कृपया दायें चलिए / अमृतलाल नागर / पृष्ठ 17

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भतीजी की ससुराल में

रायबरेली नहीं, बांसबरेली की बात कह रहा हूं-वहीं, जहां पागलखाना है, लकड़ी का काम होता है, जहां की पूड़ी और चाट मशहूर है, जहां एक बार मुशायरे में शामिल होने के लिए हज़रत ‘शौकत’ थानवी को थर्ड क्लास का टिकट लेकर सेकेंड क्लास में जाने का सौभाग्य प्राप्त हो चुका है, जिसकी बदौलत उनकी ‘डब्लू.टी.’ कहानी उनके दिल के फफोलों का मरहम बन चुकी है। स्कूल में जागरफी और ज्योमेटरी इन्हीं दोंनों से डरता रहा, वर्ना आज मैं कम से कम यह तो बतला ही सकता था कि बरेली लखनऊ से किस दिशा में पड़ता है। फिर भी बुद्धिमानों के लिए इतना इशारा दे देना काफी होगा कि रात के दस बजकर सत्ताईस की गाड़ी से दिसम्बर की कड़कती हुई सर्दी में मुझे बरेली जाना पड़ा। संडीला, हरदोई, तिलहर, शाहजहांपुर आदि स्टेशन बीच में पड़े थे, और यह भी सुना करता हूं कि बरेली से हाथ-भर के फासले पर मुरादाबाद भी है।

भतीजी को ससुराल से विदा कराने जा रहा था। चलते वक्त अम्मा, बाबू, भइया और भौजी सबने इस बात की चेतावनी दे दी थी कि समधी के यहां खाना मत। मैंने भी इसे रूमाल में गांठ बांधकर याद रक्खा।

कहना नहीं होगा कि मैं बर्थ पर बिस्तर बिछाकर आराम से बरेली पहुंच गया। कड़ाके की सर्दी में मैं लाख बार चेष्टा करने पर भी स्टेशन पर दतून-कुल्ला, स्नान-ध्यान और जलपान करने का साहस सवेरे-सवेरे न कर सका। यह सोचकर गया था कि ग्यारह बजे की गाड़ी से सवार होकर शाम के चार बजे तक वापस आ जाऊंगा।

नाश्ते के लिए जिस वक्त सामने चाय और मेवा आई तो इच्छा हुई कि प्रतिज्ञा भंग कर दूं, परन्तु साहस न हुआ। सोचने लगा कि इस महीने में प्रदोष के दो व्रत न सही तीन सही। जी कड़ा करके हाथ जोड़कर विनीत भाव से मैंने कहा,

‘‘माफी चाहता हूं। बस कृपा भाव बनाएं रक्खे।’’

‘‘देखिए साहब, मैं इस रिवाज के सख्त खिलाफ हूं कि लड़की वाला अपने समधी और दामाद के यहां कुछ खाएं-पिए नहीं।’’

लड़के के पिता ने कहा। मैं सोचने लगा कि घंटे-डेढ़ घंटे के लिए इनके यहां रहना है, फिर एहसान क्यों लिया जाए। हाथ जोड़कर मैंने खीसें निपोरते हुए कहा,

‘‘हें ! हें ! हें ! बाबूजी इसकी तो कोई बात नहीं है। कल रात चलते वक्त कुछ इतना अधिक खा गया था कि हज़म नहीं हुआ। खट्टी डकारें आ रही हैं, रात-भर जागा हूं इसलिए सर में दर्द भी है। इस वक्त न खाऊंगा तो तबियत ठीक हो जाएगी।’’

लाचारी का भाव प्रकट करते हुए समधी साहब ने कहा,

‘‘खैर, फिर आपकी मर्ज़ी। उस खयाल से अगर खाना न खाते हों तो मैं वाकई बहुत बुरा मानूंगा।’’


‘‘अजी वाह, अजी वाह, आप तो कैसी बातें करते हैं, बाबू जी। अरे, सब आप ही का दिया खाते हैं।’’

बाबू ने कन्टोप से कान ठीक तरह ढ़कते हुए प्रसन्न भाव से कमर पर हाथ बांधकर टहलना शुरू किया।

घड़ी ने नौ बजाए और मैंने समधी साहब से कहना शुरू किया कि साहब, जल्दी कीजिए, गाड़ी का मामला है। दिन-भर के बाद शाम होते-होते अपने घर पहुंच जाएंगे।

