कसपावतार में मनोहर श्याम की भाषा-लीला / रविकान्त

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हमारी बिरादरी को यह तर्क स्वीकार नहीं हुआ कि लेखक बुद्धिजीवी होने के साथ-साथ शिल्पी भी है और उसे अपने शिल्प का जनता के ज्ञानवर्धन और मनोरंजन के लिए उपयोग करने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए। शिल्प या भाषा की बात करना ही इंटेलेक्चुअलता की कमी का प्रमाण हमारी बिरादरी में माना जाता रहा है। एक गोष्ठी में मैंने जब शिल्प और भाषा की बात उठाई तो एक जनवादी युवक लेखक ने मुझे याद दिलाया कि शिल्प तो मोची को भी आता है और लच्छेदार बातों से रिझाना रंडी भी जानती है। विचारणीय है कि शिल्प को घटिया ठहरानेवाला यह तेवर कहीं 'मनुवादी' तो नहीं है? - 'मास मीडिया और साहित्य

बदमासी' का सही अनुवाद लीला होगा इस संदर्भ में, यद्यपि सुधीजनों को इस अनुवाद से किंचित आध्यात्मिक कष्ट हो सकता है। --- कसप

बहुत पहले ही यह बात उनकी किताबों का ब्लर्ब बनने तक स्वयंसिद्ध हो चली थी कि जोशीजी के शिल्प का अनूठापन उसके खिलंदड़पन में है। शायद यह भी कि उनके कृतित्व की शैली उनके वृहत्तर केलिप्रिय व्यक्तित्व का ही उप-समुच्चय है, जो भी एकाध बार उनसे मिलने-जुलने या उनको सुनने का मौक़ा मिला, उसके आधार पर ऐसा अनुमान लगाता हूँ। आप यह भी कह सकते हैं कि मैं उल्टी गंगा बहा रहा हूँ - अपने एक निहायत चहेते लेखक की शख़्सियत में वह तलाश रहा हूँ, जो मुझे उनकी रचनाओं से हासिल हुआ है। पर यहाँ एक 'रिऐलिटी टीवी'-जैसे प्रसंग का उल्लेख शायद उतना बेमानी न होगा। जिस दिन उन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिलने की घोषणा हुई थी, उस दिन मैं चैनल बदलते हुए एस-1 पर ठिठक गया था, क्योंकि साक्षात जोशीजी ऐंकर के रस्मी सवालों का अनमना-सा जवाब देते हुए फोन-इन करनेवाले मित्रों से बधाइयाँ बटोर रहे थे। ज़ाहिरा तौर पर मौक़ा ख़ुशनुमा होने के साथ-साथ साहित्यिक होने के चलते गंभीर था और वह भी यथासंभव संजीदा दीखने की कोशिश कर रहे थे। स्पष्टत: सायास। तभी मुंबई से जावेद अख़्तर का फोन आया। मुबारकवाद लिया, शुक्रिया वग़ैरह अदा किया और छूटते ही बोले, "अरे साहब आजकल तो आपके दिल्ली आने-जाने का पता ही नहीं चलता। ठीक है, आपने पीना छोड़ दिया है, पर हम तो अभी-भी कभी-कभार पी लेते हैं। मिल लिया कीजिए, आप नहीं तो हम ही थोड़ी पी लेंगे!" टीवी पर अपने पीने का ऐसा बेलौस और ऐलानिया हलफ़नामा पेश करना कम से कम साहित्यिकों में तो सिर्फ़ जोशीजी के ही बूते की बात थी। और यही सांस्कृतिक बदमासी हमारे जैसे 'जोशजू' के 'सीलिंग फ़ैनों' को बहुत पसंद थी/है/रहेगी।

वैसे ही जैसे बहुत पहले उनकी लिखन-शैली - अज्ञेय के शब्दों में 'यह तो जोशीजी जैसा हो गया'1 - के हम मुरीद हो गए थे, उनकी चीज़ें खोद-खोदकर और बार-बार पढ़ते थे, उनकी पंक्तियों को शोले के डायलॉग की तरह दुहराते थे, और आज जब मैं यह लिखने बैठा हूँ तो लिखाई के रास्ते का सबसे बड़ा अवरोध वह उपन्यास ही बन गया है, जिस पर लिखना तय किया। मसला यह है कि आपको लगता है आपने पढ़ लिया है, महत्वपूर्ण पन्नों पर झंडे-पताके गाड़ दिए हैं, उनपर नोट्स भी चेप दिए हैं, और बस लिखने को तैयार हैं। लिखना शुरू भी कर देते हैं, किसी उद्धरण के लिए पोस्ट-इट-स्मारिका की शरण में जाते हैं और तत्क्षण पाठ की गिरफ़्त में आ जाते हैं। जहाँ से शुरू करो, वहीं से रसमय और 'फँसमय' - अब कोई 'अनपुटडाउनेबल' किताब पर लिखे तो कैसे लिखे! पाठमात्र का आनंद लेखन के लिए व्यवधान पैदा कर देता है। बहरहाल संवेद-संपादक राजीव के मोबाइली आर्तनाद से दिल लबरेज़ और इनबॉक्स जाम न हो जाता तो मैं कसप को एक बार और, बस, एक बार और... पढ़ने में मुब्तिला रहता। ख़ैर साहब अब आन पड़ी है तो धंधे की ही बात करते हैं।(इसी अंक में) संजीव ने अपना लेख लिखकर मेरा काम आसान कर दिया है, मुझे ग़ैरों की नहीं बस अपनी फ़िक़्र करनी है और थोड़ी-बहुत जोशीजी के फ़न की फ़िक़्र करनी है, बस इतना सोचना है कि जोशीजी हमें क्यों पसंद हैं। दूसरे शब्दों में, यह पूछना है कि भाषा और शिल्प की जोशीगिरी क्या है? वह क्या है जिसे दिनमान के आरंभिक दिनों में ही गुरू-गंभीर अज्ञेय ने लक्ष्य कर लिया था, और जिसको हम पढ़कर नहीं अघाते, पर जिसका स्वाद हमें बताना है: 'खिलंदड़ी भाषा' के गूँगे-के-गुड़ का विखंडन करना है। पर ध्‍यान रहे कि यह मैं किसी पहुँचे हुए भाषा-मर्मज्ञ होने के गुमान में या आलोचक के किसी औचक अवतार में नहीं कह रहा हूँ। ये उद्गार एक निरे फ़ैन के हैं, अस्‍तु!

