केन्द्र-बिन्दु से परिधि तक / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

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मन सबसे अधिक वेगवान है। अब यहाँ, तो पलभर में धरती के दूसरे कोने पर पहुँच जाएगा। विचारों का ज्वार, कल्पनाओं की आँधी, कहीं से कहीं उड़ाकर ले जाएगी। मन की उर्वरा माटी में उगे बीज, भावों के जल से अभिषिक्त सिंचित होकर, कल्पनाओं के प्रकाश का आँचल पकड़कर दिव्य सर्जन को आकार देते हैं। जिस रचनाकार की भावभूमि जितनी उर्वरा एवं गहन होगी, कल्पना जितनी अनुरंजित होगी, विचार जितने सन्तुलित होंगे, सर्जन उतना ही प्रभावशाली होगा। मैं यहाँ त्वरित रचित और उड़कर मुखपोथी पर कुछ भी पोत देने वाले उतावले लोगों की बात नहीं कर रहा हूँ, बल्कि उनकी बात करना चाहता हूँ, जो गम्भीर सृजक हैं, उनके प्रकाशन का कोई भी माध्यम हो, प्राणवन्त रचना सब पटल पर सम्मान पाएगी। ऐसी ही युवा कवयित्री हैं-रश्मि विभा त्रिपाठी, जिनका काव्य-संग्रह-'मन की परिधि' मेरे सामने है। इनकी कविता-'प्रेम का पौधा' बहुत कुछ कह जाती है। अहं के विसर्जन के बिना प्रेम का पौधा कभी हरा नहीं रह सकता-

जब तलक / 'तुम' और 'मैं' से बढ़कर / हृदय में 'हम' का बीज न बोया जाएगा,

प्रेम की बेल पर / तब तलक हरियाली नहीं आ सकती!

फिर वह पेड़ आता है, जिसने जीवनभर छाँव दी है। वह पेड़ खोखला होकर अपना अस्तित्व खोने के कगार पर है। न जाने कब आँधी आ जाए और कब उसे समूल नष्ट कर दे। तब उसका क्या होगा, जो उसकी छाया में निश्चिन्त होकर रह रहा है। यह दुश्चिन्ता स्वाभाविक है। जीवन में आश्वस्ति की छाया सभी को चाहिए-

मगर वक़्त की / आँधी की मार से / तब बचके कहाँ जाऊँगी

मैं गमों की धूप में फिर / छाँव की आस लिये / कहाँ जाऊँगी?

रश्मि विभा ने प्रेम का चित्रण बहुत गहनता से किया है। प्रेम सहज सम्बन्ध का पर्याय है। इसके लिए विश्वकोश के भारी-भरकम शब्दों की आवश्यकता नहीं है। प्रेम की अभिव्यक्ति की ये पंक्तियाँ देखिए, जहाँ दृष्टि की निर्मलता का संकेत किया है-

मधुरतम प्रेम की अभिव्यक्ति को / अतिगूढ़तम शब्दों की

आवश्यकता / क्या है? / निज पलकों के द्वार आओ

तुम नयनों के उस पार जाओ / झरता हुआ स्निग्ध भाव / देखोगे / दृष्टि धूमिल न हो / बस।

नारी को केन्द्र में रखकर रश्मि विभा की अलग-अलग तेवर की कई कविताएँ हैं, जिनमें अकेली औरत, काली स्त्रियाँ और मुस्कुराती हुई स्त्री को विशेष रूप से उद्धृत करना चाहूँगा। अकेली औरत कभी अकेली नहीं होती; क्योंकि दो भूखी आँखें आमन्त्रण खोजती हैं, हर हाथ संवेदना और सांत्वना देने के लिए उसको छूने को तत्पर रहता है। नुक्कड़ की चाय की दुकान पर उसी की चर्चा मिलेगी। तीखा प्रहार करते हुए कवयित्री कहती है-

एक अकेली औरत की फिक्र में / जीते हैं कितने सारे लोग / अकेली औरत /

कब रह पाई है अकेली? / दहलीज के पार / कई पहरेदार / तैनात उसके लिए

यही नहीं, वह अकेली और बेखबर नहीं, बल्कि बाखबर है कि जो साथ होने की बात करते हैं, वह सिर्फ़ सोने भर का साथ चाहते हैं-

अकेली औरत ने पढ़ी / पुन: इक बार / सम्बन्धों की सच्चाई

उन विस्मित आँखों में / झलका दूर से ही / 'साथ' / साथ सिर्फ़ होने भर का

सिर्फ़ सोने भर का / विश्वास का कहीं भी आँखों में / अदना-सा नामो-निशान तक नहीं!

