बाबु राम 'इशारा' / जयप्रकाश चौकसे

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बाबु राम 'इशारा'


हिमाचल प्रदेश के एक मध्यमवर्गीय ब्राह्मण परिवार मे ंजन्में रोशनला शर्मा को फिल्म निर्देशक बनने का जुनून था और कमसिन वय में वे मुंबई के एक स्टूडियो कैंटीन में काम करने लगे। ग्राहकों द्वारा बाबू के नाम से पुकारे जाने के कारण उन्होंने अपना नाम ही बाबू राम ‘इशारा’ कर लिया। केवल वे जानते थे उन्हें कौन इशारा करके अपनी ओर खींच रहा है। तीक्ष्ण बुद्धि होने के कारण फिल्म निर्माण को देखते-देखते वे विषय को समझने लगे। कलकत्ता से वर्षों पूर्व बिमल रॉय के साथ उनके विश्वस्थ असित सेन भी मुंबई आए थे और ताउम्र उनका साथ रहा। असित सेन ने ही युवा बाबूराम इशारा को अपने घर में आर्शय दिया। जहां नवेंदु घोष जैसे विलक्षण लोगों को सीखने का अवसर मिला।

बाबूराम इशारा ने ‘आवारा बादल’ और ‘इंसाफ का मंदिर’ लिखी तथा उनकी एक साहसी पटकथा को सुनकर कुछ मित्रों ने अल्प बजट की फिल्म के बजट जुटाया। बाबूराम इशारा ने पूना फिल्म संस्थान में विश्वनाथ आयंगर की डिप्लोमा फिल्म में बीस वर्षीया रेहाना सुल्तान को देखा। इस फिल्म् का नाम था ‘शादी की पहली सालगिरह’। पूना फिल्म संस्थान में प्रशिक्षित रेहाना सुल्तान पहली छात्रा थी, जिसे दो फिल्मों के लिए अनुबंधित किया गया। ईशारा की ‘चेतना’ और रजिंद्र सिंह बेदी की ‘दस्तक’। ‘चेतना’ वह पहली फिल्म थी, जिसकी शूटिंग स्टूडियो के बदले जुहू के एक बंगले में की गई और महज 28 दिनों की शूटिंग में बनने वाली लघु बजट की ‘चेतना’ की सफलता के कारण अल्प बजट की सोद्देश्य फिल्मों का दौर शुरू हुआ। यद्यपि भारतीय सिनेमा में इस तरह का साहसी और सोद्देश्य फिल्में हर दौर में बनती रहीं। मसलन शांताराम की ‘दुनिया न माने’ (1937) , ‘मेहबूब की रोटी’ (1941), चेतन आनंद की ‘नीचा नगर’ से लेकर सथ्यु की ‘गर्म हवा’ (1973), गोविंद निहलानी की ‘अर्धसत्य’ (1987) से लेकर ‘वेडनेसडे’, ‘कहानी’, ‘पान सिंह तोमर’ इत्यादि फिल्मों तक यह दौर कायम रहा और हमेशा रहेगा।

बाबूराम इशारा ने रीना राय को लेकर ‘जरूरत’ बनाई। परवीन बॉबी और सलीम दुर्रानी और शत्रुघ्न सिन्हा को भी अवसर दिया तथा अमिताभ बच्चन के साथ भी उनके संघर्ष के दौर में ‘एक नजर’ बनाई। नये कलाकार और नई कहानियां उनका मिशन था। उन्होंने शबाना आजमी के साथ 1982 में ‘लोग क्या कहेंगे’ बनाई। प्राय: लोग इस विचार से भयभीत रहते हैं कि अन्य लोग क्या कहेंगे और इसी पर निर्मम प्रहार थी यह फिल्म। यह सच है कि प्राय: हम अन्य की कसौटियों पर खरा उतरने की चाह में अपना जीवन अपने ढंग से जी ही नहीं पाते और इसी सामाजिक भय के कारण केवल अपनी मौत करने की स्वतंत्रता हमें रहती है।

पचास वर्ष के ये और रेहाना चौंतीस की थीं। इस विवाह की चर्चा वैसी नहीं हुई आर.के नैयर और साधना की हुई थी, क्योंकि दोनों ही सादगी पसंद, शांत स्वभाव के लोग थे। उन्होंने इसे विवाद के कारण भी प्रचार से बचाया। यह एक ब्राह्मण और मुसलिम का विवाह था, परंतु सच तो यह है कि यह दो समान विचारों वालों वयस्कों का मिलन था। प्रेम का विरोध कुछ लोगों का पेशा इसीलिए है कि प्रेम दिमाग और आत्मा को रोशन करता है और प्रेमियों को जन्म की सतह से ऊपर उठाता है।

