है; इसलिए यह त्रिकोण आसन कहलाता है।

विधि एवं शारीरिक स्थितियाँ

1. दोनों पैरों के बीच में डेढ़ से दो फीट का अन्तर बनाकर खड़े होते हैं।

2. कमर को मोड़ते हुए दाहिनी ओर झुकते हैं तथा दाहिने हाथ से दाहिने पैर की एड़ी को पकड़ते हैं।

3. बाँयें हाथ को उठाकर तथा मुंह को भी उठाकर सीधा आकाश की ओर कर लेते हैं। यह अन्तिम स्थिति है; सांसें सामान्य चलती रहेंगी तथा आँखें खुली रहेंगी। सामथ्र्यानुसार आधा से एक मिनट इस स्थिति में रह सकते हैं।

4. फिर दूसरी ओर के पैर और हाथ से भी वैसा ही करते हैं। इस प्रकार 6 से 8 आवृत्ति कर सकते हैं।

पूर्वाभ्यास-दाहिने-बाँये किये जाने वाला चक्रासन।

उत्तर अभ्यास-कालभैरव आसन।

लाभ

शारीरिक लाभ-हाथ और पैर की पेशियों को मजबूती प्राप्त होती है तथा सायटिका आदि में लाभकारी है। कमर की चर्बी घटती है। स्फूर्ति प्राप्त होती है। श्वसन एवं रक्त परिसंचरण तन्त्र को लाभ प्राप्त होता है।

मानसिक लाभ-मानसिक स्थिरता एवं एकाग्रता प्राप्त होती है।

आध्यात्मिक लाभ-ध्यान हेतु आवश्यक एकाग्रता प्राप्त होती है।

सावधानियाँ एवं सीमाएँ-जिन्हें सिर में चक्कर आने की समस्या हो वे न करें।

चित्र 26 त्रिकोणासन में अन्तिम शारीरिक स्थिति

शरीर-शिथिलीकारक आसन-

शवासन

अर्थ-शव अर्थात् मृत शरीर; इस आसन में व्यक्ति शव के समान निष्क्रिय पड़ा रहता है। इसीलिए इसे शवासन कहा जाता है।

विधि एवं शारीरिक स्थितियाँ

1. आँखें बन्द करके; पीठ के बल भूमि पर लेट जाते हैं।

2. दोनों पैरों को एक से डेढ़ फीट की दूरी बनाते हुए फैला लेते हैं।

3. दोनों हाथों को भी पैरों के समान फैला लेते हैं।

4. गर्दन ढ़ीली छोड़ देते हैं तथा सांसें सामान्य धीमी गति से चलती रहती हैं।

5. पूरे शरीर को तनावरहित करते हैं।

6. तब तक करना चाहिए; जब तक कि पूरा शरीर एवं मन शान्त एवं तनावरहित न हो जाय।

पूर्वाभ्यास-सभी आसनों के पश्चात् विश्राम हेतु किया जाता है।

उत्तर अभ्यास-योगनिद्रा आदि।

लाभ

शारीरिक लाभ-रक्त परिसंचरण सामान्य हो जाता है। सभी अंगों एवं शरीर तन्त्रों को विश्राम मिलता है। सभी आसनों के समय जिन अंगों पर खिंचाव अनुभव होता है; वे सभी अंग इस आसन में शिथिल होते हैं। समस्त शरीर में रक्त का संचरण एवं ऑक्सीजन का वहन अत्यंत निर्बाध रूप से होता है। महिलाएँ गर्भावस्था के समय इस आसन को दिनभर में अनेक बार कर सकती हैं। इस आसन को करने से पूरा शरीर एवं मन शिथिल एवं शान्त होते हैं।

मानसिक लाभ-मन को तनावरहित एवं शान्त करके व्यक्ति को मानसिक स्वस्थता प्राप्त होती है। यह आसन नकारात्मक एवं निराशाजनक विचारों को दूर करने हेतु अत्यंत उपयोगी है। क्रोध, चिड़चिड़ापन एवं अवसाद आदि दूर होते हैं।