संसार में स्त्री वह प्राणी है, जो अकारण मुस्कुरा नहीं सकता। उसकी मुस्कान तक बन्दी बना दी गई है। रश्मि विभा ने कटाक्ष किया है-

इस ग्रह पर / एक अजीब पूर्वाग्रह है- / अकारण स्त्री का हँसना /

है वर्जित / होगी परिवर्धित / कहलाएगी बुरी /

यही नहीं, सदियों से एक ऐसा गर्हित मनोवृत्ति-चित्र कवयित्री देखती आ रही है, जिसमें मुस्कुराती हुई स्त्री का चरित्र कुछ अलग तरह का सन्देश देता है-

बन जाए गान्धारी / पलकों पर बाँधे पट्टी / बंद कर ले कान / तभी मिलता सम्मान

'काली स्त्रियाँ' कविता नारी का पूरा आख्यान है, जहाँ उसके गुणों या आचरण की बात न करके, उसके रंग-रूप और बाह्य सौन्दर्य को ही उसका पूरा अस्तित्व मान लिया जाता है। इसे मलिन सोच का परिणाम क्यों न कहा जाए! क्या औरत केवल एक शरीर ही है, उसमें आत्मा नहीं! उसमें आत्मा का सौन्दर्य नहीं! ऐसे बहुत सारे ज्वलन्त प्रश्न हैं, जिनका उत्तर न समाज के पास कल था और न आज है। वास्तविकता यह है कि रश्मि विभा 'होतीं' और 'हो जातीं' का अन्तर स्पष्ट करती हैं। जीवन और समाज के संघर्ष से उपजी यह कविता रश्मि की आत्मा के केन्द्र से नि: सृत होकर समाज की परिधि तक पहुँचती है। उस परिवेश तक पहुँचती है, जो वर्षों से अजगरी निद्रा में प्रसुप्त है–

स्त्रियाँ काली नहीं होतीं / काली हो जाती हैं / तपती रहती हैं

आशाएँ, आकांक्षाएँ / मन की भट्टी में / प्राय: सुलगती रहती हैं /

गीली लकड़ियों के साथ-साथ / घण्टों, दिनों, महीनों व सालों-साल /

धुआँ-धुआँ हो जाती हैं।

XX

स्त्रियाँ काली नहीं होतीं / हो जाती हैं काली / सूर्य की अरगनी पर /

कपड़े सुखाते / तपते जेठ की दुपहरी में नंगी एड़ियों से /

छत पर कबूतरों की बीट बुहारते / रात हो जाती हैं

इस कविता की तेजस्विता, गहन चिन्तन का ताप केन्द्र-बिन्दु से उठकर परिधि को चीरकर दूर तक चौंधिया देता है। क्या भाव, क्या भाषा, प्रत्येक दृष्टि से यह कविता समूचे नारी समाज का आख्यान है, जहाँ उसके गुणों या आचरण की बात न करके उसके रंग-रूप और बाहय सौन्दर्य को ही उसका पूरा अस्तित्व मान लिया जाता है।

रश्मि की अन्य कविताओं में-माँ नमन तुझे, पिता, अँधेरे मुझसे भय खाने लगे, जीवनदात्री नदी, पहाड़, मन की परिधि, नदी की याद आएगी, बहुत अच्छे हैं साँप आदि कविताएँ भाव, भाषा और अभिव्यक्ति के अनुरूप परिपक्व काव्य का दिग्दर्शन कराती हैं। मुझे इनमें भविष्य की प्रबुद्ध कवयित्री का स्वरूप दृष्टिगोचर होता है। पाठकों को यह संग्रह अवश्य प्रभावित करेगा, ऐसी आशा है।

रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' , दिल्ली

12-01-2022