आधी हकीकत आधा फ़साना - भाग 6 / राकेश मित्तल

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आधी हकीकत आधा फ़साना - भाग 6
प्रकाशन तिथि : दिसम्बर 2014


बोलती फिल्मों के प्रारंभिक दौर में `प्रभात’ और `न्यू थिएटर्स’ के बाद भारत का तीसरा बड़ा स्टूडियो `बॉम्बे टाकीज़’ था। कई वर्षों से इंग्लैण्ड में रह रहे हिमांशु रॉय और देविका रानी की पहली मुलाकात लेखक निरंजन पाल के घर हुई। इसके बाद मुलाकातों का सिलसिला बढ़ता गया और 1929 में दोनों ने विवाह कर लिया। विवाह के बाद वे जर्मनी चले गए। 1934 में वे मुंबई आए और बॉम्बे टाकीज़ स्टूडियो की स्थापना की। यह भारत की पहली पब्लिक लिमिटेड कंपनी थी और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड थी। बॉम्बे टॉकीज़ भारत का सबसे आधुनिक और सुविधा संपन्न स्टूडियो था, जिसमें तमाम तरह के देशी-विदेशी उपकरण उपलब्ध थे। सन 1935 से 1939 के बीच बॉम्बे टाकीज़ ने सोलह फ़िल्में बनाईं। इन सभी फिल्मों की नायिका देविका रानी और निर्देशक जर्मन नागरिक फ्रांज ऑस्टिन थे। छायांकन तथा तकनीकी दॄष्टि से ये फ़िल्में प्रभात और न्यू थियेटर्स की फिल्मों से बेहतर थीं, किन्तु इनमें भारतीयता की झलक कम थी। इनमें से दो फिल्में `जीवन नैया’ और `अछूत कन्या’ हिट रहीं।

देविका रानी को भारतीय सिनेमा की प्रथम भद्र महिला कहा जाता है। वे महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर की नातिन की लड़की थी और बंगाल के अत्यंत प्रतिष्ठित परिवार से आई थीं। उनका प्रारम्भिक जीवन लन्दन में बीता, जहाँ हिमांशु रॉय से उनकी मुलाकात और शादी हुई। लन्दन में उन्होंने आर्किटेक्चर की पढाई की और बाद में रॉयल कॉलेज ऑफ़ ड्रामेटिक आर्ट्स तथा रॉयल कॉलेज ऑफ़ म्यूजिक से अभिनय एवं संगीत की शिक्षा ली। देविका रानी को भारत का सर्वप्रथम दादा साहब फाल्के पुरस्कार पाने का गौरव प्राप्त है। नेहरू परिवार के साथ उनके गहरे आत्मीय सम्बन्ध थे।

1940 में हिमांशु रॉय के निधन के बाद देविका रानी ने बॉम्बे टाकीज़ का नियंत्रण पूरी तरह अपने हाथ में ले लिया। 1945 में उन्होंने रुसी चित्रकार स्वेतोस्लाव रोरिख से विवाह कर अपने करियर के शिखर पर अभिनय से सन्यास ले लिया। 1950 में देविका रानी और शशधर मुखर्जी तथा अशोककुमार के बीच गहरे मतभेद हो गए, जिसके कारण कुल 102 फिल्मों के निर्माण के बाद सन 1954 में इस प्रतिष्ठित स्टूडियो को बंद करना पड़ा।

बॉम्बे टाकीज़ ने भारतीय सिनेमा को अनेक बेहतरीन कलाकार दिए है, जिनमें अशोक कुमार,देविका रानी, लीला चिटनीस, दिलीप कुमार, देव आनंद, राज कपूर, मधुबाला और मेहमूद जैसे सितारे शामिल है। अपने करियर के शुरुआत में राजकपूर बॉम्बे टाकीज़ स्टूडियो के सेट्स पर अटेंडेंट के रूप में काम करते थे। उनकी प्रतिभा और लगनशीलता को देखकर देविका रानी ने उन्हें `हमारी बात’ फिल्म में मौका दिया, जिसकी नायिका वे स्वयं थीं। बाद में केदार शर्मा की `नीलकमल’ से राजकपूर की पहचान बनी, जिसका प्रदर्शन और वितरण भी बॉम्बे टाकीज़ ने ही किया था। देव आनंद को हालाँकि पहला ब्रेक प्रभात स्टूडियो ने 1946 में फिल्म `हम एक हैं’ में दिया किन्तु वह फिल्म सुपर फ्लॉप रही और देव गुमनामी में ही रहे। बॉम्बे टाकीज़ की ज़िद्दी (1948) उनकी पहली हिट फिल्म थे, जिसके बाद लोग उन्हें जानने लगे। इसी प्रकार दिलीप कुमार को फिल्म `ज्वार भाटा’ (1944), मधुबाला को फिल्म `बसंत’ (1942) में बॉम्बे टाकीज़ ने पहला ब्रेक दिया। अशोक कुमार तो बॉम्बे टाकीज़ के पर्याय ही थे। 1943 में प्रदर्शित अशोक कुमार अभिनीत `किस्मत’ बॉम्बे टाकीज़ की सबसे सफल फिल्म थी। यह भारत की पहली सबसे बड़ी ब्लॉक बस्टर फिल्म थी, जिसने उस ज़माने में एक करोड़ रूपए से अधिक का व्यवसाय किया। कलकत्ता के एक सिनेमाघर में यह फिल्म लगातार 3 साल तक चली थी।