आसमान को छूना ही लक्ष्य / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

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अभिव्यक्ति को धारदार बनाने के लिए भाषिक क्षमता अति आवश्यक है। भावप्रवणता बिना सशक्त भाषा के समुचित स्वरूप ग्रहण नहीं कर सकती। हाइकु-सृजन के लिए भाव और भाषा दोनों की गहनता काम्य है। काव्य के साथ अनेक विधाओं में असफलता का सामना करने के लिए कुछ लोग हाइकु में 5-7-5 वर्णों की पंक्तियों का जोड़-तोड़ करके पताका फहराना चाहते हैं। ऐसे लोगों के प्रयास से निर्मल नीर की नदी को कचरे से पाटने का प्रयास अहर्निश हो रहा है, इसका कारण है एक संश्लिष्ट विधा को खेल समझकर कुछ भी शब्दजाल बिछा देना। एक ओर वह रचनाकार-वर्ग है, जो अपनी सकारात्मक क्षमता से इस विधा को शीर्ष पर पहुँचाने के लिए प्रयासरत है।

डॉ. पद्मजा शर्मा जी ने गद्य की विभिन्न विधाओं (कहानी, लघुकथा, संस्मरण, रेखाचित्र, साक्षात्कार आदि) को गरिमा प्रदान करने के साथ, काव्य को भी विश्व स्तर पर ऊँचाई प्रदान की है। आप चुपचाप पिछले दशक से हाइकु लिखकर अपने पास ही सँजोकर रखती रही हैं। 'आसमान को छूना है' की पाण्डुलिपि देखने का अवसर मिला। आपके हाइकु की विषय-विविधता ने मुझे बहुत प्रभावित किया। अल्पतम शब्दों में गहन भावों को अनुस्यूत करना कठिन ही नहीं, बल्कि चुनौतीपूर्ण कार्य है। आपके कुछ हाइकु उद्धृत करना चाहूँगा। निम्नलिखित हाइकु देखने में साधारण लगता है। दीवारें खुश हैं, क्योंकि उनके पास सारे महापुरुष हैं। इस हाइकु में बहुत गहरी व्यंजना है। इन महापुरुषों के जीवन का हमारे नित्य-प्रति के कार्यों के कोई सरोकार नहीं रह गया। हमने उनके आदर्शों को जीवन में कोई स्थान नहीं दिया। इनके चित्र दीवारों पर टाँगकर हमने अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर ली है। उनके आचरण से हम कोसों दूर हैं-

दीवारें खुश / उनके पास सारे / महापुरुष

कृत्रिमता जीवन को असहज बना देती है। बच्चे जैसा निर्मल और निश्छल मन हो, तो जीवन सरल हो जाता है-

आओ ढूँढ लें / एक व्यक्ति तो ऐसा। हो बच्चे जैसा

प्रेम का चित्र अल्पतम शब्दों में इस प्रकार व्यंजित किया जा सकता है। बस जीवन में एक बार आकर सदा के लिए साथ रह जाना। ग़मों से दूर रहने के लिए तुम्हारा साथ होना ज़रूरी है। यह 'तुम' जब 'तू' में बदल जाता है, तो उसकी व्यापकता पूरा परिवेश ही बदल देती है-

तुम आ जाओ / आकर रह जाओ / फिर न जाओ

तुम होते तो / कोई गम न होता / दिल न रोता

जब तू है तो / एक तू है सर्वत्र / तब मैं नहीं

प्रेम का एक अतीन्द्रिय स्वरूप पद्मजा जी के हाइकु में मिलता है, वह भी एक नूतन परिकल्पना के साथ-

धरती तले / जैसे जल बहता / मुझमें तू था

रात जागती / तुम हो यहीं कहीं / कहे मुझसे

प्यार की स्थिति दर-दर भटकते बनजारे जैसी हो गई। जिससे प्रेम हो, उसका साथ होना आवश्यक है, क्योंकि-

है बनजारा / फिरता मारा-मारा / प्यार बेचारा

तेरी यादों ने / कहीं का नहीं छोड़ा / ये दिल तोड़ा

संघर्षशीलता जीवन की शक्ति है। जिसकी ज़मीन है, निरन्तर मेहनत करने पर भी उसे जो मिल पाता है, उससे जीवन नहीं चल पाता। यह आज की सबसे बड़ी विडम्बना है-

जमीन मेरी / है मेहनत मेरी / फसल तेरी?

आज का श्रम और संघर्ष भविष्य की आधारशिला है। लू के थपेड़ों से बचने के लिए आराम तलब लोगों के लिए बहुत सारी सुविधाएँ हैं। वहीं शिक्षा अर्जित करने के लिए बच्चों का विपरीत मौसम से संघर्ष जारी है। पथिक का निरन्तर चलना, दीपक का निरन्तर जलना यही सन्देश देते हैं कि चलना ही जीवन है-

चल रही लू / उड़ रही है धूल / बच्चे हैं स्कूल

पथिक तुम / चलो मंजिल पाओ / फिर सुस्ताओ

हवा न बहो / दीप कह रहा है- / जलते रहो

एक ओर गाँव-शहर को सींचती नहर है, तो दूसरी ओर वह नदी है, जो कहर ढाकर गाँव को बरबाद करके उसे उदास कर दे रही है-

