अमृता प्रीतम: मैं तुम्हें फिर मिलूंगी / अनुलता राज नायर

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इमरोज़ ठीक ही कहते हैं कि उसने जिस्म छोड़ा है, साथ नहीं छोड़ा.वाकई कुछ रूहें जिस्म से जान निकल जाने के बाद भी आबाद रहती हैं और मोहब्बत करने वालों के दिलों में होता है उनका बसेरा.

हिंदी और पंजाबी साहित्य की ऐसी ही एक बेहद रूमानी शख्सियत से आपको रूबरू करवाती हूँ, जो जितनी खूबसूरत थीं उससे कहीं ज़्यादा हसीं और ज़हीन थे उनके शब्द. आइये मिलते हैं “अमृता प्रीतम” से, मेरी कलम के जरिये.... अमृता, जिन्होंने कच्ची उम्र से ही अपने सपनों की इबारत लिखनी शुरू कर दी थी, जिंदगी के सफ्हे पर रोशनाई कभी जिगर का खून था तो कभी आँसू.अमृता कहती हैं-“मेरा सोलहवां वर्ष आज भी मेरे हर वर्ष में शामिल है”, शायद इसीलिए उनकी नज्में और कहानियाँ प्रेम को इतनी पूर्णता से परिभाषित कर पाती हैं.

अमृता की ज़िन्दगी को साल दर साल लिख पाना मुश्किल है क्यूंकि किसी एक एहसास को पन्ने पर उतारती हूँ तो कोई कोई गुजरा एहसास फिर दस्तक देता है या आने वाला कोई एहसास सामने खड़ा हो जाता है.मेरे ज़हन में गुत्थमगुत्था इन एहसासों के मोती यूँ ही बिखेर देती हूँ आपके आगे, चुन कर माला में पिरोने का जिम्मा आपका.

अमृता प्रीतम पंजाब (पकिस्तान) के गुजरांवालां में ३१ अगस्त १९१९ में जन्मीं थीं.माता थीं राज बीबी और पिता नंद साधु.नंद स्वयं धार्मिक कविताएँ लिखते थे “पियूष“ उपनाम से.इसलिए पुत्री का नाम उन्होंने “अमृत” रखा. सच ! शायद ईश्वर ने उसे गढ़ते हुए मिट्टी भी शहद और अमृत से गूंथी होगी.

माँ के देहांत के बाद पिता को फिर वैराग्य अपनी ओर खीचने लगा मगर अमृता का मोह संसार से जोड़े रखता. अमृता कभी बिलख उठती कि वे पिता को स्वीकार थीं या अस्वीकार..अपना अस्तित्व एक ही समय में चाहा और अनचाहा लगता था. पिता की ख़ुशी के लिए वो लिखती रही मगर माँ की मृत्यु के बाद उनकी ईश्वर से आस्था उठ सी गयी थी सो वे चोरी चोरी रूमानी कविताएँ लिखने लगीं. उन दिनों उन्होंने अपने मन में एक काल्पनिक प्रेमी “राजन” को बैठा लिया था और वे उसके सपने देखतीं.अमृता का पहला काव्य संकलन “अमृत लहरें” बाज़ार में आया तब वे मात्र सोलह साल की थीं.

दरअसल अमृता का मन एक पंछी की तरह था जो उड़ना चाहता था खुले आसमान में, एकदम स्वच्छंद, मगर एक तीखा दर्द लिए....

                     एक दर्द था 
                   जो सिगरेट की तरह 
                  जो मैंने चुपचाप पिया है 
                    सिर्फ कुछ नज्में हैं-
                    जो सिगरेट से मैंने
                   राख की तरह झाडी हैं!

अमृता का विवाह सरदार प्रीतम सिंह से हुआ और वे दो बच्चों की माँ बनीं.पति के साथ ज्यादा दिन निभ न सकी मगर प्रीतम नाम उनके साथ सदा जुड़ा रहा.

बात अमृता की हो और साहिर का ज़िक्र न आये ये मुमकिन नहीं.साहिर लुधयानवी साहब से उनकी मुलाक़ात लोपोकी गांव से लौटते हुए किसी काफिले में हुई.इस काफिले में साहिर के सिवा वो सबको जानती थीं मगर उनकी नज़र साहिर पर ही अटक गयी.वे साहिर के साए में उनके पीछे पीछे चलती रहीं और उन्हें एहसास हुआ कि –“मैं ज़रूर उनके साए में चलती रही हूँ, शायद पिछले जन्म से.”साहिर से वो इश्क , वो दीवानगी जो एक साए से शुरू हुई उनके साथ ताउम्र रही मगर सिर्फ एक साया बनकर.