समधी साहब भी उस वक्त हां में हां मिलाकर, तड़पड़ घर में घुसकर घरवाली से बार-बार सुना आते कि बहू को ग्यारह बजे वाली गाड़ी से जाना है। उसके चाचा जल्दी मचा रहे हैं।

घरवाली आखिर लड़के की मां थी। खीझकर वह एकाएक मन ही मन यह निश्चय कर बैठी कि ग्यारह बजे की गाड़ी से वह अपनी बहू को न जाने देगी।

नौ बजा, सवा नौ, साढ़े नौ, पौने दस, साढ़े दस, घर से स्टेशन का आधा घंटे का रास्ता है और ठीक ग्यारह बजकर पांच मिनट पर गाड़ी लखनऊ के लिए रवाना हो जाती है।

मैंने उनसे बार-बार कहा कि देखिए गाड़ी छूटने वाली है। आप कृपया बच्ची को विदा करने की व्यवस्था करें, और वह बार-बार घर में जाकर घरवाली से झगड़ लेते थे। इस प्रकार जल्दी-जल्दी करते हुए घड़ी ने पौने ग्यारह बजा दिए, और जब ग्यारह बजने में पांच मिनट बाकी थे तब समधी साहब ने आकर फरमाया,

‘‘तांगा मंगा दूं, जल्दी कीजिए।’’

जेब से टाइमटेबुल निकालकर मैंने उन्हें दिखाते हुए कहा,

‘‘अब तो मोटर भी शायद वक्त से स्टेशन न पहुंचा सके।’’

मैं सचमुच मन ही मन झुंझला रहा था।

उन्होंने केवल मौखिक रूप में लाचारी प्रकट कर मुझसे माफी मांगकर छुट्टी पा ली। यहां दिन-भर के लिए पेट पर नौबत बज गई।

यहां तक तो हुई भूमिका।

बारह बजे।

घर के अन्दर थालियों की झनझनाहट और रोटी के लिए बच्चों का झगड़ना बाहर स्पष्ट रूप से सुनाई पड़ रहा था। सोचने लगा, आज सवेरे आंख खुलते ही किसका मुंह देखा था। याद आता है कि किसी छोटे स्टेशन पर गाड़ी रुकने से जब नींद खुली थीं, सामने प्लेटफार्म पर एक ‘टामी’ हाथ में अपने टामी की ज़ंजीर पकड़े मुंह में सिगार दबाए हुए टहल रहा था। खटका तो उसी समय हुआ कि आखिर सवेरे-सवेरे मुझे सुग्रीव की सेना के एक सिपाही के दर्शन करने का क्या फल मिलेगा। परन्तु यह नहीं मालूम था कि आज इसके फलस्वरूप सोलहों दंड की एकादशी मनानी पड़ेगी।

समधी साहब हाथ मलते हुए बाहर आए और वाणी में गुड़ घोलकर कहने लगे, ‘‘चलिए भइया साहब, रोटी तैयार है।’’

बजाय मेरी भतीजी की ससुराल वालों के यदि किसी और ने मुझसे यह कहा होता, तो अवश्य ही मैं अपने मन-मंदिर में उसकी काल्पनिक मूर्ति स्थापित कर उसके पोपले गालों को चूमकर उसकी गंजी खोपड़ी पर प्रेम से हाथ फेरते पर कहता कि बेटा जुग-जुग जियो। खीर की कहाड़ी में तुम्हारा सिर हो और भगवान तुम्हें ओकासा और झींनसीन गोल्ड टानिक पिल्स तक सेवन करने की शक्ति प्रदान करें। प्रत्यक्ष रूप में उसके सामने नम्रता की सजीव प्रतिमा बनकर नाज़ोअन्दाज के साथ उसका प्रस्ताव स्वीकार कर चट से भोजन-शाला की ओर पैर बढ़ा देता। लेकिन यहां प्रतीत होने लगा जैसे भूखे अनशन व्रतधारी राजबंदी की बैरक के सामने जेलर महोदय दूधिया हलवा सोहन और गर्मा-गरम समोसों का भोग लगा रहे हों।

मैंने उनसे कहा,

‘‘क्या बताऊं, अभी तक खट्टी डकारें आ रही हैं। कल का खाना अब तक कम्बख्त कुबड़े की तरह मेरे पेट की थैली में आसन जमाए बैठा है।’’