बाबूराम ईशारा की मृत्यु 25 जुलाई 2012 को हुई और उनकी लंबी बीमारी में रेहाना ने उनकी सेवा की तथा उसके दो भाइयों ने अपने हिंदू जीजा का अस्पताल का खर्च उठाया। इतना ही नहीं रेहाना के दोनों भाइयों ने बाबूराम ईशारा की अंतिम यात्रा की व्यवस्था भी की और मंत्रोचार के साथ उन्हें अग्नि में सर्मपित करना का सारा इंतजाम भी किया। भारत की गंगा-जमुना संस्कृति की जड़ें बहुत गहरी हैं।

बाबूराम इशारा ने ‘आवारा बादल’ और ‘इंसाफ का मंदिर’ लिखी तथा उनकी एक साहसी पटकथा को सुनकर कुछ मित्रों ने अल्प बजट की फिल्म के बजट जुटाया। बाबूराम इशारा ने पूना फिल्म संस्थान में विश्वनाथ आयंगर की डिप्लोमा फिल्म में बीस वर्षीया रेहाना सुल्तान को देखा। इस फिल्म् का नाम था ‘शादी की पहली सालगिरह’। पूना फिल्म संस्थान में प्रशिक्षित रेहाना सुल्तान पहली छात्रा थी, जिसे दो फिल्मों के लिए अनुबंधित किया गया। ईशारा की ‘चेतना’ और रजिंद्र सिंह बेदी की ‘दस्तक’। ‘चेतना’ वह पहली फिल्म थी, जिसकी शूटिंग स्टूडियो के बदले जुहू के एक बंगले में की गई और महज 28 दिनों की शूटिंग में बनने वाली लघु बजट की ‘चेतना’ की सफलता के कारण अल्प बजट की सोद्देश्य फिल्मों का दौर शुरू हुआ। यद्यपि भारतीय सिनेमा में इस तरह का साहसी और सोद्देश्य फिल्में हर दौर में बनती रहीं। मसलन शांताराम की ‘दुनिया न माने’ (1937) , ‘मेहबूब की रोटी’ (1941), चेतन आनंद की ‘नीचा नगर’ से लेकर सथ्यु की ‘गर्म हवा’ (1973), गोविंद निहलानी की ‘अर्धसत्य’ (1987) से लेकर ‘वेडनेसडे’, ‘कहानी’, ‘पान सिंह तोमर’ इत्यादि फिल्मों तक यह दौर कायम रहा और हमेशा रहेगा।

बाबूराम इशारा ने रीना राय को लेकर ‘जरूरत’ बनाई। परवीन बॉबी और सलीम दुर्रानी और शत्रुघ्न सिन्हा को भी अवसर दिया तथा अमिताभ बच्चन के साथ भी उनके संघर्ष के दौर में ‘एक नजर’ बनाई। नये कलाकार और नई कहानियां उनका मिशन था। उन्होंने शबाना आजमी के साथ 1982 में ‘लोग क्या कहेंगे’ बनाई। प्राय: लोग इस विचार से भयभीत रहते हैं कि अन्य लोग क्या कहेंगे और इसी पर निर्मम प्रहार थी यह फिल्म। यह सच है कि प्राय: हम अन्य की कसौटियों पर खरा उतरने की चाह में अपना जीवन अपने ढंग से जी ही नहीं पाते और इसी सामाजिक भय के कारण केवल अपनी मौत करने की स्वतंत्रता हमें रहती है।

पचास वर्ष के ये और रेहाना चौंतीस की थीं। इस विवाह की चर्चा वैसी नहीं हुई आर.के नैयर और साधना की हुई थी, क्योंकि दोनों ही सादगी पसंद, शांत स्वभाव के लोग थे। उन्होंने इसे विवाद के कारण भी प्रचार से बचाया। यह एक ब्राह्मण और मुसलिम का विवाह था, परंतु सच तो यह है कि यह दो समान विचारों वालों वयस्कों का मिलन था। प्रेम का विरोध कुछ लोगों का पेशा इसीलिए है कि प्रेम दिमाग और आत्मा को रोशन करता है और प्रेमियों को जन्म की सतह से ऊपर उठाता है।

बाबूराम ईशारा की मृत्यु 25 जुलाई 2012 को हुई और उनकी लंबी बीमारी में रेहाना ने उनकी सेवा की तथा उसके दो भाइयों ने अपने हिंदू जीजा का अस्पताल का खर्च उठाया। इतना ही नहीं रेहाना के दोनों भाइयों ने बाबूराम ईशारा की अंतिम यात्रा की व्यवस्था भी की और मंत्रोचार के साथ उन्हें अग्नि में सर्मपित करना का सारा इंतजाम भी किया। भारत की गंगा-जमुना संस्कृति की जड़ें बहुत गहरी हैं