आध्यात्मिक लाभ-प्रत्याहार की सिद्धि हेतु यह आसन उपयोगी है। आत्मिक सुख एवं शान्ति प्राप्त होते हैं।

सावधानियाँ एवं सीमाएँ-गुरु के निर्देशानुसार।

चित्र 27 शवासन में अन्तिम शारीरिक स्थिति

मकरासन

अर्थ-मकर अर्थात् मगरमच्छ। इस आसन में व्यक्ति मगरमच्छ के समान भूमि पर उल्टे लेटता है; इसलिए इस आसन को यह संज्ञा दी गयी है।

विधि एवं शारीरिक स्थितियाँ

1. पेट के बल लेटकर दोनों पैरों को एक से डेढ फीट के अन्तर पर रखना चाहिए। पैरों के पंजे बाहर एवं एड़ी भीतर की ओर होनी चाहिए।

2. हाथों को कोहनी से मोड़कर भूमि पर टिका देना चाहिए। फिर हाथों को घुमाकर हथेलियों को ठुड्डी के नीचे लगाकर चेहरे को उनके बीच में टिका देना चाहिए।

3. पूरा शरीर तनावरहित कर देना चाहिए एवं सांसें सामान्य गति से चलती रहेंगी तथा आँखें बन्द रहेंगी।

4. मन एवं शरीर के पूरे विश्रान्त हो जाने तक करना चाहिए।

पूर्वाभ्यास-पेट के बल लेटकर किये जाने वाले सभी आसनों के उपरान्त विश्राम हेतु किया जा सकता है।

उत्तर अभ्यास-भुजंगासन।

लाभ

शारीरिक लाभ-रक्त परिसंचरण सामान्य होकर पूरा शरीर तनावरहित एवं विश्रान्त होता है।

मानसिक लाभ-तनाव दूर होकर; मानसिक शान्ति प्राप्त होती है।

आध्यात्मिक लाभ-आत्मिक शान्ति प्राप्त होता है।

सावधानियाँ एवं सीमाएँ-गुरु के निर्देशानुसार।

चित्र 28 मकरासन में अन्तिम शारीरिक स्थिति

ध्यानात्मक आसन

सुखासन या मुक्तासन

अर्थ-इस आसन में लम्बे समय तक सुखपूर्वक बिना किसी तनाव के बैठा जा सकता है; इसलिए यह सुखासन कहलाता है।

विधि एवं शारीरिक स्थितियाँ

1. दण्डासन में बैठें।

2. दाहिने पैर को घुटने से मोड़कर पालथी मारने जैसी स्थिति में बाँयी जंघा के नीचे लायें।

3. फिर बाँयें पैर को भी इसी प्रकार से मोड़कर दाहिनी जंघा के नीचे लायें। साँसें सामान्य गति से चलती रहेंगी और आँखें बन्द रहेंगी।

4. दाहिनी हथेली दाहिने घुटने के ऊपर रखें तथा बाँयीं हथेली बाँयें घुटने के ऊपर रखें। कमर एवं गर्दन सीधी रहेगी।

5. इस स्थिति में सामथ्र्यानुसार जितनी देर चाहें बैठे रहें और ध्यान हेतु सांसों पर मन को स्थिर करंे।

पूर्वाभ्यास-दण्डासन।

उत्तर अभ्यास-सिद्धासन।

लाभ

शारीरिक लाभ-उच्चरक्तचाप एवं सिरदर्द दूर होता है। घुटने व पैरों की मांसपेशियों एवं रक्त वाहिकाओं को लाभ होता है। थकान दूर होती है।

