अन्याय आधारित व्यवस्था के बखिये उधेड़ती फिल्म / जयप्रकाश चौकसे

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अन्याय आधारित व्यवस्था के बखिये उधेड़ती फिल्म
प्रकाशन तिथि :22 सितम्बर 2016


भारतीय कथा फिल्मों के 103 वर्षों के इतिहास में सभी किस्म की फिल्में बनती रहीं हैं और सारी धाराओं का स्वतंत्र अस्तित्व होते हुए भी फिल्म उद्योग समग्रता के कैलाइडोस्कोप की तरह है, जिसे हाथ से घुमाने पर आंख के सामने विविध रंगों की अजीबोगरीब आकृतियां उभरती हैं। उद्योग की मुख्यधारा अधिकतम की पसंद की मसाला फिल्में हैं परंतु अनेक उपधाराएं इससे जुड़ती हैं। जैसे गंगा नदी अपनी 2550 मील की यात्रा में अनेक नदियों को अपने में समाहित करती है। यहां तक कि मध्य भारत से निकली सोन नदी भी इलाहाबाद के पहले गंगा से मिलती है। ठीक इसी तरह हिंदुस्तानी सिनेमा की फॉर्मूला फिल्मों की मुख्यधारा से कला फिल्मों की विविध धाराएं आकर मिलती हैं और उनके समग्र स्वरूप को सार्थक और भव्यतर बनाती हैं।

फिल्म उद्योग में अजूबे घटते रहते हैं और फिल्मकारों के परिवार वालों के साथ ही गैर-फिल्मी एवं सामान्य परिवार के लोग भी जुड़ जाते हैं। फिल्म उद्योग की परम्परा से प्रेरित कुछ लोग अपने व्यक्तिगत मौलिक योगदान से उस परम्परा के गौरव को बढ़ाते हुए शामिल होकर भी उसमें पूरी तरह डूबते नहीं।

लीना यादव भी गैर-फिल्मी वातावरण से अाकर अपनी फिल्म 'पार्च्ड' द्वारा अंतरराष्ट्रीय महोत्सवों में खूब सराही गई हैं और पुरस्कृत भी हुई हैं तथा फिल्म कल से भारत में प्रदर्शित होने जा रही है। लीना यादव की पटकथा से प्रभावित सर्वश्री अजय देवगन, असीम बजाज, गुलाब सिंह और रोहन जगदाले इस फिल्म के संयुक्त निर्माता हैं। इसमें कुछ तकनीशियन विदेश के हैं। मसलन, टाइटैनिक जैसे फिल्म महाकाव्य के सिनेमेटोग्राफर रसेल कारपेंटर ने इसे फोटोग्राफ किया है। लीना यादव के आकल्पन से प्रभावित होकर कई देशी-विदेशी लोग इसके साथ जुड़े हैं। नौ पात्रों की इस फिल्म में राधिका आप्टे जैसी प्रतिभाशाली कलाकार भी जुड़ी हैं। गीतकार स्वानंद किरकिरे ऐसी साहसी फिल्मों में अपना योगदान देते हैं।

राजस्थान का रेगिस्तान फिल्म की पृष्ठभूमि है। समुद्र की तरह ही रेगिस्तान भी जीवंत पात्र की तरह हो सकता है। अगर आप हवाई जहाज से कई हजार फीट ऊपर से समुद्र अौर रेगिस्तान को देखें तो दोनों में ही कुछ साम्य नज़र आता है। पानी की लहरें समुद्र पर आकृतियां रचती हैं। इस तरह रेगिस्तान मंे तेज हवाएं रेत के टीलों का निर्माण करती हैं और पलक झपकते ही वे अदृश्य भी हो जाते हैं। रेत दिव्य सृजक की तरह भांति-भांति की आकृतियां रचती हैं और नखलिस्तान का भ्रम भी रचती है। इसी तरह सत्य भी विविध आकृतियों के माध्यम से अभिव्यक्त होता है। लीना यादव ने इसका भरपूर प्रयोग किया है।

रूस के महान लेखक मैक्सिम गोर्की ने सत्य ही कहा है कि सारे युद्ध और मानवीय संघर्ष नारी हृदय को ही छलनी करते हैं। लीना यादव की महिला पात्र भी ऐसी ही महिलाएं हैं और उनके हृदय भी फटी हुई धरती की तरह हैं, जिस पर पानी की एक बूंद नहीं पड़ी है। दशकों पूर्व ख्वाजा अहमद अब्बास ने भी इसी पृष्ठभूमि पर सिमी ग्रेवाल अभिनीत 'दो बूंद पानी' बनाई थी। लीना यादव ने हास्य के साथ करुणा का दृष्टिकोण अपनाया है। उसके पात्र ठहाका लगाते हैं; साथ ही अश्रु भी बहाते हैं और कभी-कभी आंसू के मध्य मुस्कान को प्रस्तुत करने की चेष्टा भी की गई है। सारे सृजन कार्य अश्रु और मुस्कान प्रस्तुत करने की ही चेष्टा करते हैं, क्योंकि ये मानव हृदय की जबान है।

अनेक विद्वान यह मानते हैं कि तीसरा महायुद्ध पीने के पानी के लिए लड़ा जाएगा। पृथ्वी का तीन-चौथाई भाग जल है और प्रलय की सारी कल्पनाएं भी जल प्लावन के गिर्द रची गई हैं। पानी की कमी के कारण ही समुद्र जल से नमक हटाकर उसे पीने योग्य बनाने के प्रयास हो रहे हैं। लीना यादव की फिल्म भी जल के अभाव में फटी धरती और मानव हृदय की कथा प्रस्तुत करती है। क्या हम यह मान लें कि तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए लड़ा जाएगा और लीना यादव की 'पार्च्ड' हमें उसी के लिए तैयार भी करती है अौर आग्रह भी करती है? कहीं ऐसा तो नहीं कि आंख से अश्रु भी नहीं बह सकेंगे- ऐसा पार्च्ड कालखंड आने वाला है।