फ़ैलन के हिन्दुस्तानी-अंग्रेज़ी कोश की अहमियत / रविकान्त

Gadya Kosh से
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एस. डब्ल्यू. फ़ैलन के ऐतिहासिक कोश और उसकी प्रस्तावना और भूमिका में विन्यस्त शोध-प्रबंध की याद दिलाने के पीछे कोई नई बहस छेड़ने या किसी पुरानी को उधेड़ने का हमारा इरादा नहीं है। अब तक हम उन्नीछसवीं सदी के उत्तीरार्ध में हुए फ़ैलन से ज़ाहिरा तौर पर हर मामले में ज़्यामदा होशियार हो गए हैं: उत्तर-संरचनावादी दौर के हम बाशिंदों के पास भाषा की बड़ी सुलझी हुई समझ है, हम सत्ता से उसके रिश्ते को पहचानते हैं। बात-बात पर विखंडन पर आमादा हम-जैसों के लिए फ़ैलन का विमर्श तो क्रिकेट के अधुनातन बीस-बिसंगर (टी-20) खेल की गेंद-जैसा ठहरा। लोकभाषा के प्रति उनकी रूमानी प्रतिबद्धता के फ़ुल टॉस को हम मर्ज़ी-मुताबिक़ छक्का मारकर उड़ा सकते हैं; जागरण सखी और फ़ेमिना की मिश्र, हिंग्रेज़ी भाषा की संतान हम इस बात पर हँस ही सकते हैं कि फ़ैलन ने ज़नाने को शुद्ध भाषा का अभयारण्य बताया था, और वहीं से पहली बार, इतने सारे शब्द और मुहावरे उठाए थे। अब न वह अभयारण्य रहा न वह एकांत ज़नाना जहाँ भाषा अपने नितांत शुद्ध रूप में पायी जाती थी, जहाँ जाकर पुरुषों की भाषा भी नए सिरे से गढ़ी जाती थी। और फ़ैलन को भी शायद आज इस बात पर तोष होता कि महिलाएँ अब उतनी अलग-थलग नहीं हैं, जितनी तब थीं। क्योंकि वे आम तौर पर भाषा के जनवादीकरण की वकालत कर रहे थे।

पर क्या हमारे पास फ़ैलन के आवेश को सुनने और सहने की क़ुव्वत बच पाई है? अगर सुन-समझ लें तो भी कुछ कर पाएँगे क्या? अपने नवजागरण की ख़ुमार से प्रेरित हम जब छपाई क्रांति की शुरुआत में उनकी बातें नहीं समझ पाए तो अब क्या समझेंगे। उनके कोश को कूड़ेदान में डालकर हमने ऐसे-ऐसे कोश बनाए कि उनपर सरकारी कार्यालयों में पड़ी धूल उतनी ही मोटी हो गई होगी जितने मोटे वे ग्रंथ ख़ुद हैं। बेशक हमने उनको भी सर-आँखों पर लिया जिन्होंने फ़ैलन की संवेदना-भूमि पर साहित्य रचना की - रेणु और राही मासूम रज़ा अनायास याद आते हैं, पर इन्हें हमने 'आंचलिक' कोटे में डालकर अपनी मुख्यधारा का प्रवाह बनाए रखा। हिन्दी सिनेमा अवश्य गाहे-बगाहे अपने निराले अंदाज़ में अपनी ही तरह की लोकभाषाओं की नुमाइश लगाता रहा, पर हम तो रचनात्मक नैतिकता की चोटी पर विराजमान थे - हम अलग, आदर्श और विशिष्ट होना चाहते थे। सो हुए।