उन्होंने कहा,

‘‘आप तो बड़े मज़ाकिए मालूम होते हैं। अबकी जब आपके भाई साहब को पत्र लिखूंगा तो इसका जिक्र ज़रूर करूंगा कि भाई वाह, क्या खुशमिजाज भाई पाया। सच मानिए, आपसे मिलकर तबीयत बहुत ही खुश हुई। ’’

भूखे पेट से व्यंग्य और खिजलाहट का राम-बाण सर्र से छूटा। अपनी बत्तीसी बाहर की ओर निपोरते हुए मैंने कहा

‘‘हें ! हें !! यकीन मानिए कि आपके यहां आकर और आपके दर्शन कर मेरी तबीयत भी बहुत ही प्रसन्न हुई।’’

थोड़ी देर तक और इसी तरह ‘नां-हां’ का मधुर सम्भाषाण होने के बाद वह यह कहते हुए अन्दर चले गए,

‘‘फिर जैसी आपकी मर्ज़ी।’’

शरीर के अन्दर ऐसा मालूम होने लगा कि कुरुक्षेत्र का मैदान बन गया है। उसी समय भगवान कृष्ण और अर्जुन का रथ मेरे हृदय पथ के खांचे में खड़खड़ करता हुआ आगे बढ़ गया। आज इस समय पेट पर हाथ फेंरता हुआ, पान चबाकर मैं भली भांति सोच-विचार कर यह बात निश्चयपूर्वक कह सकता हूं कि उस दिन कृष्णजी ने दो मिनट के अन्दर गीता के अट्ठारहों अध्याय सुना दिए थे। मन में रह-रहकर यही खयाल आ रहा था कि यदि इस समय यमराजरूपी धोबी आकर मेरे इस पुराने मैले शरीर रूपी कपड़े को धोने ले जाकर मुझे नई खोल पहना दे, तो कम से कम किसी अंधेरे घर का चिराग बनकर, नई अम्मा के स्तनों का दूध पीकर अपने पेट की ज्वाला शान्त करूं। सचमुच गीता का वह श्लोक मुझे तब से सारहीन मालूम पड़ता है। खैर, उसके बाद ही मुझे ऐसा मालूम पड़ने लगा कि मेरे पेटरूपी रथ के सारथि सखा कृष्ण की उत्तेजनामयी आध्यात्मिक बातों को सुनकर उत्तेजित अवस्था में

नरोत्तम अर्जुन ने कुछ भाव से गाण्डीव को टंकारा।

रोयें उठ खड़े हुए, दिमाग की नसें झन-झन कर बज उठीं। हृदयरूपी श्मशान पर आशा की चिता थक-थक चट-चट जलने लगी। एकाएक खयाल आया कि कल रात चलते समय भौजी ने ओवरकोट की जेब में मेवा भर दी थी। जेब भारी हो जाने के खयाल से मैंने उसे उलटकर वहीं पटक दिया था। शीघ्रतापूर्वक कुर्सी से उठकर खूंटी पर टंगे हुए ओवर कोट की जेबों को टटोलने लगा। काश, उस वक्त किशमिश और काजू के तीन-चार दाने निकल आते !.....शरद बाबू के ‘चरित्रहीन’ की प्रधान पात्री किरणमयी की भांति हाथ ले अपना ललाट ठोकते हुए मैंने भी कह दिया,

‘‘हाय रे जला कपाल !’’

समधी साहब खा-पीकर लम्बी डकार मारते और ‘‘ओउम्-ओउम्’ करते हुए कमरें में दाखिल हुए। सोच रहा था कि बाजार घूमने के बहाने किसी हलवाई के यहां जाकर अपने पेट को तर्पण दूं। इसी इच्छा से मैंने कोट और टोपी उठाई।

‘‘कहिए साहब, किधर सवारी जा रही है?’’ उन्होंने कहा।

‘‘कुछ नहीं, ऐसे बैठे-बैठे तबीयत ऊबने लगी, मैंने कहां, चलो बाज़ार ही घूम लिया जाए।’’


वे तत्परता के साथ बोले,

‘‘अरे साहब, अकेले कहां जाइएगा। आप को मालूम नहीं, बरेली के तांगेवाले साले बड़े बदमाश होते हैं। और फिर आप नये आदमी ठहरे। चलिए, मैं भी साथ चलता हूं।’’

