ओरहान पामुक का एक इंटरव्यू-2 / शिवप्रसाद जोशी

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परंपरा की पुनर्खोज को पुरस्कार

(नोबेल पुरस्कार प्राप्त ओरहान पामुक से बातचीत)

बातचीत का अगला सिलसिला पामुक की राइटिंग स्टाइल और तुर्की के मौजूदा हालात पर केंद्रित है. इस खंड में उनके मशहूर उपन्यास द ब्लैक बुक की चर्चा है. पाठकों की सुविधा के लिए थोड़ा ज़िक्र इस किताब का करते चलें. 19 वीं सदी के रिएलिज़्म को पहली बार किसी ने छुआ. कुछ लोग कहते हैं कि यही दो किताबें हैं जिनमें पामुक को अपनी आवाज़ मिली. 1980 के इस्ताम्बूल की कहानी है यह. तुर्की के इतिहास की क्रूरतम बगावत से नौ महीने पहले की बात. जब गालिप नाम का एक युवा शख़्स अपनी लापता बीबी को इस्ताम्बूल में ढूंढता भटक रहा है. पामुक ने गालिप की निगाह से न सिर्फ़ एक ऐतिहासिक शहर की कई परतें खोजीं हैं, मुल्क के अहम सम्मानबोध और ताक़तवर तबकों के अंतर्विरोधों, आधुनिकता के अधकचरे फ़लसफ़े ढोते निज़ाम के दमन भरे रवैये की छायाएं इस उपन्यास में पेश की हैं. अब आगे की बातचीत..

मुझे लगता है आपकी इस किताब द ब्लैक बुक के साथ कुछ बदल गया कि जो कुछ भी दिलचस्प काम आपने तबसे किए हैं उनकी कोंपल वहीं से फूटी थीं. क्या आप इसी नज़रिए से इसे समझते हैं?

1982 में मेरा दूसरा नॉवल प्रकाशित हुआ. तुर्की की जेलों में उस वक़्त दहशत का साया था. बोलने की आज़ादी बिल्कुल न थी. सिवाय इसके कि आप इतिहास का एक उपन्यास लिख दें या ऐसा उपन्यास जो सियासत के बारे में ज़्यादा न बोलता हो. इन चीज़ों की इजाज़त न थी. ऐसे ही वक़्त के दौरान, 1985 में मेरी हैरॉल्ड पिंटर से मुलाक़ात हुई. वो आर्थर मिलर और दूसरे बाहरी ऑब्ज़र्वरों के साथ एक मानवाधिकार मिशन पर इस्ताम्बूल आए थे. मैं उनका गाइड था. सेना ने आईन का एक मसौदा तैयार किया था और समूचा मुल्क उस पर अपना वोट दे रहा था. नब्बे फ़ीसदी उसके हक़ में गया. लेकिन पश्चिमी पैमाने के लिहाज़ से यह आज़ाद रिफ्रेंडम नहीं था.

मेरे रिश्ते का एक भाई उस दौरान एक विज्ञापन एजेंसी में काम करता था. उसने मुझे फोन किया और बताया कि स्विट्जरलैंड से मीडिया के कुछ लोग आए हैं और वे ऐसे आदमी की तलाश कर रहे हैं जो मुल्क में लागू किए जा सरे उस आईन की टीवी पर मुख़ालफ़त कर सके. हम लोग यूं तो अब भी उस आईन से बंधे हैं लेकिन उन दिनों में हर कोई उसकी खुलेआम आलोचना करने से डरता था. और यहां से स्विस टीवी वाले एक ऐसे तुर्क को खोज रहे हैं जो तुर्की में रहते हुए उसकी आलोचना करे. और भाई किसी वामपंथी इंटलेक्चुअल को नहीं जानता था इसलिए मुझे पूछ रहा था कि क्या आप किसी को जानते हैं. उसने कहा कि उनके लिए यह ज़रूरी नहीं कि बोलने वाले का चेहरा दिखे.( मैने इस बात का इस्तेमाल द ब्लैक बुक के आखिर में किया है, जब ज़रूरी राजनैतिक बयान देने के बजाय नैरेटर एक लंबी कहानी सुनाने लगता है.) मेरी मुश्किलों का भी यही बेहतर हल हो सकता था.

