आज का दलित साहित्य आंदोलन / रंजन कुमार

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रंजन कुमार

आमतौर पर किसी भी देश के साहित्यिक आंदोलन को उसकी तत्कालीन सामाजिक- सांस्कृतिक-आर्थिक परिस्थितियों की देन माना जाता है। ठीक उसी तरह उसके साहित्यिक-रूपों का विकास उसके सामाजिक विकास से अनिवार्यतः जुड़ा होता है। इसलिए समाज की विभिन्न संरचनाओं के आधार पर साहित्य की संरचनाओं को परखा और पहचाना जाता है। यह अलग बात है कि सामाजिक संरचनाएं जिस रूप में साहित्य की संरचनाओं के रूप में आकार ग्रहण करती हैं, ठीक उसी रूप में समाज में मौजूद नहीं रहतीं। क्योंकि साहित्य में रूपांतरित होने पर समाज की उन संरचनाओं का स्वरूप बदल जाता है और एक साहित्य रचना, सामाजिक शक्ति के रूप में काम करने लगती है। इसे ही साहित्य की सामाजिक उपयोगिता कहा जाता है, जो अंततः साहित्य की सामाजिक सोद्देश्यता की मांग को पूरा करती है। इस तरह की सामाजिक सोद्देश्यता मानव-समाज के विकास के व्यापक हित में समानांतर रूप से क्रियाशील रहती है। इसलिए साहित्य और समाज के जटिलतर संबंधों को उसके द्वंद्वात्मक संबंधों में व्याख्यायित करने की कोशिश की जाती रही है। सामाजिक-सांस्कूतिक आंदोलनों को साहित्य के विकास की पूर्व शर्त माना गया है।

यही वजह है कि किसी समय के सामाजिक-सांस्कूतिक आंदोलन उस समय के साहित्यिक-आंदोलनों के विकास को प्रभावित करते हैं लेकिन कभी प्रत्यक्ष रूप से तो कभी अप्रत्यक्ष रूप से। यह प्रभाव कम या ज्यादा हो सकता है लेकिन उससे बिल्कुल अछूता रहे, यह संभव नहीं है। इसलिए किसी साहित्यिक आंदोलन के विकास को जानने के लिए तत्कालीन सामाजिक- सांस्कूतिक-आर्थिक आंदोलनों के विकास को जानना जरूरी है। दलित साहित्य आंदोलन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि प्रत्येक साहित्यिक-आंदोलन की तरह ही दलित साहित्य आंदोलन भी निश्चित तौर पर तत्कालीन सामाजिक, सांस्कूतिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों की ही देन है। और इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि आज का दलित साहित्य आंदोलन अपनी समस्त सामाजिक- सांस्कूतिक परंपराओं और मूल्यों को आत्मसात् करके ही विकसित हुआ है और उत्तरोत्तर आगे बढ़ रहा है। यह सही है कि उनके विरोधियों द्वारा धर्मशास्त्रों के आधार पर हजारों साल से दलित वर्ग को अपनी सांस्कूतिक अभिव्यक्ति से वंचित करने की लाख कोशिशें की गईं पर वे उन्हें पूरी तरह से सांस्कूतिक अभिव्यक्ति से वंचित नहीं कर पाए। यही वजह है कि दलितों की सांस्कूतिक अभिव्यक्ति की प्रक्रिया किसी न किसी रूप में निरंतर बनी रही जिसकी ठोस नींव पर आज का दलित साहित्य आंदोलन विकसित हुआ है। वास्तव में आज के दलित साहित्य आंदोलन की शुरुआत सन् उन्नीस सौ बीस के दशक से मानी जानी चाहिए।

इसी दशक में अम्बेडकरवादी चिंतन के लिए जमीन तैयार हुई जिसके आधार पर दलित साहित्य आंदोलन की नींव पड़ी। अम्बेडकरवादी आंदोलन, सामाजिक आंदोलन के साथ-साथ एक सांस्कूतिक-राजनीतिक आंदोलन भी है जिसकी वजह से दलित वर्ग में सांस्कूतिक चेतना का विकास संभव हुआ है। यही सांस्कूतिक चेतना ही आज के दलित साहित्य आंदोलन की सृजनात्मक ताकत बन गई है जिसकी लंबी सामाजिक -सांस्कूतिक परंपरा है। आज का दलित साहित्य चिंतन और आंदोलन दलित पुनर्जागरण की लंबी चितन-परंपरा को अपनाकर ही विकसित हुआ है। गौतम बुद्ध के चितन और जीवन-दर्शन से प्रभावित होकर सर्वाधिक शोषित-उत्पीड़ित वर्ग में जन-जागरण संभव हुआ जिसे पहला दलित जन-जागरण भी कहा जा सकता है। गौतम बुद्ध ऐसे पहले दार्शनिक-चिंतक हैं जिन्होंने मनुष्य की समस्याओं का समाधान इसी भौतिक जगत में उसकी सामाजिक-आर्थिक संरचना में खोजकर नया रास्ता दिखाया जिसे 'मध्यम मार्ग' कहा जाता है। उन्होंने ही सबसे पहले विश्व की सबसे द्घृणित समाज-व्यवस्था के रूप में प्रसिद्ध वर्ण-व्यवस्था पर जबरदस्त प्रहार करके उसकी कब्र खोदने वाली ऐसी सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक चेतना को जन्म दिया जिससे लैस होकर दलित वर्ग सामने आया। वैसे भी बुद्ध का चिंतन किसी न किसी रूप में श्रमण-परंपरा में ही विकसित हुआ है जिसके समाज दर्शन ने ब्राहणवादी वर्ग व्यवस्था की जड़ें खोदने वाले दलित वर्ग को नई चेतना और ऊर्जा से भर दिया।

