ऐडमिशन / चित्तरंजन गोप 'लुकाठी'
खिड़की पर एक लड़का हुलुक-बुलुक कर रहा था। गुरुजी ने आवाज़ दी, "कौन झांक रहा है?" इतना सुनते ही दो उद्दंड टाइप के लड़के दौड़कर क्लास से बाहर निकले और खदेड़ते हुए उस लड़के को पकड़ लाये।
"खिड़की से क्यों झांक रहा था?" गुरुजी ने पूछा।लड़के ने कांपते हुए जवाब दिया, "गुरुजी देख रहा था कि बच्चे कैसे पढ़ते हैं?"
"क्या तुम भी पढ़ना चाहते हो?"
"हूँं...।" लड़के ने माथा हिलाकर हामी भरी।
"क्या नाम है तुम्हारा?"
"गोरू।"
सभी लड़के हंस पड़े।
गुरुजी ने आगे पूछा, "पिताजी का नाम?"
"भालुक।"
फिर हंसी हुई।
अगले दिन गुरुजी भालुक के घर गए।भालुक ने कहा, "गुरुजी हमलोग पढ़-लिखकर क्या करेंगे?"
गुरुजी ने कहा, "मानुष बनोगे।"
यह सुनकर भालुक हा करके ताकने लगा। बोला, "मैं और मेरा बड़ा बेटा शेरू मजदूरी करते हैं। भेड़ू और उसकी माँ बाबू के यहाँ काम करते हैं और गोरू गाँव की भेड़-बकरी चराता है। गोरू पढ़ने जाएगा तो...।"
गुरुजी ने काफ़ी समझाया। उनके कामों का बंटवारा किया। तब भालुक गोरू को स्कूल भेजने के लिए राजी हो गया।
दूसरे दिन भालुक गोरू को लेकर स्कूल पहुँचा। गुरुजी ने गोरू को स्कूल ड्रेस, किताब, कॉपी और पेंसिल दी। गोरू बच्चों के बीच बैठकर पढ़ने लगा। गुरुजी ने ऐडमिशन रजिस्टर पर उसका नाम लिखा-- गोरेलाल। अंगूठे का ठप्पा लगाते हुए भालुक की आंखों से आंसू छलकने लगे। छलछलायी आंखों से वह अपने बेटे को एकटक निहारने लगा। पर उसका बेटा इन सब से बेखबर, मानुष बनने की तैयारी में जुट गया था-- क ख ग घ ङ। क ख ग ।