क्षण की अनुभूति की गहनता है क्षणिका /रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

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कण से ब्रह्माण्ड तक,बिन्दु से सिन्धु तक क्षण से युगों तक चेतना का विस्तार है ।स्वनिम से शब्द तक,शब्द से अर्थ तक मानव का चिन्तन अभिव्यक्त हो रहा है । इन सभी का महत्त्व जीवन की सार्थकता में ही समाहित है ।सही समय पर किसी कण का , किसी क्षण का , किसी स्वनिम का सही प्रयोग किया तो सार्थक रचना का निर्माण होता है, चाहे वह जीवन – जगत् हो या काव्य हो ।जीवन भर कुछ न किया जाए तो जीवन निर्रथक , क्षण भर में जो सार्थक कर लिया जाए तो यश , जीवन भर अच्छा करते-करते अन्तत: कुछ बुरा कर दिया जाए तो सारे शुभकर्मों की परिणति अपयश में हो सकती है । यही सब काव्य के भी साथ है।

क्षण या काल के विस्तार की गहनता , उसकी नब्ज़ पर पकड़ किसी रचना की प्राण शक्ति बनती है। रचना का महत्त्व उसके स्वरूप दोहा , चौपाई, छन्दोबद्ध , छन्दमुक्त , क्षणिका , हाइकु आदि से नहीं है , वरन् उसके कथ्य से है , कथ्य की प्रस्तुति से है , उसमें निहित भाव-संवेदना से है ।केवल छोटी रचना लिखना या बड़ी रचना लिखना किसी महत्त्व का आधार नहीं बन सकता। आकारगत लघुता के कारण फुलचुही महत्त्वहीन नहीं हो जाती और बड़े आकार के कारण चील का महत्त्व नहीं बढ़ जाता । कारण- रचना में कही बात पाठक की संवेदना को , चिन्तन को कितना प्रभावित करती है , वही उस रचना का जीवन है।क्षणिका के सन्दर्भ में भी मैं यही बात कहना चाहूँगा कि समय के किसी महत्त्वपूर्ण क्षण को आत्मसात् करके संश्लिष्ट (संक्षिप्त नहीं ) रूप में किया गया काव्य –सर्जन ही क्षणिका है ।क्षणिका किसी लम्बी कविता का सारांश नहीं है और न मन बहलाने के लिए गढ़ा गया कोई चुटकुला या चुहुलबाज़ी –भरा कोई कथन।भाव की अभिकेन्द्रिकता, भाषा का वाग्वैदग्ध्यपूर्ण प्रयोग एक दिन का काम नहीं , वरन् गहन चिन्तन –मनन ,अनुभूत क्षण की सार्थकता और सार्वजनीनता पर निर्भर है ।

जिस रचनाकार के चिन्तन और अनुभव का फलक जितना व्यापक होगा ,भाषा-व्यवहार जितना अर्थ-सम्पृक्त होगा ,क्षणिका उतनी ही प्रभावशाली और मर्मस्पर्शी और मर्मभेदी होगी । आकारगत लघुता को खँगालने के लिए कहीं दूर जाने की आवश्यकता नहीं । भारतीय वाङ्मय ही इसके लिए पर्याप्त है ।निम्न उदाहरणों से क्षणिका की प्रगाढ़ता , व्यंजना और घनत्व को समझा जा सकता है-

एक आदमी /रोटी बेलता है /एक आदमी रोटी खाता है /एक तीसरा आदमी भी है

जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है/वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है/मैं पूछता हूँ-

