कुछ बेहतर ढूँढती ग़ज़लें :भूल बैठा हूँ जिसे / शिवजी श्रीवास्तव

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भूल बैठा हूँ जिसे (ग़ज़ल-संग्रह) -विज्ञानव्रत; पृष्ठ: 96; मूल्य: ₹250; प्रथम संस्करण: 2022 ई0; प्रकाशक: सहज प्रकाशन 113, लालबाग गाँधी कालोनी मुजफ़्फ़रनगर-251001

'भूल बैठा हूँ जिसे' विज्ञानव्रत का नवीन ग़ज़ल-संग्रह है, जिसमें उनकी 63 गज़लें संकलित हैं। इन समस्त ग़ज़लों में विज्ञानव्रत ग़ज़ल कहने की अपनी चिर परिचित मुद्रा में उपस्थित हैं, वही चिरपरिचित मुद्रा, जिसके बारे में हरेराम समीप जी ने फ्लैप पर लिखा है-'उनके लिए ग़ज़ल एक संजीदा और शालीन विधा है, जहाँ अपनी बात बड़े सलीके से कही जाती है। कोई क्रोध, कोई आक्रोश कोई तनाव नहीं। न वे बचाव की मुद्रा में रहते हैं न आक्रामक मुद्रा में। " ...दरअसल उनकी मुद्रा है-तटस्थ भाव से हर चीज को देखने की मुद्रा। हरेराम समीप जी के ही शब्दों में कहें तो' उनके यहाँ जीवन पूरी समग्रता में आया है। '

जीवन समग्रता से आने का अर्थ है कि जीवन में जो वैविध्य है जो धूप-छाँव है, जो द्वंद्व हैं, जो बेचैनियाँ हैं सब उनकी ग़ज़लों में है, सीधी-साधी-सी दिखने वाली उनकी ग़ज़लों के हर अशआर में गहरे मर्म छुपे हैं। उनमें इश्क है, दुनियादारी है, दर्शन है, अध्यात्म है, सच और झूठ का भेद है, शोषण का विरुद्ध विरोध के स्वर हैं, अर्थात् उनकी ग़ज़लों में ऐसा बहुत कुछ है, जो जिंदगी में है; लेकिन सारी की सारी बातों को वे बड़े शांत और तटस्थ भाव से कह कर परे हट जाते हैं, उनकी कहने की यही मुद्रा चमत्कृत करती है।

जहाँ तक उनकी ग़ज़लों में इश्क की बात है, तो वह इश्क-ए-मजाज़ी से इश्क-ए-हकीकी (लौकिक से अलौकिक) तक कि यात्रा है। इश्क जब जीवन में आता है, तो जीवन कुछ का कुछ हो जाता है, वह सारे जीवन महका देता है, प्रिय का मिलना जीवन के इत्र का मिलना है-

मुझको आप मिले हैं यों

ज्यों जीवन का इत्र मिले

प्रेम में होने के बाद जीवन जीने के अर्थ बदल जाते हैं, व्यक्ति स्वयं की सुध-बुध खो बैठता है, प्रेम के इस उदात्त भाव को विज्ञानव्रत केअनेक अशआरों में देखा जा सकता है-

खोया-खोया हूँ तबसे ही

जबसे मैंने उसको देखा

-खुद भी अपने पास नहीं हूँ

उनके नाम लिखाया खुद को

उसने ऐसे मुझको देखा

मैंने फिर-फिर खुद को देखा

आध्यात्मिक प्रेम की चरम अवस्था है अपनी सत्ता का तिरोभाव हो जाना, निज की सत्ता को प्रिय की सत्ता में लय कर देना, अपने अंदर प्रिय की सत्ता का साक्षात्कार करना, इस अवस्था में निज का बोध तिरोहित हो जाता है इसी भाव के लिए कबीर कहते हैं-'तू तू करता तू भया, मुझमें रही न हूँ। वारी फेरी बलि गई जित देखूँ तित तू।' ...इसी भाव को विज्ञानव्रत कुछ यूँ कहते हैं-

