त्रिलोचन की एक कालजयी रचना / महेश चंद्र पुनेठा

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मलयज की डायरी
भारतीय जमीन में खड़े रहकर पश्‍चि‍मी आधुनिकता से टकराती एक कालजयी रचना

त्रिलोचन की कविता को लेकर मलयज ने अपनी डायरी में लिखा है,

‘‘मुझे यह साफ दि‍ख पड़ता है कि आज त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन की भारतीयता को लेकर हम नहीं चल सकते, इनकी भारतीयता में बौद्धिक ऊर्जा की कमी है। नितांत कमी है । ये हद से हद लिरिकल किस्म के भारतीय हैं। इनमें टकराहट नहीं है। ये बस अपने को सुरक्षित रखे हुए। अपनी अस्मिता बचाए हुए हैं, बह नहीं गए हैं । एक जमीन इनके पास है, उस पर बस टिके हुए हैं। हमें रामचंद्र शुक्ल की भारतीयता चाहिए, गॉधी जी की भारतीयता चाहिए, जिनमें एक ओर अपनी जमीन का विवेक था तो दूसरी तरफ पश्‍चि‍म से टकराने की अदम्य बौद्धिक ऊर्जा और ललकार और उससे टकराने का खुलापन-त्रिलोचन की भारतीयता जैसा बंधा-बंधापन उनमें न था, एक जगह टिके रहने की भारतीयता उनमें न थी ।’’

मलयज के इस मत से सहमत हो पाना कठिन है क्योंकि त्रिलोचन की ‘नगई महरा’, ‘फेरू कहार’, ‘भोरई केवट के घर’, ‘चम्पा काले-काले अच्छर नहीं चीन्हती’ सरीखी दर्जनों कवितायें हैं जो इस बात का प्रमाण हैं कि त्रिलोचन की भारतीयता में कितनी जबरदस्त ऊर्जा है। ऐसी ऊर्जा जो रामचंद्र शुक्ल तथा प्रेमचंद की भारतीयता को आगे विकसित करती है । इस भारतीयता में अपनी जमीन का विवेक भी है और पश्‍चि‍म से टकराने की अदम्य बौद्धिक ऊर्जा भी । ‘चम्पा काले-काले अच्छर नहीं चीन्हती’ कविता में जब चम्पा कहती है,

‘कलकत्ता मैं कभी न जाने दूँगी
कलकत्ते पर बजर गिरे।’

यहाँ अपनी जमीन के प्रति प्रेम तो है ही साथ पश्‍चि‍म की अंध औद्योगिकता का विरोध भी। यह उस केन्‍द्रीकृत औद्योगीकरण तथा शहरीकरण की आलोचना है जो पश्‍चि‍म की देन है । जिसके कारण लोगों को अपना गाँव या कस्बा छोड़ने के लिये मजबूर होना पड़ता है । गाँधी की उस विचारधारा का प्रकारांतर से समर्थन है जिसमें वे स्वालम्बी ग्राम्य अर्थव्यवस्था के पक्ष तथा विवेकहीन मशीनीकरण के विरोध की बात करते हैं । यदि गाँव स्वालंबी होंगे तो स्वाभाविक है घर से दूर जाने का जो दंश है, उसे नहीं भोगना पड़ेगा। दरअसल इस कविता की केन्‍द्रीय अंतर्वस्तु यही है । क्या यह पश्‍चि‍म के पूँजीवादी विकास के ढाँचे से टकराना नहीं है ? अपनी जमीन पर मजबूती से खड़ा होना तथा वहाँ के जन, उसकी प्रकृति, उसके समाज और संघर्षों से गहराई से जुड़ना क्या यह पश्‍चि‍म या पश्‍चि‍मी साम्राज्यवाद को ललकारना नहीं है?