गाँवों से निकलकर हमने शहरों में पांडित्य के द्वीप बनाए, हिन्दी और उर्दू के अलग-अलग कैम्प बनाए, उन्हीं के आधार पर राष्ट्र बनाए और हिन्दुस्तानी नामक एक दरमियानी, पागल ज़बान सरहदों के ऐन बीच, नो-मैन्स लैंड में मारी गई। लेकिन प्रतीकात्मक तौर पर टोबा टेक सिंह जिस तरह अमर साबित हुआ, वैसे ही तमाम विपरीत परिस्थितियों के बीच इस बिचौलिया ज़बान की निरंतरता पर बाज़ लोगों को शायद हैरानी होती होगी। ख़ास तौर पर ऐसे लोगों को जो उसे अंतर्वस्तु-विहीन राजनीतिक स्टंट मानने के क़ायल रहे हैं: कि हिन्दुस्तानी तो विरासत और अंतर्वस्तु से मरहूम एक खोखला मुखौटा भर थी, जिसे पहले मनचले अंग्रेज़ों ने और फिर गांधी ने अपनी विक्षिप्तता में देश को पहनाने की असफल कोशिश की थी, कि हिन्दुस्तानी की बात करना दरअसल हिन्दी की दुनिया में पिछले दरवाज़े से उर्दू के दाख़िले की चालाक कोशिश ही है। और उर्दू के हक़ की बात करना तो ख़ैर 'बासी भात में ख़ुदा का साझा' माँगना है ही! विडंबना नहीं तो और क्या कहा जाए इसे कि जिस विमर्श में संस्कृत से रक्त का संबंध गाँठने के लिए ज़मीन-आसमान एक किया गया, उसमें अपने पड़ोस की, हमसफ़र भाषाओं-बोलियों से, तुलसी-नज़ीर-कबीर की वाणी से हरसंभव दूरी बनाई जाने के भरसक व्यायाम किए गए। शुद्धतावादी आधुनिकता के तत्वावधान में सुधार की ऐसी हवा चलाई गई, जिसमें जनभाषा की तकियाकलाम तथाकथित अश्लीलताओं की जगह हमने ख़ाली छोड़ देने का रिवाज चलाया। हमें तो लोगों की ज़बान को नए सिरे से गढ़ना था, भाषा के अपने प्रयोक्ताओं के नैसर्गिक पर्यावरण की परवाह कहाँ थी, हमने इसका भी लिहाज नहीं किया इस चक्कर में हमारी अभिव्यक्ति ठस्स हुई जा रही है।

बहरहाल, फ़ैलन ने ज़बान की रियाज़त के आधार पर हिन्दू-मुसलमान, शहर-गाँव, औरत-मर्द आदि में भेद नहीं किया। बेशक नज़ीर की हिन्दुस्तानी उनके लिए आदर्श है, पर शब्दं-प्रयोग के दृष्टांतों का चयन करने में भी वे नज़ीर की ही फ़राग़दिली दिखाते हुए ग़ालिब, मीर, सूर, तुलसी, कबीर इन सबके पास जाते हैं। सच तो यह है कि यह कोश उन्नीसवीं सदी के उत्तर भारत में प्रचलित हिन्दुस्तानी को उसकी समग्रता में पेश करने की कोशिश में अमूमन 1300 पन्नों में, निहायत पतले अक्षरों में भाषाई प्रयोग का विलक्षण रेंज दिखाने में सफल होता है। गद्य-पद्य और लोकोक्तियों की बेहतरीन बानगी से हमें दो-चार कराता है: यहाँ दोहे, कवित्त, चौपाइयाँ, शेर-ओ-शायरी, होली, चैता, बिरहा, ग़ज़ल, गीत, नज़्म, बुझौवल सब कुछ मौजूद हैं। और मुहावरों का इतना बड़ा ज़ख़ीरा तो शायद ही इससे पहले किसी ने इकट्ठा किया होगा। हम अगली सदी की तीसरी दहाई में छपी अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' की मुहावरों की किताब बोलचाल में फ़ैलन का असर साफ़ देख सकते हैं।