'यह तीसरा आदमी कौन है ?'/मेरे देश की संसद मौन है। (रोटी और संसद-धूमिल) इस तीसरे आदमी की तलाश कहीं बाहर नहीं करना है । संसद की चुप्पी ही उसकी उपस्थिति दर्ज़ करा रही है । क्षणिका-एक लक्ष्य ( टारगेट)और एक ही गोली, यदि गोली लक्ष्य से भटकी तो उपलब्धि -शून्य अंक ।यह मेले का खेल नहीं कि दस में से नौ टारगेट पा गए तो अच्छे निशानेबाज हो जाएँगे। शत्रु सामने हो, तो कोई भी कुशल सैनिक जिसके पास एक ही गोली बची हो, अपना लक्ष्य नहीं खोना चाहेगा ।क्षणिका की इसी तरह की त्वरा धूमिल की पंक्तियों में नज़र आती है । इसमें लम्बी कविता की तरह सँभलने का कोई अवसर नहीं ।अज्ञेय की ‘साँप’ कविता में सभ्यता की परिभाषा करते हुए वही तीक्ष्णता गहन लाक्षणिकता लिये नज़र आती है-

साँप ! /तुम सभ्य तो हुए नहीं /नगर में बसना /भी तुम्हें नहीं आया।

एक बात पूछूँ-(उत्तर दोगे)/तब कैसे सीखा डँसना /विष कहाँ पाया?

क्षणिका में विविध भाषिक प्रयोग का केवल सन्तुलित अवसर और अवकाश होता है । अगर वह सहजात नहीं हुआ ,तो दुर्बोध होने के साथ बेअसर भी हो सकता है ।बिम्ब और प्रतीकों के माध्यम से अभिव्यक्ति के समय इसका विशेष ध्यान रखने की आवश्यकता है।भाषा की सहजता शब्दों के सरल या कठिन होने से नहीं, वरन् भावबोध की स्पष्टता पर आधारित होती है । यदि रचनाकार के भाव और विचार उलझे हुए हैं ,तो सरल शब्दों में भी अभिव्यक्ति जटिल हो सकती है । पानी-पत्थर,और स्टेच्यू के प्रतीकों का स्वाभाविक समावेश ,भाषा का सहज और सन्तुलित प्रयोग इन क्षणिकाओं में देखा जा सकता है ।दोनों रचनाएँ समय के शाश्वत सच की व्याख्या करती हैं-

बहते हुए पानी ने /पत्थरों पर निशान छोड़े हैं /अजीब बात है-

पत्थरों ने /पानी पर/कोई निशान नहीं छोड़ा (पानी-नरेश सक्सेना)

-जी चाहता है /उन पलों को /तू स्टैच्यू बोल दे /जिन पलों में /'वो' साथ हो /और फिर भूल जा... (स्टैच्यू बोल दे- डॉ .जेन्नी शबनम)

वृद्धावस्था की उपेक्षा और प्यार की खत्म होती गर्माहट को डॉ सुधा ओम ढींगरा और तुहिना रंजन ने पतझर के माध्यम से बहुत मार्मिक स्वरूप प्रदान किया है ।शब्दों का नपा -तुला प्रयोग अभिव्यक्ति को बहुत मार्मिक बना देता है-

-झड़े पत्तों से /टुण्ड- मुण्ड हुए /वृक्ष,/बच्चों के /घर छोड़कर /जाने के बाद /बुज़ुर्ग माँ-बाप से लगे। (अकेलापन: डॉ सुधा ओम ढींगरा)

-तेरे इंतज़ार में /जिन आँखों से /बरसे अनगिन सावन/कल देखा -/उन्ही आँखों में /पतझड़ उतर आया है.. (तुहिना रंजन )

रात –दिन घर -गिरस्ती में मरती -खटती अत्याचार सहती औरत की हूक -भरी व्यथा को रचना श्रीवास्तव ने बहुत मार्मिक अभिव्यक्ति दी है । दैनन्दिन जीवन का यह अभिशाप सांकेतिक रूप से चित्रित हुआ है , जिसमें हल्दी -प्याज का लेप सारी व्यथा–कथा कह जाता है-

-उनके कुछ कहते ही /एक भारी रोबीली आवाज /और कुछ कटीले शब्द/यहाँ वहाँ उछलने लगे /रात मैंने देखा-/माँ /अपनी ख्वाहिशों पर /हल्दी- प्याज का लेप लगा रही थी ।

सुदर्शन रत्नाकर - टूटे काँच के टुकड़े से आहत मन की और डॉ.भावना कुँअर पर्स की तहों में लिपटी निशानियों से ‘रिश्तों की घुटन’ का तीव्रता से अहसास कराती हैं-