मानसिक लाभ-मानसिक एकाग्रता एवं सुख प्राप्त होता है।

आध्यात्मिक लाभ-ध्यान हेतु उपयोगी।

सावधानियाँ एवं सीमाएँ-जिन्हें घुटनों में दर्द हो वे अधिक देर न करें।

चित्र 29 सुखासन में अन्तिम शारीरिक स्थिति

वज्रासन

अर्थ-वज्रासन शब्द वज्र से निर्मित है। वज्र का अर्थ है-इन्द्र का वह मज़बूत अस्त्र जिससे बिजली उत्पन्न होती है। इस नाम से शरीर की एक नाड़ी का नामकरण भी किया गया है। जो कि शरीर के श्रोणि या वस्ति प्रदेश (Pelvic Region से सम्बन्धित है। वज्रासन से इस नाड़ी को लाभ होता है; जिससे पाचन, उत्सर्जन एवं प्रजनन तन्त्रों को विशेष लाभ प्राप्त होता है। इस आसन से शरीर वज्र के समान मज़बूत एवं शक्तिशाली बनता है; इसलिए इसे वज्रासन कहा जाता है।

विधि एवं शारीरिक स्थितियाँ

1. दण्डासन में बैठें।

2. अपनी बांयी टांग को घुटने से मोड़कर पैर को बांयी जंघा के नीचे लायें तथा पैर का तलुआ ऊपर की ओर करते हुए पंजे को पूरा भूमि पर लिटा दें।

3. इसी प्रकार अपनी दाहिनी टांग को घुटने से मोड़कर पैर को दाहिनी जंघा के नीचे लायें तथा पैर का तलुआ ऊपर की ओर करते हुए पंजे को पूरा भूमि पर लिटा दें।

4. दोनों घुटने एवं जांघें मिली हुई होती हैं। हाथों की हथेलियाँ नीचे की ओर करके घुटनों पर रखी जाती है।

5. शरीर का पूरा भार एड़ियों के बीचों बीच होना चाहिए, रीढ़ की हड्डी, गर्दन आदि सीधे होने चाहिए।

6. आँखें बन्द एवं चेहरा तनावरहित कर लें तथा यथाशक्ति लम्बे समय तक आसन की इस अन्तिम स्थिति में रहना चाहिए। सांसें सामान्य गति से चलती रहनी चाहिए।

7. प्रारम्भ में पांच मिनट से लेकर उत्तरोत्तर समय बढ़ाया जाना चाहिए। ध्यान हेतु जितनी देर भी बैठना हो; इस आसन में शान्त एवं सुस्थिर होकर बैठा जा सकता है।

8. इस प्रकार अन्तिम स्थिति में यथाशक्ति रहने के पश्चात् हाथेलियों को आपस में रगड़ते हुए एवं आँखें खोलते हुए; पूर्वस्थिति में आ जाना चाहिए।

पूर्वाभ्यास-दण्डासन, शलभासन।

उत्तर अभ्यास-सुप्त वज्रासन, मकरासन आदि।

लाभ

शारीरिक लाभ-कमजोर पाचन संस्थान को मज़बूत बनाने हेतु यह आसन अत्यंत उपयोगी है। इसके अतिरिक्त रक्त परिसंचरण संस्थान हेतु भी उपयोगी है।

मानसिक लाभ-इस अभ्यास से मन स्थिर, शान्त एवं तनावरहित होता है।

आध्यात्मिक लाभ-ध्यान एवं समाधि हेतु अत्यंत उपयोगी अभ्यास। चक्र एवं कुण्डलिनी जागरण में भी सहयोगी अभ्यास।

सावधानियाँ एवं सीमाएँ-जिन्हें मेरुरज्जु के लम्बर क्षेत्र में कोई समस्या, बड़ी अथवा छोटी आँत से सम्बन्धित कोई गम्भीर रोग, अल्सर तथा हर्निया आदि हो उन्हें इस आसन का अभ्यास नहीं करना चाहिए। कमर, गर्दन आदि बिल्कुल सीधे, आँखें बन्द, चेहरा तनावरहित एवं शान्त होना चाहिए।

