डायनमारी / शेखर मल्लिक

Gadya Kosh से
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इस दिन आकाश में दोपहर का सूरज बादलों को ठेलकर जबरन दिन के कमजोर से उजाले पर अपना दावा ठोंकने को निकल आया था। हालाँकि बरसात बूँद-बूँद जारी थी... डीह (गाँव) की तमाम औरतें सर-माथा में कपड़ा दिए ओर-छोर से आ-आ कर ताक रही थीं... और इस वक्त, जिनकी कमर या कूल्हों पर नंगे-अधनंगे बच्चे अटके हुए थे... उन्हीं के बीच उपस्थित कोई भी आदमी कह सकता था कि उनके चेहरे पर विकृति और तृप्ति, दोनों भाव, 'आश्चर्यजनक मगर सत्य' की तर्ज पर, एक साथ लीपे हुए थे... उत्पाती बच्चे शोर मचाए हुए थे... डीह के सिवान पर इस वक्त मेला-सा लग गया था... लेकिन तमाम शोर के बीच एक मादा कराह सिवान के इन खेतों में घिसट रही थी... शोर में दबती जाने के बावजूद कानों में आ रही थी और एकाएक जितनी तेज आती, उतना ज़्यादा उन्माद भर जाता उस भीड़ में... यह फिर भी कोई आदिम समाज का दृश्य नहीं था... यह अभी बीती हुई उस पिछली सदी की ही बात थी... पिछली लगातार कई सदियों की तरह, जिसमें औरत एक बार फिर अपने ऊपर घट रहे वीभत्स तमाशे के केंद्र में थी और बाकि लोग तमाशबीन... 'हो-हो...हुर्र-हुर्र...हुश-हुश-हुश...' करते हुए... उसे घेरे हुए थे... हर तरफ से...!

दृश्य यह था... गुनिया मुर्मू, उम्र-पैंतीस साल, जात-संथाल, तीन बच्चों की माँ, हल में बैल की जगह जुती हुई थी...!

उसने..., पिछली रात ही, थोड़ी बारिश हुई थी तो आकाश से लेकर अपनी आँखें अपने खेत पर टिका कर, मोगा से कहा था... 'चलो थोड़ा अभी जोत दो। इस बारी पानी भी ठीक से नहीं हो रहा...'

एक झन्नाटेदार थप्पड़ पड़ा था गुनिया के बाएँ गाल पर और उसका मुँह दाहिने तरफ हल्का-सा टेढा-सा हो गया एकाएक, 'हरामजादी... मर्द को दो-चार घड़ी आराम करने देगी भी या नहीं! सुअर की औलाद रे... दिन भर खटाई से यहाँ आदमी की कमर भसक जाती है और तू कहे तो रात में भी...'

गुनिया महसूस कर रही थी, उसकी कनपट्टी चाँटे की मार से गर्म हो गई है... उस पर उसका हाथ अनायास ही चला गया था... उसने पति के मार के पिछले इतिहास की याद करके उसे झिंझोड़ना छोड़ दिया... ये आदमी मारता है जैसे जानवर को मार रहा हो... वह चुपचाप नीचे चटाई पर लेट गई और झपक-झपक खपरैल की छत ताकने लगी...

बायाँ गाल अभी भी तक बेथा रहा था... बगल में लेटी बड़ी लड़की माइनो चाँटे की आवाज से चिहुँक कर जाग गई थी और माँ को घूर रही थी...

इस रात, इस समय गुनिया के सामने बड़ा प्रश्न था, जुताई-बुआई नहीं हुई तो आगामी साल बच्चों का पेट कैसे पालेगी वह? यह मर्द जो कमाता है, दारू भट्टी में झोंक आता है। माह की पगार दारू का हिसाब करने में ही चुक जाती है... भरी-पूरी पगार की शक्ल नहीं देखी गुनिया ने और बच्चे साल-साल पीछे जन्मते गए. बच्चों का क्या दोष...!

गुनिया मार से डर तो गई थी, मगर फिर मन मान नहीं रहा था। मार खाना तो यहाँ औरतों के लिए रोज का काम था... चाहे चुप रहकर खाए, या लड़कर थोड़ा 'ज्यादा' खाए... उसे बच्चों का ध्यान कचोटने लगा। वह फिर उठ बैठी...

'चल ना तू' वह मोगा को फिर से हिलाने लगी, 'पानी मुश्किल से गिरा है...'

अबकी बार मोगा एकदम फुफकार उठा। शराबी आदमी को नशे में जबर नींद आती है, कोई जगाए तो कत्ल करने को दौड़ता है! वह गुनिया को एकबारगी पटक कर उसकी चपटी छातियों पर चढ़ बैठा, 'काहे को परेशान करती है बहिनचो... आराम करने दे... देखते हैं बहुत मजाल हो गया है' वह बोलता एक था, बोलता क्या... रेलवे की नौकरी में संगति से जो हिन्दी गालियाँ अर्जित की थीं, वही बकता था और मारता दो...!

गुनिया जब जी भर कर पिट चुकी तो छोटे वाले लड़के को छाती से चिपकाए खिड़की के पास मोढ़े पर बैठ गई और बाहर खेत को देखने लगी... खेत में पानी भर गया था... गुनिया का देह-मन मार की चोट से नहीं रोया था, अब अपनी लाचारी से कुलबुला उठा और गालों से होते हुए आँसू गोद में सोए छोटे बच्चे के बालों में टपककर जज्ब होने लगे।

'खेत नहीं जोता गया तो मेरे बच्चे कैसे रहेंगे...? अधपेट...' यह सवाल उसकी छाती पर खंजर की तरह टंगा हुआ था... एक बड़ा सहारा तो इस हाल में यह खेती ही थी और उसमें इस बखत पानी जमा था, जुताई-बुआई के लिए आमंत्रण देता हुआ सा। फिर बरसात का क्या भरोसा! इतना टूट-टूट के हो रही है कि एक बार जोर से बरस के थम जाए, तो फिर कब बरसेगा कौन जाने! इसी पानी पर खेत को पालना है... गुनिया के मुँह से एक आह निकली। जिसे उस रात की सर्द हवाओं ने सुना... और बच्चे की जेब से गिरे कंचे की मानिंद 'टप्प' से गुम कर दिया... उसने बच्चे के सिर को कसकर छाती से दाब लिया... दिन भर की दौड़-धाड़ और चिंता... और पिटाई के बाद चटखी हुई पसलियाँ! पलकें भारी होकर धीरे-धीरे मुँदती गईं और सिर दीवार से लगा एक ओर लुढ़क-सा गया... नींद के कोमल पंजों ने उसे दबोच लिया था।

...डीह के सिवान पर फैले चौड़े-चकले खेतों को जोत रही थी गुनिया... जिसे इस वक्त मवेशी में बदल दिया गया था... डंडे ले कर गाँव के कठियारे मर्द और लड़के बैल या मवेशी की तरह हाँक रहे थे उसको... पसीने और टूटे हुए बदन से लथपथ गुनिया के मुँह से फिचकुर-सा झाग निकलने लगा था... दूसरी तरफ हल की फाल के उपर आदमी पूरा दाब बनाए हुए थे और गुनिया टान रही थी जुआ...