यह त्रिलोचन की पश्‍चि‍म से टकराने की अदम्य बौद्धिक ऊर्जा का प्रमाण ही है कि उनकी सन् 40-41 के दिनों में लिखी कविता ‘चम्पा काले-काले अच्छर नहीं चिन्हती’ आज उस समय से अधिक प्रासंगिक हो चली है। पश्‍चि‍म से आये वैश्‍वीकरण-उदारीकरण-निजीकरण के चलते जैसे-जैसे पूँजी का केन्‍द्रीकरण होता जा रहा है तथा देश में चंद शहर ‘विकास के द्वीप’ बनते जा रहे हैं, यह कविता उस चट्टानी-व्यवस्था से टकराती है। उस पर बज्र बनकर टूटना चाहती है। ‘कलकत्ता’ दरअसल उस पूँजीवादी व्यवस्था का प्रतीक है जिसने विकास को कुछ लोगों और कुछ स्थानों तक सीमित कर दिया है। उसके बदले छीन लिये हैं बहुत सारे लोगों के सुख-सपने और संसाधन । गाँवों को खाली कर दिया है ।वहाँ छोड़ दिये हैं बूढ़े, बच्चे और महिलायें जो परदेश गये अपने लोगों की याद में कलपते रहते हैं । मजदूर के जीवन में परायापन एवं अलगाव पैदा कर दिया है। फलस्वरूप वह परिवार और मानवीयता से अलग होता जा रहा है। आज तो स्थितियाँ और अधिक जटिल हुई हैं । आज नौबत यह आ गई है कि कलकत्ते गये बिना गुजारा नहीं ।वैश्‍वीकरण-उदारीकरण-निजीकरण के फलस्वरूप गाँवों में न कुटीर उद्योग रहे, न खुदरा व्यापार, न किसानी और न खेत मजदूरी । ऐसे में छोटे-मोटे काम की तलाश में शहरों की और जाना मजबूरी हो गयी है। इसका सबसे अधिक दंश उस स्त्री को झेलना पड़ रहा है जो न केवल अपने पति से दूर हो जाती है बल्कि पति की गैर मौजूदगी में परिवार की पूरी जिम्मेदारी उस पर आ जाती है । आज यह कविता हमारे सामने एक प्रश्‍न खड़ा करती है कि परिस्थितियों के चलते क्या आज किसी चम्पा के समक्ष ऐसा विकल्प रह गया है कि वह कह सके-

‘मैं अपने बालम को संग साथ रखूँगी/
कलकत्ता मैं कभी न जाने दूँगी।’

मैं समझता हूँ विकल्प नहीं रह गया है। बल्कि पूँजीवादी व्यवस्था ने शहर के प्रति ऐसा आकर्षण तथा श्रम के प्रति ऐसी हिकारत पैदा कर दी है कि चम्पायें कहने लगी हैं- ‘कलकत्ते मैं भी साथ चलूँगी।’ बहू-बेटे के कलकत्ता चले जाने पर घर के बड़े-बूढ़ों पर जो पहाड़ टूटता है वह दिल को दहलाने वाला होता है। अपने अंचल उत्तराखण्‍ड के गाँवों की ही बात करूँ, पृथक राज्य बनने के बावजूद यहाँ यह दृश्य आज भी आम हैं। ‘कलकत्ते में बजर गिरे’ जैसी पंक्ति लिखकर कवि इस अर्थव्यवस्था का प्रतिरोध रचता है। वह यह कहता हुआ प्रतीत होता है कि ऐसी व्यवस्था जो अपनों को अपनों से अलगाती है, आदमी को उसके जल-जंगल-जमीन और उसकी संस्कृति से काट देती है, वह किसी काम की नहीं उसे समाप्त होना ही चाहिये।

त्रिलोचन परदेश गये पति के लिए घर में कलपती पत्नी की मनोदशा और परदेशी मजदूर की कठिन जिन्‍दगी को गहराई से समझते हैं। उनके दर्द को उन्होंने बहुत नजदीक से महसूस किया है। जिसको ‘परदेशी के नाम पत्र’ और ‘सचमुच इधर तुम्हारी याद तो…’ कविताओं में भी देखा जा सकता है-

सचमुच, इधर तुम्हारी याद तो नहीं आई
झूठ क्या कहूँ । पूरे दिन मशीन पर खटना,
बासे पर आकर पड़ जाना और कमाई
का हिसाब जोड़ना,बराबर चित्त उचटना ।