खैर..मैने कहा, ठीक है मैं किसी को ढूंढता हूं. अपने एक दोस्त के साथ मैं दूसरे दोस्तों से मिलने गया. वे प्रोफेसर लोग थे जिन्हें यूनिवर्सिटी से निकाल बाहर कर दिया गया था लेकिन जो जेल में नहीं थे. हम फोन का इस्तेमाल नहीं कर सकते थे, सो हम मिलने गए, उन्हें पूछने. वे सब बोलते तो मुश्किलों में पड़ जाते.

यह बात भी मेरे ज़ेहन में रह गई. (किताब के लिए)..अपर मिडल क्लास का पढ़ा लिखा लिबरल एक आदमी दो मकान दर मकान भटक रहा है, फोन किए जा रहा है..मुश्किल और दुविधा से घिरा हुआ हीरो जो इस्ताम्बूल में किसी को खोज रहा है. ये कहानी का एक अच्छा फ्रेम था. लेकिन हम झुंझला गए थे. हमें कोई भी बोलने वाला शख़्स नहीं मिला. मेरे दोस्त ने कहा, ठीक है ओरहान तुम बोलो. लेकिन उस वक़्त में कायर था. मैं सियासी तौर पर मुखर नहीं था. मैं तब नहीं जानता था कि संविधान की आलोचना कैसे की जाए. वे लोग ऐसा आदमी चाहते थे जो मानवाधिकारों से जुड़ा हो. सो मैं आखिरकार नहीं बोल सका...लेकिन गालिप..मेरा हीरो..वो बोलता है.

मैं अपने उपन्यास के प्लाट में यूरोप की एक प्रमुख टीम के तुर्की का फुटबॉल मैच रखने जा रहा था. जहां जहां मेरा हीरो गालिप गया सारा मुल्क वहीं था, रेडियो सुनता हुआ, उस ज़माने में जर्मनी और तुर्की के मैच 7-0 पर छूटते थे. मैने सोचा देश की हार को, गुस्से और फ्रस्टेशन को ज़ाहिर करने के लिए यही ठीक रहेगा. जब गालिप सियासी बयान दे सकने वाले किसी इंसान की तलाश कर रहा था तो ऐसे लोग उसे न सिर्फ़ मिल गए बल्कि रेडियो पर समूचा इस्ताम्बूल फुटबॉल मैच के स्कोर को सुन भी रहा था. एक शून्य. तीन शून्य...पांच शून्य...

मैंने 1985 में यह नॉवल लिखना शुरू किया और तुर्की में यह 1990 में प्रकाशित हुआ. और इस बीच मैने इस टैक्सचर की तलाश की..कहानी की नहीं..कहानी बहुत सामान्य है. बीवी गुम हो जाती है. और हैरान परेशान हीरो ऐसा इंसान जो मेरे कल्चर और सेंटीमेंट को साझा करता है, इस्ताम्बूल की गलियों में घूमता है, मेरे दिमाग में इस्ताम्बूल को निशानों के महासागर में बदल देने का ख़्याल आया, कुछ निशान मेरा हीरो पढ़ लेता और कुछ वो नहीं समझ पाता. और अगर वो उनको नहीं समझ पाता तो इसमें कोई हर्ज़ नहीं. क्योंकि इससे रहस्य की परत ही जुड़ती है. जो कि वहां पहले से मौजूद भी है. इस्ताम्बूल में इतिहास की सभी परतें होने की वजह से..

यह मेरे चरित्र में है कि मैं पाठ को अत्यधिक भरा पूरा, अति प्रचुर रखता हूं. मेरी प्रवृत्ति है ज़्यादा से ज़्यादा जोड़ते जाने की, किसी खाली जगह में, किसी कमरे में, किसी दूकान पर डिटेल्स को परखना मुझे पसंद है. जहां डिटेल्स ऑर्गनिक तौर पर ड्रामे को नुमाया नहीं करती बल्कि मुख्य कहानी की तरफ़ ही बढ़ने लगती है..उसे चाटती हुई..होशियारी से कहानी को दूसरे किनारे पर खींचती हुई.