पहला ख़याल तो यह आता है जोशीजी के अमूमन संपूर्ण औपन्यासिक कृतित्व पर और इसलिए कसप पर भी कि यह 'मेटाफ़िक्‍शन' है। यानी ऐसी सजग गल्प कृति जो आपको अपने कृतित्व के एहसास से लगातार बाख़बर रखती है, आपको भूलने नहीं देती कि यह आद्योपांत और मुकम्मल तौर पर एक रचना है। मसलन, यथार्थवादी तकनीक से इसका वैषम्य साफ़ है: यथार्थवाद 'जो देखा वह लिखा' का मंत्र लेकर चलता है, कुछ इस क़दर कि पाठ पर पाठक का विश्वास जमा रहे, वह कहे - ऐसा ही हुआ होगा, ऐसा ही तो होता है! इसके बरक्स अमूमन विडंबना के स्थायी स्वर में लिपटा मेटाफ़िक्‍शन यथार्थ और गल्प के अंतर्संबंधों पर सवाल खड़े करता है। उदाहरण के तौर पर यहाँ सुमित्रानंदन पंत भी आते हैं, और जयशंकर प्रसाद भी, पर उनका आवाहन भी किसी यथार्थ को पोसने के लिए नहीं होता। लाज़िम तौर पर आत्मचेता यह विधा जो पाठकों की प्रतिक्रिया का पूर्वानुमान भी लगाती है, स्थितियों के अनुसार उन पर, पात्रों या ख़ुद पर कटाक्ष करती चलती है, और इन सबके लिए ज़रूरत के मुताबिक ढाँचे में रैडिकल प्रयोग करने से गुरेज़ नहीं करती। विकिपीडिया2 के अनुसार मेटाफ़िक्‍शन के कथा-विन्यास में एकरैखिकता नहीं होती, आवश्यतानुसार फ़ुटनोट आते हैं, कभी फ़्लैशबैक होते है कभी फ़्लैशफ़ॉर्वर्ड, आदि-आदि।

सो जोशीजी इस 'बेढब सी कादंबरी' को, किसी और की कहानी को, इतने तरह के तार्किक संभ्रम-विभ्रम व सैद्धांतिक संभावनाओं के उहापोह में डालते हैं कि पाठक कथा के यथार्थ-मोह में फँस कर रह जाए तो बलिहारी उसी की है, उपन्यासकार ने ऐसा कुछ नहीं किया, आप ऐसा कह सकते हैं। उपन्यासकार ने तो हर क़दम पर 'सुधी समीक्षकों' 'व 'सहृदय पाठकों' से वाद-विवाद-संवाद करने की कोशिश की है - बाज़ मौक़ों पर, भले ही तंज़िया लहज़े में - अब जब उसने 'प्रेम कहानियों की घनघोर पाठिका अपनी पत्नी' को समर्पण जैसी प्यारी जगह पर नहीं बख़्शा तो आप किस खेत की मूली हैं! उसने तो चाहा है कि आप मनोविज्ञान से, पॉप सोस्यॉलजी व सेक्सॉलजी, जीवरसायन विज्ञान से, हॉर्मोन आदि के स्राव से प्रेम-व-सेक्स की विकट-विशिष्ट और अनगढ़ स्थितियों को समझें। उसने तो कई ज़रूरी मोड़ों पर आशिक़-माशूक़ को हर तरह के विकल्प सुझाए और पाठकों से भी उन्हें साझा किया। यहाँ तक कि वह परम गल्पकार, जगत-मिथ्या-कार भगवान से भी प्रेम की परिभाषा, उसके दर्शन व उसकी नियति को लेकर अड़ा। बात कहीं बनती नहीं, एतमेव कहानी ऐसी क्याप-सी है। तिस पर भी अगर किसी को साधारण प्रेम-कहानी की तरह बाल्टी-भर-भर रोना आए तो इस गुनाह के देवता जोशीजी नहीं हैं। साफ़ है कि यह कहानी प्रेम-कहानियों की अपनी साहित्यिक विरासत से भी मुखामुखम है, और ख़ुद को कहने के लिए तमाम तरह के संसाधन दस्‍तयाब करती है, उनकी ऐतिहासिक व्यंजना-अक्षमता से जूझती है, उनकी नुक़्ताचीनी करती है, उनसे चुनती-बीनती है, आड़ा-तिरछा, कोहनीमार संबंध बनाते हुए उन्हें फ़ुटनोट में घायल करती चलती है। इस तरह की हायपरलिंक्ड अंतर्पाठ्यता कसप की ख़ासियत है, पर शायद यह समस्त जोशी-वाङ्मय का ही वैभव है। इस अर्थ में जोशीजी थोड़े डिमांडिंग लेखक हैं, उनकी क़िस्सागोई इतालवी उपन्यासकार उम्बर्तो इको जैसी क़िस्सागोई है, कि अगर ख़ूब मज़ा चाहिए तो आपको बहु-नहीं-तो-थोड़ा-पठित तो होना ही चाहिए। फिर यहाँ कहानी की गति या दिशा घटना-दर-घटना उत्कंठा पर अवलंबित नहीं है, न ही अभिधात्मक निर्वचन पर, पैराग्राफ़ पिछले पैराग्राफ़ की किसी उक्ति से संबंध जोड़कर, कई बार एक नया उक्ति-वैचित्र्य पैदा कर, आगे बढ़ते हैं। यह नहीं कि कह दिया अब कुछ और कहो, बल्कि कह दिया उससे आगे जो कहना है, उसका क्या संबंध बनेगा, यह जुगाड़ते-इशारते चलना जोशीजी की क्रीड़ाप्रिय कल्पनाशीलता की विशेषता है।