खिलखिलाती / पानी देती नहर / गाँव शहर

गाँव उदास / नदी ढाए कहर / चुप शहर

शब्द ब्रह्म है और काव्य हृदय का शृंगार, आत्मा का भोज्य। यह सभी सम्भव है, जब व्यक्ति संवेदनशील हो। एक अकेला शब्द दीपक की तरह मन को आलोकित करता है-

दिल का होना / है कविता का होना / कुछ बोलो ना

शब्द से होता / रोशन अन्धकार / घृणा हो प्यार

आज के इस भौतिक युग में आदमी केवल उपभोक्ता बनकर रह गया। लाभ-हानि का अर्थतन्त्र, जो न करा ले, वही कम है। विकास की अंधी दौड़ में मानवता ही गुम हो गई है। पद्मजा जी ने कटाक्ष किया है-

आदमी खोया / उपभोक्ता बनके / बहुत रोया

कैसा विकास / इंसानियत ख़त्म / बची न आस

जबकि इस छोटे-से जीवन को सलीके से जीना था। यह तभी सम्भव है, जब हमारे मन में कोई दुराव न हो, कोई ग्रन्थि न हो। झरना शब्द का यमक के रूप में भाषिक प्रयोग और वृक्ष के पत्तों के माध्यम से जीवन का गहन सन्देश द्रष्टव्य है-

जीवन थोड़ा / मन की गाँठें खोलो / कुछ तो बोलो

झरना झरे / पत्ते-पत्ते से कहे- / झरना नहीं

नारी की स्थिति आज समाज में बद से बदतर होती जा रही है। आधुनिकता की चकाचौंध ने सारी मर्यादाएँ ध्वस्त कर दी हैं। साधारण जन, नेता, अभिनेता, धर्म का लबादा ओढ़े छद्म भक्त किसी खूँखार भेड़िए से कम नहीं। जिसे अवसर मिला, वही नारी को अपनी कुत्सित वासना का शिकार बना लेता है। उम्र की सारी सीमाएँ लाँघ दी जाती हैं। ऐसे पतितों को धन-बल, जन-बल वालों का संरक्षण भी मिल जाता है-

स्त्री है अकेली / शिकारी है घात में / दिन रात में

कराह रही / बच्ची कोई बचाओ / कि बचे बच्ची

स्त्री की खुशी लोग कहाँ देख पाते हैं। उसका हँसना भी उसके लिए अभिशाप ही है-

हँसती स्त्री / कोई सह न पाए / वह जी न पाए

इन हाइकु में प्रेम, प्रेम की मधुर स्मृति, प्रेम को न पाने की पिपासा का गहन चित्रण किया गया है। यादों का मधुरिम स्पन्दन है। छोटे-से हाइकु में कितनी तीव्रता है, कितनी गहनता है, उसका अनुभव इन हाइकु से हो जाएगा-

मैं समंदर / हर लहर में हूँ / पहर में हूँ

मैं तो नदी की / हर लहर में हूँ / सहर में हूँ

नींद नहीं है / है तो सपना तेरा / लगता मेरा

हम मिलेंगे / जीवन एक फेरा / छँटा अँधेरा

मिलने आई / तेरी निगोड़ी याद / बरसों बाद

प्रिय के साथ जीवन बिताना किसी अमृतपान से कम नहीं है। प्रिय का स्पर्श न पाना बहुत बड़ा अभाव है। इस क्षणभंगुर जीवन में प्रिय का साथ रहना ही जीवन का आधार है। प्रेम इतना सम्पृक्त है कि प्रिय में सदा-सदा के लिए समा जाना ही उसकी एकमात्र कामना है

तेरे ही साथ / मैंने जीवन जिया / अमृत पिया

कि तुम्हें गए / बहुत दिन हुए / कि तुम्हें छुए

जीवन थोड़ा / तुम मत जाओ ना / पास आओ ना

प्रेम इतना सम्पृक्त है कि प्रिय में सदा-सदा के लिए समा जाना ही उसकी एकमात्र कामना है। यह हृदय में समा जाने वाला एक अद्भुत हाइकु है-

तू मुझमें आ / तू मुझमें समा जा / सदा के लिए

प्रिय का होना सौभाग्य है, तो उसके खोने का डर सबसे बड़ा है-

लगता डर / तेरे नहीं होने से / तेरे खोने से

आपसी सम्बन्ध इतने जीर्ण हो चुके हैं कि अपनी सारी ऊष्मा खो चुके हैं। घर का अपनापन कहीं हो गया, क्योंकि अब घर, घर नहीं रहा, मकान हो गया। इस विडम्बना को निम्न हाइकु में चित्रित किया गया है-

यह मकान / है घर नहीं पर / था यहीं कहीं

पर्यावरण की चिन्ता में हज़ारों हाइकु लिखे गए, जो केवल वर्णन बनकर रह गए। पद्मजा जी का यह हाइकु देखिए और इसकी सांकेतिकता देखिए, जो शब्दों की संरचना से बाहर जाकर बहुत कुछ कह जाती है। इसमें व्यंजित डर केवल चिड़िया का नहीं; बल्कि पूरी उजड़ती, पल-पल मरती प्रकृति का है-

टहनी हिली / पेड़ के कटने से / चिड़िया डरी

स्थानाभाव के कारण सभी हाइकु पर लिखना सम्भव नहीं है। सारे हाइकु गहन संवेदना और सहज भाषा से सज्जित हैं। मैं आशा करता हूँ कि डॉ. पद्मजा शर्मा का यह संग्रह आपको अवश्य पसन्द आएगा।


4 मई 2023, नई दिल्ली