चित्र 30 वज्रासन में अन्तिम शारीरिक स्थिति

अर्धपद्मासन तथा पद्मासन

अर्थ-पद्म अर्थात् कमल; इस आसन की अन्तिम स्थिति में पैर कमल की आकृति जैसे दिखते हैं; इसलिए यह पद्मासन कहलाता है।

विधि एवं शारीरिक स्थितियाँ

पूर्वाभ्यास-दण्डासन।

उत्तर अभ्यास-बद्धपद्मासन।

अर्धपद्मासन विधि-

1. दण्डासन में बैठते हैं। कमर एवं गर्दन सीधे रहेंगे एवं भूमि से 90 डिग्री का कोण बनायेंगे।

2. दाहिनी टांग को घुटने से मोड़कर पैर को बांयी जांघ के मूल पर रखा जाता है। जांघ के जोड़ पर स्थिर करके तलुआ बाहर की ओर रहेगा।

3. आँखें बन्द, चेहरा तनाव रहित एवं शान्त तथा दोनों हथेलियाँ ज्ञानमुद्रा में घुटनों पर रहेंगी।

पद्मासन विधि-

1. दण्डासन में बैठते हैं। कमर एवं गर्दन सीधे रहेंगे एवं भूमि से 90 डिग्री का कोण बनायेंगे।

2. दाहिनी टांग को घुटने से मोड़कर पैर को बांयी जांघ के मूल पर रखा जाता है। जांघ के जोड़ पर स्थिर करके तलुआ बाहर की ओर रहेगा।

3. बाईं टाँग को घुटने से मोड़कर दाहिनी जांघ के मूल पर रखा जाता है। जांघ के जोड़ पर स्थिर करके तलुआ बाहर की ओर रहेगा।

4. दोनों पैर एक दूसरे पर स्थिर होने के बाद कमल जैसी आकृति बनती है।

5. इसके पश्चात् बाएँ हाथ की हथेली को ऊपर की ओर करके एड़ियों के बीच में रखते हैं तथा उसके ऊपर दूसरे हाथ की हथेली को स्थिर करते हैं। अथवा ज्ञान मुद्रा में भी बैठ सकते हैं।

6. शरीर का पूरा भार शरीर के बीचों बीच होना चाहिए, रीढ़ की हड्डी, गर्दन आदि सीधे होने चाहिए।

7. आँखें बन्द एवं चेहरा तनावरहित कर लें। सांसें सामान्य गति से चलती रहनी चाहिए तथा यथाशक्ति लम्बे समय तक आसन की इस अन्तिम स्थिति में रहना चाहिए।

8. प्रारम्भ में पांच मिनट से लेकर उत्तरोत्तर समय बढ़ाया जाना चाहिए। अभ्यस्त होने पर 3 से 5 घंटे तक भी किया जा सकता है। ध्यान हेतु जितनी देर भी बैठना हो; इस आसन में शान्त एवं सुस्थिर होकर बैठा जा सकता है। यह आसन इस हेतु सर्वाधिक उपयोगी है।

9. इस प्रकार अन्तिम स्थिति में यथाशक्ति रहने के पश्चात् हाथेलियों को आपस में रगड़ते हुए एवं आँखें खोलते हुए; पूर्वस्थिति में आ जाना चाहिए।

10. नए अभ्यासी तो सामान्य स्थिति में ही बैठते हैं; किन्तु अभ्यसत होने पर जालन्धर एवं मूलबन्ध के साथ करते हैं।

11. नये अभ्यासी सामान्य स्थिति में ही करते हैं; किन्तु अभ्यस्त होने पर नासाग्र और भ्रूमध्य दृष्टि के साथ अभ्यास करते हैं।