इस क्रीड़ाप्रियता का दूसरा दिलचस्प पहलू निश्चय ही भाषा-प्रयोग है पर भाषा की स्टिक से अभिव्यक्ति को ड्रिबल करने का उनका अंदाज़, उनका आत्मविश्वास उन्हें बेनीपुरी, रेणु- प्रभृति महान शैलीकारों से भी दो क़दम आगे ले जाता है। आंचलिकता के बहुचर्चित संदर्भ पर थोड़ी और चर्चा करके शायद इसका खुलासा हो जाए। वैसे तो अब तक यह स्थापित हो ही चुका है कि 'आंचलिक' भी महज़ आंचलिक नहीं होता; साहित्य से पाठक या अलोचक का तादात्म्य वन-टू-वन का नहीं होता, यानी मैला आँचल के 'मेरीगंज' का विलायती नाम और 'आधा गाँव' का कम से कम उत्तर भारत के विभाजन का (अंतर-)राष्ट्रीय रूपक बन जाना अपने आप में इस बात के वैसे ही सबूत हैं, जैसे कालांतर में आंचलिकता के लेबल से ख़ुद रेणु का असंतोष। बहरहाल, मैला आँचल और आधा गाँव से एक फ़र्क़ तो है ही कि कसप के लिए कुमाउँनी भाषा का प्रयोग किसी कथ्यात्मक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा नहीं है। पहले दोनों उपन्यास एक हद तक 'जनपद का कवि'-नुमा उद्घोष करते दिखते हैं। ऐसा लगता है कि भाषा की मुख्यधारा के रजिस्टर या दीवान में वह कहने की गुंजाइश नहीं रही थी, जो उन कहानियों के लेखक कहना चाह रहे थे, क्योंकि मुख्यधारा आम तौर पर नई क़िस्म की खड़ी बोली को साधकर प्रगति, एकता, अखंडता, पंचवार्षिक आधुनिकता और नागर जीवन के राष्ट्रवादी आख्यान गढ़ने में मसरूफ़ थी। अपने विस्फोटक कथ्यों के अलावा मैथिली-प्रधान हिन्दी और भोजपुरी उर्दू में लिखे दोनों पूर्ववर्ती उपन्यास इसी वजह से अपनी छाप भी छोड़ते हैं कि वे अपने चरित्रों की भाषिक संवेदनाओं के ज़रिए उत्तर बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के नितांत अनछुए पहलू उजागर करते हैं। ऐसी कहानियाँ, ऐसी 'उजबक' शैली में रचते हैं जिन्हें राष्ट्रीय इतिहास व आलोचना की प्रदत्त सुर्ख़ियों या शब्दावलियों में खपाना दुरूह हो गया। ऐसे दुस्साहस के लिए कुछ नासमझ आलोचकों द्वारा उनकी पर्याप्त लानत-मलामत भी की गई।3

बहरहाल, कसप के मुताल्लिक यह कहना नाकाफ़ी होगा कि जोशीजी इस उपन्यास के विन्यास में उस दूरी को पाटते हैं, जो संस्कृत-पोषिता हिन्दी और उससे दूर छिटक आई बोलियों का है(यह तो ज़ाहिर है पहले भी हुआ है, या यूँ कहें कि अब तक तो पहले के भाषायी-कथात्मक विद्रोहों को हिन्दी के 'गौरवशाली इतिहास' में अंतर्भुक्त किया जा चुका है)। हक़ीक़त में, कुरु कुरु स्वाहा से लेकर बरास्ते हमज़ाद और बाक़ायदा क्याप तक जोशीजी मुख़्तलिफ़ भाषा-प्रकारों के नानाविध तेवर पेश करते हैं, और अक्सर तो एक ही कृति में उनकी विराट लीलाओं का मंचन करते नज़र आते हैं। वैसे तो सीधे तौर पर कम से कम इस उपन्यास में किसी फ़ौरी तौर पर शिनाख़्त किए जाने वाले 'राजनीतिक' एजेंडे की उपस्थिति नहीं हैं, पर संपूर्ण जोशी-वाङ्मय भाषा-मात्र की क्षमता का अपूर्व विस्तार है। जैसे हजारीप्रसाद द्विवेदी, रज़ा, रेणु, कृष्णा सोबती, काशीनाथ सिंह आदि की भाषा विरसे में मिली हदों का स्पष्ट अतिक्रमण है, वैसे ही जोशीजी की हर कृति मानक भाषा की सरहदों, उसके तटबंधों को अपनी रचनात्मक धार से नेस्तनाबूद करती चलती है। इसलिए भाषा की रचनात्मक राजनीति के संदर्भ में उनके कृतित्व के महत्व की अतिरंजना ग़ैर-मुमकिन है। फ़िलहाल इतना समझ लिया जाए कि आंचलिकता उनके भाषाई टूल-बक्से में बस एक और औज़ार है।

कुमाउँनी हिन्दी तो कसप का घोषित माध्यम है ही, और उपन्यासकार, रेणु-राही का 'शब्दकोष दिखाकर उपन्यास पढ़ाने का सिलसिला'4 जारी रखता है। पर यहाँ कूर्मांचल के अलावा कम से कम तीन और अंचल हैं: पहला, अंग्रेज़ी का, जो मुख्यत: गुलनार और डीडी(नायक देवीदत्त का शॉर्टहैन्ड नाम!) के मध्य घटते प्रसंगों, और बाद में प्रौढ़ दिग्‍दर्शक डीडी + कला-संरक्षिका मिसेज़ मैत्रेयी के संदर्भों, ख़ासकर उनके संवादों में झलकता है; दूसरा, शास्त्री-शास्त्राणीजी की बनारसी भोजपुरी का, और तीसरा फ़िल्मी ज़बान का। और ये सब एक-दूसरे से क्या बख़ूबी नथे-गुँथे हैं, हर पाठक पर ज़ाहिर ही होगा। बब्बन और डीडी की आपसी कूट भाषा फ़िल्मी है, नायिका बेबी और उसकी सहेलियाँ एक ही साँस में कुमाउँनी रस्मी गीत और फ़िल्मी गीत गाती हैं। प्रसंगवश एक और ग़ौर करने लायक़ बात यह है कि गाने बड़े करीने-से तिथिक्रमानुसार ही आते हैं - अगर कहानी 1954 में शुरू हुई है तो गीत भी उसके ही आसपास के हैं, और अगर कहानी ने तीस साल का फ़ासला तय कर लिया है तो गाने भी तदनुसार बदल जाते हैं। और जोशीजी फ़िल्मी भाषा की शरण में जाने से वह चिराचरित साहित्यिक परहेज़ भी नहीं करते। उपन्यास में प्रयुक्त अनगिनत गानों के मुखड़ों से एक मिसाल लें। प्रसंग है नायिका का प्यार के होने के प्रति प्रत्याशा-मिश्रित-याकि-भाववाचक प्रश्न का, जो वह सिनेगीत की एक पंक्ति के ज़रिए पेश करती है। बक़ौल जोशीजी :