बुद्ध के समाज-दर्शन से ही सिद्ध-नाथपंथियों को सृजनात्मक ऊर्जा मिली जिसकी परंपरा में मध्ययुग का दलित-संत काव्य अस्तित्व में आया और जो निश्चित तौर पर ब्राहणवादी सांस्कृतिक चेतना के खिलाफ विकसित हुआ। इस तरह सिद्ध-नाथपंथियों की सृजनात्मक ऊर्जा से जो नई सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना विकसित हुई, वह लंबे विकास-क्रम के दौरान मध्ययुग में दलित संतों कबीर, रैदास और चोखामेला आदि संतों के पास पहुंचकर क्रांतिकारी सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना में तब्दील हो गई। यह क्रांतिकारी सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना चौदहवीं-पन्द्रहवीं सदी के भारत में सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में आए मूलभूत बदलावों के कारण आई थी और जिसके बल पर ब्राहणवादी-सामंती ताकतों को सामाजिक सांस्कृतिक स्तर पर चुनौती दी गई थी। इस काल को हमने दलित पुनर्जागरण काल का नाम दिया है जो यूरोप के पुनर्जागरण काल के साथ-साथ आया। भारत का यह दलित पुनर्जागरण काल मूलतः एक सांस्कृतिक था और जो धर्म और जाति पर आधारित वर्णवादी समाज-व्यवस्था के उन्मूलन पर केंद्रित था और उसने काफी हद तक वर्णवादी सामाजिक- आर्थिक संरचना पर आधारित ब्राहणवादी चेतना को हाशिए पर पहुंचा दिया था। इस तरह भारत का दलित पुनर्जागरण धर्मविहीन और जातिविहीन समाज की पुनर्र्संरचना के लिए एक प्रतिबद्ध सांस्कृतिक-आंदोलन रहा है जिसमें कबीर-रैदास-चोखामेला जैसे क्रांतिकारी दलित-संत पैदा हुए हैं।

इन दलित-संत कवियों ने बुद्ध के प्रतीत्यसमुप्पाद, अनात्मवाद और अनित्यवाद जैसे भौतिकवादी दर्शन के आधार पर अवतारवाद, कर्मवाद, पुनर्जन्मवाद, नियतिवाद तथा आत्मा-परमात्मा आदि विश्वासों और आस्थाओं को पोषित करने वाले विचारों और सिद्धांतों का विखंडन करके ब्राहणवाद और सामंतवाद का ही विखंडन कर दिया। इस तरह बुद्ध का धम्म-सार शील समाधि और प्रज्ञा पर आधारित चिंतन दलित पुनर्जागरण काल में ज्ञान, तर्कबुद्धि और विवेक में रूपांतरित होकर दलित संत कवियों की सबसे बड़ी बौद्धिक ताकत बन जाता है। दलित पुनर्जागरण की यही बौद्धिक परंपरा आधुनिक युग में जोतिबा फुले की सामाजिक क्रांतिकारी चेतना का मुख्य आधार बनती है। जोतिबा फुले आधुनिक सामाजिक-क्रांति के अग्रदूत बनकर सामने आते हैं। उनकी किताब 'गुलामगिरी' बहुजन समाज की मुक्ति का दस्तावेज बन जाती है। 'सत्यशोधक समाज' की स्थापना करके उन्होंने समाज के सभी शोषित-उत्पीड़ित समुदायों की मुक्ति के लिए नया रास्ता दिखाया। उसमें जाति, लिंग, धर्म और वर्ण आदि के आधार पर भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं है। जबकि उस समय के ब्राहण बुद्धिजीवियों राजा राममोहन राय को समाज' और दयानंद सरस्वती को 'आर्य समाज' द्वारा चलाए गए समाज-सुधार आंदोलन हिंदू पुनरुत्थानवादी तत्वों से मुक्त नहीं था। यही वजह है कि वह सवर्ण समाज की विधवा-विवाह, बाल-विवाह और सती प्रथा जैसी सामाजिक-धार्मिक कुरीतियों तक ही सीमित था यानी वह सवर्ण परिवारों के सुधारवादी प्रश्नों पर ही केंद्रित आंदोलन था।