मैंने बड़ी ना-नू की, परन्तु वह न माने। तांगेवालों की बदमाशियों का वर्णन करते हुए उन्होंने कपड़े पहनना आरम्भ किया।

मैंने अपने मन में कहा कि बरेली के सिर्फ तांगे वाले ही नहीं, वरन सभी लोग अव्वल दरजे के पाजी होते हैं। तांगा जब शहर की भीड़-भरी सड़कों पर दौड़ रहा था, तब मैं केवल यही देख रहा था कि आखिर बरेली की इतनी बड़ी आबादी में कितने आदमी मेरे समान छैल-चिकनिया बने प्रसन्नता और बीमारी का अभिनय करते हुए अपने पेट को चूहों की कुश्ती का अखाड़ा बनाकर घूम रहे हैं।

सड़क पर थोड़ा आगे बढ़कर एक हलवाई की दूकान पर नजर आई। लोग पूड़िया खरीद रहे थे, मिठाइयां खा रहे थे, और हलवाई की दुकान का धुआं उठकर मेरे मन-मुकुर को धूमिल करता हुआ आगे बढ़ा। मुंह में पानी और आंखों में रोब भरकर मैंने बगल में बैठे हुए समधी साहब की ओर एक बार निहारा। ऐसा मालूम हुआ कि जैसे यमराज की ड्यूटी का चौकीदार मेरे सामने विकराल रूप लिए हुए पान चबा रहा है। इच्छा हुई कि नाक पर एक घूंसा जमाकर कहूं कि कम्बख्त तुझे इस समय मिर्गी ही क्यों नहीं आ जाती, जिससे कि हलवाई की दुकान से पानी लेने के बहाने मिठाई के चार कौर ही मुंह में रख लेता।

पेट में आतिशबाजी का प्रोग्राम शुरू हो गया। चर्खी, बान, अनार और कम्बख्त जी ललचाने वाली चुटपुटी फुलझड़ियां क्षण-क्षण के बाद मेरे मुंह की टंकी को खोलकर पानी का अन्दाज़ लगा लेती थीं।

सिर की नसें अपने हिसाब जैसे हरमोनियम की धौंकनी हो रही थी जो कि मालिक की मर्जी के अनुसार ज़रा-से इशारे पर पूरा राग, दूध राग, गंडेरी रांग, षठराग भरी, राग और रागिनियों को बजाकर मुझे प्रलोभन देता ही चला जा रहा था।

आपसे क्या अर्ज़ करूं कि किस तरह मैंने शाम के चार बजे तक अपना वक्त काटा। उस समय रह-रहकर यही ख्याल आता था कि हमारे लखनऊ में टेढ़ी कबर के पहलवान की पूड़ियां कितनी स्वादिष्ट होती हैं, कालिका भंडार के रसगुल्ले, रामासरे की दूकान की गिलौरियां, दुनिया की समस्त उत्तम खाद्य-सामग्री के काल्पनिक स्वाद ने भूख और प्रचण्ड कर दी। मुझे तो ऐसा मालूम पड़ने लगा कि शेष शैया पर लेटे हुए भगवान विष्णु की नाभि से बजाय ब्रह्मा के बुटबल का सन्तरा पैदा हुआ, जिसे लक्ष्मी जी ने अपने हाथों बड़े प्रेम से मुझे प्रदान किया।

शरीर के अन्दर की दुनिया में आशा और निराशारूपी देव और दानव दृदय-सागर का मंथन कर उसमें से ताज़े-ताज़े गरम-गरम समोसे, हलवा, चटनी, रायता, चटपटी चटनी आदि सुन्दर-सुन्दर रत्न निकाल रहे हैं और मैं महादेव शंकर की तरह किनारे खड़ा हुआ मुंह के पानी को कालकूट की तरह गले में उतार रहा था, जिसकी गर्मी शान्त करने के लिए मुझे भी सर की जगह गले में मफलर लपेटना पड़ा।

अक्ल गुम थी, दिमाग हैरान था कि आखिर इस बच्ची के ससुर से किस तरह अपनी जान बचाकर किसी हलवाई की शरण लूं। एकाएक समस्या कुछ हल-सी होती दिखाईं पड़ी। मैंने टाइम-टेबुल को मौका पाकर समधी साहब के बही-खाते वाली मचान पर धीरे से प्रवेश किया, मैंने उनसे कहा,

