करण जौहर : कुछ अधपका रह जाता है / जयप्रकाश चौकसे

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करण जौहर : कुछ अधपका रह जाता है
प्रकाशन तिथि :08 अगस्त 2016


इस तरह की खबर है कि फिल्मकार 'प्राचार्य' करण जौहर अपने कलाकार छात्रों से उन्हें 'स्टूडेंट ऑफ द ईयर' नामक फूहड़ परंतु बॉक्स ऑफिस पर सफल फिल्म में प्रस्तुत करने के एवज में उन्हें अन्य निर्माताओं से प्राप्त मेहनताने का बीस प्रतिशत कमीशन लेते हैं। इसके साथ ही तीन या पांच फिल्में उन्हें करण जौहर की निर्माण संस्था के लिए नाम मात्र के मुआवजे पर करनी होंगी।

सफलता का अष्टपद अपनी बाहों में कई तरह से 'शिकार' बांध लेता है। यह भी सुना है कि वरुण के पिता फिल्मकार डेविड धवन इस 'शोषण' से त्रस्त हैं। जब डेविड धवन ने अपने पुत्र वरुण के साथ फिल्म बनाई तब भी वरुण को कमीशन देना पड़ा। कुछ अनुबंध किसी रिश्ते को नहीं मानते। बंधुआ प्रथा अनेक रूपों में प्रकट होती है। दरअसल, स्वतंत्रता का आदर्श कभी यथार्थ में बदलता नहीं है। सिर्फ जंजीरों के नाम बदलते हैं। फूलों की माला डालकर विवाह के रिश्ते को भी जंजीर का स्वरूप प्रदान किया जाता है। याद आती है निदा फाज़ली की पंक्तियां, 'आज़ाद न तू, आज़ाद न मैं, जंजीर बदलती रहती है, तस्वीर बदलती है, दीवार वही रहती है।'

करण जौहर के पिता यश जौहर ने फिल्म निर्माण में व्यवस्था करने वाले व्यक्ति के रूप में काम किया, लंबे समय तक साधना के सचिव रहे। 'कुली' दुर्घटना में घायल अमिताभ बच्चन के लिए विदेशों से तुरंत दवा प्राप्त करने का काम भी उन्होंने किया। वह व्यक्ति अपनी फिल्म 'दोस्ताना' के टाइटल को जीवन में ढाल चुका था। उन्होंने 41 की उम्र में विवाह किया था और करण उनके एकमात्र पुत्र हैं। यश जौहर दक्षिण मुंबई में रहते थे और वह क्षेत्र उच्च व्यापारी वर्ग की रिहाइश का क्षेत्र है। करण का लालन-पालन बहुत ही सुरक्षा के साथ किया गया। उन्हें सब तरह के कवच दिए गए।

यश जौहर इतने व्यावहारिक व्यक्ति थे कि उन्होंने फिल्म व्यवसाय के साथ अपना गारमेंट एक्सपोर्ट का काम जारी रखा। करण जौहर के उस दौर के संगी-साथी सिनेमा को हेय दृष्टि से देखते थे, क्योंकि यह अभिजात्य वर्ग का झूठा गर्व था। करण एक बार अपने पिता के साथ अादित्य चोपड़ा से मिले और इस मामूली मुलाकात ने करण जौहर का जीवन ही बदल दिया। वे 'दुल्हनिया' में आदित्य चोपड़ा के सहायक बने तथा शूटिंग के दरमियान काजोल और शाहरुख खान से मित्रता हो गई। इसके परिणाम स्वरूप करुण जौहर 'कुछ कुछ होता है' नामक सफल फिल्म बना पाए। इस उत्साह की तरंग पर सवार करण जौहर ने यह कहा कि शाहरुख को केंद्र में रखे बिना वे किसी फिल्म का आकल्पन ही नहीं कर पाएंगे परंतु ऐसा हुआ नहीं।

करण जौहर की फिल्मों में बिना किसी संदर्भ के भी समलैंगिकता का जिक्र आ ही जाता है। पटकथा की मांग नहीं होने पर भी ऐसा किया जाता है। हर फिल्मकार किसी भी दृष्टिकोण को प्रस्तुत करने के लिए स्वतंत्र है और उनकी फिल्में सेन्सर बोर्ड द्वारा प्रमाणित भी रही है, अत: किसी को कोई ऐतराज नहीं करना चाहिए। उनकी 'स्टूडेंट ऑफ द ईयर' में ऋषि कपूर अभिनीत पात्र कॉलेज का प्राचार्य है और गेम्स टीचर से प्रेम करता है। दोनों ही पुरुष पात्र है। जब मृत्यु शैया पर पड़ा ऋषि कपूर अभिनीत पात्र गेम्स टीचर से अगले जन्म में साथ देेन की बात करता है तब संवेदनशील व्यक्ति को बहुत खटकता है, क्योंकि मृत्यु का क्षण अत्यंत गंभीर भी है और पवित्र भी, जिसे समलैंगिकता या अन्य किस्म के शारीरिक संबंध की बात से दूषित नहीं किया जाना चाहिए। हमें कैसा लगता जब मृत्यु शय्या पर पड़े भीष्म पितामह से अंबा अगले जन्म में विवाह की प्रार्थना करे।

जीवन का हर क्षण पवित्र है परंतु जन्म और मृत्यु तो अर्थ की अनेक सतहों को उजागर करते हैं। यह तो गनीमत है कि फिल्मकार ने उन दृश्यों के पार्श्व संगीत में शंख ध्वनि का इस्तेमाल नहीं किया। उनकी पहली फिल्म 'कुछ कुछ होता है,' में सात-अाठ वर्ष की मासूम हिंदू कन्या कोई जानकारी लेने मुस्लिम परिवार में स्वयं को मुस्लिम बताकर प्रवेश करती है और नमाज अदायगी का स्वांग भी करती है। प्रयोजन कुछ भी हो परंतु फिल्मकार ने एक मासूम पात्र से उसकी उम्र की मासूमियत छीनकर उसे छल-कपट करते दिखा दिया।

सफलता को साद्य मान लेने पर इस तरह की गलतयां होती हैं परंतु दुखद यह है कि उन्हें इसका अहसास भी नहीं है। उनका अपना बचाव यह हो सकता है कि अधिकतम दर्शकों ने इन त्रुटियों की ओर ध्यान ही नहीं दिया। बचाव की पतली गलियां हमेशा उपलब्ध रहती हैं। 'मैं हूं प्रेम रोगी' गीत में एक ध्वनि ऑफ की है और लक्ष्मी-प्यारे ने यह कहा कि इतनी-सी चूक पर कोई ध्यान नहीं देता, अत: इसे पुन: रिकॉर्ड करने की आवश्यकता नहीं है। इस बात के बाद राज कपूर ने उन्हें अपनी अगली फिल्म में नहीं लिया। हर एक अपने तरीके से काम करने के लिए स्वतंत्र है।