भारतीय समाज के सर्वाधिक उत्पीड़ित-शोषित दलित वर्ग की समस्याओं से उसका कोई सीधा संबंध नहीं था। इसलिए इसे भारतीय नवजागरण न कहकर हिंदू नवजारण कहा गया है। जबकि इसके विपरीत भारत का दलित पुनर्जागरण किसी खास वर्ण, जाति, समुदाय या धर्म विशेष के लोगों के उत्थान तक सीमित न होकर समस्त उत्पीड़ित-शोषित वर्ग की सामाजिक- आर्थिक शोषण से मुक्ति का रास्ता तलाश रहा था। बीसवीं सदी तक आते-आते दलित पुनर्जागरण की बौद्धिक-परंपरा अम्बेडकरवादी चिंतन का वैचारिक आधार बनने लगी। डॉ ़ अम्बेडकर ने बुद्ध, कबीर और जोतिबा फुले को अपना गुरु मानकर दलित पुनर्जागरण की बौद्धिक चिंतन परंपरा को ही आत्मसात करके अपने आधुनिक बौद्धिक चिंतन द्वारा उसे नया सामाजिक-सांस्कृतिक आधार प्रदान किया है जिसकी ठोस जमीन पर आज का दलित-चिंतन और दलित-लेखन विकसित हुआ है। इसी प्रक्रिया में जोतिबा फुले, डॉ ़ अम्बेडकर और रामास्वामी पेरियार, स्वामी अछूतानंद आदि आधुनिक चिंतकों ने आजादी, भाईचारा और बराबरी जैसे जनवादी और लोकतांत्रिक मूल्यों और विचारों का अपने चिंतन में समावेश करके अपने सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन को आधुनिक बनाया है। इन्हीं जनवादी और लोकतांत्रिक-मूल्यों की कसौटी पर कसते हुए डॉ ़ अम्बेडकर ने भारतीय समाज को एक अलोकतांत्रिक समाज बताया है क्योंकि उसमें समानता की अवधारणा के लिए कोई जगह नहीं है। लोकतांत्रिक समाज बनाने के लिए जरूरी है कि इस देश से जातिप्रथा का उन्मूलन कर दिया जाए।

उन्होंने यह भी बताया कि भारतीय समाज में 'समग्रवर्ग चेतना' का अभाव है जिसकी वजह से सामाजिक-अलगाव की अवधारणा मजबूत हुई है। यह सामाजिक-अलगाव सभी स्तरों पर देखा जा सकता है। इसलिए उन्होंने सामाजिक लोकतंत्र की अवधारणा को मजबूत करने पर अत्यधिक जोर दिया। उनकी यह भी मान्यता रही है कि बराबरी, स्वतंत्रता और बंधुत्व में ही व्यक्ति-स्वातंत्रता की भावना निहित है। एक व्यक्ति, एक मूल्य, सामाजिक-लोकतंत्र का आधार बिंदु है और सामाजिक लोकतंत्र को संवैधानिक तरीकों से ही प्राप्त किया जा सकता है। इसलिए उन्होंने सामाजिक-सुधार की अपेक्षा सामाजिक-परिवर्तन पर अधिक जोर दिया। यही वजह है कि डॉ ़ अम्बेडकर का समाज-दर्शन केवल दलित-पिछड़े वर्ग के लोगों को ही नहीं बल्कि समस्त मानव समाज को सभी तरह के शोषण-उत्पीड़न से मुक्ति का रास्ता दिखाता है। यह सही है कि डॉ ़ अम्बेडकर का आंदोलन शुरू से ही सामाजिक-सांस्कृतिक स्वरूप लिए हुए था लेकिन सन् ३० के बाद वह राजनीतिक स्वरूप भी ग्रहण करने लगा। सन् ५६ में उन्होंने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध-धर्म की दीक्षा लेकर दलित मुक्ति का नया रास्ता सुझाया। उनके परिनिर्वाण के बाद 'रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया' के स्थापना से उनके राजनीतिक कार्यक्रमों को नई दिशा मिलने लगी और खासतौर पर महाराष्ट्र में सन् ७२ में तीखा विद्रोही स्वर लिए हुए 'दलित पैंथर' नामक सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संगठन का उदय हुआ जिससे दलित आंदोलन को एक नया सांस्कृतिक आयाम मिला और वह फिर से गतिशील हुआ।