हाँफते-हाँफते वह थककर रुकी नहीं कि सड़ाक से डंडा पीठ पर मारते और चिल्लाते, 'ही...ही...हिया...' गुनिया मार से एकबारगी बिलबिला उठती, ऐंठ-सी जाती मगर खींचने लगती जुआ बचा हुआ दम लगाकर... पूरी तस्वीर के फ्रेम के बाहर डीह की औरतें-बच्चे और बाकि मर्द नाद करते हुए जुटे हुए थे वहाँ... मेड़ों पर गाँव झुंड बनाकर तमाशे का मजा लूट रहा था...! अजीब-सा उग्रवाद पसरा हुआ था वातावरण में और हरेक चेहरे पर डर के साथ-साथ एक आदिम संतोष... एक तसल्ली कि डीह पर अपने कुकर्म से आफत लाने वाली औरत को दंड दिया जा रहा था और रिवाजों के अनुसार इस तरह उसके कारण पूरे डीह पर आया हुआ दोष कट रहा था... या काटा जा रहा था... अब डीह देवी माँ के प्रकोप से बच जाएगा...

औरतें गुनिया पर पड़ती मार से सी-सी कर रही थीं... साड़ी की किनारी से आकाश से टपकते पानी को अपने मुँह पर से पोंछती... आँखें फिर खेत में चल रहे कार्यक्रम पर अपलक टिक जातीं... बच्चे एक कौतुहल और आतंक से चिल्ला उठते, फिर भीड़ में उनकी आवाज भी विलय हो जाती। जैसे यह भी खेल का एक अवांतर हिस्सा हो...

गुनिया कई बार बेदम होकर गिर पड़ी... प्रधान ने चिल्लाकर हुक्म दिया था, 'पानी मार...!' और पानी के छींटे मार कर गुनिया को होश में लाया जाकर फिर वही बेशर्म क्रूर-कलाप वहशियाने तरीके से चालू हो जाता...

दम टूटने लगा था अब... साँसें बेतरह फूल रही थीं और बदन का पीठ और कंधा वाला हिस्सा मार से सूज गया था... गुनिया की आँखों में रंगीन तारे नाचने लगे थे... मगर उसके मुँह से रहम माँगने के लिए कोई शब्द नहीं निकलते थे... चूँकि वह फिजूल ही होता! जितनी ताकत अब बाकि थी, वह उसी से जुआ खींचती जा रही थी... किसी तरह यह त्रास कटे!

माइनो बदहवास-सी माँ के बगल-बगल अपने भाइयों के साथ भाग रही थी। लड़खड़ाकर गिर रहे थे बच्चे कीचड़ में... उनके रोने की आवाज हवा में 'ही...हिया...' के शोर में गुम हो रही थी... बच्चे सब रो-रोकर पस्त हो चुके थे... माइनो को लग रहा था, वह कुछ करेगी, मगर इतने वहशी लोगों के बीच वह चौदह साल की लड़की क्या करेगी, यही समझ नहीं पा रही थी। कहीं माँ मर गई तो? और यह ख्याल आते ही वह जोर से 'आयो...!' कहकर रोने लगती... उसे देखकर साथ घिसटते भाई भी मुँह फाड़ कर रोने लगते!

यह सुबह और दिनों की सुबह की तरह ही थी...!

भोर होते ही मोगा ड्यूटी पर छुट्टा निकल गया था... उस समय भी गुनिया ने मिन्नत की थी, 'खेत थोड़ा अभी निरा देते तो...' बड़ी-बड़ी लाल आँखें निकल आईं थी मोगा की। 'हरामजादी... मन-बदन गंधिया रहा है क्या तेरा? और मार खाएगी...'

गुनिया ने और मनुहार नहीं की। क्या लाभ? जिसका पेट गले तक शराब से भरा रहता हो, जो आदमी घर में पड़े भूखे बच्चों की परवाह नहीं करके कभी नकद, तो कभी उधार, पेट भर भकोस के घर घुसता हो, उस पर निर्लज्जता की हद तक जा कर रस ले-ले कर चार जलती हुई अँतड़ियों के आगे अपना खाना बखानता हो, उस अमानुष से गुनिया कितना उम्मीद करती? मगर खेत का काम, बिना मर्द के कैसे होगा? एक बार गोड़ाई हो जाती तो... मगर हल चलेगा कैसे? यह तो मर्द का काम है, लेकिन घर का मर्द कोई काम का नहीं... एक ही बचा मर्द है-एक बूढा बैल... ससुर के जमाने का। अस्थि-पंजर उसकी गिन ले कोई बच्चा भी...! जब घर के मनुष्यों को दाना के लिए मुँह ताकना पड़ता है, तो निरे ढोर की क्या पूछे कोई! पर इस बखत वही बूढ़ा कमजोर जानवर सबसे बड़ा साथी बन जाता है।

बुझे मन से रोटी और गुड़ के चार ढेले मोगा के टिफिन-बक्से में रखती हुई गुनिया की नजर घुटनों को पेट में घुसाए सिकुड़ कर सोते छोटे पर थी। गुनिया अपने होंठ भींचे थी, अभी सिसकारी फूटी तो मोगा कमरबंद खोल कर चढ़ दौड़ेगा... 'खसम की फिकर पहले कर, जिसके जोर से ये पिल्ले जनी है...!'

हमेशा तो यही होता है... गुनिया के पास चारा क्या है? गुनिया कर क्या सकती है... करना चाहती तो बहुत है तब भी... मगर... कैसे...?

ड्यूटी पर तो तड़के ही चला गया मोगा। मुँह-अँधियारा था। गुनिया बाहर दालान में एक ओर कोने में दीवार पर टेक देकर पड़े हल की फाल को देखने लगी... बूढ़ा बैल खड़ा पूँछ से मक्खियाँ उड़ा रहा था और अपने कान फड़फड़ा रहा था। उसकी पिचकी काया और गुनिया के बच्चों के पेट में अदभुत साम्य था... वैसे ही, वही पसली की हड्डियाँ उभरी हुईं, बच्चे भी वही हड्डियों के ढाँचे...