इस उस पर मन दौड़ाना।
फिर उठकर रोटी
करना । कभी नमक से कभी साग से खाना।

धीरज धरो, आज कल करते तब आऊँगा
जब देखूँगा अपना घर कुछ कर पाऊँगा।

अपने बालम को कलकत्ता मैं कभी न जाने दूँगी कहने के पीछे यह भी चम्पा की चिन्‍ता का एक कारण है । उसे डर है कलकत्ते जाने से उसका बालम न केवल उससे दूर हो जायेगा बल्कि वहाँ जाकर वह इतना व्यस्त हो जायेगा कि उसके पास उसे याद करने का समय भी नहीं रहेगा और चित्त उचटने पर कहीं इस उस पर मन न दौड़ाने लगे, अतंतः उसे भूल ही न जाये। जैसा कि भोजपुर क्षेत्र में मिथक भी प्रचलित हैं जिनका उल्लेख इस कविता की चर्चा करते हुये विश्‍वनाथ त्रिपाठी भी करते हैं कि पूरब जाकर बालम भटक जाते हैं, पूरब की औरतें जादू-टोना जानती हैं । वे मर्दों को दिन में भेड़ और रात में आदमी बना देती हैं। इसलिये उसका गुस्सा जायज है- कलकत्ते पर बजर गिरे । यह कविता उस गुस्से को व्यक्त करने में पूरी तरह सफल रही है। त्रिलोचन जैसा कवि ही जिसको लोक मन की सूक्ष्म पहचान हो इतने संश्लिष्ट रूप से किसी भाव को व्यक्त कर सकता है।

इस कविता के बारे में परमानंद श्रीवास्तव कहते हैं,

‘‘कविता में यह कला अद्भुत तड़प के साथ व्यक्त हुई है । कविता के सीधे सरल या अबोध आरम्भ में आगे के जिस हादसे की खबर या उसका पूर्वाभास है उसे सुनने के लिये उपयुक्त कान चाहिए- महज कागज पर अक्षर देखने वाली आँखें नहीं । बजर गिरे में जितना कहा गया है उससे ज्यादा अनकहा है और वह कम महत्वपूर्ण नहीं ।’’ निश्‍चि‍त रूप से कविता जिस पंक्ति पर समाप्त होती है वास्तव में वहाँ कविता के अर्थ का वृत्त और अधिक फैलता जाता है। कविता की अनुगूँज मन-मस्तिष्क पर देर तक बनी रहती है। ‘वर्तमान साहित्य के शताब्दि कविता विशेषांक’ में राजेंद्र शर्मा इस कविता पर लिखते हुए बिल्कुल सही कहते हैं कि वह बहुत दूर तक और बहुत देर तक हमें बॉधे हुए अपने साथ लिये चली जाती है। हम मंत्रबिद्ध हो जाते हैं।

कविता में प्रतीकात्मकता एवं शब्दों की मितव्ययिता के आग्रहियों को भले इस कविता में काव्यात्मकता न दिखाई देती हो लेकिन एक कथात्मकता के साथ यह कविता जिस तरह से अपने पूरे यथार्थ को चित्रित करती है, उससे काव्य की नई अनुभूति होती है। यही कविता का सौंदर्य भी है। जिसे सौंदर्य की परम्परागत कसौटी से नहीं आँका जा सकता है। वरिष्ठ आलोचक विश्‍वनाथ त्रिपाठी जिन्होंने इस कविता पर सबसे अधिक विस्तार से लिखा है, का विश्‍लेषण इस दृष्टि से उल्लेखनीय है,

‘‘ इस कविता का सौंदर्य मूलतः वात्सल्य पर टिका है। चम्पा के भोलेपन से उसका मन सुंदर है। बच्चे का अनजानापन वयस्क के यहाँ अज्ञान नहीं रहता वह भेालापन बन जाता है।…इसलिये पहली बात यह कि चम्पा का भोलापन कवि की रचना नहीं है । रचनात्मकता उस भोलेपन की प्रस्तुति में है। अनिवार्य- कथनता से लाभ यह हुआ है कि यह भोलापन वागाडम्बर से आहत नहीं हुआ । भोलापन कथित नहीं- वह सम्‍वाद से प्रकाशित होता है- पाठक-श्रोता के मन में । सौंदर्य प्रकाशित होता है । उसे पाठक-श्रोता मन में रचता है। जो मन में रचा जाता वह सौंदर्य नहीं। त्रिलोचन केवल आवश्यक- कथन करके पाठक-श्रोता को रचने का पूरा अवकाश देते हैं। यह त्रिलोचन के काव्य सौंदर्य की विधि है। इस विधि में वह अद्वितीय हैं। जो अपने संस्कारों से इस अवकाश में रच नहीं पाते उन्हें त्रिलोचन का काव्य सपाट लगेगा। उन्हें सपाट लगता है। कवि अपने शर्तों पर सौंदर्य बोध जमाते हैं। यह उनकी निजता है।’’