'ब्लैक पैंथर' की तर्ज पर नामदेव ाले, न ़वि ़ पवार, अर्जुन डांगले, अनिल काम्बले, रामदास आठवले, प्रहलाद चेंदवणकर आदि दलित युवाओं ने मिलकर 'दलित पैंथर' की नींव रखी जिसे बुद्ध, फुले और डॉ ़ अम्बेडकर के विचारों के आधार पर दिशा दी गई। लेकिन कुछ समय बाद मार्क्सवाद और अम्बेडकरवाद के प्रश्नों पर उनमें गंभीर मतभेद उभर आए और वैचारिक आग्रहों और मतभेदों के चलते 'दलित पैंथर' आंदोलन बिखरकर अपनी ताकत खोने लगा जिसका असर बाद में दलित आंदोलन पर भी दिखाई दिया। लेकिन इतना जरूर हो गया कि 'दलित पैंथर' ने दलित साहित्य के लिए एक नई जमीन तैयार कर दी थी जिसमें आक्रोश और विद्रोह की भावना भरी हुई थी। इन्हीं सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक पृष्ठभूमि पर ही आज का दलित साहित्य आंदोलन पूरे भारत में अपनी जड़ें जमाने में सफल रहा है। इस तरह बुद्ध, कबीर, जोतिबा फुले और डॉ ़ अम्बेडकर के विचार ही उसके प्रेरणास्रोत रहे हैं। दलित साहित्य की अवधारणा दलित साहित्य की अवधारणा पर विचार करने से पहले 'दलित' शब्द पर विचार कर लेना जरूरी लग रहा है क्योंकि इस 'दलित' शब्द के साथ ही दलित साहित्य की अवधारणा जुड़ी हुई है। वैसे 'दलित' शब्द का प्रयोग आधुनिक काल में ही हुआ है और वर्ण व्यवस्था से बाहर खड़े विभिन्न समुदायों के लिए इसका प्रयोग हुआ है। हिन्दी के शब्दकोशों में 'दलित' शब्द का अर्थ है- जिसका दलन और दमन किया गया हो, दबाया और रौंदा गया हो तथा मसला और कुचला गया हो, आदि दिया गया है, जो निश्चित तौर पर दलित समुदायों के लिए अपमानसूचक है क्योंकि शब्दकोश 'दलित' शब्द का केवल शाब्दिक अर्थ बतलाता है। दलित वर्ग के लेखकों को यह स्वीकार्य नहीं है। आधुनिक काल की देन होने की वजह से 'दलित' शब्द की उत्पत्ति के पीछे इन समुदायों की सामाजिक-सांस्कृतिक- राजनीतिक चेतना काम कर रही थी जिसे हिन्दी के शब्दकोशकारों ने ठीक से नहीं समझा। इसलिए यहां उस ऐतिहासिक चेतना को जानना जरूरी लग रहा है। सन् १८९१ में भारत की पहली जनगणना में 'जाति' का आधार बनाया गया जिसका ऐतिहासिक महत्व है। फिर बाद में भारत की ब्रिटिश सरकार सभी कामगार जातियों का उल्लेख करने के लिए 'पददलित जातियां' डिप्रेस्ड क्लासेस शब्द का इस्तेमाल करने लगीं जिन्हें डॉ ़ अम्बेडकर ने 'उत्पादक जातियां' कहा।

फिर सरकार में प्रतिनिधित्व देने के लिए उन्हें 'अनुसूचित' किया गया। सन् १९१९ में मंटिग्यू चेम्सफोर्ड द्वारा सरकारी निकायों में प्रथम प्रतिनिधित्व देने के लिए अस्पृश्यों, आदिवासियों और अन्य पिछड़ा वर्ग को 'दलित वर्ग' में डिप्रेस्ड क्लासेस सम्मिलत कर लिया गया। इसी कारण सन् १९२१ की जनगणना में 'दलित वर्ग' के अंतर्गत अस्पृश्यों, आदिवासी और अन्य पिछड़ा वर्ग को भी शामिल कर लिया। लेकिन सवर्णों के प्रतिरोध के कारण सन् १९३१ की जनगणना में आदिवासी समुदायों और अन्य पिछड़ा वर्ग को दलित वर्ग से अलग कर दिया गया। इस तरह व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक आधार वाले दलित वर्ग को अस्पृश्यों का पर्याय बना दिया गया और अंततः भारत सरकार अधिनियम, १९३५ की एक अनुसूची में अस्पृश्यों को अनुसूचित जातियों के रूप में चिह्नित कर दिया गया। हालांकि बाद में डॉ ़ अम्बेडकर सामाजिक-आर्थिक स्तर पर शोषित-उत्पीड़ित तबकों के लिए व्यापक अर्थ में दलित वर्ग का प्रयोग करने लगे थे। यह उनका ही प्रभाव था कि सन् ३८-३९ में अखिल भारतीय स्तर पर 'दलित वर्ग संद्घ' की स्थापना हुई जिसका दसवां अधिवेशन उत्तर प्रदेश के जिला बुलंदशहर में १२ मार्च १९४९ को संपन्न हुआ जिसमें दलित-पिछड़ा वर्ग, दोनों ही शामिल थे।

जोतिबा फुले ने भी दलितों को पिछड़ों से बिछुड़ा हुआ भाई बताया था और दलित वर्ग के साथ-साथ बहुजन समाज की अवधारणा प्रस्तुत की थी। लेकिन इस बहुजन समाज में अनुसूचित जातियां, अनुसूचित जनजातियां और अन्य पिछड़ा वर्ग शामिल हैं। कांचा इलैया ने इन सभी समुदायों को मिलाकर दलित बहुजन की अवधारणा प्रस्तुत की जो कहीं न कहीं कांशीराम की बहुजन समाज की अवधारणा का ही दूसरा नाम है। इससे भी स्पष्ट है कि हिन्दुओं की वर्णव्यवस्था (जाति प्रथा) से बाहर खड़े सामाजिक-आर्थिक स्तर पर शोषित-उत्पीड़ित विभिन्न समुदाय 'दलित वर्ग' की अवधारणा में शामिल हैं। इस तरह 'दलित' शब्द से उस सामाजिक-अस्मिता का बोध होता है जो परंपरागत सामाजिक-अलगाव पर आधारित हिन्दुओं की वर्ण व्यवस्था के खिलाफ समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व जैसे जनवादी और लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना के लिए प्रयत्नशील और प्रतिबद्ध है इसलिए ऐसी सामाजिक-अस्मिता को दलित-अस्मिता कहा गया है जो संपूर्ण दलित वर्ग में स्वाभिमान और आत्मसम्मान से जीने की चेतना को पैदा करती है और सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर एक अलग पहचान निर्मित करती है।