‘‘बाबूजी, एक गाड़ी यहां से चार बजकर बावन मिनट पर भी जाती है। आज्ञा दीजिए तो इसी से बच्ची को लखनऊ ले जाऊं। अभी स्टेशन जाने का वक्त भी है।’’ उनकी समझ में यह बात कुछ आ गई उन्होंने कहा,‘‘अच्छी बात है, दो तांगे मंगवाए देता हूं।’’

खैर साहब, दस मिनट के बाद ही स्टेशन पर जाने की पूरी तैयारी हो गई थी। समधी साहब इस बात पर अड़ गए कि बिना मुझे कुछ खिलाए-पिलाए घर से विदा नहीं होने देंगे।

बड़े असमंजस में पड़ा। जिस प्रतिज्ञा के कारण दिन भर आंतों को कंडे बनाकर जलाया और केवल पेट भरने के ही लालच में मैं पांच घण्टे पहले ही स्टेशन के वेटिंग रूम में अपना आसन जमाने की फिक्र में हूं। मुझे जल्दी थी, इधर वह जिद कर रहे थे। लाचार होकर मैंने भरे हुए दूध के गिलास के दो-तीन घूंट पी लिए। सामने पड़ी तरकारी रक्खी हुई थी। सोचा कि अगर सब खा जाऊंगा तो दिन-भर की बीमारी का अभिनय झूठा प्रमाणित हो जाएगा। एक पूरी उठाकर उसका एक कौर तोड़ा और आलू के टुकड़े मुंह में रखकर पानी पी लिया।

समधी साहब बोले, ‘‘साहब, आपने तो कुछ खाया भी नहीं।’’

इच्छा हुई कि समधी साहब से कह दूं,

‘‘मियां, क्यों अपनी और मेरी जान के गाहक बने हो ! आग में घी छोड़ते हो ! फिर कहते हो कि आग तेज़ी क्यों पकड़ रही है!’’

लेकिन फिर भी मैंने उनसे नम्रतापूर्वक कहा,

‘‘आपकी आज्ञा का पालन कर लिया। अब जान बखशिए। आपकी कृपा से पेट अब तक तम्बूरे की तरह तन चुका है। डर लगता है कि कहीं बदहज़मी न हो जाए।’’

समधी साहब बडी तत्परता के साथ अन्दर जाकर चूरन की चार गोलियां ले आए और कहा कि इसे खा लीजिए, दस्त साफ हो जाएगा और बदहज़मी की शिकायत न होगी।

हर एक बात की एक सीमा होती है। दिन-भर भूखा रहा और शाम को बजाय भोजन के हाज़मे की गोलियां खाने को मिल रही हैं। मेरा क्रोध अपनी सीमा पार कर बाहर निकल चुका था, लेकिन फिर शान्त हो गया। लाचारी थी, आंख बचाकर गोलियां इधर-उधर फेंक नहीं सकता था, चुपचाप मुंह में रख लीं।

तांगे आए, उनपर सामान रखा गया। बच्ची को भी एक तांगे पर बैठा दिया और मैं समधी साहब से खड़ा होकर विदा मांगने लगा। जेब से एक रुपया निकालकर उनकी सेवा में समर्पित करते हुए कहा,

‘‘जो कुछ आपके यहां खाया-पीया हो उसका यह दाम है।’’

समधी साहब ने हंसते हुए कहा,

‘‘अच्छा-अच्छा, अभी इसे जेब में रखिए स्टेशन पर भुगतान हो जाएगा।’’

आप यकीन मानिए, कि मेरे पैरों तले से जमीन खिसक गई। कम्बख्त ने मेरी सारी बनी-बनाई आशारूपी कुटिया फूंक मारकर उड़ा दी। बड़ी नम्रतापूर्वक कई बार मैंने उन्हें जाने से रोकना चाहा, लेकिन वह यह कहते दूसरे तांगे पर बैठ गए कि तांगा अकेला छोड़ना ठीक नहीं, आप बहू के पास तांगे पर बैठ जाइए।

