ज्ञाता / खलील जिब्रान / सुकेश साहनी

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(अनुवाद :सुकेश साहनी)


पहाड़ी प्रदेश में रहने वाले एक व्यक्ति के पास पुराने ज़माने के एक मूर्तिकार द्वारा गढ़ी गई एक मूर्ति थी। यह प्रतिमा उसके घर की दहलीज पर औंधे मुंह पड़ी रहती थी और वह इस ओर कभी ध्यान भी नहीं देता था।

एक दिन एक नगरवासी उसके घर के सामने से गुज़रा। मूर्ति पर नज़र पड़ते ही उसने मालिक से उस मूर्ति को बेचने के बारे में पूछा।

वह आदमी हंसकर बोला, "भला इस भद्दे और गन्दे पत्थर को कौन खरीदेगा?"

नगरवासी ने कहा, "मैं तुम्हें इस मूर्ति के बदले एक सिक्का दूँगा।"

उस आदमी को हैरत भी हुई और खुशी भी।

उस मूर्ति को हाथी की मदद से शहर पहुँचाया गया। बहुत दिनों बाद उस पहाड़ी आदमी का शहर जाना हुआ। उसने एक दुकान के बाहर बहुत भीड़ देखी, एक आदमी ऊँची आवाज़ में चिल्ला रहा था, "आइए संसार की सबसे सुन्दर एवं अनोखी मूर्ति देखिए. मात्र दो सिक्कों में एक कलाकार की कला का उत्कृष्ट नमूना।"

दो सिक्के देकर उस पहाड़ी ने उस प्रतिमा को देखा, जिसे उसने खुद ही एक सिक्के में बेचा था।