अचानक कहीं बिजली गिरी... सूखी बिजली... जोर की आवाज के साथ पूर्वी आकाश पर बिजली की लकीरें खिंच गईं... छोटा एक बार कुनमुनाया और बड़ी बहन के साथ सट कर सोया रहा...

सुबह होगी... दिन चढ़ेगा... हर दिन की तरह बच्चे खाना माँगेंगे और वह कभी भी पूरा ना पड़ने वाली रोटी या माड़ और साग खिला देगी। मगर खेत में हल नहीं चला तो पूरे साल बच्चों की भूख का क्या जवाब देगी गुनिया? अधपेट बच्चों की तरस देखी नहीं जाती... कुछ तो उगाया जाय... कुछ तो आसरा रहे...

गुनिया खुद से जूझने लगी थी...

उसने हल कंधे पर उठा लिया और बैल को हाँक दे कर दालान से उतार लिया... अँधेरा छँटा नहीं था पूरी तरह या बादलों के कारण उजास ढंग से आया नहीं था। ठीक उजाला हो जाने से पहले गुनिया ने सोच लिया था, तय कर लिया था कि उसे क्या करना है... जवाब सूझ गया था...

उसे ऐसा लगा भी था कि इस जवाब के जवाब में डीह के अंदर कुछ भी हो सकता है। पर इस समय वह केवल एक संथालन नहीं थी। वह माँ थी, जिसे और बातों से ज़्यादा अपने बच्चों की परवाह करनी थी...

घर के पिछवाड़े की उस मोटी जमीन पर कीचड़ में फच्च-फच्च, इकलौते बूढ़े बैल के साथ हल जोत रही थी गुनिया... सारी ताकत झोंक कर। जैसे उस पर जूनून सवार हो। गुनिया की आँखों में बच्चों का रुआँसा चेहरा हँसते हुए चेहरे में बदलता हुआ डबडबाता रहा और बैल अपनी मालकिन की हुलस और पुलक से अपना जोर भी झोंकता रहा... बूँदें इस बीच आकाश से मानों उनकी मेहनत को सलाम करने पड़ती रहीं... कड़ी-पथरीली-सी धरती उसके श्रम के आगे नरम, माँ की स्निग्ध गोद-सी बिछ गई थी... बूढ़ा बैल अशक्तता के मारे लड़खड़ा कर बढ़ता... गुनिया दबे स्वर में उसका हौसला बढ़ाती... 'हुश... बस गे... बेटा गे, थोड़ा दम और लगा दे... थोड़ा जोर और दे... चल...चल...चल...' और बैल चलता रहा... एक-देढ घंटे तक उनकी मशक्कत जारी रही... ना बैल पस्त हुआ, ना गुनिया...

हल्का-सा उजाला अब पूर्वी क्षितिज से झाँकने लगा था... चिड़ियाँ शोर मचाती हुईं पेड़ों को छोड़कर आकाश में पाँत बनाकर उड़ी जा रही थीं... बूँदें अब हलकी फुहारों में बदल गई थीं...

गुनिया खुश-खुश वापस आ गई थी... जिस काम के लिए पिछली रात से छाती पर मानों पत्थर रखा हुआ था... वह बोझ सरक गया था... उसने मुड़कर खेत को देखा और जोर-जोर से दम भर कर साँसें लीं... उत्साह का जादू भी गजब होता है... सचमुच उत्साह ही ज़िन्दगी है और निराशा मौत...

बच्चे अभी भी सोए थे, उसने छोटे को प्यार से उठा कर अपनी गोद में समेट लिया... और उसका सिर थपथपाने लगी...

हल को वापस वहीं दालान में दीवार से टिका कर रख आई थी... बैल को थपथपा कर गुहाल घर में धकेल दिया था, जो अभी हाँफता हुआ-सा अपने बुढ़ाते सींगों को गुहाल के खंभे पर रगड़ रहा था... गुनिया का बदन भी टूट रहा था, मगर अब उसके चेहरे पर संतोष की सुबह उग आई थी... थोड़ी देर बच्चे को गोद में लिए बैठी रही, फिर जैसे चैतन्य हो कर उठी, किवाड़ की कुंडी हटाई और बाल्टी ले आँगन के कुएँ पर नहाने चली...

हवा मंद-मंद बह रही थी और एक अजीब-सी सरगोशी उस धुँधले वातावरण में जैसे घुली-मिली थी... गोदवा का लड़का सबसे पहले डीह में घूम-घूम कर अपशकुन की घोषणा कर आया था... 'सुना नहीं क्या इस डीह में क्या अकाज हुआ है! बहुत खतरनाक अधरम का काज हुआ है काका... जाने क्या होगा अब इस डीह पर...!'

इससे पहले, यानी सबसे पहले, सुगना को उसके सत्रह साल के लड़के ने यह भयानक खबर सुनाई थी। खेत-मैदान से आकर, लोटा-गमछी पकड़े थर-थर काँपता, जैसे सन्निपात लगा हो, 'हे बाबा... ओ खेत में डाईन... देखा हम... डाईन... जंघा तक कपड़ा उठा कर बैल के साथ मोगा के खेत में दौड़ रही थी... खेत में डाईन...'

'चुप कर। काहे बकबकाता है रे, भोर-भोर... कौन था खेत में...?' सुगना दातून करते-करते उसे झिड़का था।

'हे बाबा, मोगा की घरवाली...!'

'क्या देखा तू?'

'वो मोगा की घरवाली, बैल लेके अपना खेत जोत रही थी... बाबा गे... हम आध-पखना भागे हैं, जो डाईन देखे... हम पर जो आँख पड़ जाती, लील जाती हमको... डाईन गे बाबा... कोई संथालन होश में ऐसा। करेगी...!' बताते हुए सिहर रहा था लड़का।

औरत जात खेत में हल चलाई...! ऐसा तो कभी नहीं हुआ... ना इस डीह में, ना किसी डीह में... ना कोई काल और जुग में... संथालों में ऐसा नहीं होता है... पूरे आदिवासी समुदाय में-मुंडा, हो, खड़िया-कहीं ऐसा नहीं होता! औरत बैल-गाड़ी पर चढ़े, हाँके ठीक... मगर बैल लेकर, हल उठाकर खेत जोते, यह आदिवासियों में कुफ्र है... मनाही है इसकी 'डीह की देवी का प्रकोप होगा अब, देखना... इस डीह को कोई नहीं बचा सकेगा रे अब। देवी किसी को नहीं छोड़ेगी। हैजा फैलेगा... महामारी व्यापेगी इस डीह में... एक ठो कुकुर भी भौंकने को नहीं बचेगा... बहुत बड़ा अनर्थ, अकाज हुआ है...' हजार बोतल ताड़ी-महुआ और अब तक कई क्विंटल मुरगा-मांस भकोसने पर भी चार-पसली का दिखने वाला ओझा थरथराने लगा। उसकी आँखें, जो सरसों के तेल में शाल पत्ते पर आदमी का भूत-भविष्य, रोग-व्याधि, नजर-टोना... आदि साफ देख लेती थीं, जैसे संभावित प्रलय को देख रही हों...