जहां चीज़ें भी कैरेक्टर बन जाती हैं...

मैं नहीं जानता..लेकिन इसका रिश्ता लिखने की आदतों से भी हैं. अगर आप तेज़ी से लिखने वाले लेखक हैं..मुझे इन धुआंधार लेखकों से जलन होती है....तो आप एक सुगठित गद्य लिख लेते हैं. मैं कभी ऐसा कर पाता हूं कभी नहीं कर पाता. मेरा दिमाग इतना तेज़ नहीं दौड़ता..दूसरी तरफ़ मैं यह भी ध्यान रखता हूं कि कहानी पटरी से उतर न जाए. हर बार मैं सोचता हूं कि मेरा फलां चैप्टर सात या आठ पेजों का ही रहेगा. लेकिन लिखते लिखते वो 18 पेज का हो जाता है. उन 18 पन्नों में जो कुछ होता हो वही सात पन्नों में होना था. लेकिन कई सारे निशान और प्रतीक उभरने लगते हैं, मुझे यह सुहाता है कि मैं कई रंगतों कई धुनों में काम करूं कि जिनका किताब में और दूसरी कई चीज़ों से रिश्ता रहता है.

बोर्खेज़ का असर है आप पर. उनमें ऐसा क्या था जिसने आपके सामने चीज़ें खोल कर रख दीं?

साहित्य की दुनिया में यह एक तरह का उजाला था. छिपे हुए तथ्य सामने आ गए थे. उनसे मैने सीखा कि गूढ़ किस्म के किसी मज़हबी पाठ को ठेठ तीखे निस्पृह और इसके नतीज़तन सेक्यूलर आंख से कैसे देखना चाहिए. बोर्खेज़ ने मुझे सिखाया कि असल में लिटरेचर का भी मेटाफिज़िक्स(साहित्य की पराभौतिकी) हो सकता है. उन्होंने मुझे उन पुराने पाठों को देखने की एक आज़ाद ख़्याल निगाह दी जो यूं रिवायत और मज़हब के इतने भारी जज़्बाती बोझ से दबे हैं. मुझे यह बात अच्छी लगी कि बोर्खेज़ किसी साहित्यिक पाठ के भावुक पहलू से नहीं बल्कि उसके पराभौतिक गुणों से प्रभावित होते थे. उन्होंने लिटरेचर के पैटर्न पर बात की थी और उससे मैने सीखा कि सूफ़ी पाठ को उस रोशनी में कैसे समझना है. बोर्खेज़ के अलावा एडगर एलन पो, काफ़्का और इतालो काल्विनो ने मुझे मज़हब और नैतिकता-आध्यात्मिकता का सबक सिखाने वाली किसी कहानी(पैराबल) के बीच और कहानी औऱ फ़िलॉसफ़ी के बीच फ़र्क करना सिखाया. मैने 1980 के दशक के शुरू और बीच में तुर्की और अमेरिका में रहकर सारे सूफ़ी पाठ पढ़ डाले. मेरे समूचे सू़फ़ी अनुभव का लब्बोलुआब यह है कि मैने रूमी को पढ़ा..बोर्खेज़ और काल्विनो को दिमाग में रखकर.

तुर्की में नॉवल लिखने का मतलब था एक पॉलिटिक्ल या शायद एक आईडियोलॉजिकल पैकेज. बाल्ज़ाक को पढ़ने, पश्चिमी क्लासिक्स पढ़ने का मतलब था वामपंथियों, आधुनिकतावादियों से जुड़ाव, पुराने सूफ़ी और इस्लामी क्लासिक पढ़ने को बड़ा रूढ़िवादी माना जाता था.

आपके कहने का मतलब यह है कि तुर्की दो विचारधाराओं की दरारों में गुम हो गया?