मराठी के प्रसिद्ध साहित्यकार बाबू राव बागुल 'दलित' शब्द की व्यापक व्याख्या करते हैं 'दलित शब्द से अनेक प्रकार का बोध होता है। जैसे, अपमान-बोध, दुःख- बोध दैन्य-दासत्व बोध, जाति और वर्ण-बोध, विश्व-बंधुत्वबोध क्रांति-बोध।' अर्जुन डांगले के मतानुसार 'दलित यानी शोषित, पीड़ित समाज, धर्म व अन्य कारणों से जिसका आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक शोषण किया जाता है, वह मनुष्य और वही मनुष्य क्रांति कर सकता है।' लेकिन 'दलित पैंथर्स' ने अपने द्घोषणा-पत्र में 'दलित' शब्द को और व्यापक अर्थ देते हुए परिभाषित किया है कि 'दलित का अर्थ है अनुसूचित जाति, बौद्ध, कामगार, भूमिहीन, मजदूर, गरीब किसान, खानाबदोश जातियां, आदिवासी और नारी समाज।' लेकिन हिन्दी के कुछ दलित साहित्यकार 'दलित' शब्द को सिर्फ अनुसूचित जातियों तक ही सीमित करके देखते हैं और इस तरह उसका अर्थ संकुचित कर देते हैं।

डॉ ़ श्यौराज सिंह 'बेचैन' के अनुसार 'दलित वह है जिसे भारतीय संविधान ने अनुसूचित जाति का दर्जा दिया है।' ठीक इसी तरह कंवल भारती भी मानते हैं, 'दलित' शब्द के अंतर्गत वही जातियां आती हैं, जिन्हें अनुसूचित जातियां कहा जाता है।' ओम प्रकाश वाल्मीकि भी इन्हीं मान्यताओं का समर्थन करते दिखाई देते हैं, 'भारतीय समाज में जिसे अस्पृश्य माना गया वह व्यक्ति ही दलित है।' लेकिन इनके विपरीत मोहनदास नैमिशराय 'दलित' की 'सर्वहारा' शब्द से तुलना करते हुए बताते हैं, 'दलित की व्याप्ति अधिक है तो सर्वहारा की सीमित। ़ ़ ़प्रत्येक दलित व्यक्ति सर्वहारा के अंतर्गत आ सकता है, लेकिन प्रत्येक सर्वहारा को दलित कहने के लिए बाध्य नहीं हो सकते ़ ़ ़अर्थात सर्वहारा की सीमाओं में आर्थिक विषमता का शिकार वर्ग आता है जबकि दलित विशेष तौर पर सामाजिक विषमता का शिकार होता है।' इस तरह 'दलित' शब्द की मिली-जुली व्याख्याओं के बाद दलित साहित्य की अवधारणा पर विचार करने का रास्ता साफ हो जाता है कि दलित साहित्य किसे कहा जाए। दलित साहित्य की यह सर्वमान्य परिभाषा है कि दलितों द्वारा लिखा गया साहित्य ही दलित साहित्य है जिसका आधार अम्बेडकरवादी विचारधारा है और अम्बेडकरवादी विचारधारा बुद्ध, कबीर, फुले, पेरियार और स्वामी अछूतानंद आदि के समन्वित-विचारों के आधार पर निर्मित हुई है अर्थात अम्बेडकरवादी विचारधारा के आधार पर दलितों द्वारा लिखा गया साहित्य ही दलित साहित्य है, न इससे एक इंच कम और न इससे एक इंच ज्यादा। फिर भी गैर-दलितों ने दलित साहित्य की अवधारण को कभी 'दलित-कलम' या 'दलित-संवेदना' के नाम पर तो कभी 'दलित सहानुभूति' या 'दलित-विमर्श' के नाम पर भ्रम पैदा करने की लगातार कोशिशें की हैं। जबकि 'दलित-चेतना' और 'दलित-विमर्श' में तथा 'दलित स्वानुभूति' और 'दलित सहानुभूति' में मौलिक अंतर है। इसलिए चेतना और विमर्श इन दो भिन्न प्रत्ययों के आधार पर दलित साहित्य की अवधारणा को ठीक तरह समझा जा सकता है। यहां मैं स्पष्ट कर दूं कि दलित चेतना अम्बेडकरवादी चेतना है।