अब ज़िक्र साहिर का छिड़ा है तो सिलसिला जारी रखती हूँ. अमृता को साहिर से इश्क़ बंटवारे से पहले , हिन्दुस्तान आने के पहले हुआ.अमृता देहरादून होते हुए दिल्ली में आ बसीं और साहिर बम्बई(मुंबई) चले गए मगर सम्मेलनों, समागमों और खतोकिताबत के जरिये वे सदा जुड़े रहे.अमृता साहिर को ख़त लिखतीं और हर ख़त एक नज़्म होती.उनका इश्क़ किसी मुक्कमल रिश्ते की शक्ल तो न ले सका मगर दोनों की तरफ से नज्मों और कविताओं का अनमोल खजाना दुनिया को दे गया.

इमरोज़ कहते हैं कि इतने लम्बे सफ़र के दौरान साहिर नज़्म से बेहतरीन नज़्म तक पहुंचे, अमृता कविता से बेहतरीन कविता तक पहुँचीं, मगर ये जिंदगी तक नहीं पहुंचे.अमृता ने इसे ख़ामोशी के हसीं रिश्ते का नाम दिया.

आसमान जब भी रात का

और रौशनी का रिश्ता जोड़ते हैं

सितारे मुबारकबाद देते हैं

क्यों सोचती हूँ मैं

अगर कहीं...

मैं, जो तेरी कुछ नहीं लगती!

मेरा मानना है कि यदि अमृता को जानना है, तो हमें उनके भीतर झांकना होगा उनकी नज्मों और कहानियों की खिड़की से. अमृता की नज्मों में जादू है, उन्हें पढ़ते हुए एक तिलस्म सा तारी हो जाता है और आप खो जाते हैं कहीं लफ़्ज़ों और एहसासों के बियाबान में.....

यूँ तो अमृता मोहब्बत करने वाले दिलों की मलिका हैं मगर उनकी कविताओं में सिर्फ इश्क़ या रूमानियत ही नहीं थी.उन्होंने समाज और दुनिया को बेहद करीब से देखा और उसका दर्द अपनी संवेदनशील कलम से पन्नों पर उतारा.बंटवारे का दर्द उन्होंने खुद भुगता है और अपनी आत्मकथा “रसीदी टिकट” में उन्होंने लिखा-मैंने लाशें देखीं, लाशों जैसे लोग देखे थे.अपने दिल्ली के सफ़र के दौरान बाहर की वीरानियाँ देख उन्हें वारिस शाह की पंक्तियाँ याद आयीं जिनमे उन्होंने हीर का दुःख लिखा है -भला मोए ते बिछड़े कौन मेले (जो मर चुके हैं, बिछड़ चुके है उनसे कौन मिलन कराये...) अमृता के ज़ेहन में ख़याल आया कि आज एक हीर नहीं पंजाब की लाखों बेटियां रो रही हैं, इनके दुःख को कौन गायेगा...और तब उन्होंने वारिस शाह को संबोधित करके अपनी कांपती कलम से लिखा-

अज्ज आक्खां वारिस शाह नूं किते कबरां बिच्चों बोल

ते अज्ज किताबे-इश्क दा कोई अगला वर्क खोल...

इक्क रोई सी धी पंजाब दी, तू लिख लिख मारे बैन

अज्ज लक्खां धीयां रोंदियां, तैनू वारिस शाह नु कहन...

इस कालजयी कविता ने उन्हें बाद में शोहरत की नयी ऊंचाइयां दी मगर जब ये लिखी गयी थी तब पंजाब में कई पत्र-पत्रिकाओं ने उन पर तोहमतें लगाईं.यहाँ तक कि इस कविता के विरुद्ध कई कविताएँ लिखी गयीं.

अमृता औरत के दिल को बखूबी समझती थीं और अपने एहसासों को अपनी कहानियों में बेहद सुन्दर लफ़्ज़ों में व्यक्त किया. उन्होंने जलियांवालाबाग़, देशप्रेम, राजनीति, किसान, मजदूर, फिरकापरस्ती, गुरुदेव.लेनिन, वियतनाम जैसे विभिन्न विषयों पर कविताएँ लिखीं. अपने छियासी साल के जीवन में उन्होंने सत्तर साल लेखन करते हुए व्यतीत किये.उन्होंने २८ उपन्यास, १८ पद्य संकलन, कई लघु कथाये, आत्मकथा और संस्मरण लिखे.वे पहली महिला थीं जिन्हें साहित्य अकादमी अवार्ड से नवाज़ा गया, १९५७ में “सुनहरे” के लिए.१९६९ में पद्मश्री, २००४ में पद्मविभूषण, १९८२ में “कागज़ ते केनवस” के लिए उन्हें भारतीय ज्ञानपीठ अवार्ड मिला. शान्तिनिकेतन जैसे कई प्रसिद्द विश्वविद्यालयों ने उन्हें डी.लिट की मानद उपाधी से नवाजा. अमृता को अपने देश में ही नहीं विदेश में भी बहुत प्यार और सम्मान मिला.