एक औरत के कारण पूरा डीह मारा जाएगा। बाप रे, यह कोई कम बड़ा संताप नहीं था!

पूरे डीह में तभी से यही आवाज सरसराती हुई गूँजने लगी, बहुत बड़ा अनर्थ हुआ है... और अनर्थ करने वाली है, मोगा की घरवाली गुनिया!

शाम का धुँधलका अँधेरा पश्चिम के आसमान से उभरने लगा, तब तक पूरे डीह के खेत जुतवाए जा चुके थे... गुनिया से, जो एक मनुष्य थी... स्त्री थी... और माना गया कि उसके स्त्री होकर हल चला कर परंपरा-भंजन के कारण, डीह पर प्रतिकूल समय आने वाला है... जो पूरे डीह के लिए अपशकुन लाने वाली डायन करार दी जा चुकी थी, जिसके साथ यही सलूक किया जाना तय किया गया था...

वह औरत, जो उस आदिवासी समुदाय का हिस्सा थी, उन गाँवों में से एक की, जहाँ के बारे में, अक्सर अखवारी या किसी स्वयंसेवी संगठन की रिपोर्टों में कुछ ऐसा लिखा जाता था-'यहाँ अशिक्षा और गरीबी के असर से अंधविश्वास की मार सबसे ज़्यादा औरत ही उठाती है... और अफसोस यह कि इस पूरी प्रक्रिया में खुद औरत भी आततायी और पीड़ित दोनों भूमिकाओं में मिल जाती है। अकेली औरत को बढ़ने से रोकना हो या उसकी संपति का लोभ या सिर्फ़ अपने मर्दपन को साबित करना हो, तो उस औरत को' डायन'साबित करके उसे मैला खिलाने, उसकी आँखें फोड़ने से लेकर पूरे गाँव में नंगा घुमाने आदि की नृशंसता का ग्राफ यहाँ बहुत ऊँचा है...' मगर इसके खिलाफ बना कानून टिड्डे की लेड़ी से ज़्यादा बड़ा नहीं है! इसलिए ही ना पिछले साल वह अधेड़ कासो अपनी बगल-घर की बुढ़िया का सिर कुल्हाड़ी से काट कर, वह कटा हुआ सिर लेकर खुद थाने जा पहुँचा था... और थाने के चबूतरे पर मजे से बैठा रहा... पूछे कोई, कहता था... उसका बच्चा का देह नहीं ठीक हो रहा था... ओझा बोला, बुढ़िया बिद्या करके बाण मारी है... डायन खा रही है तेरा बच्चा... तो आज उसको खत्म कर दिया! अब खा रे मेरा बच्चा...!

प्रधान के हुक्म के अनुसार गुनिया को घर से ले आया गया था... और नाँद के आगे खूँटे से बाँध दिया गया था, ठीक जैसे मवेशी को बांधते हैं... गुनिया लस्त-पस्त कुछ कह रही थी, जिसमें कराह का स्वर ज़्यादा था... उन लोगों ने सुना था, गुनिया को खूँटे से बँधे दोहरी होते देखते हुए... 'पानी...' और गोरू-बैल को दी जाने वाली सानी आगे डालकर उसका मुँह उसमें बलात झुका दिया गया... 'साली..., पानी... ले...' एक लड़का जमीन पर थूककर बोला था... प्रधान की आँखों में अपने लिए तारीफ देख ली थी उसने इसके बाद... छोटे हरुआ का भतीजा, जो नाँद का तसला उठा कर लाया था, जिसमें सानी भरा था और जिसने गुनिया की मुंडी को बालों से पकड़ कर सानी के उस तसले में गाड़ ही दिया था, जोर से हँसने लगा... गुनिया लगभग बेहोशी की हालत में उसी को पानी समझ कर पीने लगी तो, गले में ऐसी फाँस लगी कि खाँसते-खाँसते दोहरी हो गई... खूँटे से बँधी...

सरकार की विकास योजनाओं के तमाम बड़े दावों के बावजूद इस गाँव या इस जैसे गाँवों में अभी तक विकास नाम की चिड़िया ने बीट भी नहीं की थी... और यह दूसरी बात है कि परली तरफ पूरी दुनिया इक्कीसवीं सदी के दरवाजे पर मुँह बाए खड़ी थी। इस डीह के लोग अँधेरों में जीते थे इसलिए, जाहिर था कि इनकी सभी आस्थाएँ और विश्वास किसी भी तरह की रोशनी से वंचित तो थे ही... अक्सर किसी बूढ़ी या जवान स्त्री को 'डाईन-बिसाही' का दोष देकर कोई खाँटी बाप का जना मर्द उसकी गर्दन काट कर सदर थाने में कटी हुई मुंडी लिए पहुँच जाता और शान से कबूलता कि 'इसको' मैंने काटा है! या फिर बाँस की नली से औरतों को आदमी का गू घोल कर पिलाया जाता या उसकी आँखें निकाल दी जातीं, उसे गंजा कर और / या पीट कर उसके मुँह पर चूना पोता हुआ या उसे नंगा कर गाँव भर घुमाया जाता... डायन के आरोप और डायनों के प्रति नफरत आम बात थी और डायनों का शिकार भी! अखबार इन खबरों को छोटे कॉलम में छापते, यदाकदा बड़े में भी। मगर प्रशासन बड़े नालों में मछली मारता पाया जाता... किसे फुर्सत थी कहीं पर भी कि 'स्पार' जैसे गैर-सरकारी संगठन के उन स्लोगनों पर गौर करता, जिसमें बताया गया होता... 'नारी माँ है, डायन नहीं!' या ऐसा ही कुछ... मगर जिनके वास्ते लिखा जाता, वह उसे कभी नहीं पढेंगे! जो पढेंगे, वह उन तक पहुँचाएँगे नहीं... यही सच्चाई है, जिसे सीधे मुँह कोई नहीं कबूलता...!