यहीं मुझे सिनेमाई गीतों का इतना अधिक सहारा लेने के लिए नायक-नायिका की ओर से, विज्ञ पाठकों से क्षमा-याचना करना भी आवश्यक प्रतीत होता है। मुझे विश्वास है कि वे मेरी लाचारी समझेंगे और उनकी सहानुभूति इस कथा के युवा पात्रों को समान रूप से प्राप्त हो सकेगी। प्रेमोपयोगी काव्य का हिन्दी में शोचनीय दारिद्र्य है। संस्कृत काव्य, रीतिकालीन-भक्तिकालीन काव्य और उर्दू शेरो-शायरी का सहारा वे ले सकते थे, किन्तु एक तो वे इनसे सुपरिचित नहीं है, दूसरे इनसे नितान्त सामन्ती-सा रंग मिलता है प्यार को जो लोकतंत्र में अभीष्ट नहीं। अस्तु सिनेमा-गीतों का ही संबल है। हिन्दी कवि क्यों प्रेमोपयोगी काव्य नहीं लिख सके, कतिपय रसाभिषिक्त कवियों के एतत्संबंधी सत्प्रयासों के बावजूद क्यों नहीं हिन्दीभाषी प्रेमियों के मध्य 'इस पार प्रिये तुम हो मधु है' अथवा 'इन फ़िरोजी ओठों पर बर्बाद मेरी जिन्दगी' अथवा 'पीले फूल कनेर के' गा-गाकर प्रेम करने का चलन हो सका - यह स्वतंत्र चिंतन का विषय है, जिस पर फिर कभी विचार हो सकता है।

संप्रति विचारणीय है नायिका की वह चिरौरी : इतना तो बता दो कोई हमें क्या प्यार इसी को कहते हैं?

नायिका द्वारा प्रस्तुत सूची में भी पहला इंदराज वही पुरानी सूचीवाला है : वह पास रहें या दूर रहें नज़रों में समाये रहते हैं। [पृ. 155]

भाषा, लोक-संस्कृति, फ़िल्म व प्रेमोपयोगी हिन्दी साहित्यिक सामग्री के अंतर्संबंधों पर जोशीजी की अपनी समझ इस अवतरण से ज़ाहिर हो गई होगी। मेरा झगड़ा अगर उनसे है तो सिर्फ़ इतना कि उन्होंने उर्दू को बड़ी आसानी से बाक़ियों कि तरह सामन्ती भाषा का दर्जा दे दिया, जैसे कि उर्दू ने कभी सामंतवाद से पूंजीवाद और समाजवादी सपनों की यात्रा तय ही नहीं की, मानो इक़बाल, मंटो, फ़ैज़, साहिर, मजरूह हुए ही नहीं, जैसे कि उर्दू का सबसे अहम फ़िल्मी ज़बान बने रहना मात्र संयोग हो। पर उनकी बाक़ी बातें मुझे तो ठीक लगीं, यह भी कि नायक-नायिका उर्दू साहित्यिक संस्कारों से किंचित दूर छिटक आए हैं - अपनी तरफ़ से बस इतना जोड़ दूँ - उसे वे अगर वापस हासिल भी करते हैं तो फ़िल्मों के ज़रिए ही।

अंग्रेज़ी के संवाद तो नागरी में हैं ही, शाब्दिक पर लतीफ़ अनुवाद के साथ, मज़े की बात यह भी है कि एक बिन्दु के बाद जब पाठक मान चुके हैं कि गुलनार-डीडी की बातचीत का माध्यम अंग्रेज़ी ही है और जोशीजी उनके लिए अंग्रेज़ी झाड़ना बंद कर देते हैं तब भी हिन्दी संवादों में अंग्रेज़ी की ही तर्ज़ेबयानी - वाक्य-विन्यास, मुहावरे व जुमले - फ़ॉलो किए जाते हैं। रही बात 'शास्त्रीय' बनारसी के इस्तेमाल की तो वह पूरा सिलसिला ही मारक है। याद कीजिए कि शास्त्रीजी बनारसी भोजपुरी में कब फूटते हैं: तब जब वह बेबी की ज़िद के आगे विह्वल और निरुपाय हो जाते हैं। पति-पत्नी हताश हैं, रूस्वाई के अहसास में निहायत तन्हा हैं और दूसरों की शुद्ध हिन्दी की वर्तनी सुधारनेवाले प्रकांड भाषा-पंडित शास्त्रीजी ऐसी असाधारण स्थिति में 'कार्तिकेयक इजा' नहीं, 'कार्तिकेय कs महतारी' से पूछा चाहते हैं कि अब करें तो क्या करें। निज भाषा से उनका अपना संबंध बिगड़ गया है, लगता है अधिकार जाता रहा है। पर विह्वल क्षणों में अटपटी पर-भाषा का आह्वान सुकून तो क्या देगा, उल्टे यही विशिष्ट संबोधन जोशीजी के हाथों कठिन-कठोर कटाक्ष-कुठार बन जाता है, और शास्त्रीजी की जवानी के इतिहास/सांस्कृतिक यानी जिए हुए भूगोल/रोमांस या उसकी शून्यता/ज्ञान/विराग/कूपमंडूकपन/दब्बूपन/इम्प्रैक्टिकलता - एक शब्द में संस्कारबद्धता - का ऐसा विशद और बेमुरव्वत नक़्शा खींचा जाता है कि निरपेक्ष पाठक भी त्राहि-त्राहि कर उठें: कुछ ऐसा ही है विस्मयादिबोधक चिह्न-विभूषित 'कार्त्तिकेय कs महतारी' के शीर्षक से शुरू या उस पर समाप्त होनेवाले अनुच्छेदों का असर!(पृ. 196-200)

