पत्तों के आँसू / अमिता नीरव

Gadya Kosh से
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सावन लगा तो नहीं था, लेकिन बारिश लगातार हो रही थी। मौसम की मेहरबानी और बेहद अस्त-व्यस्तता भरे 'लंबे' हफ्ते के बाद शांत और क्लांत मन... पूरी तरह से संडे का सामान था। ऐसे ही मौकों पर हम अपने आस-पास को नजर भरकर देख पाते हैं, जी पाते हैं। घर भर पर नजर मारते हुए ऐसे ही छत के गमलों पर नजर चली गई थी। वो बड़े-बड़े पत्तों वाला पौधा एकदम खिल और हरिया गया था। मौसम ने भी तो बड़ी दरियादिली दिखाई है ना...

'ये इनडोर प्लांट है ना...?'

'हाँ।'

'तो इसे तो ड्राइंग रूम में होना चाहिए...'

'वहाँ, ले चलते हैं।'

वो पौधा ड्राइंग रूम के कोने में आ पहुँचा था। मन उसे देख-देखकर मुग्ध हो रहा था। हफ्ते के व्यस्तता भरे दिनों में भी आते-जाते उस कोने को देखना खुश कर दिया करता था। सप्ताह की शुरुआत के दो दिन तो ऐसा मौका ही नहीं मिल पाया कि उसके करीब बैठा जा सके। इस बीच एक दिन जरूर उस पौधे के पास की जमीन बड़ी गीली-गीली-सी लगी। नजर उठाकर छत को देख लिया, कहीं ऐसा तो नहीं कि छत से पानी टपक रहा हो, आखिर महीने भर से लगातार हो रही बारिश को कोई भी सीमेंट कब तक सहन करेगी, लेकिन छत भी सूखी ही थी। फिर लगा कि शायद पास की खिड़की खुली रह गई हो, बौछारें भीतर आ गई हों...। अमूमन काम के दिनों में दिमाग इतने झंझटों में फँसा हुआ करता है कि घर की छोटी-मोटी चीजों पर ध्यान ही नहीं जाता। उसी शाम बाहर की तेज बारिश के बीच घर पहुँची तो सरप्राइजिंगली गर्मागर्म कॉफी का मग इंतजार कर रहा था। अपने कॉलेज के दिनों में कहीं पढ़-सुन लिया था कि कॉफी पीने से दिमाग का ग्रे मैटर कम हो जाता है और अंत में वो काम करना कम कर देता है। मेरे मामले में यूँ ही दिल हावी हुआ करता है, इसलिए कॉफी से दूरी बना ली थी, पसंद होने के बावजूद...। इसलिए जब बिना अपेक्षा के आपकी पसंद की कोई चीज मिल जाए तो इससे बड़ा सरप्राइज और क्या होगा? खैर तो कॉफी का कप था, विविध भारती पर पुरानी गजलों का कोई प्रोग्राम चल रहा था, बिजली गुल थी और बारिश मेहरबान...। कोने के उस पौधे के पास ही आसन जमा लिया था, गजल के बोल और बारिश की ताल... कुल मिलाकर अद्भुत समां था। अचानक बाँह पर पानी की बूँद आ गिरी। फिर से छत को देखा... आखिर ये पानी आया कहाँ से? खिड़की की तरफ भी नजर गई थी, उसके भी शीशे बंद थे। फिर सोचा वहम होगा। लेकिन थोड़ी देर बाद फिर वही। इस बार कोने वाले पौधे को गौर से देखा... उसके सबसे नीचे वाले पत्ते पर पानी जमा था... और तीन-चार पत्तों के नोक पर पानी की बूँद टपकने की तैयारी में थी... अरे, ये क्या? ये पौधा पानी छोड़ रहा है। जब इसे छत से ला रहे थे तो गमले में भरे पानी को भी निकाल दिया था, लेकिन हो सकता है कि मिट्टी में अब भी इतनी नमी हो कि अतिरिक्त पानी तने से गुजरकर पत्तों की नोक से डिस्चार्ज हो रहा हो...। इंटरनेट पर देखा तो इस पौधे को आम तौर पर एलिफेंट इयर या फिर Colocasia Esculenta के नाम से जाना जाता है।

कितना अद्भुत है ना प्रकृति का सिस्टम... अतिरिक्त कुछ भी अपने पास नहीं रखती है वह, जो कुछ भी उसके पास अतिरिक्त होता है, वो उसे ड्रेन कर देती है, डिस्चार्ज कर देती है। बारिश के पानी से भरा हुआ लॉन सामने पसरा नजर आया...। समझ आया कि प्रकृति का सारा संग्रहण हमारे लिए है... कुछ भी वो अपने लिए नहीं रखती है और फिर भी उसके संग्रहण की एक सीमा है। जाने विज्ञान का सच क्या है? लेकिन प्रकृति उतना ही ग्रहण करती है, जितने कि उसको जरूरत है... जितना वो संभाल पाती है। इतना ही नहीं, इंसान को छोड़कर बाकी जीव-जंतु भी... बल्कि तो इंसान के शरीर का भी सच इतना ही है... पेट भरने से ज्यादा इंसान खा नहीं सकता है... बस मन ही है जो नहीं भरता... किसी भी हाल में नहीं भरता है, ये होता है तो कुछ और चाहने लगता है, कुछ ओर हो जाता है तो और कुछ चाहने लगता है... और मिट्टी में मिलने तक यही चाहत बनी रहती है। चाहतों का बोझ लिए ही इंसान इस दुनिया से विदा हो जाता है... मरते हुए भी बोझ से छुटकारा नहीं होता... सवाल उठता है कि क्या हम कुछ सीखेंगे प्रकृति से...!