हवा का रुख पता नहीं चलता था... आकाश में बादल स्थायी तौर पर पुते हुए-हुए थे, चढ़े हुए दिन की रोशनी भी धुँधली...! सेतुआ बांदरा तीरों की पूँछ में पंखों को बांधते हुए अपनी औरत से कह रहा था, 'अब क्या होगा... ऐसा अकाज काहे किया इस डाईन ने...' पूरे डीह में धिक्कार और शिकायत की ऐसी आवाजें... शंका और डर... अफवाहें और बौखलाहट... वातावरण के कुहासे को और घना कर रही थीं... सिर्फ़ राधुका की पचपन साल की विधवा, जिसके सर पर कपड़ा लिपटा रखा था, क्योंकि हाल में उसे डायन बता कर सिर के केश मूँड़ दिए गए थे और डीह भर के सामने नंग-धड़ंग कर खूब पीटा गया था... सेमल के पेड़ से बांधकर..., अपने दरवाजे से झाँक कर बाहर के वातावरण का अंदाजा लेती और अपने-आप से बुदबुदा रही थी, '...तुम लोग मरता काहे नहीं... आज फिर एक जन को खा जाएँगे... औरत जात नहीं डाईन, यही लोग है...' कुछ दूसरी औरतें भी कुछ ऐसा ही सोच रही थीं, जिनके साथ 'डाईन-दोष' लगा कर क्या-क्या नहीं किया गया था... मगर वे खाली जिंदा बच गई थीं... और इस समय भीड़ की ताकत के सामने बौनी होकर घर में दुबक जाने या फिर भीड़ में ही शामिल हो जाने के विकल्पों के बीच झूल रही थीं...

'महामारी फैलेगी... बहुत भयानक प्रलय आएगा... जमीन पलट जाएगी... खून की उलटी करके मरेंगे बच्चा-बूढ़ा सब... पूरा डीह का डीह साफ हो जाएगा। देखना तुम लोग... अरे देखने के लिए डीह में बचेगा ही कौन!' गुस्से और असंतोष की लपटें लपलपाने लगीं... 'इस कुकर्मी औरत के कारण देवी गुस्सा हो गई जान लो... समूल नाश समझो। एक-एक ठो बच्चा मरेगा, जवान-बूढ़ा और औरत लोग...'

'तब इसका कोई उपाय करिए ओझा... कोई रास्ता करिए... डीह पर आई आफत का काट बताइए.' आदिवासी जुगुप्सा और डर से पगलाए हुए, बचाव के लिए ओझा का मुँह ताकने लगे...

और ओझा अपनी महत्त्वपूर्णता के अहसास में अतिरेक आवेग से चीख ही उठा, 'दंड दो उसको... अधरम की है मोगा की औरत... डीह में जाति की परंपरा को तोड़ने का दोष हुआ है उससे। अनजाने तो नहीं की है... हुआ ही है ग़लत काम... दंड होगा उसको... बिना दंड लिए देवी मानेगी नहीं... और यदि देवी दंड दी तो पूरा डीह को भुगतना पड़ेगा...' ओझा बोलता तो उसकी गर्दन बगुले की तरह उठंग जाती और आवाज ऐसी आती मानो बाँस की फट्ठियों से हवा गुजर रही हो...

'दंड देने से डीह पर आई आफत टल जाएगी ना ओझा?'

'अरे काहे नहीं टलेगी... जोन आदमी दोष किया है, उसको दंड दिया तो न्याय हुआ कि नहीं। तब देवी माँ काहे को रूसेगी रे...' ओझा इत्मिनान से बोला... इसके बाद दंड के निर्धारण की प्रक्रिया शुरू हो गई. गाँव की औरतें इस सब माजरे के बीच हमेशा की तरह बेआवाज उपस्थित थीं... जबकि सब समझ चुकी थीं और अपने बच्चों को ऐसे दबोचे खड़ी थीं मानो अभी देवी का प्रकोप बिजली बनकर टूट पड़ेगा और उनके बच्चों को ग्रस लेगा... इस तरह सारी गतिविधियों और कार्यवाहियों पर उनकी मूक सहमति थी... हाँ, जिन पर पहले गुजरी होगी, वह लोग सिहर उठी थीं भीतर ही भीतर, लगातार यह सोचते हुए कि 'गुनिया भी कैसे बचेगी?'

गुनिया को कोसने की होड़ थी वहाँ... जिसके अपकर्म से डीह पर तबाही के आसार आ गए थे...! उसके नाम के साथ गालियाँ निकल रहीं थी... यह तबाही या प्रलय ओझा की जुबान से फूटे अकाट्य सत्य थे और उसके कपाल धरने और हाथ झटक-झटक कर कहने के अंदाज से और भी विश्वसनीय समझे गए थे। हमेशा की तरह... ओझा पर अनास्था यहाँ किसी के बलबूते से बाहर की सोच थी...

आज पता नहीं क्यों या कैसे बारिश लगातार टिपिर-टिपिर बनी हुई थी...! क्या यह किसी घटित होते अपराध के साक्ष्यों को धो-पोंछ देने का उपक्रम था...? नहीं, प्रकृति इतनी बेहया नहीं होती! ...शायद उसके माथे से भी तनाव का पसीना टपक रहा था...!

'चलो रे... सब हरामजादी के ठिया...' भीड़ में कोई चिल्लाकर बोला और गंदी गालियाँ देता चला गया...

बात डीह के एक सिरे से दूसरे सिरे तक फैला दी गई थी कि अमुक औरत ने... मोगा की घरवाली ने... जाति की वर्जना, परंपरा तोड़ कर खेत में हल चलाया है... 'कैसे हिम्मत पा गई साली!'

...पता नहीं इस समय कैसे यह लोग अपने 'धरती के आबा' बिरसा को भूल रहे थे... 'सभी जीवों पर दया करो! ...भूत-प्रेत की पूजा मत करो! ...सिंग-बोंगा एक है...!' और एक जीती-जागती इनसान को रौंदने जा रहे थे... किसी भी धर्म और समाज का 'सिंग-बोंगा' यानी ईश्वर और उसको प्रतिष्ठित करने वाले तमाम ग्रंथ आदमी को ऐसी प्रेरणा तो नहीं देते हैं!

धूप इस बूँदा-बाँदी के बीच बादलों से निकलने को बिलबिला रही थी। मार उमस के आदमी का बदन पसीना फेंक रहा था... नंग-धड़ंग बच्चे अपने नाक-कान कोंच कर बड़ों का मुँह ताक रहे थे। ज़्यादा छोटे बच्चों को यह समझ नहीं आ रहा कि आखिर क्या हो गया है! चूल्हे क्यों नहीं सुलगाए जा रहे हैं... इतनी जोरों की भूख लगी है और माँ हैं कि भीड़ में थिनक रही हैं... भात क्यों नहीं राँधती! कुछ ऐसे भी थे, जो थोड़े-बहुत बड़े हो चुके थे, बात कुछ समझ गए थे और फिर किसी तमाशे की संभावना से उत्तेजित हो गए थे...