दलित साहित्य दलित समाज की अस्मिता की वास्तविक पहचान कराने वाला साहित्य है। जबकि ब्राहणवादी चेतना एक मिथ्या चेतना है जो ब्राहण पुराण ग्रंथों तथा उपनिषदों के आधार पर विकसित की गई है। इसलिए गैर-दलित साहित्यकार-आलोचक जान बूझकर दलित साहित्य की अवधारणा और उसकी दलित चेतना को दलित विमर्श के नाम पर तोड़-मरोड़कर पेश कर रहे हैं जबकि वास्तविक सच्चाई यह है कि दलित-विमर्श का दलित चेतना से कोई संबंध नहीं है। दलित-विमर्श का अर्थ है गैर दलित साहित्यकारों द्वारा दलित समाज के लोगों के दुःख दर्द के प्रति सहानुभूति दिखाना या ज्यादा से ज्यादा उनके उत्पीड़न-शोषण की स्थितियों की जानकारी देना। इसलिए दलितों की वास्तविक स्थितियों और समस्याओं से उनका कोई सीधा संबंध नहीं होता। दलितों के प्रति उनकी सहानुभूति साहित्यिक स्तर तक ही सीमित रहती है और वह भी सैद्धांतिक अधिक होती है। इस तरह सवर्ण साहित्यकाराें द्वारा दलित समाज की समस्याओं का संवेदना के धरातल (मानसिक जगत) पर आदर्शवादी ंग से विचार करते हुए केवल सहानुभूति प्रकट करना दलित विमर्श कहा जाएगा। जबकि इसके विपरीत समाज के लोगों की आशाओं-आकांक्षाओं और दुःख-दर्द यथार्थ अभिव्यक्ति साथ-साथ सामाजिक-आर्थिक विषमताओं मुक्ति, शोषण-उत्पीड़न विरुद्ध विद्रोह चेतना, आत्मसम्मान जीने प्रबल इच्छाशक्ति तथा एकजुट होकर अपनी अस्मिता पहचान लिए संद्घ चेतना जागृत है।

यही अम्बेडकरवादी है जो साहित्यकारों द्वारा ही साहित्य में संभव होती इसी धरातल पर आकर साहित्यकार गैर अलग हो जाता इस तरह बहुजन पीड़ा दुःख-दर्दों को नहीं अभिव्यक्त कर रहा बल्कि सामाजिक अन्याय उनके आक्रोश भी करके उसमें (अम्बेडकरवादी चेतना) का विस्तार बिंदु 'स्वानुभूति' 'सहानुभूति' अंतर स्पष्ट हम बार-बार चुके कि जीवन दलितों लिखा गया उसे किसी अर्थ जा सकता न शामिल किया क्योंकि तो से, उसके कटु अनुभवों बीच गुजरते वे जातिगत भेदभाव उत्पन्न छुआछूत दं को, अत्याचारों अमानवीय स्थितियोंषण उत्पीड़न नृशंस रूप मानसिक स्तर झेलते दिखाई देते हैं। कुछ गैर-दलित विद्वान 'सहानुभूति' और 'स्वानुभूति' में अनुभूतिपरक शब्दों को पाकर इतना अभिभूत हो जाते हैं कि 'अनुभूति की प्रामाणिकता' के आधार पर दलित साहित्य की अस्तित्ववादी धारणा (चिंतन) से प्रभावित साहित्य बताने लगते हैं और यह भूल जाते हैं कि दलित साहित्य अस्तित्ववादी चिंतन पर नहीं अम्बेडकरवादी चिंतन (चेतना) के आधार पर अस्तित्व में आया है। इसलिए दलित साहित्य सहानुभूति का नहीं, स्वानुभूति का साहित्य है और उनकी स्वानुभूति दलित जीवन के कटु अनुभवों से उपजी है। दलित साहित्य की अवधारणा में दो चीजें महत्वपूर्ण हैं। एक, वह दलितों द्वारा लिखा हुआ होना चाहिए और दूसरा, उसमें अम्बेडकरवादी चेतना होनी चाहिए। इसलिए जो साहित्य इन दोनों 'कसौटियों' पर खरा नहीं उतरता है, उसे दलित साहित्य नहीं कहा जा सकता और न ही उसे दलित साहित्य में शामिल किया जा सकता है। उधर कुछ स्वनाम धन्य दलित साहित्यकारों ने दलित साहित्य को जाति-विशेष तक सीमित करने की मुहिम चलाई हुई है तो इधर अभी भी गैर दलित आलोचक-विद्वान दलित सहानुभूति, दलित संवेदना या दलित कलम की अपनी अवधारणाओं के आधार पर दलित साहित्य को विद्घटित करने की कोशिशें कर रहे हैं जिससे पाठकों और शोधार्थियों में दलित साहित्य की अवधारणा को लेकर भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है। इन सभी भ्रांत धारणाओं के निराकरण के लिए दलित साहित्य के स्थान पर अम्बेडकरवादी साहित्य के नाम से त्रैमासिक पत्रिका 'अपेक्षा' अंक जुलाई-सितंबर २००४ के द्वारा नई अवधारणा प्रस्तुत की गई है। इसके ठीक एक साल बाद सन् २००५ में औरंगाबाद में आयोजित दलित साहित्यकार सम्मेलन में मराठी के साहित्यकारों ने एक प्रस्ताव पारित करते हुए द्घोषणा की थी कि भविष्य में दलित साहित्य को अम्बेडकरवादी साहित्य ही कहा जाएगा। यह दलित साहित्य के विरोध में नहीं बल्कि उसको विचारधारात्मक स्तर पर एक नया नाम दिया गया है ताकि नए-नए विवादों से बचा जा सके।