-टूटे काँच के टुकड़े तो / तुमने उठा लिये/ उनका क्या जो/मेरे दिल के हुए । -तुम्हारे पर्स की तहों में/लिपटी रहती थी यादें बनी/मेरी नन्हीं निशानियाँ/ आज वहाँ किसी की/तस्वीर नज़र आती है ।

रिश्तों की गर्माहट का अस्तित्व बनाए रखने के लिए क्या किया जाए, इसका उपाय है निजता और सामीप्य , जिसे मंजु मिश्रा की इस क्षणिका में देखिए-

-बैठने दो/ दो घड़ी अपने पास /बस इतना हक़ दो कि/ पूछ सकूँ-/तुम क्यों उदास हो ?

कोई विधा अपने आकार -प्रकार से या किसी वरिष्ठ की कलम से रची होने के कारण नहीं वरन् प्रभावान्विति होने से ही महत्त्वपूर्ण होती है ।क्षणिका का जनमानस से जुड़ना बहुत आवश्यक है। प्रेम की संवेदना को उँगली में चुभा काँटा और उसका चले जाना अधिक तीव्र कर देता है । अभिव्यक्ति-लाघव की सादगी और कौशल प्रसिद्ध हाइकुकार डॉ• सुधा गुप्ता जी के काव्य में अनुस्यूत रहे हैं। अन्तिम वाक्य के …भी अपनी अनकही उपस्थिति से बहुत कुछ कह जाते हैं-

-गुलाब की नन्हीं कली/तोड़, तुम्हारे बालों में /सजा दी /उँगली में चुभा काँटा /रहा याद दिलाता/कि तुम चली गई …

प्यार का यही अटूट मिलन -माधुर्य , यही जीवन के प्रति चुम्बकीय आकर्षण इन क्षणिकाओं को किसी भी प्रेम –कविता की टक्कर में खड़ा करता है-

-छुओ ,छलको /मिलो मुझसे गीत गाकर/ मिले जैसे नदी सागर/ पास आकर। (मिलन-—केदारनाथ अग्रवाल)

-मुस्कुराने की /कोशिशें हजार करता है /सुना है वो/अब भी ज़िंदगी से /प्यार करता है ! । (डॉ .ज्योत्स्ना शर्मा)

-धूप आशाओं की / जगमगा कर खिले /जब वो / आकर मिले । (डॉ .ज्योत्स्ना शर्मा)

केदारनाथ सिंह प्यार की इसी गर्माहट को नपे –तुले शब्दों में अनायास कह जाते हैं । पाठक है कि प्यार की उस गर्माहट को परत –दर-परत महसूस करता है-

-उसका हाथ/अपने हाथ में लेते हुए /मैंने सोचा-दुनिया को/ हाथ की तरह / गर्म और सुन्दर होना चाहिए ।( [[केदार नाथ सिंह[[)

कवि के लिए कोई विषय या क्षण छोटा-बड़ा नहीं है, बड़ा है वह भाव-बिम्ब जो आत्मीयता के रस से सम्पृक्त है। अलका सिन्हा ने ‘ज़िन्दगी की चादर’ क्षणिका में चढ़ती उम्र की लड़की के जीवन की विवशता, को उसकी चौकसी से जोड़कर जिस तीव्रता से अभिव्यक्त कर गई ,उसमें इनका भाषिक –कौशल हर पंक्ति को तान देता है । नींद में होने पर भी सजगता में जैसे लाज के साथ एक अज्ञात भय भी समाहित है-

-ज़िन्दगी को जिया मैंने /इतना चौकस होकर /जैसे की नींद में भी रहती है सजग / चढ़ती उम्र की लड़की/ कि कहीं उसके पैरों से / चादर न उघड़ जाए ।

अनिता ललित हाथ उठाकर दुआ करने के परिणाम की जो कल्पना करती हैं ,वह अपनी अभिव्यक्ति की अन्तरंग नवीनता से पाठक को बाँध लेती है-