कहने को कसप एक मुख़्तसर-सी, असफल प्रेम कहानी है, पर जोशी जी की क़िस्सागोई की तकनीक में पगकर यह अद्वितीय बन जाती है। घोषित तौर पर नारूमानी जगह(टाट की टट्टी) से शुरू यह कहानी रूमानी भी है, अपने पूरे रास्ते किंचित करुण और अंत में त्रासद भी। पर इसकी उपलब्धि आशिक़ी के विमर्श के हज़ार रंगों, उसकी विविध स्थितियों, मनोदशाओं, आकर्षण-विकर्षणों, उत्कंठाओं, बेचैनियों, चुनौतियों, मजबूरियों, चालबाज़ियों, उद्घोषणाओं, प्रदर्शनप्रियताओं व गुप्त-चेष्टाओं के निरूपण में है। 'मेलोड्रामा' के तमाम तत्त्वों से सजे होने के बावजूद यह मेलोड्रामा नहीं है तो इसलिए कि जोशीजी हर स्थिति का निर्मम आकलन करते हैं, और अपनी भाषाई बाज़ीगरी से पाठकों का ध्यान दिल और दिमाग़ के बीच तनी किसी रस्सी पर संतुलित-संकेन्द्रित किए चले जाते हैं। प्रेमी-प्रेमिका से आपकी सहमर्मिता भी बनी रहती है, आप तदनुरूप सोचने को बाध्य होते रहते हैं, पर जोशीजी की तीसरी आलोचनात्मक आँख में भी उतनी ही मोहिनी-शक्ति है, यानी आप प्रेम के विखंडन का लुत्फ़ उठाने को अभिशप्त हैं।

यह लगभग तय है कि कसप लिखने से पहले जोशीजी ने फ़्रांसीसी भाषाविद-संरचनावादी-उत्तर-संरचनावादी-दार्शनिक रोलाँ बार्थ के लवर्स डिस्कोर्स5 को नहीं पलटा होगा, क्योंकि अगर ऐसा होता तो वात्स्यायन, जॉनसन ऐण्ड मास्टर, आदि के साथ-साथ उन्होंने बार्थ को भी बेशक उद्धृत किया होता, पर बहुत पहले मुझे बार्थ पढ़ते हुए बराबर ऐसा अहसास होता रहा कि यहाँ जैसी कुछ चीज़ें मैंने कसप में पढ़ी हैं। लिहाज़ा जब यह लिखने बैठा तो दोनों किताबों की मानसिक तुलना स्वाभाविक लगी। दोनों की कथा-भूमि प्रेम है, और कथ्य उसका पाठ-सुख के ज़रिए विखंडन। चाहे वह 'अनाथ-ग्रंथि'-सेवी डीडी का प्रेम-विषयक बहिष्कार के अहसास से पोषित दैन्य हो, चाहे वह प्रेमी-मन की चिरंतन 'याकिवादी' द्विधाग्रस्तता हो या एकतरफ़ा प्रतीक्षा का विषाद, प्राथमिक या द्वितीयक ईर्ष्याभाव, सामनेवाले को जानने-न-जानने के बीच झूलना, आशिक़ रूह की भटकन, दिल का घुमक्कड़पन, सूफ़ियाना, हठधर्मी आत्मपीड़न, हर आशिक़ की तरह यह भरोसा कि उसका प्यार अद्वितीय है, अमर है, पर साथ ही यह नियतिवादी आस्था भी कि उसका कुछ नहीं हो सकता - इश्क़ दा लग्या रोग, बचने दी नइयों उम्मीद - आत्मनिर्वासन, अपराधबोध, जाने-अनजाने आशिक़ की मदद ही कर जानेवाले भेदिया की भूमिका, विशिष्ट प्रेम-उद्बोधन('जिलेम्बू-मारगाँठ'), ख़त लिखना, उनका इंतज़ार करना, चौंका हुआ होना आदि, प्रेम के शास्त्रीय/बार्थीय/जोशीय लक्षण हैं।

कहा जा सकता है कि बार्थ ने पाश्चात्य परंपरा की कहानियों और आधुनिकता से उनमें पैदा दरार पर फ़ोकस किया है। उचित ही है कि उनके द्वारा उद्धृत दृष्टांतों में बड़े-बूढ़ों की ज़्यादा दख़ल नहीं है, नायक-नायिका की आपसी आशा-प्रत्याशाओं की आँख-मिचौली और धींगामुश्ती चलती है। पश्चिमी प्रेम-कहानियों में आधुनिकता द्वारा भावुकता को निरुद्देश्य और फ़ालतू सिद्ध कर दिए जाने की स्थिति में प्यार करना द्रोह का पर्याय बन जाता है। जो कसप में भी है और बेबी से नायिका तक मैत्रेयी का संक्रमण इसी द्रोह का परिणाम है। फ़र्क़ यह है यहाँ पर कि लेखन की परिधि में खलनायक की भूमिका में पूरा कुनबा, कुल-परिजन-सैन्य-दल है, समस्त समुदाय खड़ा है, यहाँ तक कि सारा शहर फुसफुसाकर सरगोशी करता दिखता है।

किरदार के हिसाब से डीडी अपने वक़्त की पैदाइश है, बौद्धिक लेकिन बिल्कुल देवदासाना, पर नायिका के चित्रण में जोशीजी ने एक बार फिर कई परंपराओं को ध्वस्त कर दिया है। याद कीजिए वह प्रसंग, जब डीडी-बेबी न बोलने की हिदायत पर अमल करते हुए स्लेट-पेंसिल पर लिखकर वार्तालाप करते हैं, और जब नींबू को लेकर विवाद उठता है, नायक भावुकतावश नींबू के नायिका द्वारा नमक लगाकर चट कर दिए जाने की संभावना से प्रतिहत है - प्यार के अमर-अमोल उपहार का ऐसा दैनंदिन इस्तेमाल! - जोशीजी नायक को जैसे समझाते हैं - " अरे यह तो शुरुआत है। जब पराकाष्ठा पर पहुँचेगा तेरा प्यार, तब नायिका तेरा चुराकर दिया नींबू क्या, स्वयं तुझे दही-नमक से खा जाएगी। भक्षण प्रेम का अंतिम चरण है। कितना तो प्यारा लग रहा होता है चूहा बिल्ली को, जिस समय वह पंजा मार रही होती है उस पर।" भोज्य/भोक्ता, शिकार/शिकारी की कैसी भूमिका-पलट करते हैं जोशीजी, यह साफ़ हो गया होगा। पर मेरे इस लेख के ताल्लुक से महत्वपूर्ण पंक्ति है - 'भक्षण प्रेम का अंतिम चरण है'। कामायनी मुझे ठीक-ठीक याद नहीं पर उर्वशी का मशहूर प्रेम-काम, देह-अदेह का द्वैत कितनी सफ़ाई से, फ़ैसलाकुन लहज़े में समाप्त होता है, यह विचारणीय है। 'रूप की आराधना का मार्ग आलिंगन नहीं तो और क्या है'! बात तो वही है, पर भूमिका-विपर्यय दर्शनीय है।