इस तरह दलित साहित्य की नई अवधारणा, अम्बेडकरवादी साहित्य की अवधारणा अस्तित्व में आई है जिसे 'अपेक्षा' पत्रिका की एक महत्वपूर्ण देन माना जा सकता है।


फिलहाल, इस आलेख में दलित साहित्य शब्द का ही प्रयोग किया जा रहा है। दलित साहित्य का विकास 'दलित' शब्द के साथ दलित साहित्य की अवधारणा जुड़ी हुई है और पहली बार मराठी में ही साहित्य के साथ दलित साहित्य का प्रयोग किया गया है जिसमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति (आदिवासी) और अन्य पिछड़ा वर्ग के साहित्यकारों के साहित्य को शामिल किया गया। वैसे हम दलित साहित्य की शुरुआत डॉ ़ अम्बेडकर द्वारा प्रकाशित 'मूकनायक' (३-११-१९२०) से मानते हैं क्योंकि उसके द्वारा दलित समाज में सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर नई चेतना का प्रसार हुआ। सन् ४८ में ही 'दलित सेवक साहित्य संद्घ' और 'दलित साहित्य संद्घ' बन चुके थे लेकिन साहित्य के संदर्भ में पहली बार 'जनता साप्ताहिक' (१२-९-५३) में आ, रणपीसे का एक लेख 'दलित-साहित्य का समालोचन' छपा था जिसमें पहली बार 'दलित साहित्य' शब्द प्रयोग किया गया। दलित साहित्यकारों का पहला अधिवेशन सन् १९५३ में औरंगाबाद में सुखराम हिवराले की अध्यक्षता में संपन्न हुआ जिसे 'दलित साहित्य परिषद्' द्वारा आयोजित किया गया था। सन् १९६९ में डॉ ़म ऩा ़वानखेड़े की प्रेरणा से 'अस्मिता-दर्शन' पत्रिका प्रकाशित हुई। लेकिन बाद में 'अस्मितादर्श' त्रैमासिक पत्रिका (संपादक गंगाधर पानतावणे) ने दलित साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया और अभी तक निरंतर प्रकाशित हो रही है। 'दलित साहित्य परिषद्' और 'अस्मितादर्श' पत्रिका द्वारा कई दलित साहित्यकार सम्मेलन आयोजित किए गए जिसमें वामन कर्डक, राजा राजवाड़े, राम बिवलकर, वामन निम्बालकर, शिवराम देवलकर, दया पवार, शान्ताराम हिवराले, प्रहलाद चेंदवणकर, नारायण सुर्वे, भास्कर जाधव, अण्णाभाऊ साठे, बाबूराव बागुल, प्र ़ई ़सोनकाम्बले, योगेन्द्र मेश्राम, केशव मेश्राम, जनार्दन वाद्घमारे, कुमुद पावड़े, नामदेव आदि दलित लेखकों ने भाग लेकर दलित साहित्य के विकास में विशेष योगदान दिया।

इस तरह मराठी क्षेत्र में आयोजित दलित साहित्य सम्मेलनों ने दलित साहित्य को गति प्रदान करने में पहली भूमिका निभाई है जिसका सार्थक परिणाम यह निकला कि दलित साहित्य भी सभी विधाओं में गतिशील होने लगा। जैसा कि स्वाभाविक ही है कि दलित साहित्य की पहली अभिव्यक्ति काव्य के क्षेत्र में ही संभव हुई।

शरतचन्द्र मुक्तिबोध, भालचन्द्र फड़के, नारायण आठवले, सम्भाजी कदम आदि ने महती भूमिका निभाई है। मराठी के दलित साहित्य से प्रेरणा पाकर भारत की समस्त भाषाओं में आज दलित-लेखन संभव हुआ है। जैसे तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, बंगला, तमिल और पंजाबी आदि में भी इसका विस्तार हुआ है लेकिन हिन्दी में दलित साहित्य की लंबी परंपरा रही है।

आधुनिक युग में हिन्दी के दलित साहित्य की प्रथम अभिव्यक्ति कविता के क्षेत्र में ही संभव हुई। पटना के हीराडोम ने भोजपुरी में 'अछूत की शिकायत' कविता लिखकर दलित वर्ग की वेदना और पीड़ा को अभिव्यक्ति दी थी और जो अंततः एक दलित की शिकायत बनकर रह गई। यह कविता सन् १९१४ में 'सरस्वती' पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। लेकिन इस कविता का दलित साहित्य आंदोलन की परंपरा में ऐतिहासिक महत्व है। इस कविता का ऐतिहासिक महत्व इस अर्थ में है कि कवि ने कविता के माध्यम से पहली बार (आधुनिक युग में) ें के अवतारी पुरुषों की दोहरी मानसिकता यानी जातिगत भेदभाव वाले चरित्र को उद्द्घाटित करते हुए उनके अवतारवाद पर प्रश्न लगाते हुए अपनी पीड़ा को अभिव्यक्ति दी है।