-हाथ उठाकर दुआओं में/तेरी खुशियाँ माँगी थी मैंने / नहीं जानती थी-/मेरे हाथों की लक़ीरों से ही निकल जाएगा तू…! ( अनिता ललित)

काव्य में लौकिक प्रतीकों और जन –जीवन से जुड़े बिम्बों की एक अलग खुशबू होती है । उमेश महादोषी ने धोबी और पटा ( जिस पर पट पर वह कपड़े धोता/ पछाड़ता है) का निर्वाह बहुत सन्तुलित रूप में किया है। धोबी की दुर्दशा भी अभिव्यक्त हो रही है , जिससे निकटवर्ती नाता रखने वाला यदि कोई है ,तो सिर्फ़ वही पटा है। ‘छुइयो राम, छुइयो राम’ का लौकिक प्रयोग जन-संस्कृति का परिचायक ही नही , बल्कि उस पूरे परिवेश को भी वाणी देता है, जीवन-संघर्ष जारी है-

-छुइयो राम, छुइयो राम/ धोबी के पटा/ पत्थर है , पत्थर तू /पर देख तो ज़रा/ धोबी तेरा आज-/ कितने टुकड़ों में बँटा ! ( उमेश महादोषी)

लौकिक खेल में ‘ धप्पा’ मीनाक्षी जिजीविषा की इस क्षणिका में परिचय के व्याज से सुधियों में समाए प्यार की एक भोली –सी अनुगूँज छोड़ जाता है-

-तुमसे परिचय/ जैसे बचपन के खेल-खेल में/ ज़िन्दगी अचानक पीछे से पीठ पर हाथ रखे / और धीरे से कान में कहे -/ धप्पा---!

चाँद के दाग के बहुत सारे मिथक हैं, लेकिन डॉ जेन्नी शबनम ने यहाँ एक नया प्रयोग किया है –शैतान बच्चे के बहाने, भोलेपन के रस में पगा । वह शैतान बच्चा कुछ भी कर सकता है–

-ऐ चाँद /तेरे माथे पर जो दाग है /क्या मैंने तुम्हें मारा था ? /अम्मा कहती है /मैं बहुत शैतान थी /और कुछ भी कर सकती थी ।

सारा काव्य मानव –जीवन से जुड़ा है । यदि कवि केवल विचारों का घटाटोप प्रस्तुत करने की अनुभवहीनता का परिचय देता है तो क्षणिका के लघु कलेवर में जीवन –दर्शन प्रस्तुत करना उबाऊ हो सकता है ।खुद लिखें और खुद ही समझें वाले रचनाकार खुश हो सकते हैं कि उन्होंने नाज़ुक पंखों की इस चिड़िया पर कई किलो बोझ लाद दिया है । इसके विपरीत इमरोज़ और सर्वेश्वर की क्षणिकाओं में जीवन –दर्शन किसी बोझिल व्याख्या का नहीं वरन् घाटियों में कल-कल करती पतली निर्मल जलधारा का अहसास कराता है-

-जीने लगो/तो करना/फूल ज़िंदगी के हवाले/जाने लगो/तो करना/बीज धरती के हवाले...( ज़िंदगी-इमरोज़)

-घास की एक पत्ती के सम्मुख/मैं झुक गया/और मैने पाया कि/मैं आकाश छू रहा हूँ । (समर्पण-सर्वेश्वर दयाल सक्सेना)

दूसरों के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण का प्रभाव बहुत व्यापक होता है। केवल अपने सुख की चिन्ता करने वाले स्वकेन्द्रित लोगों को बलराम अग्रवाल ने सचेत किया है-

शब्द को/ शूल न बनाओ/ न सुई बनाकर / हवा में फेंको / फूट जाएँगी /सभी ओर हैं--- मेरी आँखें !