'भक्षण प्रेम का अंतिम चरण है'। वह उपन्यास ही क्या जिसमें इस तरह की सार-गर्हित, चिर-स्मरणीय और बहु-उद्धरणीय इकलाइनाँ जुमले न हों। प्रसंगेतर आनंद और प्रसंगातीत उपादेयता ऐसी लाइनों की ताक़त है। निवेदन है कि जोशीजी इस कला के महारथी हैं। आइए देखें उनकी कुछ चुभती हुई पंक्तियाँ, जिन्हें आप श्रद्धानुसार जुमले, फ़िक़रे या सूक्तियाँ कह सकते हैं:

- ज़िन्दगी की घास खोदने में जुटे हुए हम सब कभी चौंककर घास, घाम और खुरपा तीनों भुला देते हैं तो प्यार का जन्म होता है। (पृ.11)

- असंभव के आयाम में ही होता है, प्‍यार रूपी व्‍यायाम। (16)

- प्रेम कालजयी होने का एक दुस्‍साहसी पर कुल मिलाकर दयनीय कर्म है। मानव कितना भी कैसा भी यत्‍न कर ले काल हमेशा से प्रेमजयी रहा है।(280)

- प्यार होने के लिए न विपुल समय चाहिए, न कोई स्थूल आलंबन! उसके लिए कुछ चाहिए तो आक्रान्त हो सकने की क्षमता।

- प्‍यार वह भार है, जिससे मानस-पोत जीवन सागर में संतुलित, गर्वोन्‍नत तिर पाता है। (119)

- क्या वही लोग हमें प्रीतिकर नहीं होते जिन पर हम हँस सकें, जो हमें हँसा सकें?(121)

- बेबी बैडमिंटन में ज़िला-स्तर की चैंपियन है, यह बात अलग है कि इस जिले में बैडमिंटन स्तरीय नहीं। (14)

- विफल दाम्पत्य संवादहीनता को जन्म देता है। सफल दाम्पत्य संवाद की अनावश्यकता को। क्या मौन ही विवाह की चरम परिणति है?(200).

- साहित्यिक लोगों की बातचीत में इस तरह का घपला हो जाता है। उनमें शब्‍दों के बहुत अर्थ निकालने की प्रवृत्ति जो होती है। फिर जब डीडी ने अपना मसला दो-टूक बयान किया, तो ऐसे समझाने पर तो साहित्यकार तक समझ जाते हैं। (102)

- 'अस्मिता का प्रश्न शेष रह जाता है।' 'जो शेष रह जाता है, कहीं उतनी ही अस्मिता तो नहीं।' (87).

- वर्षों-वर्षों बैठा रहूँगा इसी तरह इस गाड़ी में जिसका नाम आकांक्षा है...संघर्ष का टिकट मेरे पास होगा, सुविधा का रिजर्वेशन नहीं। (84)।

- नियति लिखती है हमारी पहली कविता और जीवन-भर हम उसका संशोधन किये जाते हैं।(72).

- मुख से न बोलने की मुनादी क्या आँखों पर भी लागू होती है? इन लाउड-स्पीकर आँखों पर!

- "भीतर जाती है कि नहीं?", ठुल'दा सुर्ख़ियों में चीखते हैं।(51).

- अपने वर्त्तमान पर लानत भेजने का युवाओं को वैसा ही अधिकार है, जैसा मेरे जैसे वृद्धों को अतीत की स्मृति में भावुक होने का।

- यौवन गुलनार का बीत चुका है, लेकिन वह उसे साग्रह बनाए हुए है, इसलिए उसके संदर्भ में यौवन-भार-मंथरा विशेषण का प्रयोग करते हुए मेरी लेखनी हिचकती नहीं।(111)

- वैसे विधाता के विनोदी स्वभाव का परिचय देने के लिए यह पर्याप्त नहीं कि उसने मल-निष्कासन और काम-क्रीड़ा के लिए अलग-अलग अंग बनाना अस्वाभाविक समझा?(231)

- मनोविज्ञान, समाजशास्‍त्र, सामाजिक प्राणिशास्‍त्र - सब औसत सत्‍य के शास्‍त्र हैं। इनका औसत सदा दूसरों पर लागू होता है। हम सब अपनी दृष्‍टि में अनुपम हैं। (176)

तो जोशीजी के भाषाई तरकश में इसी तरह के असंख्य छोटे-छोटे पर नुकीले तीर हैं, गंभीर घाव करनेवाले। यह भी ज़ाहिर है कि वह अपनी बौद्धिक विरासत से, सामाजिक संस्कार से दो-दो हाथ कर रहे हैं, उनसे सतत शास्त्रार्थरत हैं। वे संस्कृति की राजनीति को अहम मानते हैं, और इसीलिए अपने ज़हर-बुझे व्यंग्य-बाण की बौछार कर पुरातनपंथी रिपुसैन्यदल को मर्माहत कर देते हैं। सेक्स-विषयक प्रसंगों में वे काफ़ी कुछ लिख जाते हैं, पर जो नहीं लिख पाते उसके लिए गेंद सुधी-समीक्षकों के पाले में डाल जाते हैं - 'है कलम बंधी स्वच्छंद नहीं' वाले अंदाज़ में। मुझे लगता है कि जोशीजी ने अपने साहसिक पूर्ववर्तियों के कड़वे तजुर्बे से बहुत-कुछ सीखा है - इस तरह के आरोप नज़ीर अकबराबादी और मंटो से लेकर तमाम आंचलिकों पर तो लगाए ही गए, सुरेन्द्र वर्मा जैसे समकालीनों को एक हद तक नज़रअंदाज़ करने के पीछे भी वही समझ हो सकती है। अपनी बात जोशीजी के मार्फ़त पुष्ट करने के लिए एक आख़िरी लंबे उद्धरण की इजाज़त चाहूँगा, जिसमें उनका अपना राजनीतिक रुख़ भी साफ़ हो जाता है:

नायक के पौरुष के आगे प्रश्नचिह्न-सा लगा होने के बावजूद सैद्धांतिक स्तर पर यह शंका उठ सकती है कि यह कथानक परुषसत्तात्मक हुआ जा रहा है। अस्तु, नायिका की ओर से कुछ निवेदन करने की अनुमति चाहूँगा। किन्तु कुछ और कहूँ, इससे पूर्व यह स्वीकार करना अपना कर्त्तव्य समझता हूँ कि नायिका के निरूपण में मेरा स्वयं पुल्लिंग होना बाधक है।

इस विषय में हुए साहित्यिक शास्त्रार्थ में से तीन स्थापनाओं का उल्लेख कर देना श्रेयस्कर होगा। पहली यह कि पुरुष अपने साहित्य में स्त्रियों की भूमिका सीमित रखते हैं और उस सीमित भूमिका का निरूपण भी पुरुषसत्तात्मक मानकों के अनुसार करते हैं। दूसरी यह कि हिन्दी कथाकार नारी को पूज्या मानते हैं(कभी पुष्प-गन्धाक्षत और मन्त्रोच्चार से, कभी लात-घूँसे और गाली-गलौच से), अतएव उस सामान्य नारी का निरूपण करना उनके लिए असंभव है जो न चण्डी है, न रण्डी। तीसरा यह कि हिन्दी-लेखक का सहवास का अनुभव इतना सीमित और दरिद्र होता है कि अपने में यही अनंत आश्चर्य का विषय है कि नारी पर लिखने के लिए उसका कलम भी कैसे उठ पाता है।

कलम किसी तरह उठ ही गया है तो नायिका के संदर्भ में कुछ लिखना ही होगा। (पृ. 78)

ज़ाहिर है कि जोशीजी परंपरा को प्रश्नांकित करते हुए ख़ुद को भी सर्वज्ञता की निर्भ्रम कोटि में नहीं रखते। अपने दृष्टिकोण को पाठकों के रू-ब-रू खोल कर रख देते हैं। हिचकिचाहट दर्ज करने के बाद दैहिक विषयों में भी पूरे मनोयोग से लगते हैं, उन्हें 'भदेस' की पराकाष्ठा तक ले जाते हैं - चाहे वह बेबी का अपने 'लफड़-दफड़ बूबुआ' से लाड़-भरी नाराज़गी का प्रसंग हो, या गुलनार की संयत पेशेवर कार्यशीलता के साथ-साथ उसकी बिंदास दैहिकता के प्रति बौद्धिक डीडी की असहजता या फिर मंदिर के पास उस सुरम्य पवित्र स्थल पर बेबी-डीडी का एक-दूसरे को देखते-दिखाते हुए पेशाब करना, जिसका अंत 'लतावेष्टिक' आलिंगन में होता है - इन प्रसंगों में जुगुप्सा कहीं नहीं, हास्य-रसाभिषिक्त वर्णन है क्योंकि सेक्स के चित्रण को जोशीजी उसके नैसर्गिक अटपटेपन और हमारे 'लाटे' नायक के अनाड़ीपन के साथ प्रस्तुत करते हैं। शायद यह भी अहम है कि नायक-नायिका का झगड़ोपरान्त बिछोह बिस्तर पर ही, ऐन पराकाष्ठा के बिंदु के पहले नायिका के उघड़े बदन पर नायक द्वारा चादर डाल देने पर होती है। चादर डालने का यह क़िस्सा भी जोशीजी ने रघुवीर सहाय की असली ज़िन्दगी से उठाई है।6 परन्‍तु इस चदरिया को वह कितना खींचते हैं, ग़ौरतलब यह है। इस एक चादर के वितान में जैसे पूरा सभ्यता-विमर्श लिपटा चला आता है - नेहरू की पंचवर्षीय योजना से लेकर गांधीजी के क़ब्ज़ तक, कामायनी से लेकर गोदान तक, ब्रह्मबीजीय सृष्टि-मिथक से लेकर 'बिग बैंग' तक। और क़िस्सागोई ऐसी कि इन सारे कार्य-कारण घटकों को कहानी की वैकल्पिक परिणतियों की कसौटी पर कसकर छाँटते हुए चादर द्वारा लाज-ढँकाउ अंत के चुनाव के औचित्य से जोड़ देने का करतब दिखाते हैं। निवेदन है कि मेरी जानकारी में जोशीजी के पहले इतनी अर्थच्छायाओं वाली चादर सिर्फ़ कबीर ने ओढ़ी थी या फिर समकालीनों की बात करें तो मात्र सलमान रुश्दी ने मिड्नाइट्स चिल्ड्रेन में छेदिल चादर के पर्दे के पीछे इतने असरदार जादुई तमाशे का आयोजन किया है।