एक ही पंक्ति किसी कविता को कैसे अर्थ की व्यापकता प्रदान कर देती है यह कविता उसका बेहतरीन उदाहरण है। कविता में लोक हृदय की सही पहचान की गई है । कविता में गहरी सम्‍वेदना तो है ही साथ ही कथा का आनंद भी । ‘नगई महरा’ के सन्‍दर्भ में कवि राजेश जोशी की कही बात यहाँ भी समान रूप से लागू होती है,

‘‘त्रिलोचन की कहानी कहने की इस कला पर विचार किया जाना चाहिए। एक ऐसे दौर में, जबकि कहानी का घोर पतन हो चुका है, इस तरह की कवितायें न केवल एक बड़ी जरूरत को पूरा करती हैं, बल्कि कहानी को अपने संकट से उबारने के रास्ते भी बताती हैं।’’

कविता में गाँव की बोली-ठोली तथा एक बच्ची का भोलापन, कौतूहल, बालसुलभ क्रियायें जिस स्वाभाविकता के साथ आयी हैं, वे इस कविता को काव्यात्मकता प्रदान करने के लिए काफी है। लोकगीत या लोककथाओं की जैसी गहरी आत्मीयता है इसमें । इस कविता को पढ़ते हुए अपने अंचल में प्रचलित लोकगीत याद आने लगते हैं। डॉक्‍टर नामवर सिंह इस कविता में कासी-कौसल में प्रचलित एक लोकगीत-

‘रेलिया न बैरी, जहजिया न बैरी, पइसवा बैरी हो । सइयॉ के ले गै बिदेसबा, इ पइसवा बैरी हो।’

की प्रतिध्वनि देखते हैं। वे इस कविता को उक्त लोकगीत का रूपान्तरण मानते हैं। पर मुझे लगता है ऐसा मानना इस कविता के महत्व को कम करना है । यह हो सकता है कि कविता की प्रेरणा कवि को उक्त लोकगीत को सुनकर मिली हो, पर कविता का कथ्य लोकगीत से बहुत आगे का है । लोकगीत में जहाँ केवल दो पैसे के खातिर विदेश जाने की विवशता का उल्लेख मात्र है, वहीं कविता उस व्यवस्था का तीव्र प्रतिकार करती है जो इस विवशता का कारण है। किसी व्यवस्था की उपेक्षा करना और उसके आगे न झुकना भी उस व्यवस्था का एक तरीके से प्रतिकार ही है। इस कविता में वही बात परिलक्षित होती है। ‘कलकत्ते में बजर गिरे’ कहना पूँजीवादी व्यवस्था की उपेक्षा करना ही है। यह कविता की ताकत ही है कि नामवर सिंह इस कविता को एकदम स्वतंत्र कविता न मानते हुए भी कविता के पक्ष में कुछ महत्वपूर्ण बातें कहते हैं जिसका उन्हीं के शब्दों में उल्लेख करना चाहूँगा, कविता में,