जीवन आस्था और विश्वास का नाम है। डॉ उमेश महादोषी ने सूरज की किरणों से , माथा चूमने से इसे पुख़्ता किया है । कुल मिलाकर आनन्द के जिस गत्यात्मक बिम्ब की सृष्टि की है , वह बहुत मनोहारी होने के साथ सकारात्मक सन्देश भी लिये है। कुशल चितेरा इन पंक्तियों को रंगों में समेट सकता है-

कल सुबह / जब मैं उठूँगा / सामने होंगी---मेरा माथा चूमती हुई / कुछ किरणें—सूरज की / मैं थोड़ी देर आँखें मूँदूँगा, मुस्कराऊँगा/ और फिर/ दिन भर के काम पर लग जाऊँगा ।

डॉ उमेश महादोषी ने बरसों से क्षणिका के लिए सार्थक कार्य किया है । दूसरी ओर पूर्णिमा वर्मन ने अनुभूति के माध्यम से विश्वभर की चुनी हुई क्षणिकाएँ प्रस्तुत की हैं ; जिससे इस शैली का महत्त्व बढ़ा है । क्षणिका के क्षेत्र में उनका अपना एक अलग अन्दाज़ है, सूरज के आगमन से जीवन को निखारने वाली आस्था की संश्लिष्ट प्रस्तुति की है , ‘उदासी’ की सारी धूल झाड़कर जीवन –अनुराग का सन्देश दिया है-

-फिर उदासी की दरारों से / कोई झाँकेगा/ कहेगा-आँख धो लो /जल्द ही सूरज को आना है ।

त्रिभुवन पाण्डेय भी उसी आस्था और आश्वस्ति को ‘घर’ के माध्यम से अपनेपन की एक स्फुलिंग जगा जाते हैं-

-तूफ़ान के गुज़र जाने के बाद/ हर बार गाती रहती है / चिड़िया छत पर / घर।

-जहाँ कुछ भी नहीं / लेकिन सब कुछ होने का /आश्वस्ति -भरा स्वर / घर

कमला निखुर्पा इसी आस्था को ‘दीप’ क्षणिका के माध्य्म से इस प्रकार प्रस्तुत करती हैं-

-दीप भावों के /महकती चाहों के /जलाना ज़रूर / सूना-सा कोना मन का / झिलमिलाएगा ज़रूर

प्रकृति के अनुपम सौन्दर्य को इस नन्ही –सी क्षणिका में पिरोना , बिम्बों को साधना भाषा की कुशलता के बिना सम्भव नहीं । अज्ञेय की ये क्षणिकाएँ बहुत मुखर हो उठी हैं-

-सूप-सूप भर/धूप-कनक/यह सूने नभ में गयी बिखर:/चौंधाया/ बीन रहा है /उसे अकेला एक कुरर।( अज्ञेय)

नन्दा देवी पर केन्द्रित अज्ञेय की 14 क्षणिकाओं में से एक यह,जिसका समापन केवल के साथ नहीं बल्कि बाद में आए डॉट… के साथ हुआ है-

- निचले/हर शिखर पर/देवल :/ऊपर/निराकार/तुम/केवल...

रंजना भाटिया गुलमोहर के फूल के चित्रण में दृश्य और स्पर्श बिम्ब को अनायास अहसास करा जाती हैं-

गुलमोहर के फूल/जैसे हाथ पर कोई / अंगार है जलता ।

डॉ अनीता कपूर ने रात्रि के सौन्दर्य का बहुत सुन्दर और प्रभावी दृश्य बिम्ब प्रस्तुत किया है । ‘चाँद का गोटा’ एक नया ही भाव-बोध उजागर करता है-

-चाँद का गोटा लगा/किरणों वाली साड़ी पहने/ सजी सँवरी रात ने/ बन्द कर दिया / दरवाज़ा आसमान का।

उपर्युक्त बातों से मेरा मन्तव्य इतना भर है कि काव्य का कोई भी रूप हो वह यदि भाव-विचार-कल्पना से संवलित नहीं होगा,तो वह कुछ भी हो ,पर काव्य नहीं होगा । आदमी का सुख –दुख , हर्ष-विषाद जो शब्द न बाँध सकें ,वे माला का हिस्सा नहीं बन सकते । विषयवस्तु और प्रस्तुति दोनों का सार्थक संयोजन , संगुम्फन महत्त्वपूर्ण है , तभी रचना निखर सकती है। डॉ सुरेन्द्र वर्मा की क्षणिका ‘आस्तीन तुम्हारी’ इसका खूबसूरत उदाहरण हो सकती है-