खर्च मैं कुछ यों हुआ

सिर्फ मुझमें तू बचा

इस अवस्था के बाद धर्म के वाह्य प्रतीक निरर्थक हो जाते हैं-

वो रक्खे ये मंदिर-मस्जिद

मुझको क्या लेना मज़हब से

प्रेम की इस अवस्था में पहुँचे हुए व्यक्ति के स्वयं के जीवन का रूपांतरण तो होता ही है वह अन्य लोगों की मनःस्थिति को भी बदलने लगता है, इस लौकिक जगत में नफरत से भरे लोगों में भी प्रेम का अंकुरण होने लगता है-

नफरत ही नफरत थी जिसमें

वो मेरा दीवाना निकला

प्रेम में डूबा व्यक्ति इस सत्य को जान जाता है कि संसार में पैसा ही सब कुछ नहीं है, धन-संपदा का मोह त्याग कर अपने 'अहं' को मिटाने का प्रयास करना ही बड़ा धर्म है-

पैसे से गर सब हो जाता

तू अब तक तो रब हो जाता

राज दिलों पर तू करता

तेरा 'मैं' गायब हो जाता

जहाँ एक ओर वे प्रेम और दर्शन के मर्म तक ले जाते हैं, वहीं अनेक स्थलों पर उनकी ग़ज़लों में प्रतिरोध के स्वर भी सुनाई देते हैं, जब वे कहते हैं-

'आखिर उसको मौत मिली / सच कहना था क्या करता।' , तो पूरी व्यवस्था के छद्म को उद्घाटित करते हैं, समाज में हर युग में सच बोलने की कीमत जान देकर चुकानी पड़ती है, फिर भी जो सच बोलने वाले हैं, वे सच बोलते ही हैं। इस तल्ख़ बात को भी वे बहुत शांत भाव से कह देते हैं। प्रायः उनकी ग़ज़लों में व्यवस्था विरोध के वैसे स्वर नहीं मिलते जैसे प्रतिबद्ध ग़ज़लकारों में मिलते हैं, पर इसका अर्थ यह नहीं है कि व्यवस्था की कमियों को वे अनदेखा करते हैं, सच तो ये है, वे अपने अंदाज में व्यवस्था की तमाम कमियों / नाकामियों की ओर उँगली भी उठाते हैं और उसके विरुद्ध प्रतिरोध की बात भी करते हैं। उनका ये शेर वर्तमान के विरूप चेहरे को आइना दिखाने के लिए पर्याप्त है-

हमने जब अखबार पढ़ा

केवल हाहाकार पढ़ा

इतना ही नहीं इसके आगे वे ये भी कह देते हैं-

अखबारों के पैकर में ही

शोषण अत्याचार पढ़ा"

शोषण अत्याचार पढ़ने वाले कवि के मन में ये भाव भी आता है-

सोच रहा हूँ दुनिया बदलूँ

या फिर सिर्फ नज़रिया बदलूँ

पर नजरिया बदलने के ख्याल के साथ ही वह सीधे-सीधे कह देते हैं-

मेरे मन में आग भरी है

कैसे अपना लहजा बदलूँ।

हाकिम की तासीर सदा

क्यों होती बे-पीर सदा

मैं कोई परचम नहीं हूँ

वो मुझे फहराएंगे क्या

सच तो ये है कि एक ओर प्रेम, अध्यात्म और उसी के समानान्तर विद्रोही स्वर उन्हें कबीर से मिले हैं। वे कहते भी हैं

टोका-टाकी करता है

मुझमें एक कबीर सदा

वस्तुतः वे जीवन के कवि हैं और उनकी गज़लें जीवन में बेहतरी की तलाश की गज़लें हैं, स्वयं की तलाश की ग़ज़लें हैं। वे कहते भी हैं

मैं कुछ बेहतर ढूँढ़ रहा हूँ

घर में हूँ, घर ढूँढ़ रहा हूँ।

कुछ बेहतर ढूँढ़ने वाले विज्ञानव्रत का स्वयं के विषय में शेर है-"दानिश्वर क्या समझेंगे / मैं बच्चों की भाषा हूँ।" ...सच है बच्चों जैसी सरल मानसिकता वाले पाठक ही उनकी ग़ज़लों को समझ सकते हैं, बहुत तर्क-वितर्क की उनकी ग़ज़लों में गुंजाइश नहीं है।

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