पूरे डीह में शोर क्षितिज के किसी कोने से उठते तूफान के शोर-सा हरहराकर उभरता जा रहा था...

गुनिया बदन से कीचड़ धोकर कपड़ा बदलने जा रही थी... और उसके दुआर पर वह शोर आ धमका था...

'ए डाईन... रे गुनिया... बाहर आ रे...' प्रधान पहले हांका था, मानों किसी कायदे की तरह, फिर पीछे की भीड़ चिल्लाई, 'बाहर निकल तू...'

गुनिया को अपने संतोष के बीच कहीं ऐसा आभास भी था, वही संदेह इस रूप में अब प्रत्यक्ष दुआर में खड़ा था... कुंडी कैसे हटा देती! हटाने को हाथ रुक-रुक गए... किवाड़ से मुँह लगा के ही पूछा, 'काहे आए हैं आप लोग, माइनो के बाबा ड्यूटी गए...' और जैसे अपनी ही आवाज की कमजोरी को भाँप कर चुप हो गई. बच्चे अकबकी-सी हालत में पिछली दीवार के पास जाकर बैठ गए थे... छोटा कभी भी चिल्ला पड़ने को था, जिसे माइनो जोर से अपने से दाब के रखी हुई थी... 'आयो! यह लोग...' वह अपनी माँ से फुसफुसाती-सी बोली... तो गुनिया ने आँख से आवाज करने से मना कर दिया। माइनो खुद रुआँसी होने लगी तो छोटे पर उसका दबाव कम हो गया... बहन की गिरफ्त से छूटते ही छोटा जोर से चिल्ला कर रोने लगा...

बाहर से शोर बदस्तूर आ रहा था, 'है गे... छिनाल... भीतर से बात करती है, बाहर आ रे...'

'जो बात है कहिए...' गुनिया बच्चों की तरफ देख रही थी... वह कुंडी नहीं हटाएगी...

'तुमसे दोष हुआ है, महादोष... सुनती है... तू बाहर आ कर समाज के आगे कबूलती है कि घुस कर निकालें?'

ठंडी हवा किवाड़ के फाकों से घुस रही थी और झिर्री से बाहर ताकती गुनिया की आँखों में चुभ-सी रही थी... इस बार प्रधान की आवाज में धमकी नहीं थी, सच्चाई थी... गुनिया जानती थी, यह लोग जोर-जबर्दस्ती किए तो... बच्चे...

माइनो ने हल्की चीख मारी थी, 'आयो, नहीं...' मगर अबकी कुंडी सरका दी उसने... ओसारे के आगे पूरा डीह उसके सामने था...

'क्या दोष हुआ है, बोलिए?' गुनिया के पास मुँहजोरी के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था, उनको टालने का, चाहे थोड़ी देर को ही सही।

'मुँह देख रे रंडी का... मुँह तो बाघ जैसा खोलती है! पूरा डीह खाने को खेत में बाल खोल बैल के साथ भोर नंगा नाच रही थी डाईन...!' ओझा इतना चिल्लाकर ऐसे बोला मानो इसे इसी तरह बेशर्मी से बोलने पर गुनिया का पूरा 'दोष' सिद्ध हो जाता था।

गुनिया को एक बार सिहरी आई... वह हड़काने से हड़कने वाली संथालन नहीं थी, मगर बच्चे साथ हैं, घर में मर्दजात नहीं, भले वह कुमर्द ही हो और इन लोगों का इरादा...

खुद को फिर मजबूत दिखाने का यत्न करती गुनिया ओसारे के बाँस को कसकर पकड़े बोली, 'क्या उल्टा-पुल्टा बक रहे हैं आप लोग? क्या डाईनी किए हैं हम? एका औरत देख के चढ़े जा रहे हैं एकदम तो...'

'चुप... चुप...' चीखा प्रधान, ओझा भुनभुनाया... 'सुगना का लड़का देखा है, लुगड़ी (कपड़ा) उठा के खेत में... बैल के साथ...'

'मेरी जमीन तांडी (परती) रह जाएगी राधू काका। बच्चा लोग सारा बरस आँत को गिठ्ठा बाँधके कैसे रहेगा? आप देंगे क्या...?' ...गुनिया की आवाज में अनायास कातरता उतर आई, मगर ऊपर से सख्त बनी रही। , 'ये ही बोल के...'

'तू खेत जोती है, हल चलाई है...?' हल्का पीला साफा जैसा सिर पर बांधे और उजले चारखाने वाला गमछा पहने प्रधान ने साफ सवाल किया था, जिसकी प्रत्येक वर्तनी पर जोर बढ़ता गया था।

गुनिया अब उसी तरह दृढ हो चुकी थी, जैसे संभाव्य वध से पहले एक प्रकार का स्थिर, निस्संग और तटस्थ मानसिक-बोध हो आता है और जीव कमजोर भावनाओं, डर और संवेदना से मुक्त होकर ढीठ हो जाता है। वह जानती थी कि जाति की 'परंपरा' उससे टूटी है, चाहे यह बाध्यतावश हुआ हो, मगर यह कौन सुनेगा! वह 'डाईन' घोषित हो चुकी है... और डाईन के साथ क्या होता है, इसका पता था उसे...

'हाँ... खेत जोते हम। हल चलाए हम... बच्चा का मुँह में डाका (भात) देने के लिए किए... क्या पाप किए बताइए...'

भीड़ में आग लग गई! जुड़े हुए सिर अंगार उगलने लगे। औरतें आँखें फाड़ कर ताकने लगीं कि अब किसी भी पल कुछ भी हो सकता है... मर्द दाँत पीस, जबड़े कसने लगे... एक तो अकाज, उस पर इतनी ढिठाई से मान रही है, छाती फुलाके! देख तो हिम्मत! बाबा गे... हे बाबा...!

'डाईन है ये औरत...' बहुत-सी आवाजें एक साथ ऊँची उठी...

प्रधान का सीना थोड़ा आगे निकल आया था। ओझा की आँखें कंचे जैसीं चमक उठी थीं। सुगना और उसका लड़का ऐसे एक दुसरे से सटा-सटी करके भीड़ में सबसे आगे की पंक्ति में खुद को उभार आए... जैसे सारा श्रेय इन्हीं को है, यह बताना हो। सुगना का ही लड़का देखा था और जो देखा था, अब दोषी अपने मुँह से कबूल रहा है... सुगना अपने लड़के को पकड़ कर जोर-जोर से बोलने लगा, 'देखा... देखा... मेरा लड़का सबसे पहले देखा था... ये डाईन को विद्या करते समय... मान रही है डाईन अब... देखा...'

