भूमिका / ब्राह्मण समाज की स्थिति / सहजानन्द सरस्वती

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भूमिका

श्रीहरि:

विद्या तपश्‍च योनिश्‍च एतद् (त्रयं) ब्राह्मणकारकम्।
विद्यातपोभ्यां यो हीनो जातिब्राह्मण एव स:॥

महाभाष्यम् 5-1-115

इसमें संशय नहीं कि भारत का अध:पात जैसा इस समय हो गया है वैसा 'न भूतो न भविष्यति'। इसमें भी संदेह नहीं कि जिन भारतीयों के हृदय में कुछ भी मनुष्यता की मात्रा रह गई है उन्हें इस दशा के स्मरणमात्र से ही वेदना होती है। यह भी निर्विवाद है कि इसका कुछ न कुछ कारण अवश्य ही है। अब केवल यही प्रश्‍न रह गया है कि वह कारण कौन सा है; क्योंकि निदानज्ञान बिना रोग की यथार्थ औषधि हो ही नहीं सकती। यह प्रश्‍न विवादग्रस्त है। इसका उत्तर 'रुचीनां वैचित्र्यात्' के अनुसार लोग भिन्न-भिन्न दिया करते हैं। हमें यहाँ पर उन सभी उत्तरों की आलोचना करनी नहीं है, वरन केवल यही कहना है कि चाहे जो भी इसके कारण हों उन सभी का अधिकांश उत्तरदायित्व हिंदू समाज के मत्थे है। हिंदू समाज इस अवनति की जवाबदेही से बच नहीं सकता। ऐसी दशा में इस समाज को आँखें खोल कर देखना चाहिए कि इसने कौन सा ऐसा महापातक किया है, या कर रहा है, जिससे एक तो उसके फलस्वरूप महादु:खदावानल में दग्ध होना पड़ रहा है और दूसरे उसके लिए अपराधी भी स्वयमेव बनना पड़ रहा है। निस्संदेह वह साधारण पाप नहीं हो सकता जिसके फल से 33 कोटि प्रजा के कष्ट का अन्त नहीं है। थोड़ा सा विचार करने पर विदित हो जावेगा कि हिंदुओं के सामाजिक संगठन और बंधन के बेतरह अनुचित रूप से ढीले पड़ जाने के कारण ही यह सब दुर्दशा हो रही है और इस ढीलेपन के लिए सोलहों आने उत्तरदाता केवल ब्राह्मण समाज है। हिंदुओं के समाज का संगठन ऐसा है कि उसमें ब्राह्मणों की प्रधानता कई रूपों में है, कम से कम तिहरे ताले के भीतर ब्राह्मणों ने हिंदू समाज को बंद कर रखा है। प्रथम तो पुरोहित के रूप में अपना अधिकार बनाया है, फिर गुरु के आकार में और अन्त में व्यास बन कर। यदि कोई एक से कथमपि बच भी गया तो दूसरे से नहीं और तीसरे से बच ही नहीं सकता! वस्तुत: तो यह त्रिगुण घेरा ही सर्वव्यापी है। इसके अतिरिक्‍त बहुत से स्थानों में राजा, मन्त्री और जमींदार के रूप में भी वही तिहरा घेरा है। पर हाँ, इसका प्रभाव सामाजिक दृष्टि से उतना नहीं है जितना पहले का। अतएव उत्तरदायित्व भी उसी प्रकार न्यूनाधिक है। जब इस प्रकार बलवती प्रधानता जमी हुई है तो फिर क्या हिंदूसमाज के सत्यानाश या गर्तपात के लिए प्रधान ही जवाबदेह न होगा? ड्राइवर, गार्ड तथा प्वाइंट्समैन ही ट्रेनों के लड़ने या टूटने के उत्तरदाता नहीं होंगे तो फिर होगा कौन? जहाज डूब गया परंतु कप्तान और माझी निरपराधा! तो क्या कोई यह भी कहने को तैयार है कि वह पूर्व प्रदर्शित तिरंगी प्रधानता वास्तव में झूठी है? यदि कोई धृष्टतावश कहे भी तो क्या यह बात किसी को मान्य होगी? चाहे कोई कुछ भी कहे, पर हिंदू समाज का संगठन डंके की चोट कह रहा है कि हजार उपाय कर लो सही, लेकिन जब तक विविध रूप में प्रधानता जमा कर बैठा हुआ ब्राह्मण समाज न सुधरेगा - कर्तव्यपरायण बनकर अपने अधिकार को समझता हुआ उसका दुरुपयोग न रोकेगा - तब तक हिंदुओं और हिंदुस्तान की वास्तविक तथा चिरस्थायिनी उन्नति का होना असंभव-सा ही समझो! आप कुछ भी समझाइए और सिखलाइए, पर उन प्रधानों के सामने वह 'नक्कारखाने में तूती की आवाज' ही हो जाती है। कुछ इने-गिने पुरुषरत्‍नों को छोड़ शेष ब्राह्मण समाज की नादिरशाही हिंदुस्तान में चल रही है। इसमें जरा भी अत्युक्‍ति नहीं है। और तो और, इस प्रधानता के मद में उस समाज ने अपने ही समाज की परस्पर घोर दुर्दशा कर रखी है। फिर इतर समाज की बात ही क्या?

इतने बड़े अपराधों को करता हुआ ब्राह्मण समाज बड़ी-बड़ी डींगें मारता है और समझता है कि हमारे सामने कोई है ही नहीं। इस पुस्तिका के लिखने का एक मात्र तात्पर्य यही है कि ब्राह्मण मात्र को उनकी सामाजिक स्थिति का यथार्थ ज्ञान कराकर उनके अधिकार उन्हें सुझा दिए जाएँ, और यह भी बता दिया जावे कि उन अधिकारों के सदुपयोग तथा दुरुपयोग से उनके और देश को क्या हानि-लाभ हो रहा है और आगे होगा। इस लेख का यह भी एक मुख्य प्रयोजन है कि जिन ब्राह्मणेतर जातियों को ब्राह्मणों की सामाजिक दशा का प्राय: पूरा पता नहीं है वह भी उसके जानकार बन उस ज्ञान से लाभ उठावें।