जिन मौलवियों व पंडितों को हरिऔध और फ़ैलन ललकारते हैं, वे बेशक आज भी ज़िन्दा हैं। फ़र्क़ इतना है कि उनकी अब चलने से रही। फ़ैलन की दूरंदेशी मानी जानी चाहिए कि उन्हें भरोसा था कि लोकभाषाओं का युग लौटेगा। ये दीगर बात है कि जिन औज़ारों पर उन्हें भरोसा था, उनके बल पर नहीं, बल्कि जिस डिजिटल क्रांति की हवा भी उन्हें नहीं हो सकती थी, उसके ज़रिए। तो उम्मीद बाक़ी है कि दुनिया वापस गाँव बन रही है, राष्ट्रेवाद की मध्यस्थता कमज़ोर पड़ रही है: लोग इतने सारे नवसंचार के औज़ारों का अहर्निश इस्तेमाल कर इतनी सारी सामग्री ख़ुद रोज़-ब-रोज़ परोस रहे हैं कि स्थानीय का वैश्विक बन जाना संभव लगता है। ज़ाहिर है कि अब भाषाएँ अपने पारंपरिक इलाक़ों तक महदूद नहीं रह जाएँगी। कुछ दूसरे मायनों में कह सकते हैं कि हम फिर से भाषाओं के बोली-दौर में जा रहे हैं। तकनीकी इतिहास के नज़रिए से देखें तो जिन भाषाओं से आधुनिकता के युग में छपाई क्रांति वाली बस छूट चुकी थी, या जिन्होंने राष्ट्रभाषा को मज़बूत करने के लिए अपनी पहचान का उत्सर्ग कर दिया था, अपने सांस्कृतिक दावे छोड़ दिए थे, उनकी वापसी का मौसम है। वैसे ही जैसे यह हिन्दी के अपने असुरक्षा-बोध से उबरने का दौर भी है,चूँकि चतुर्दिक उसका फैलाव हो रहा है। यह विस्तार परिमाण-भर का नहीं है। मसलन, सुकून मिलता है एफ़एम रेडियो सुनकर कि ओड़िसा या असम, कश्मीर या चेन्नई में बैठा संवाददाता जब अपने लहजे में हिन्दी की रपट आकाशवाणी को भेज रहा होता है तो कोई हिन्दी अधिकारी पहले उसकी हिन्दी को ठीक करना ज़रूरी नहीं समझता, उसे यथावत लाइव प्रसारण करने दिया जाता है। यानी हमने मान लिया है कि हिन्दी उसकी ज़बान भी है। इतना आत्मविश्वास पहले अंग्रेज़ी वालों में ही पाया जाता था।

यही आत्मविश्वास अंग्रेज़ी-भाषी फ़ैलन में रहा होगा कि उन्होंने आम लोगों से आमफ़हम शब्द लेकर ऐसे अद्भुत कोश का संकलन-संपादन किया। ग़ौरतलब है कि इसे छापते समय जहाँ उन्होंने अपने अंग्रेज़ प्रशिक्षुओं की ज़रूरतों का ज़्यादा ख़याल रखा, कि यह कोश अंतत: उन्हीं को संबोधित था, लिहाज़ा रोमन लिपि में ही आया। लेकिन हमने इसे गंभीरता से न लेकर अपना ही नुक़सान किया है। इसे उर्दू और हिन्दी दोनों में उपलब्ध होना ही चाहिए, क्योंकि यह दरमियानी लोक-भाषा का ज़िन्दादिल कोश है - और इसकी जोड़ का कोश हम आज तक नहीं बना पाए हैं, कि जिसे पढ़कर आपको साहित्य का आनंद आ जाए।


(मूलत: नया पथ, जुलाई-सितंबर, 2008 में प्रकाशित, फिर मुरली मनोहर प्रसद सिंह, आदि के संपादन में हिंदी-उर्दू साझा संस्कृति (नैशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली, 2011 में पुनर्प्रकाशित). कोश अंतर्जाल पर उपलब्ध है:

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