'नहीं भी मानती तो, तब तेरा जो हल पड़ा है, उस पर लिथड़ा माटी देख लिए हम लोग... डीह को खा जाना चाह रही थी रे कुत्ति... डाईन है ये औरत नहीं तो क्या, हमारी जात-जोनी में औरत का खेत जोतना दोष है, इसको मालूम नहीं हुआ...!'

और प्रधान का आदेश हुआ, 'ए गोंदा, होपा... जा रे टान के चल साली को...'

दो तगड़े संथाल लड़के भीड़ में से निकल कर गुनिया को घसीटने लगे... वातावरण में कई तरह की चीखें थीं, जिसमें गुनिया और उसके बच्चों की चीख व चीत्कार शामिल हो गईं... माइनो माँ को पकड़ घसीटे जाने से बचाने की कोशिश में खुद साथ घिसट आई थी...

सारे चेहरे एक से लगने लगे... सारी औरतें... सारे मर्द... सारे पेड़-पौधे... डीह की हरेक डूह-दीवार... सारा माहौल एकसार हो गया था... पत्तों पर गिरती हुई बूँदें रिस-रिस कर जमींदोज हुई जा रही थीं, ठीक वैसे जैसे गुनिया के बच्चों का अनसुना विलाप...! गुनिया के अस्त-व्यस्त और तार-तार हो चुके कपड़े के भीतर तमाम लपलपाती नजरें बेहया उत्सुकता से कुछ मनोरंजक तलाश रही थीं... और मुँह पर चिपकी हुई गालियाँ... उसके उन अंगों से जोड़कर अश्लील हुई फब्तियाँ...

इसके बाद भी घोषित डायन को सजा अभी मुक्कमल नहीं हुई है, इस आशय से प्रधान चीखते हुए बोला, उसका बोलना हर बार चीखना ही होता था, जैसे अपना प्रभाव सिद्ध करने के उसके पास कोई और चारा नहीं हो... 'ये कुतिया... डाईन के कुकर्म से पूरी डीह पर दोष लगा था... इसको जुरमाना भरना होगा... मोगा से बात होगी...' और प्रधान के वाक्य पूरा करते-ना-करते प्रधान के साथ-साथ उसका दायाँ-बायाँ लेने वाले मर्द देर रात के जश्न के ख्याल से भीतर-ही-भीतर मुर्गा-मांस और महुआ, ताड़ी की मादक बास महसूसने लगे...

थोड़ी देर तक मोगा के इंतजार में लोग वहीं पसरे रहे, फिर प्रधान के कहने पर धीरे-धीरे छँट गए थे... सिर्फ़ प्रधान, सुगना, ओझा, हाथरू और चार-पाँच जन वहीं ओसारे में पाँव फैलाकर बैठे रहे... कीचड़ से लिथड़ी हल की फाल दीवार से टेक लगाई पड़ी थी... अपने खूँटे से खुला बूढ़ा बैल आँगन में भीगता लगातार पूँछ हिला कर पैर पटकता खड़ा था... और उसी तरह खूँटे से बँधी जमीन पर बिछी हुई गुनिया की देह, जिसके पास माइनो और उसके भाइयों की रुलाई की आवाजें आले पर रखी लालटेन की रोशनी की तरह धीरे-धीरे मद्धिम होती जा रही थीं... वह माँ की गर्दन और कलाइयों में पड़ी नारियल के जूट की रस्सी की गाँठ को अपने छोटे हाथों के छोटे-छोटे नाखूनों से खोलने की चेष्टा में जुटे थे...

नेपथ्य से मेढकों के टर्राने और झींगुरों के बोलने का तेज शोर पूरे वातावरण में फैलता जा रहा था... सन्न-सन्न करती पछुआ हवा... और बीत रही थी एक भौंचक्की-सी आर्द्र शाम...

डीह के ठीक बीचोंबीच पुराने बड़ के नीचे गोलाकार में बने चौड़े चबूतरे पर छातों के नीचे प्रधान और वह लोग इकठ्ठे थे... मोगा बिना छाते के भीगता हुआ अपराधी जैसा खड़ा था... प्रधान ही हमेशा की तरह अगुआई करता हुआ बोला... 'मोगा, तेरी घरवाली तेरी टाँगों के बीच नहीं रहती क्या रे? ...इतना बड़ा अकाज कर गई आज... उससे दोष हुआ है... डीह पर उसके अपशकुन के कारण प्रेत नाचेगा... बोल, भला किया उसने?'

मोगा के देर रात घर पहुँचते ही उसे यहाँ लगभग खींच कर लाया गया था, वह माजरा सुन चुका था और अब गुनिया के लिए सारा गुस्सा मन के एक कोने में इकठ्ठा कर रहा था... दारू के पैसे का नुकसान वह बर्दास्त नहीं कर सकता था और जुरमाने में मोटी रकम जाने वाली है, इसमें उसे संदेह नहीं था। फिर भी यदि गोड़-हाथ जोड़कर कुछ टल जाए तो जाए... 'उससे जब भूल तो हुई है, मना नहीं करते हम। पर इतना रुपया...' ओझा बीच में बोला, 'दोष हुआ है तब भरना पड़ेगा मोगा... उसके कारण पूरे डीह पर भारी विपद आ रहा था, जो हमने दोष कटवा लिया... इसका जुरमाना तो भरना होगा मोगा... चाहे तो अपनी बीवी बेच दे या जमीन बेच के दे!' ओझा 'मोगा' ऐसे बोलता जैसे मोगा की गर्दन पकड़ रहा हो... 'भरना पड़ेगा' इन दो शब्दों पर खासा जोर दिया था उसने... और इससे एक यह बात भी कुछ साफ हुई कि मोगा की उस जमीन पर 'आँख' है... जिस पर आज भोर को गुनिया, जो कि कानूनन इस जमीन की मालकिन और वारिस थी, ने हल चलाकर 'डाईनगिरी' से इस समुदाय की पुश्तों पुरानी परंपरा का भंजन परंपरा का भंजन कर दिया था... जिसे थोड़ी देर पहले सबक सिखा दिया गया था...!

मोगा का शाम को चढ़े ताड़ी का नशा अब पानी हो चुका था। उसकी आँखों के आगे जैसे रेलवे के लाल-पीले सिग्नल कौंधने लगे थे... वह धड़ाम से जमीन पर ऐसे बैठ गया, जैसे उसके घुटने गायब हो गए हों...