‘‘ सृजन-प्रक्रिया में लोकबोली का भी संस्कार हुआ है । लोकगीत के छंद का भी और लोकगीत के काव्य का भी । भाषा खड़ी बोली है, लेकिन उसमें ‘अच्छर’ अक्षर नहीं हुआ न ‘बजर’ बज्र और ‘चिह्नती’ क्रिया भी अपनी सहजता के साथ डटी हुई है । वाक्य विन्यास गद्य का है लेकिन उसमें एक अंतर्निहित लय है- वर्णन में भी और संलाप में भी । चम्पा के लहजे में गवँई गाँव के एक बेपढ़े-लिखे आदमी की स्वाभाविक सहजता और प्रमाणिकता है- धूमिल के ‘मोची राम’ से कहीं अधिक । बातचीत के क्रम में पढ़े-लिखे कवि की भाषा भी ‘हारे गाढ़े काम सरेगा’ वाली ठेठ मुहावरेदानी अपना लेती है। और काव्य में चोट भी उस कलकत्ता शहर पर है जो गाँव के रहने वालों को बेघर बनाकर हजम किये जा रहा है। कविता हर तरह से गैर-आधुनिक है, बल्कि प्रति-आधुनिक, आधुनिकता-विरोधी । शहर के विरूद्ध गाँव, पैसे के खिलाफ इंसानी रिश्ता। किंतु उस दौर की आधुनिकतावादी कविताओं में साथ इसे रखकर देखें तो प्रयोग और प्रगति के नाम पर लिखी जानेवाली कविताओं से कितनी अलग। हर तरह की अंग्रेजीयत के खिलाफ । भाव में भी और भाषा में भी। यह है ठेठ हिन्‍दी की कविता । हिन्‍दी की नयी कविता-हिन्‍दी की अपनी परम्परा से निकली हुई । आधुनिक लेकिन भारतीय । न पश्‍चि‍म से आयातित, न आतंकित ।’’

डॉक्‍टर सिंह की यह राय मलयज की स्थापनाओं का सटीक जबाब भी हो सकता है। निःसंदेह यह कविता एक ऐसी व्यवस्था की ऐसी-तैसी करती है जो मनुष्य से उसका प्रेम, आत्मीयता, घर-परिवार, गाँव-जवार, पानी-बानी छीनती है। चम्पा की तरह उसकी उपेक्षा करना, उसको ठेंगा दिखाना उससे निपटने का एक कारगर तरीका हो सकता है । बिल्कुल त्रिलोचनी तरीका जो उन्होंने भारतीय किसान से सीखा है । भाषा भी उन्हीं से सीखी है। ठेठ गाँव-जवार की । उनके यहॉ ‘काले-काले अच्छर नहीं चीन्हती’ का काले-काले अक्षर नहीं पहचानती या पढ़ना-लिखना नहीं जानती, ‘कागद ही गोदा करते हो’ का पढ़ते-लिखते ही रहते हो तथा ‘हारे गाढ़े काम सरेगा’ का समय-असमय काम आयेगा नहीं होता है क्योंकि कवि को पता है जो बल या तासीर लोक से पैदा इन शब्दों और मुहावरों में है वह शब्दकोशीय शब्दों में कहाँ? थोड़ी देर के लिये कविता में उक्त स्थानों पर उनके निकवर्ती खड़ी बोली के शब्दों या वाक्यों को रख के देख लिया जाये, कविता की सरसता तथा जीवंतता में कितनी कमी आ जाती है। बोली के ये प्रयोग जीवन-यथार्थ को एक वजन प्रदान करते हैं। इसलिये त्रिलोचन भाषा को सुनने-सीखने के लिए किसानों-मजदूरों के बीच खेतों-खलिहानों-कारखानों में जाया करते थे। यह स्वाभाविक है

‘जो भाषा सीखने जायेगा वह जीवन के तौर तरीके भी सीखेगा’ (त्रिलोचन)। इसी कारण ‘त्रिलोचन की कविता में लोक जीवन की क्रियाएं, स्पंदन और धड़कनें साफ सुनाई देती है’ (विजेंद्र )। कुछ शुद्धतावादियों का मानना रहता है कि हिन्‍दी भाषा में लोक बोली के शब्द नहीं आने चाहिये क्योंकि इससे भाषा की ‘साहित्यिकता और सौंदर्य’ में कमी आ जाती है। यह भाषा का ‘पिछड़ापन’ है । पर वे भूल जाते हैं, कविता में भाषा की साहित्यिकता की रक्षा करना कवि का साध्य नहीं होता है । भाषा साधन है जिसके माध्यम से कवि अपने विचार तथा भावनाओं को भावक तक संप्रेषित करता है। इसलिये कवि को उन्ही शब्दों का प्रयोग करना चाहिये जिससे अपने भाव व विचारों को पूरी गहराई एवं तीव्रता के साथ व्यक्त कर सके। फिर वे शब्द लोक के हों या मानक भाषा के । कभी-कभी यह भी देखने में आता है कि कवि जिस भाव या स्थिति को व्यक्त करना चाहता है उसके लिये मानक भाषा में कोई शब्द ही उपलब्ध नहीं होता है। ऐसे में बोली के शब्दों का प्रयोग अनिवार्य हो जाता है। फिर भाषा का विस्तार करना भी कवि का काम है। इस तरह भाषा को नये-नये शब्द मिलते रहते हैं। इस दृष्टि से न केवल यह कविता बल्कि त्रिलोचन का पूरा काव्य ही एक प्रतिमान है। त्रिलोचन ने