आज आप किसी किताब की दूकान में जाएं तो आपको हर तरह की मज़हबी और मॉडर्न किताबें मिल जाएंगी. लेकिन मेरे युवा दिनों में कोई किताब की दूकान या तो वेस्टर्न, मॉडर्न और लेफ़्ट झुकाव वाली हो सकती थी या फिर इस्लामी और रूढ़िवादी. मुल्क उस वक़्त तहज़ीबी तौर पर ज़्यादा बंटा हुआ था. मेरे युवा दौर में तथाकथित पब्लिक स्पेस कम मज़हबी थी जबकि मुझे लगता है कि घरों के भीतर की ज़िंदगी ज़्यादा पाक थी.

विरोधाभास यह है कि तुर्की खुद को दुनिया के सामने 99 फ़ीसदी मुस्लिम देश के तौर पर पेश करता है लेकिन खुद को सेक्यूलर मुल्क भी बताता है. तो इसमें दोहराव दिखता है. तुर्की के बाहर लोग नहीं समझ पाते कि दोनों परिभाषाएं कैसे एक साथ फिट होती हैं?

जी हां...नौकरशाह ..जो सत्ता पर क़ाबिज़ इलीट खेमे के अभी भी 60 फ़ीसद बैठते हैं..हमेशा उखड़ जाते हैं, जब कोई अमेरिकी या यूरोपियाई शख़्स कहता है कि तुर्की इस्लामी मुल्क है. क्योंकि हम तुर्कों को इस बात का बड़ा गुमान है कि हम अकेले सेक्यूलर इस्लामी मुल्क हैं. यह हमारी पहचान का हिस्सा है. यह बदकिस्मती से कौमपरस्ती का भी हिस्सा है. क्योंकि हम सत्ता से जुड़े कंज़रवेटिवों को दो टुकड़ों में बांट सकते हैं. एक तरफ़ पश्चिम विरोधी राष्ट्रवादी तुर्क हैं और दूसरी तरफ़ इस्लामपरस्त हैं.वे कौमपरस्त नहीं हैं. इस्लामपरस्त हमें यूरोप में ले जा रहे हैं जबकि धुर कौमपरस्त जिनमें से कई बड़े सेक्यूलर हैं वे तुर्की का यूरोपीय संघ में शामिल होने का रास्ता बंद करने के लिए सेक्यूलरिज़्म और अतातुर्क के रसूख़ का इस्तेमाल कर रहे हैं.

ओरहान आप क्या शहर में अब भी पहले जितना घूम फिर लेते हैं?

बिल्कुल. जबसे अपनी किताबों के प्रमोशन के लिए मैं टीवी पर आने लगा...तो मैं ज़रा आत्मसजग हो गया हूं. कुछ लोग मुझे सड़क पर पहचान लेते हैं, टैक्सी ड्राइवर फौरन विवाद की बात छेड़ देते हैं लेकिन दक्षिणपंथी मीडिया के मुक़ाबले ज़्यादा नरमी और ज़्यादा दोस्ताना तरीक़े से. भले ही मुझसे सहमत न हों..हम एक दूसरे की इज़्ज़त करते हैं. मिसाल के लिए आज सुबह ही एक टैक्सी ड्राइवर मिला, मुझे पहचानकर हमदर्दी जताने लगा. फिर मैने कुछ शिकायत की. उसने कहा, तुम्हें देशद्रोही सरीखा बना दिया उन लोगों ने. ज़्यादा ही बढ़ा चढ़ाकर दिखाई हैं चीज़ें. पांच मिनट में हम दोस्त बन गए. यह शख़्स यूं एक गुस्सैल कौमपरस्त था, शिकायत करता हुआ कि सरकार साइप्रस को बेच देना चाहती है, लेकिन हम दोस्तो की तरह विदा हुए.

मैं ऐसे लोगों से पहले जो कहता था वो सब अब नहीं कहता हूं. मैं बहस नहीं करना चाहता हूं. मैं सुनना पसंद करता हूं. लिहाज़ा मैं हां में सिर हिलाता हूं. और बस...हां...हां..हां करता हूं.