काशी शहर नही इतिहास है / जयप्रकाश चौकसे

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काशी शहर नही इतिहास है

प्रकाशन तिथि : 13 फरवरी 2011


सीरियल 'चाणक्य' और फिल्म 'पिंजर' के लिए प्रसिद्ध फिल्मकार चंद्रप्रकाश द्विवेदी काशीनाथ सिंह की किताब 'काशी का अस्सी' पर आधारित सनी देओल अभिनीत फिल्म 'मोहल्ला अस्सी' बना रहे हैं, जिसका स्कूल शिक्षक नायक अपने सिद्धांतों के लिए एकल व्यक्ति युद्ध करता है। काशी में 'मोहल्ला अस्सी' नामक एक प्रसिद्ध घाट है, जिसके निकट चाय की दुकान पर आम आदमी जीवन की कठिनाइयों की बातें करते हैं। आज पलायनवादी मनोरंजन के दौर में चंद्रप्रकाश द्विवेदी के इस सार्थक प्रयास के लिए प्रार्थना करना चाहिए और सनी देओल को उनके साहस के लिए बधाई देना चाहिए कि उन्होंने लीक से हटकर बनने वाली फिल्म स्वीकार की। कोई दो दशक पहले भी सनी देओल ने राजकुमार संतोषी की तीन सामाजिक सोद्देश्यता वाली फिल्मों में अभिनय किया था, यह 'घायल', 'घातक' और 'दामिनी' थीं।

लंबी पारी खेलने वाले सितारे प्राय: अपने भीतर के कलाकार को नई चुनौतियां उपलब्ध कराते हैं और नई भूमिकाएं ही कलाकार को मांजती हैं। क्या अक्षय कुमार कभी अपनी घिसी-पिटी भूमिकाओं से थकेंगे? क्या परेश रावल कभी सार्थक भूमिकाओं की ओर लौटेंगे? वर्तमान के लोकप्रिय सुपर सितारों में प्रयोग करने की इच्छा ही नहीं है। ख्वाजा अहमद अब्बास ने 'चार दिल चार राहें' नामक फिल्म में राजकपूर, मीना कुमारी, शम्मी कपूर इत्यादि दर्जनभर सितारों को नाम मात्र का मेहनताना देकर बनाई थी। ऋषिकेश मुखर्जी की 'मुसाफिर' में दिलीप कुमार ने लगभग मुफ्त में काम किया था। आज अन्य क्षेत्रों में भी प्रयोग प्रवृत्ति का अभाव है। केवल मार्केटिंग और विज्ञापन में प्रयोग हो रहे हैं और दोनों ही विधाएं शिखर पर हैं।

काशी एक अद्भुत शहर है और गंगा के किनारे बने हुए घाट फिल्मकार को चुनौती देते हैं। सत्यजीत राय ने अपनी एक फिल्म में गंगा तट के सौंदर्य और आध्यात्मिकता को बखूबी परदे पर प्रस्तुत किया था। कुछ वर्ष पूर्व 'धर्म' नामक फिल्म में एक ब्राह्मण के घर एक मुसलमान के बच्चे के पलने की कहानी थी और काशी के घाट पात्र की तरह प्रस्तुत हुए थे। सनी देओल अभिनीत 'अर्जुन पंडित' में भी काशी के दृश्य थे।

महान शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला खां ताउम्र घाट पर रोज सुबह रियाज करते थे और जब अमेरिका के एक संस्थान ने उन्हें वहां आमंत्रित किया और ठीक उनके मकान की तरह वहां उनके लिए निवास स्थान बनाने की बात की थी, तब खान साहब ने कहा कि काशी के घाट भी आप रच सकते हैं, परंतु वहां मेरी गंगा कैसे लाएंगे? धर्म के नाम पर संस्कृति के विभाजन करने वालों के लिए खान साहब ने उदाहरण प्रस्तुत किया था।

आज की फिल्मों में पृष्ठभूमि प्राय: महानगर या विदेशों के नगरों को रखा जाता है, क्योंकि मल्टी के महंगे टिकट खरीदने वालों को चकाचौंध पसंद है। भारतीय सिनेमा से भारतीयता लोप करने का षडय़ंत्र है। भारत में अनेक शहर, कस्बे और नदियां हैं, परंतु प्राकृतिक सौंदर्य को अनदेखा करते हैं फिल्मकार। इसका एक कारण यह भी है कि देश में कानून व्यवस्था लचर है और हर जगह फिल्मकार और उसकी यूनिट स्वयं को सुरक्षित महसूस नहीं करती। काशी में व्यावसायिक हुड़दंगियों ने दीपा मेहता को 'वॉटर' शूट नहीं करने दी और उन्होंने श्रीलंका में अपनी कहानी फिल्माई। बनारस के घाट की शूटिंग हजारों वॉट्स की रोशनी में नहीं की जानी चाहिए। स्वाभाविक प्रकाश में उसकी अपनी आब ही शूटिंग के लिए यथेष्ठ है। यह बताना कठिन है कि चंद्रप्रकाश द्विवेदी की कहानी क्या है, परंतु काशी की कथा नीरस नहीं हो सकती।