भारत : थीमपार्क की तरह संरचना / जयप्रकाश चौकसे

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भारत : थीमपार्क की तरह संरचना
प्रकाशन तिथि :08 अप्रैल 2017


दक्षिण भारत में मनोरंजन जगत के अजूबे 'बाहुबली' की लोकप्रियता का लाभ लेते हुए अब 'बाहुबली थीम पार्क' की शृंखला चेन्नई, बेंगलुरू, हैदराबाद, नई दिल्ली इत्यादि शहरों में बनाने की योजना पर काम हो रहा है। थीम पार्क में भांति-भांति के मनोरंजन गढ़े जाते हैं और जल क्रीड़ा भी रची जाती है। वॉल्ट डिज़्नी ने 1921 में फिल्म निर्माण प्रारंभ किया और सितारों की सनक से खिन्न होकर उन्होंने एनिमेशन फिल्में बनानी शरू की। 1928 के आसपास हॉलीवुड में 'जॉर्ज सिंगर' नामक पहली सवाक फिल्म बनी थी। मूक फिल्मों का दौर भारत में 1931 तक चला तथा पहली सवाक फिल्म 'आलम आरा' बनी। बाद में बनी 'इंद्रसभा' में 71 गीत थे। वॉल्ट डिज़्नी ने एनिमेशन फिल्में बनाने के साथ ही 'डिज़्नी थीम पार्क' भी बनाया। उन्होंने डिज़्नी थीम पार्क की शृंखला रची और कुछ वर्ष पूर्व उन्हें लगा कि भारत में हजार-दो हजार का टिकट खरीदकर थीम पार्क जाने वाले लोगों की संख्या अधिक नहीं होगी और चीन में देशज सहयोग से थीम पार्क बनाया।

भारत के मनमोहन शेट्‌टी को यह बात बुरी लगी कि उन्होंने भारतीय दर्शक की क्षमता कमतर आंकी। अत: सात वर्ष तक परिश्रम करके उन्होंने मुंबई से 80 किलोमीटर दूर भारत का पहला थीम पार्क बनाया। इसके लिए उन्होंने अमेरिकी कंपनी डिज़्नी से कोई सहायता नहीं ली और अपने पार्क के लिए जर्मनी से टेक्नोलॉजी आयात की और अनेक आइटम भारत के इंजीनियरों ने ही बनाए। 'बाहुबली' का दूसरा भाग अप्रैल में प्रदर्शित होगा, जिसमें दर्शकों को जवाब मिलागा कि कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा।

'बाहुबली' की बॉक्स ऑफिस सफलता सामाजिक सार्थकता के सिनेमा को नष्ट कर देगी। दरअसल, 'बाहुबली' का सारा दारोमदार टेक्नोलॉजी पर है और भव्यता गढ़कर उन्होंने दर्शक को अंचभित कर दिया। दरअसल, दक्षिण भारत के व्यावसायिक सिनेमा में भव्यता को बहुत महत्व दिया जाता है। स्वतंत्रता प्राप्त करने के तीन वर्ष पश्चात ही 'चंद्रलेखा' बनी थी, जिसमें तलवारबाजी के दृश्य थे। यह भी गौरतलब है कि दक्षिण में ही कॉमिक्स का प्रकाशन शुरू हुआ था। 'बाहुबली' कॉमिक्स का ही फिल्म रूपांतरण है। इस तरह की फिल्में तर्क पर सीधा आक्रमण करती हैं। याद आता है कि देवकीनंदन खत्री ने 'चंद्रकांता' व 'भूतनाथ' नामक उपन्यास लिखे थे, जिनमें जासूस को अय्यार का नाम दिया परंतु अंतर यह है कि जासूस दाढ़ी लगाकर, वेशभुषा में परिवर्तन करके रहस्य जानने का प्रयास है, जबकि अय्यार अपने पूरे व्यक्तित्व में ही आमूल परिवर्तन कर लेता है। शायरी में निदा फाज़ली पहले शायर हैं, जिन्होंने अय्यार शब्द का इस्तेमाल इस तरह किया, 'औरों जैसे होकर भी बाइज्जत हैं बस्ती में, कुछ तो लोगों का सीधापन है, कुछ अपनी अय्यारी भी, जीवन जीना सहज नहीं, यह है फनकारी भी।' विगत कुछ समय से अय्यार राजनीति में प्रवेश कर चुके हैं और हमें मुंशी प्रेमचंद, शरदचंद्र, टैगोर, सआदत हसन मंटो और कृश्नचंदर से दूर ले जाकर बाबू देवकीनंदन खत्री के मायावी संसार में ले जाने का प्रयास हो रहा है। हमारा अवाम इसके लिए हमेशा से आतुर रहा है, केवल कुछ विलक्षण प्रतिभा वाले नेताओं ने भारत को आधुनिकता में प्रवेश कराने का प्रयास किया था। अब तो राजनीति मिथ मैकर्स के हाथ चली गई है।

कई दशक पूर्व एक हॉलीवुड फिल्म का कथासार कुछ इस तरह है कि एक कंपनी प्रचार करती है कि यथेष्ठ धन देने पर वह मनुष्य को अन्य उपग्रह की सैर कराएगी और उनकी वापसी सुनिश्चित होगी। केवल अन्य ग्रह पर रहने का अनुभव उन्हें थ्रिल देगा। अनेक लोगों ने आवेदन दिया। उन्हें कई घंटे तक एक मशीन पर बैठाकर परदे पर दृश्य दिखाए जाते थे। उनका कार्यक्रम ऐसा गढ़ा गया था कि वे मनुष्य के अवचेतन में यह बात सत्य की तरह बैठा देते थे कि वह अन्य ग्रह पर विचरण कर रहा है। इस भ्रम को रचने के लिए उन्होंने नशीली दवाओं का प्रयोग भी किया। सारा खेल बहुत मेहनत से रचा गया था। रॉबर्ट नोलन ने अवचेतन में घुसपैठ पर कथा फिल्म बनाई थी। इस फिल्म के प्रदर्शन के बाद कुछ विज्ञापन भी प्रकाशित हुए कि उन्य ग्रहों पर अपने प्लॉट का आरक्षण किया जा सकता है। हमारे देश में यही काम सदियों से हो रहा है कि फलां फलां उपवास व मंत्र उच्चारण से स्वर्ग में स्थान मिल कता है। देश के कोने-कोने से लोग बनारस आते हैं, क्योंकि बनारस में प्राण तजने वाला स्वर्ग ही जाता है। 'स्वर्ग' का पासपोर्ट दफ्तर बनारस में है। शीघ्र ही अवाम को विश्वास दिला दिया जाएगा कि देश स्वर्ग के समान हो गया है और आप जीवित होते हुए भी 'स्वर्गवासी' का आत्मानंद पाएंगे। मोक्ष अवधारणा भी किलो के भाव से बेची जाएगी।