जुरमाना भरके ही लौट पाया मोगा... और अब तक ओसारे में ही कीचड़ और गोबर-सानी में लिथड़ी पड़ी गुनिया के कूल्हे में एक लात मारी थी...

माइनो और उसके भाई गुनिया के बंधनों को खोलने में कामयाब हो गए थे... माइनो पानी लाकर माँ को अधलेटा कर पिलाने की कोशिश कर रही थी... बाप की इस हरकत पर और बच्चे तो फिर रोने लगे, मगर माइनो बिजली जैसी तड़प के साथ उठी और बाप को धक्का देकर पीछे करते हुए रुँधे हुए कंठ से चिल्लाई... 'बाबा गे... आयो को छूना मत... मार दूँगी!' उसकी आँखें लाल हो रही थीं... बहुत देर से लगातार रोते रहने के कारण या फिर गहरी वितृष्णा और स्थितियों की नकार से उपजे गुस्से से, कहना जितना आसान था, उतना ही मुश्किल...! मोगा नहीं देख पाया कि इसके बाद उसकी आँखें एक बार हल की तरफ भी उठी थीं, मोगा शायद सुन भी नहीं सका कि उसने कुछ बुदबुदाकर भविष्य के अपने फैसले को अपने भीतर दोहराया था...

क्या उसने पंजाबी कवि 'पाश' को पढ़ा था? क्या उसने फक्कड़ जनकवि बाबा नागार्जुन को पढ़ा था? क्या कैफी आजमी, सुदामा पांडेय 'धूमिल' , रघुवीर सहाय या राजेंद्र यादव... कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी, तस्लीमा नसरीन, मृणाल पांडेय, अरुंधती राय... या किसी भी विद्रोही-चेता साहित्य-दर्शन को पढ़ा था? नहीं... अभी नहीं, इसकी कतई गुंजाइश नहीं है! मगर केंदाडीह के उत्क्रमित राजकीय मध्य विद्यालय की कक्षा नौ की छात्रा माइनो ज़िन्दगी को करीब से पढ़ रही थी... चीजों को बदलने के लिए यह भी उतना ही ज़रूरी होता है... शायद किताब पढ़ने से ज्यादा...! असल में विद्रोह का संस्कार तो ज़िन्दगी देती है, जहाँ से मूल चेतना के तौर पर वह विचार, साहित्य, दर्शन आदि में शामिल हो जाती है! जिन्हें पढ़ना पुनः उसी चेतना और संस्कार को विस्तार देता है...

माइनो को याद आने लगा कि खासकर उन-उन दिनों, जब डीह में कोई किसी औरत के साथ 'जोर-जबर्दस्ती' करता है और सुबह उसकी मुर्दा देह झाड़ी में या पेड़ पर लटकी नंग-धड़ंग पाई जाती है; जब 'डायन है ये औरत' की चीख उठाकर किसी विधवा, बूढी या फिर अवश मगर अधिकार-चेता औरत, जो उनकी सत्ता के लिए खतरे की संभावना बनने लगती है, की जमीन छीनने या बदला लेने या अपनी ताकत और उसकी औकात बताने के लिए उसको अपमान और क्रूरता के चरम से गुजारा जाता है! जब 'दिकू' लोग टाटा-पटना-कोलकाता से यहाँ की जमीन या औरत के लिए लार भरे जबड़े लेकर आ जाते हैं; जब राँची जैसी जगह में, जो कि राजधानी है, उस बिरसा मुंडा, जिससे ब्रिटिश सत्ता हार कर, डर कर धोखे से जहर देकर ही पकड़ और जेल में मार सकी थी, के परपौतों को आजाद हिंदुस्तान की पुलिस 'साले नक्सली!' कहकर सरेआम पीटती है, जब वे अपना मताधिकार प्रयोग करने जा रहे होते हैं...! और तब, जब कोई लड़की भागकर डीह में वापस लौटती है और बताती है कि उसके जैसी बारह से अठारह साल की आदिवासी लड़कियों को दिल्ली, यू.पी. में शादी या नौकरानी का काम दिलाने के नाम पर बेचा जाता है... क्योंकि वे इतने लाचार हैं कि गंदे नाले से पानी पीते हैं... और इतने भूखे कि जड़ और बीज खोद कर खाते हैं...! तब... विद्यालय की चश्मे वाली नई मास्टरनी दीदी, जो एक स्वंयसेवी संगठन भी चलाती है, विद्यालय में आने वाले अखबार पढ़ती है, सयानी लड़कियों को कैसे बताती है कि 'तुम लोग वह सब मत मानना जो सब लोग कहते हैं... वे सिर्फ़ अपने फायदे के लिए तुम्हारी कोची (कोमल या कमसिन) चमड़ी को खुद या दूसरों से जुठाना चाहते हैं... वे लोग हर बार सिर्फ़ झूठ कहते हैं क्योंकि, तुम कभी उनके बराबर ताकत ना पा जाओ... सब इस बात से डरते हैं। तुमको तुम्हारी जमीन, तुम्हारे जंगल, तुम्हारी पहचान और हक, तुम्हारी आत्मा और चेतना, तुम्हारे विरोध करने की शक्ति को हासिल करने, तुम्हारे ऊपर उठने और आदमी होने की सभी संभावनाओं को कुचल देना चाहते हैं... यह लोग तुम्हारे बीच भी है और जिनको तुम लोग दिकू कहते हो, वे भी...' और उसने उन्हें मध्यप्रदेश की एक महिला के बारे में बताया था, जो एक विराट, महत्त्वाकांक्षी, मगर निरंकुश बांध परियोजना के कारण अपनी जमीन से उखाड़ दिए जाने के खिलाफ सालों से लगातार लड़ रही थी... और उनके साथ धीरे-धीरे कई लोग, जिनमें औरतें, लड़कियाँ भी थीं, एकजुट होते गए थे... माइनो ने गौर से वह किस्सा सुना था और सुना था कि मास्टरनी दीदी एक शब्द बार-बार दोहराती है- 'विरोध' ...!

उसने असल में आज एक सबक सीखा था, 'विरोध' ! जिसकी प्रेरणा से उसने भविष्य का वह फैसला किया था...!

बादल काफी देर से झप-झप टपकते रहने के बाद एक बार फिर गरज कर जोर से बरसने लगे थे... आश्चर्य है, कैसे अचानक आज ही बरसात ने अपना आलस्य छोड़ दिया था...! पूरी डीह पर छाई निस्तब्धता को भंग करती हुई जमीन पर बौछारों की मारें पड़ रही थीं... चट-चट-चटाक...

...और खेत में जमा पानी बिजली की चमक से बार-बार कौंध उठता था... माइनो खिड़की के पास बैठी उसी तरफ देख रही थी...