लाभ

शारीरिक लाभ-शरीर से नीचे की ओर जाने वाली नसों के दबने के कारण उनके रक्त संचरण में बाधा आती है; रुके हुए रक्त के कारण श्रोणि प्रदेश (पेट के नीचे तथा जांघों के ऊपर वाला भाग) को अधिक रक्त मिलता है। जब आसन से पूर्वस्थिति में आते हैं तो रक्त तेजी से नीचे टांगों की ओर भागता है; जिससे वहाँ की सभी संधियों एवं पेशियों को लाभ होता है। शरीर के निचले भाग का स्वास्थ्य संवर्धन होता है। इस भाग में अनेक महत्त्वपूर्ण नाड़ियाँ होने से उनको भी लाभ प्राप्त होता है। प्रजनन, उत्सर्जन, रक्त परिसंचरण, अन्तःस्रावी एवं पेशी तन्त्र को लाभ होता है।

मानसिक लाभ-इस आसन में ध्यान करने से मानसिक शान्ति, एकाग्रता तथा सुख प्राप्त होता है।

आध्यात्मिक लाभ-इस आसन में बैठने से धारणा, ध्यान एवं समाधि हेतु सहयोग प्राप्त होता है। इससे आध्यात्मिक ज्ञान एवं शान्ति प्राप्त होती है।

सावधानियाँ एवं सीमाएँ-सामान्य रूप से यह ध्यान में बैठने हेतु सबसे उचित आसन है; और लम्बे समय तक अभ्यास किया जा सकता है; किन्तु फिर भी अपनी सामथ्र्य एवं क्षमता के अनुसार करना चाहिए। जब तक अभ्यस्त न हों बिना बन्ध के ही करना चाहिए।

चित्र 31 पद्मासन में अन्तिम शारीरिक स्थिति

बद्धपद्मासन

अर्थ-पद्म अर्थात् कमल; इस आसन की अन्तिम स्थिति में पैर कमल की आकृति जैसे दिखते हैं; इसलिए यह पद्मासन कहलाता है।

विधि एवं शारीरिक स्थितियाँ

1. सर्वप्रथम पद्मासन में सुस्थिर हो जाना चाहिए।

2. बाँएँ हाथ को कमर के पीछे से घुमाते हुए दाहिने पैर के अँगूठे को पकड़ना चाहिए।

3. दाहिने हाथ को कमर के पीछे से घुमाते हुए बाँयें पैर के अँगूठे को पकड़ना चाहिए।

4. कमर, गर्दन सीधे, आँखें बन्द, चेहरा तनावरहित एवं शान्त, सांसें सामान्य एवं मन शान्त रहना चाहिए।

5. यथाशक्ति

पूर्वाभ्यास-पद्मासन।

उत्तर अभ्यास-मत्स्यासन।

लाभ

शारीरिक लाभ-शरीर से नीचे की ओर जाने वाली नसों के दबने के कारण उनके रक्त संचरण में बाधा आती है; रुके हुए रक्त के कारण श्रोणि प्रदेश (पेट के नीचे तथा जांघों के ऊपर वाला भाग) को अधिक रक्त मिलता है। जब आसन से पूर्वस्थिति में आते हैं तो रक्त तेजी से नीचे टांगों की ओर भागता है; जिससे वहाँ की सभी संधियों एवं पेशियों को लाभ होता है। शरीर के निचले भाग का स्वास्थ्य संवर्धन होता है। इस भाग में अनेक महत्त्वपूर्ण नाड़ियाँ होने से उनको भी लाभ प्राप्त होता है। प्रजनन, उत्सर्जन, रक्त परिसंचरण, अन्तःस्रावी एवं पेशी तन्त्र को लाभ होता है।

मानसिक लाभ-इस आसन में ध्यान करने से मानसिक शान्ति, एकाग्रता तथा सुख प्राप्त होता है। इससे आध्यात्मिक ज्ञान एवं शान्ति प्राप्त होती है।

सावधानियाँ एवं सीमाएँ-यह कठिन अभ्यास है; इसलिए अपनी सामथ्र्य एवं क्षमता के अनुसार करना चाहिए। जब तक अभ्यस्त न हों बिना बन्ध के ही करना चाहिए।