बहरहाल, जोशीजी इस प्रेम-कहानी का पटाक्षेप यहीं नहीं कर देते, शॉट फ़्रीज़ न करके उसे आगे बढ़ा देते हैं। ऐसे परिपाटी-पोषित अंत उन्हें पसंद नहीं, जिनसे पाठक सीधे-सादे सुखांत का सुख उठाए या दुखांत की सुखमय पीड़ा झेले। बल्कि यह कहानी जहाँ ख़त्म होती है, वहाँ से एक 'सीक्वेल' का भी बख़ूबी आरंभ हो सकता है। पर मैं इस तरह की भाषा का इस्तेमाल यहाँ सिर्फ़ इसलिए कर रहा हूँ कि अपने पाठकों का ध्यान कैमरे से लिखे गए इस उपन्यास की ओर खींच सकूँ। रेणु के बारे में किसी सुधी समीक्षक ने सही फ़रमाया है कि उन्होंने हिन्दी भाषा को पार्श्व-संगीत दिया। उसी तर्ज़ पर कहा जा सकता है कि जोशीजी ने अपनी कहानियों में कई मौक़ों पर सिनेमाई मंज़रनामे लिखे और इस तरह हिन्दी को एक अभिनव, चलचित्रोपम, मुहावरा दिया। 'चालीस दिनों की शूटिंग' में समाप्त कसप में इसके नायक के अपने प्रशिक्षण व व्यवसाय के अनुरूप कथात्मक काव्यात्मकता है तो सिनेमाई नाटकीयता भी। अक्सर वर्तमान-काल में घटती घटनाएँ हैं, पर उन्हें अलग-अलग कोणों से देखती आँखें है, जो दृश्य-बंध बनाती चलती है। आँखों से आँखों के बनते त्रिकोण हैं, तो उनको तोड़ते कट भी हैं। दृश्यों का संपादन तो पाठकों व सुधी समीक्षकों को बता-बताकर किया ही गया है। मैं जो पहला सीन अपकी स्मृति में री-प्ले करने की इजाज़त चाहूँगा वह है डीडी द्वारा नारियल न लिए जाने वाला, जिसमें लॉङ्‍ग शॉट भी है, क्लोज़ अप भी, लोग-बाग तो रस्मी संवाद बोल ही रहे हैं, पर बीच में शास्त्रीजी द्वारा देने और नायक द्वारा न लेने के चलते एक गोला भी लुढ़क रहा है सीढ़ियों से नारियल का, बैटलशिप पोटेंप्किन के मशहूर ओडेसा-स्टेप्स के दृश्य की तरह, पीछे से सीढ़ियाँ उतरती नायिका के पाजेब भी बज रहे हैं, और जैसा कि मैंने ऊपर कहा, नयन-कोण तो बन-टूट ही रहे हैं।(पृ. 148-49). या फिर इसके फ़ौरन बाद होल्डॉल पर एक-दूसरे से पीठ-टिकाए बैठे मौनव्रतधारी पर स्लेट-संभाषण-रत नायक-नायिका का ही दृश्‍य याद कीजिए जिसमें बात नींबू-भक्षण से शुरू होकर ओंठ-भक्षण की ओर जाती है:

और जब नायिका ने लगभग काट दिया है उसका निचला ओंठ, नायक अनुभव कर रहा है कि नीहारिकाओं के मध्य जो है झंझावात, उसी की सहानुभूति में झंकृत हो उठा है मेरा समस्त स्नायु तंत्र।

एक-दूसरे को टोहते-टटोलते इन दो को, जो एक हो जाना चाहते हैं, किसी बात की सुध नहीं है, किन्तु मैं आशंकित-सा देख रहा हूँ इस कक्ष के द्वार को, जिस पर यह गन्दा-सा पर्दा पड़ा है।

कहीं कोई इन्हें देख न ले!

और कोई नहीं देख रहा है - इस तथ्य से आश्वस्त होने के बाद मैं अपनी आश्वस्त मुद्रा पर स्वयं हँसता हूँ। उसने तो देखा ही होगा और कितनी तो ईर्ष्या है उसके मन में, अपनी ही माया से।

अधिक भौतिक धरातल पर यह कि इस कमरे में बाहर से कोई आ रहे हैं। उनकी आहट पाते ही ये एक-दूसरे से अलग हुए। गुड़िया देखकर सकपकायी, उसके पीछे से आती पड़ोस की लड़कियाँ मुस्कुरायीं। पूछा गुड़िया ने स्वयं लजाकर, "ये क्या हो रहा है?"

"गणित सीख रही हूँ।" कह रही है नायिका स्लेट दिखाकर और हँस रही है। गुड़िया और लड़कियाँ पढ़ रही हैं गणित का विचित्र-सा सवाल - "चखा नहीं तो कैसे मालूम?"

अब आप ही देख लीजिए साहब कि फ़िल्म की पूरी रिहर्सल हो चुकी है या नहीं, चुंबन वग़ैरह के दृश्य से ही बोल्ड शुरुआत है, जो आजकल तो सेंसरवाले भी पास कर ही देते हैं, बस अपना कैमरा उठाइए और शूट कर लीजिए। इतना ख़याल रहे कि इस दृश्यावली में लेखक भी मौजूद है, अपनी तमाम भाव-भंगिमाओं के साथ, सो दूसरा कैमरा उस पर भी होगा। कैमरे में अगर क़ैद नहीं हो सकती तो वह निराकार आँख जो सर्वदर्शी ईश्वर की है, जिसको लेखक-दिग्दर्शक पूरी स्क्रिप्ट के दौरान जोशीजी यथासंभव जलाते-भुनाते और जला-कटा सुनाते रहते हैं, पर हिन्दी सिनेमा में तो अदृश्‍य को दृश्‍यमान करने के लिए पार्श्वसंगीत का युक्तिसंगत विधान है ही, लिहाज़ा आप आकाशवाणी करा दें कि:

ख़ुदा भी आसमाँ से जब ज़मीं पर देखता होगा...!

तो यह है जोशीजी का फ़न, उनकी ख़ुदी की बुलंदी, जिसका एक ट्रेलर ही मैं यहाँ पेश कर पाया हूँ, अपनी सर्जना-शक्ति के बूते जो ईश्वर तक को मसख़रा साबित कर देता है, जो मंटो की तरह यह सोचने का साहस करता है कि हम दोनों में बड़ा कथाकार कौन है। प्रश्न याकिवादी है - वह परम-लीलाकार याकि यह 'बदमास' जोशी!

संदर्भ

  1. मनोहर श्याम जोशी, रघुवीर सहाय: रचनाओं के बहाने एक स्मरण, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2003.
  2. http://www.wikipedia.org/metafiction
  3. भारत यायावर(सं.) मैला आँचल: वाद-विवाद और संवाद, आधार प्रकाशन, पंचकूला, (हरियाणा), 2006.
  4. भारत यायावर(सं), मैला आँचल के कुछ आलेख.
  5. रोलाँ बार्थ, अ लवर्स डिस्कोर्स: फ़्रैग्मेण्ट्स, फ़्रासीसी से अनुवाद: रिचर्ड हावर्ड; हिल ऐण्ड वाङ, 1977.
  6. मनोहर श्याम जोशी, रघुवीर सहाय.