‘रस जीवन का जीवन से खींचा/दिये हृदय के भाव, उपेक्षित थी जो भाषा/उसको आदर दिया।’

त्रिलोचन की मान्यता भी है कि जिस जीवन को कविता का विषय बनायेंगे उस जीवन की भाषा लेनी ही पड़ेगी।…….शुद्ध होना भाषा के लिए घातक होता है। अपने एक साक्षात्कार में विदिशा का उल्लेख करते हुये वह कहते है,

‘‘जब विदिशा मैं गया तो विदिशा की भाषा का स्वभाव मुझे जानना पड़ा। और जब विदिशा का वातावरण मैं दे रहा हूँ तो वहाँ समझे जाने वाले शब्द मुझे लेने पड़ेंगे। विदिशा के ऐतिहासिक महत्व को यदि मैं पकड़ रहा हूँ तो पुराने शब्दों का प्रयोग मुझे करना पड़ेगा।’’वही बात कवि इस कविता में भी करता है।

इस कविता में एक निश्‍चलता और सादगी है ठीक कवि त्रिलोचन की तरह। वह जनपद की चम्पा की मन की बात को एक मनोवैज्ञानिक के मानिंद कितनी गहराई से पकड़ते हैं इन पंक्तियों में देखा जा सकता है-

मैं जब पढ़ने लगता हूँ वह आ जाती है/खड़ी-खड़ी चुपचाप सुना करती है/उसे बड़ा अचरज होता है/इन काले चिह्नों से कैसे ये सब/स्वर निकला करते हैं।

लिखे-छपे काले-काले अक्षरों के लिये गाँव के निरक्षर लोग कुछ इसी तरह सोचते हैं। वह जनपद के लोगों के कितने करीब रहते थे यह बात इन पंक्तियों से उभर कर आती है। ऊपर से सामान्य और सरल लगने वाली इस कविता को पढ़ते-सुनते हुये हमारे आसपास रहने वाले अनेकानेक चम्पाओं के चेहरे हमारी आँखों के सामने तैरने लग जाते हैं। एक अच्छी कविता का यह गुण भी होता है कि वह सहृदय का चित्रित घटना, क्रिया या पात्र से एकाकार करा देती है। ऐसी ही कविता पाठक को पसंद आती है जो उसके भाव-जगत के साथ पूर्ण तादात्म्य स्थापित करती है।

कविता की ये पंक्तियॉ-

तुम तो कहते थे गाँधी बाबा अच्छे हैं/वे पढ़ने लिखने की कैसे बात कहेंगे/मैं तो नहीं पढूँगी।

हमारे मन में एक प्रश्‍न और पैदा करती हैं जिसकी ओर शायद कम ध्यान दिया गया है कि हमारी शिक्षा में ऐसा क्या है जिसके कारण बच्चे उससे दूर भागते हैं? आज से पचास साल पूर्व ही नहीं आज भी पढ़ने-लिखने के प्रति बच्चों के मन में बोझ का भाव दिखाई देता है। बच्चे स्कूल जाने के नाम पर आज भी प्रसन्न नहीं दिखाई देते। उन्हें यातना शिविर की तरह लगता है स्कूल। स्कूल को जाते समय होने लगता है पेट में दर्द। स्कूल सारी इच्छाओं के विरूद्ध सख्त इमारत की तरह लगता है। आखिर हम पढ़ाई-लिखाई के प्रति बच्चों में रुचि और आनंद क्यों नहीं पैदा कर पाये ? वह चम्पा जिसे इस बात पर आश्‍चर्य होता है कि इन काले चिह्नों से कैसे ये सब स्वर/निकला करते हैं, अर्थात जिसके भीतर अपार जिज्ञासा है, वही पढ़ने-लिखने से दूर क्यों भागती है? इसका एक कारण कहीं यह तो नहीं कि हमने शिक्षा को आनंद का माध्यम न बनाकर उसे कुछ ऐसे छोटे-मोटे लाभों की प्राप्ति का साधन बना दिया है-