अमृता के मुताबिक १९६० उनकी ज़िन्दगी का सबसे उदास वर्ष था, जिंदगी के केलेंडर में फटे हुए पृष्ठ की तरह.उन्हीं दिनों अमृता ने जाना कि साहिर को ज़िन्दगी की एक नयी मोहबत मिल गयी है.इमरोज़ से उनकी दोस्ती थी मगर बहुत दुविधाओं से घिरी....ज़िन्दगी की सबसे उदास कविताएँ भी उन्होंने इन्ही दिनों लिखीं.

गज़ब की कल्पनाशीलता और अद्भुत अभिव्यक्ति सामर्थ्य थी अमृता में.जबकी अपनी मानसिक स्थिति को समझने और सम्हालने के लिए उन दिनों वे साइकेट्रिस्ट से भी मिलती थीं.और उसे बताने के लिए अपने सपनों को कागज़ पर लिख लेते थीं...जो बाद में “काला गुलाब” किताब में छपे.

उनकी इस नज़्म से उनके दर्द को महसूस किया मैंने –

मेरी रात जाग रही है

तेरा ख़याल सो गया.....

तेरे इश्क की पाक किताब

कितनी दर्दनाक है

आज मैंने इंतज़ार का सफ़ा

इसमें से फाड़ दिया.....

अमृता की नज्मों की तरह उनकी कहानियाँ भी ह्रदय को हौले से छू कर भी झकझोर दिए जाने का दम रखती हैं.

“पिंजर” उनका सबसे प्रसिद्द उपन्यास है, “पूरो” का किरदार पाठकों के दिल के भीतर नश्तर सा चुभ जाता है, और एक दर्द का एहसास भी देता है साथ ही सहलाता भी है. उनके एक उपन्यास “धरती सागर और सीपियाँ” पर फिल्म बनी कादम्बिनी, १९७५ में.उस फिल्म के लिए उन्होंने एक गीत दिया जो दरअसल उन्होंने १९६० में इमरोज़ से पहली बार मिलने पर लिखा था-

“अम्बर की एक पाक सुराही, बादल का एक जाम उठाकर

घूँट चांदनी पी है हमने, बात कुफ्र की की है हमने.”

अमृता जी की कहानियों के पात्र इसने सजीव होते थे कि यकीन करना मुश्किल था कि उन पात्रों को उन्होंने खुद नहीं जिया है.हालांकि उनका मानना था कि कई पात्र चेतन या अचेतन मन से उनकी आस-पास की जिंदगियों से जुड़े थे.

उनकी एक कहानी “नागमणि” जो “३६ चक’ नाम से भी छपी, उसकी नायिका अलका का चरित्र अमृता जी को खुद के सबसे ज्यादा करीब लगता है.शायद कई पाठकों को वो किरदार सबसे अधिक प्रभावित करता हो.उनके शब्दों के मायाजाल में हर कोई उलझ जाता है.

साहिर के ज़िक्र से इब्तेदा हुई तो इन्तहा इमरोज़ के ज़िक्र से ही होगी....अमृता ने अपने जीवन का ज़्यादातर वक्त इमरोज़ के साथ बिताया.इमरोज़-एक बेहतरीन इंसान और जानेमाने चित्रकार.अमृता ने अपनी आत्मकथा रसीदी टिकट में इमरोज़ का ज़िक्र एक अल्लाह के बन्दे की तरह किया है, जिसने हँसते हुए उनका हाथ थामा और चल पड़ा बिना कोई सवाल किये.

अमृता कहती हैं “इमरोज़ एक दूधिया बादल है, चलने के लिए वह सारा आसमान भी खुद है और वह पवन भी खुद है जो उस बादल को दिशा मुक्त करती है.”

और इमरोज़ कहते हैं-

अमृता -आखर आखर कविता

कविता कविता ज़िन्दगी...

३१ अक्टूबर २००५, दिल्ली में अमृता ने आख़री सांस ली....”वे मैं तिड़के घड़े दा पानी, कल तक नइ रहना.......” तब से अब तक वो बसी हैं मोहब्बत करने वालों की साँसों में खुशबू बन कर.

अमृता एक बूँद अमृत की या अथाह सागर मीठे पानी का....उन्हें लफ़्ज़ों में समेत पाना मुमकिन नहीं.... उन्हें सिर्फ पिया जा सकता है...जिया जा सकता है......जी भर के......