चित्र 32 बद्धपद्मासन में अन्तिम शारीरिक स्थिति

ब्रह्मचर्यासन

अर्थ-इस आसन में बैठने से ब्रह्मचर्य सिद्ध होता है; इसलिए इसे यह नाम दिया गया है।

विधि एवं शारीरिक स्थितियाँ

1. वज्रासन में बैठें।

2. दोनों घुटनों को अच्छे से मिला लें।

3. दोनों पैरों के तलुओं को उल्टा करके भूमि पर लिटा दें तथा थोड़ा दाहिने एवं बांयीं ओर बाहर की ओर फैला लें।

4. दाहिनी हथेली दाहिने घुटने एवं बांयीं हथेली बांयें घुटने पर रख लें।

5. गर्दन एवं कमर सीधी, सांसें सामान्य तथा आंखें बन्द रहेंगी।

पूर्वाभ्यास-वज्रासन।

उत्तर अभ्यास-सुप्त वज्रासन।

लाभ

शारीरिक लाभ-जननांगों एवं पैर के जोड़ों को लाभ होता है।

मानसिक लाभ-मन को गहन शान्ति प्राप्त होती है। मानसिक उद्विग्नता समाप्त होती है।

आध्यात्मिक लाभ-कामवासना पर संयम होने से ब्रह्मचर्य सिद्ध होता है; जो समस्त योगाभ्यास की प्राथमिक आवश्यकता है।

सावधानियाँ एवं सीमाएँ-जिनके घुटनों में दर्द हो वे न करें।

चित्र 33 ब्रह्मचर्यासन में अन्तिम शारीरिक स्थिति

भद्रासन

अर्थ-भद्र अर्थात् सज्जन; इस आसन में व्यक्ति गहन ध्यान में जाकर अत्यधिक संयमी योगी बन सकता है; इसलिए यह भद्रासन कहलाता है।

विधि एवं शारीरिक स्थितियाँ

1. वज्रासन में बैठें।

2. दाहिने घुटने को दाहिनी ओर एवं बाँयें घुटने को बाँयी ओर पूरा बगल की ओर खोलें।

3. इस स्थिति में पैरों के तलुवे ऊपर, पंजे भीतर एवं एड़ी बाहर की ओर रहेगी।

4. दोनों हाथ दोनों घुटनों पर, कमर एवं गर्दन सीधी तथा आँखें बन्द रहेंगी। जितनी देर हो सके इस आसन में बैठकर ध्यान किया जा सकता है।

पूर्वाभ्यास-वज्रासन।

उत्तर अभ्यास-उत्थान माण्डूक्यासन।

लाभ

शारीरिक लाभ-प्राण के यथोचित प्रवाह से नाड़ियों की सक्रियता बढ़ती है। मलोत्सर्जन प्रदेश पर दबाव पड़ने से यह उत्सर्जन एवं पाचन दोनों तन्त्रों हेतु उपयोगी है।

मानसिक लाभ-मानसिक सुख एवं स्थिरता प्राप्त होती है।

आध्यात्मिक लाभ-मूलाधार, स्वाधिष्ठान एवं मणिपूरक चक्रों की सक्रियता में वृद्धि होती है।

सावधानियाँ एवं सीमाएँ-जिन्हें घुटनों में दर्द की समस्या हो; वे न करें।

चित्र 34 भद्रासन में अन्तिम शारीरिक स्थिति

वीरासन

अर्थ-वीरों के समान इस आसन में सीना तना हुआ होता है। इसलिए इसे वीरासन कहा जाता है।

विधि एवं शारीरिक स्थितियाँ

1. दण्डासन में बैठें।

2. बाँयाँ पैर घुटने से मोड़कर वज्रासन के समान पीछे की ओर ले जायें। पंजा भूमि पर लिटा हुआ रहेगा।

3. दाहिने पैर को घुटने से मोड़कर उसका पंजा और तलुआ बाँये घुटने के समीप कर लें।

4. बांयाँ हाथ बांयें घुटने पर रखें तथा दाहिने हाथ की कोहनी को दाहिने घुटने पर टिकाते हुए उसकी हथेली पर चेहरे को टिका दें। छाती तनी हुई, कमर एवं गर्दन सीधी तथा आँखें बन्द रहेंगी। सांसें सामान्य गति से चलती रहेंगी। यह अन्तिम स्थिति है।