ब्याह तुम्हारा होगा, तुम गौने जाओगी,
कुछ दिन बालम संग साथ रह चला जाएगा जब
कलकत्ता
बड़ी दूर है वह कलकत्ता
कैसे उसके पत्र पढ़ोगी
चम्पा पढ़ लेना अच्छा है!

बच्चा तो आनंद के लिये सब कुछ करता है। इस तरह के तर्कों का बच्चों के लिये कोई विशेष महत्व भी नहीं होता है। वह चम्पा की तरह के ही उत्तर देगा-

मैं तो ब्याह कभी न करूँगी
और कहीं जो ब्याह हो गया
तो मैं अपने बालम को संग साथ रखूँगी।

इस तरह कब तक आखिर छोटे-मोटे लाभों का प्रलोभन देकर हम बच्चों को शिक्षा से जोड़ने का प्रयास करते रहेंगे तथा पढ़ाई के सच्चे आनंद से बच्चों को वंचित करते रहेंगे, यह यक्ष प्रश्‍न है? कविता इस ओर हमारा ध्यान खींचती है। साथ ही बताती है कि शिक्षा का आदर्श एक अच्छा इंसान बनाना है इसलिये तो पढ़े-लिखे व्यक्ति के झूठ बोलने पर भी आश्‍चर्य व्यक्त किया जाता है- हाय राम, तुम पढ़-लिख कर इतने झूठे हो। इस पंक्ति से लगता है कहीं न कहीं कवि शिक्षा में मूल्यों की बात करते हैं।

यह सुना जाता है कि त्रिलोचन को छोटे बच्चों से दोस्ती करने में कोई वक्त नहीं लगता था । बच्चों के बीच जल्दी घुल-मिल जाते थे। वह बात इस कविता में भी देखी जा सकती है । चम्पा का उनकी कलम चुरा लेना जब तक उसे ढूँढ़ कर लायें कागज गायब कर देना फिर उनसे तरह -तरह के सवाल पूछना बाबजूद इसके उनका बच्ची पर गुस्सा न होना और न ही तिलमिलाना, इस बात का प्रमाण है कि बच्चों से वह कितना स्नेह करते थे तथा बच्चे उनको अपने कितना करीब पाते थे। इस कविता में अपनी बात को कहने के लिये वह किसी वयस्क पात्र को भी चुन सकते थे पर उन्होंने एक बच्ची को ही चुना। ऐसा करना जहाँ कवि की बच्चों के प्रति रागात्मकता को प्रदर्शित करता है, वहीं कविता के सौंदर्य को और अधिक बढ़ा देता है। यह कहना असंगत नहीं होगा कि यह कविता पूँजीवाद पर चोट करने वाली कविता होने के साथ-साथ बच्चों के प्रति प्रेम की एक अद्भुत कविता भी है। कविता की ये पंक्तियाँ मन को छूने वाली हैं। यह वही लिख सकता है जिसे बच्चों की बालसुलभ क्रियाओं में आनंद आता है -

चम्पा अच्छी है
चंचल है
न ट ख ट भी है
कभी-कभी उधम करती है
कभी-कभी वह कलम चुरा लेती है
जैसे तैसे उसे ढूँढ़ कर जब लाता हूँ
पाता हूँ- अब क़ागज गायब
परेशान फिर हो जाता हूँ
चम्पा कहती हैः तुम कागद ही गोदा करते हो दिन भर
क्या यह काम बहुत अच्छा है
यह सुन कर मैं हँस देता हूँ
फिर चम्पा चुप हो जाती है।