उनके बाद स्वामी अछूतानन्द आदि हिंदू, आदिवंश का डंका और बिहारी लाल हरित अछूतों का पैगम्बर, भीमायण, जगजीवन-ज्योति ऐसे दो बड़े कवि हैं जिन्होंने दलित साहित्य के आंदोलन को नई दिशा दी। इनकी काव्य-परंपरा को आगे बझ़ाने में गयाप्रसाद प्रशांत भीम चेतावन, माता प्रसाद कलव्य, भीमशतकमोती राम शास्त्री रावण नहीं तथागत लक्ष्मी नारायण सुधाकर भीम सागर नाथूराम सागर भीम प्रशस्ति, नाथूराम ताम्रमेली भारत के वीर का योगदान है जिन्होंने अपनी कविताओं के द्वारा डॉ ़अम्बेडकर की स्तुति-वंदना करके उनके विचारों को दलित जन-जन तक पहुंचाया है। लेकिन बाद में बदली हुई परिस्थितियों में नए कवियों ने डॉ ़अम्बेडकर की स्तुति-वंदना और प्रचार-प्रसार के महती उद्देश्य से विमुख होकर दलित समाज के लोगों की पीड़ा, दुःख-दर्द तथा हजारों साल के सामाजिक-आर्थिक उत्पीड़न और शोषण से उपजे आक्रोश और उसके विद्रोह को ईमानदारी से अभिव्यक्त करने की कोशिश की है। लेकिन उनका आक्रोश और विद्रोह नकारात्मक नहीं, बल्कि सकारात्मक पहलुओं के आधार पर विकसित हुआ है।

दलित कहानियों की अपेक्षा उपन्यास कम ही संख्या में लिखे गए हैं। अगर कुछ आरंभिक उपन्यासों को छोड़ दिया जाय तो सभी उपन्यास आदर्शवादी ोपड़ी से राजभवन', रमाशंकर आर्य- 'द्घुटन', नवेन्दु- 'इंसान से ईश्वर तक' आदि दलित आत्मवृत्त सामने आए हैं। यहां स्पष्ट कर दूं कि हिन्दी की आत्मकथाओं और दलित लेखकों के आत्मवृत्तों में मूलभूत अंतर यह है कि हिन्दी आत्मकथाएं प्रसिद्ध व्यक्तियों द्वारा अपने पारिवारिक जीवन को ही आधार बनाकर लिखी जाती रही है, इसलिए वे एकांगी और व्यक्ति विशेष की उपलब्धियों तक ही सीमित रहती हैं जबकि दलित आत्मवृत्त व्यक्तिगत के बजाय संपूर्ण दलित समाज के परिवेश को लेकर चलते हैं, इसलिए वे एकांगी और आत्मगत न होकर समष्टिगत होते हैं क्योंकि उनमें संपूर्ण समाज का चित्र भी उपस्थित रहता है। इस तरह दलित आत्मवृत्त संपूर्ण दलित जीवनानुभवों की सर्जनात्मक उपलब्धि हैं क्योंकि इनमें दलित जीवन की पीड़ाओं, यंत्रणाओं, उपेक्षाओं और दुःखों को इनके लेखकों ने सच्चे और प्रामाणिक जीवनानुभवों के आधार पर अभिव्यक्त किया है। इधर हिन्दी के दलित साहित्य में आलोचनात्मक लेखन बहुत ही कम अनुपात में हुआ है। दलित आलोचना का क्षेत्र अभी उपेक्षित रहा है।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि मराठी दलित साहित्य की अपेक्षा भारत की अन्य भाषाओं में हिंदी के दलित-लेखन को छोड़कर, अभी दलित-लेखन कम ही हुआ। लेकिन जैसे-जैसे सामाजिक परिवर्तन और सामाजिक न्याय का आंदोलन गति पकड़ेगा, वैसे-वैसे दलित साहित्य का आंदोलन भी गति पकड़ने लगेगा। यह सच है कि आज का दलित साहित्य पिछली एक सदी के सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन का परिणाम है। इसलिए आज का दलित साहित्य अपनी ऐतिहासिक-सांस्कृतिक परंपरा से दलित समाज को परिचित ही नहीं करा रहा बल्कि उसमें स्वाभिमान और आत्मसम्मान से जीने की चेतना भी पैदा कर रहा है जिसे दलित-अस्मिता कहा जाता है और दलित-अस्मिता अम्बेडकरवादी चेतना के बिना संभव नहीं है।

यह लेख मैंने द सन्डे पोस्ट के सहयोग से लिया है .......बस थोड़े से नोट्स मेरे है ...