5. एक बार अन्तिम स्थिति में कुछ देर रहकर दूसरी ओर से करें।

पूर्वाभ्यास-दण्डासन।

उत्तर अभ्यास-वज्रासन।

लाभ

शारीरिक लाभ-अन्तःस्रावी तन्त्र तथा नाड़ी तन्त्र को लाभ होता है। उच्चरक्तचाप सामान्य हो जाता है।

मानसिक लाभ-मानसिक स्वास्थ्य, सुख-शान्ति प्राप्त होती है।

आध्यात्मिक लाभ-मेरुरज्जु का पूर्णरूपेण तान होता है; जिससे सुषुम्ना नाड़ी में चेतना का विस्तार, चक्र जागरण एवं प्राणोत्थान होता है।

सावधानियाँ एवं सीमाएँ-जिन व्यक्तियों के घुटने में दर्द हो; उन्हें नहीं करना चाहिए।

चित्र 35 वीरासन में अन्तिम शारीरिक स्थिति

सिद्धासन

अर्थ-सिद्ध योगियों द्वारा इस आसन में लम्बे समय तक बैठकर ध्यान का अभ्यास किया जाता है। इसलिए इसे सिद्धासन कहा जाता है।

पूर्वाभ्यास-दण्डासन।

उत्तर अभ्यास-पद्मासन।

विधि एवं शारीरिक स्थितियाँ

1. दण्डासन में बैठकर दोनों पैरों के बीच में एक से डेढ़ फीट का अन्तर बना लेना चाहिए।

2. दाहिनी टांग को घुटने से मोड़कर बाँयीं जंघा पर इस प्रकार स्थापित करना चाहिए कि उसकी एड़ी पुरुषों एवं महिलाओं दोनों में जननांग को स्पर्श करे।

3. इसके उपरान्त बाँईं टांग को घुटने से मोड़कर दाहिनी जंघा पर इस प्रकार स्थापित करना चाहिए कि उसकी एड़ी पुरुषों एवं महिलाओं दोनों में जननांग को स्पर्श करे।

4. दोनों हथेलियाँ ज्ञानमुद्रा में दोनों घुटनों पर रहेंगीं, आँखें बन्द, चेहरा तनावरहित, साँसें सामान्य गति से चलती रहेंगी।

लाभ

शारीरिक लाभ-इस आसन में रीढ़ की हड्डी सीधी रहने से तन्त्रिका तन्त्र की गतिविधियों में सकारात्मक परिवर्तन होता है। सभी नाड़ियों की सक्रियता बढ़ती है। सांसें सामान्य होती हैं। रक्त परिसंचरण सामान्य होता है। हॉर्मोन्स का संतुलन बना रहता है।

मानसिक लाभ-मानसिक तनाव एवं अवसाद समाप्त होते हैं। एकाग्रता बढ़ती है।

आध्यात्मिक लाभ-आत्मिक आनन्द प्राप्त होता है। ध्यान हेतु अत्यंत उपयोगी आसन।

सावधानियाँ एवं सीमाएँ-हाइड्रोसील तथा बढ़े हुए वृषण से ग्रस्त व्यक्तियों को यह आसन नहीं करना चाहिए।

चित्र 36 सिद्धासन में अन्तिम शारीरिक स्थिति

आसनों के पश्चात् प्राणायाम का अभ्यास किया जाता है। ध्यानात्मक आसनों में से जो भी सुविधाजनक लगे उसमें ही बैठकर प्राणायाम करना चाहिए। ध्यानात्मक आसनों में स्थिर होने का अभ्यास करना प्राणायाम के साथ ही प्रत्याहार, धारणा एवं ध्यान की भी पूर्वापेक्षा है। अब हम अगले अध्याय में प्राणायाम को स्पष्ट करेंगे।

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