यहाँ एक महत्वपूर्ण बात है, शायद कोई अन्य कवि रहा होता चम्पा जैसी चंचल, नटखट और उधम करने वाली लड़की के लिये सीधे-सीधे ‘शैतान’ शब्द का प्रयोग कर देता पर वह बहुत सतर्कता से शब्दों का चयन करते हैं- वह ‘चंचल’ कहते हैं, ‘नटखट’ कहते हैं पर शैतान नहीं । ये अनायास नहीं लगता बल्कि पूरी सम्‍वेदनशीलता से कवि ने ऐसा किया होगा । बच्चों के प्रति रागात्मकता रखने वाला कवि ही ऐसा कर सकता है। अन्यथा छोटी-मोटी शरारत में ही माता-पिता भी अपने बच्चों को ‘शैतान’ की उपाधि दे देते हैं।

यह कविता स्त्री चेतना की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण कविता है। एक ऐसे समाज में जहाँ यह मान्यता हो कि स्त्री को बचपन में पिता, युवावस्था में पति तथा बुढ़ापे में पुत्र के संरक्षण में रहना चाहिये वहाँ किसी चम्पा के मुँह से यह सुनना प्रीतिकर लगता है- मैं अपने बालम को संग-साथ रखूँगी/कलकत्ते मैं कभी न जाने दूँगी। चम्पा का यह कथन स्त्री के आत्मविश्‍वास और अधिकार भाव को प्रदर्शित करता है। इस अधिकार भाव के साथ चम्पा किसी आधुनिक बाला से कम नहीं लगती। यहाँ चम्पा कठपुतली सी प्रतीत नहीं होती है। पूरी कविता में चम्पा का चरित्र एक हाजिर जबाब, चुलबुली एवं स्वतंत्र चेता लड़की का है। आज से छः-सात दशक पूर्व जबकि लड़कियों में तमाम तरह के प्रतिबंध रहते थे- जोर से हँसना-बोलना भी उनके लिये गलत माना जाता था, तब चम्पा जैसी लड़की को कविता का विषय बनाना कवि का स्त्री-स्वतंत्रता के पक्ष में खड़ा होना है। यह कविता दूरस्थ जनपदों में रहने वाली स्त्री के जीवन, स्वभाव और नियति से हमारा परिचय कराती है। जैसा कि युवा आलोचक अरविंद त्रिपाठी इस कविता के सन्‍दर्भ में लिखते हैं,

‘‘यह कविता लोकजीवन में व्याप्त एक औसत भारतीय स्त्री की नियति का साक्षात्कार कराती है। इसीलिये सारी अल्हड़ता और सारे सौंदर्यबोध के बावजूद कविता में स्त्री नियति की उदासी छाई हुई है। इसलिये चम्पा एकवचन की स्त्री की नियति की कविता नहीं है, बल्कि बहुवचन की स्त्री की नियति का उदास साक्षात्कार है। आज भी हमारे आम घरों में चम्पायें अपनी नियति से जूझ रही हैं।’’

पूरी कविता में सम्‍वाद के दौरान चम्पा का कवि से बीस साबित होना भी यूँ ही नहीं लगता, बल्कि इसके पीछे भी कवि की सोची-समझी योजना लगती है। वह कहीं भी चम्पा को कमजोर नहीं दिखाना चाहता। जिस बिन्‍दु पर कवि कविता समाप्त करता है, वहाँ चम्पा उसे अनुत्तरित कर देती है। कवि और चम्पा के तर्क-वितर्क में चम्पा का हावी रहना बहुत अच्छा लगता है। यह कविता को असाधारण बना देता है। यह इस कविता की विशिष्टता है।

इस तरह यह कविता अपने प्रत्येक पाठ के बाद अलग-अलग भाव धरातलों पर कुछ नये-नये रूप में खुलती है। यह जनपदीय चेतना की कविता है जो पूँजीवादी समाज में चतुर्दिक व्याप्त अलगाव का निषेध या प्रतिकार करती है। यह कविता साधारण में असाधारण और सहज में जटिल का संधान करती है। जैसा कि प्रखर आलोचक डॉक्‍टर जीवन सिंह कहते हैं कि त्रिलोचन अंतर्वस्तु और भाषा दोनों स्तरों पर कविता के देशी साँचे को नहीं छोड़ते। वह अपनी जमीन को कभी नहीं भूलते । इस कविता में भी यह बात साफ-साफ देखी जा सकती है। कुल मिलाकर यह भारतीय जमीन में खड़े रहकर पश्‍चि‍मी आधुनिकता से टकराती एक कालजयी रचना है।