-यों तो तुम्हारी आँखों में / झिलमिलाती चमक थी/लेकिन मैंने अपना सिर / जब तुम्हारे / कन्धे पर टिकाया / आस्तीन तुम्हारी गीली थी।

और ये आँसू यूँ ही नहीं मिल जाते , इनको पाने के लिए भी सौदा करना पड़ता है । जितेन्द्र जौहर ने यह सौदा मिठास चुकाकर इस प्रकार किया है-

मैंने /मिठास चुकाई है, /तब जाकर मिला है मुझे/तुम्हारा खारापन...!/ऐ आँसुओ ! /तुम्हें...यूँ न जाने दूँगा /आँखों की दहलीज़ छोडकर...!

हरकीरत ‘हीर’ गहन संवेदना की कवयित्री हैं। इनकी क्षणिकाओं में प्रेम की अनुभूति, अपरिचय का मुखर प्रतिरोध ,दोनों ही अपनी पूरी तीव्रता के साथ उपस्थित हैं।प्रतीकों का भी समुचित निर्वाह किया गया है-

1-आज की रात/तुम अक्षर हो जाना/मैं सफ़हा हो जाऊँगी/ जी चाहता है आज/ जन्म दूँ इक नज़्म ...

2- तुमने नहीं पढ़ा/जब किसी ग़ैर ने उसे पढ़ा/वह बाज़ारू हो गई ....!!

डॉ. कविता भट्ट के अनुभव और संवेदना का फलक बहुत व्यापक है। जीवन के छोटे-छोटे क्षण उनकी रचनाओं में पाठक की संवेदना को झकझोर कर रख देते हैं। अर्थ की सूक्ष्म पकड़ में आपको महारत हासिल है। इन क्षणिकाओं ‘प्रेम’ और ‘प्रेम को प्राप्त करने की आतुरता की अभिव्यक्ति की प्रस्तुति , किसान और आकाश जैसे लोक -प्रचलित सहज प्रतीकों के प्रयोग भी देखिए-

1.जिंदगी -जिस शिद्दत से देखते हो /तुम मेरा चेहरा /काश ! जिंदगी भी /उतनी ही कशिश-भरी होती ।

2.प्रणय-निवेदन-जिस उम्मीद से / किसान देखता है /आकाश की ओर /उसी उम्मीद-सा है, प्रिय!/तुम्हारा प्रणय-निवेदन।

3.मिलन में भी -प्रेम की पराकाष्ठा /तुमसे लिपटी हुई /तुम्हारे पास ही होती हूँ/ तब भी तुम्हारी ही याद में रोती हूँ।

कुछ क्षणिकाएँ रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की भी , इनमें कुछ है या नहीं, पाठकों तय करें-

पतझर /ऊपर से आँधी/ पकड़ो न पात /बचा ठूँठ/ बाहों में भर लो,तो फूटेंगे कोंपल।

वनखण्डों के पार/ पिंजरे में बंद/ प्रतीक्षारत/ व्याकुल सुग्गा /कहीं वह तुम तो नहीं ?

न शूल –सी चुभे न कील –सी खुभे ,बस आस्तीन बनकर आँसू पोंछ दे ,तो क्षणिका सार्थक हो जाएगी । आस्तीन बनकर आँसू पोंछने का मेरा अपना आशय है –वह जनमानस के सुख-दु:ख की प्रतिनिधि बने।किसी दोहे ,चौपाई, मुक्तक को तोड़कर क्षणिका बनाने या तुकबन्दी का अनावश्यक शिरस्त्राण पहनाने की आवश्यकता नहीं है । सारगर्भित रचनात्मकता के लिए यह क्षेत्र खुला है, इसे रातों-रात प्रसिद्धि पाने का शॉर्टकट मानना भूल होगी । अच्छी रचना , रचनाकार के लिए खुद पथ का निर्माण और ऊँचाई का निर्धारण करती है। -0-