अगर मेरे पास उस वक्त पिस्तौल होती तो यह निश्चय था कि समधी साहब की गंजी खोपड़ी में, उनके दिमाग से लेकर पेट तक के रहस्यों का भंडाफोड़ करने के लिए मैं एक सुरंग बना देता। रास्ते-भर पछताता रहा कि हाय ! न हुआ मेरे पास अलादीन का चिराग, वरना ढाई गज़ टुकड़े में उन्हें लपेटकर काले पानी में डुबा देता। रास्ते-भर बदला लेने के इसी प्रकार के सैकड़ों उपाय सोचता हुआ स्टेशन पहुंच गया। उस वक्त लखनऊ के लिए गाड़ी न जाती थी। चार बजकर बावन मिनट की गाड़ी की कथा रेलवे टाइम-टेबुल में परिवर्तन हो जाने के बाद, केवल कोरी कथा ही रह गई थी। यह मुझे मालूम था कि पापी पेट को भोजन से पाटने के लिए ही मैं इतनी जल्दी स्टेशन पर आ गया। परन्तु हाय रे जला कपाल ! स्टेशन मास्टर मेरे दूर के रिश्ते से जीजा और समधी साहब के खास साले लगते थे। उनके क्वार्टर में ही आसन जमा। थोड़ी देर बाद भोजन के लिए कहा गया। चट से समधी साहब ने कह दिया कि इनके पेट में दर्द है। बेचारे दिन-भर तो भूखे रहे, दवाई खाई, अभी तक देखिए इस बेचारे का चेहरा कुम्हलाया हुआ है।

खिझलाया तो बहुत, लेकिन कर कुछ भी न सका, क्योंकि इस दस्त की गोली अपना असर कर चुकी थी। पाखाना हो आने के बाद ऐसा मालूम होने लगा कि मेरी खोपड़ी पर शिवजी नृत्य कर रहे हैं। आंखें बाहर की ओर निकली पड़ रही थीं, पेट पीठ से सटा चला जा रहा था। ऐसे समय ही कानों को सुनाई पड़ा कि समधी साहब खीर की प्रशंसा करते हुए थोड़ी और मांग रहे हैं। हड्डियां और पसलियां तक, ऐसा मालूम हो रहा था कि शीघ्र ही इस शरीररूपी, इन्द्रजाल को तोड़कर सीधे बैकुण्ठ जाना चाहती हों। आंखें चन्द्रकान्ता सन्तति के तिलस्म का खटकेदार ताला हो रही थीं।

थोड़ी देर के बाद ऐसा प्रतीत होने लगा, जैसे की शरीररूपी मंदिर में हृदयरूपी घड़ियाल बजना बन्द हो गया हो, तथा मेरी जीवन-ज्योति एक बार जल उठकर फिर बुझ गई हो।


आप यकीन मानिए की दिसम्बर की इस कड़कती हुई सर्दी में भी मेरा शरीर पसीने से तर हो गया। भौचक्का होकर बार-बार आंखें खोलता अपना बदन हिला-डुलाकर, दिल की धड़कन की परीक्षा कर मैंने निश्चितन्तता-पूर्वक सन्तोष की एक गहरी सांस ली।

अभी हाल ही में मेरे प्रिय मित्र लाला लल्लूलाल जी अपनी लड़की को ससुराल से विदा कराने बरेली गए थे। उन पर ठीक इसी प्रकार की आफत आ चुकी थी। दिल और दिमाग की नसें घड़-घड़ झन-झन कर अपने लिए भी ऐसे ही चित्र की कल्पना कर रही थीं।

मैं अत्यन्त भयभीत भाव से अपने समधी साहब के यहां पहुंचा। मुझे इस बात का दु:ख है कि रास्ते-भर जिस चित्र की कल्पना ने मेरे शरीर का पसेरी-भर खून जलाकर मुझे निर्जीव-सा बना दिया था, तथा मुझे अपने समधी साहब की ऐसी सुन्दर कल्पना करने के लिए बाध्य किया, उसे उन्होंने अपनी मीठी बातों और खातिरदारी की अप्रत्याशित व्यवस्था से एकदम बरबाद कर डाला। रास्ते-भर मैंने अपने समधी साहब को जिस रूप में देखा और समझा, उसे उन्होंने एकदम पलट दिया। इच्छा हुई कि अपने दिमाग को दुरुस्त कराने के लिए उसे मैं बरेली के पागल-खाने में छोड़ता आऊं।

रास्ते-भर मैंने उनका जितना विकराल रूप देखा था, उतना ही उनके सौजन्यपूर्ण व्यवहार न मेरे मन में उनके प्रति श्रद्धा उत्पन्न कर दी।

राम करे जैसा मेरा राजपाट लौटा, वैसा सबका लौटे !