मनोविकारों का विकास / साहित्य शास्त्र / रामचन्द्र शुक्ल

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मूल तत्व् की दोरंगी झलक का नाम व्यक्तावस्था है। यदि दु:ख के बिना सुख है तो यह अव्यक्त है। जीव अपने अस्तित्व की घोषणा द्वंद्वाभास ही से आरंभ करता है। उच्च प्राणी कहलानेवाला मनुष्य भी भावों की एक जोड़ी लेकर धरती पर गिरता है। उसके छोटे से हृदय में पहले दु:ख और आनंद भर ही के लिए जगह रहती है। ये मनोवेग ऐसे हैं जो मनुष्य यदि जन्म से स्ववर्गियों से अलग रखा जाय तो भी उत्पन्न होंगे। पेट के भरे रहने या खाली रहने के अनुभव ही से इनका आरंभ होता है। इन उद्वेगों के लिए दूसरे व्यक्तियों के साथ की अपेक्षा नहीं। जीवनारंभ में इन्ही दोनों के चिद्द हँसना और रोना देखे जाते हैं। यह न समझना चाहिए कि और प्रकार के भाव भी शिशु के हृदय में उमड़ते हैं पर वह उनका बोध नहीं करा सकता। प्रकृति इतना अन्याय कभी नहीं कर सकती। बच्चे के हृदय में उसी रूप में भाव उत्पन्न होते हैं जिस रूप में वह व्यंजित करता है। यह बात इस विचार से प्रत्यक्ष हो जाएगी कि इन्हीं दोनों मनोवेगों से क्रमश: और दूसरे मनोवेगों की उत्पत्ति और विकास होता है। सब मनोवेग दु:ख और आनंद ही के सामाजिक विकार हैं। दु:ख ही के गर्भ में क्रोध, भय, करुणा, घृणा और ईर्ष्याा आदि के भाव रहते हैं जो आगे चलकर समाज के साथ संबंध बढ़ने और शरीर के साथ साथ मनसिक शक्तियों के पुष्ट और प्रशस्त होने पर पृथक् पृथक् रूप में प्रकट होने लगते हैं। जैसे यदि शरीर में कहीं सुई चुभने की पीड़ा हो तो केवल दु:ख होगा। पर यदि यह ज्ञान हो जाय कि सुई चुभानेवाला कोई दूसरा व्यक्ति है तो दु:ख अनष्टि वा प्रतिकार की प्रबल इच्छा से मिश्रित हो जाएगा और क्रोध कहलावेगा। जिस शिशु को पहले अपने ही दु:ख का ज्ञान होता था बढ़ने पर उसे अनुमन द्वारा औरों का क्लेश देखकर भी दु:ख होने लगता है जिसे हम करुणा वा दया कहते हैं। इसी प्रकार अज्ञान वा जिस पर अपना वश न हो ऐसे कारण से पहुँचनेवाले भावी अनिष्ट के निश्चय से जो दु:ख होता है वह भय कहलाता है। शिशु को जिसे यह निश्चयात्मक बुद्धि नहीं होती भय बिलकुल नहीं होता। यहाँ तक कि उसे मारने के लिए हाथ उठाएँ तो वह विचलित न होगा क्योंकि वह यह नहीं निश्चय कर सकता कि इस हाथ उठाने का परिणाम दु:ख होगा।

इसी प्रकार जैसे जैसे संबंध, काल, मात्रा और स्थान आदि का ज्ञान और विवेक शिशु में होता जाता है वैसे ही वैसे उसी आनंद से संतोष, प्रसन्नता, उत्साह, प्रेम, लोभ, आदि फूट फूट कर निकलने लगते हैं। जिस प्रकार दु:ख पहुँचानेवाले का ज्ञान होने पर हमें क्रोध होता है उसी प्रकार जिससे आनंद मिला है उसका ज्ञान होने पर हम उस पर प्रसन्न होते हैं और उसे भी प्रसन्न करना चाहते हैं। जो बात हम जैसी चाहते हैं यदि किसी से वैसी ही बन पड़ी तो हमें संतोष होता है। यदि उससे बढ़कर हुई तो हमें प्रसन्नता होती है। इसी प्रकार आनेवाले सुख को सोचकर हमें उत्साह होता है और उसके निमित्त हम किसी कार्य में प्रवृत्त होते हैं। प्रकृति को मनुष्य से काम कराना मंजूर रहता है इसी से सुख के अनुभव की अपेक्षा भावी सुख की आशा बहुत बलवती होती है। संतोष और प्रसन्नता की अपेक्षा उत्साह में कहीं अधिक क्रियोत्पादिनी शक्ति होती है। कोई किसी पर संतुष्ट वा प्रसन्न होगा तो बहुत करेगा उसे कुछ दे दिला देगा पर यदि वह भावी आनंद के अनुमन से उत्साहित होगा तो कोसों पैदल चलेगा, नदी नाले पार करेगा और रात रात भर जागेगा। लोग कहते हैं कि जब हमारा काम हो जाएगा तब तुम्हें इतना देंगे पर जब वह काम हो जाता है तब देने का जी नहीं करता। इसी से कहा गया है कि Man never is but will be happy अर्थात मनुष्य सुखी नहीं है पर सुखी होगा। किसी पर प्रसन्न होकर फिर उसे प्रसन्न करने के लिए जिस भाव की प्रेरणा से हम अनेक प्रकार के आयोजन करते हैं और श्रम उठाते हैं वह भी उत्साह ही कहलाता है क्योंकि उसे प्रसन्न देखकर हमें जो संतोष होगा उसी की चाह से हम दौड़धूप करते हैं। देशोपकारियों के आगमन पर जो उत्साह दिखाया जाता है वह इसी प्रकार का है।

जिससे हमें बराबर किसी प्रकार का सुख मिलता है वा एकबारगी अत्यंत सुख मिलता है उसका ज्ञान होने पर उससे हमें प्रेम हो जाता है अर्थात उसके सामीप्य की एक स्थायी इच्छा जिसे हम एक प्रकार का लोभ कह सकते हैं चित्त में स्थान कर लेती है जो अभाव में बड़ा उग्र रूप धारण करती है। शिशु अपनी माता का दूध पी पी कर सुखी होता है और उससे प्रेम करता है। युवक किसी युवती के रूप गुण आदि को देख कर एकबारगी आनंदित हो उठता है और उसका अत्यंत सान्निधय चाहता है। इसी से कवि लोग ऐसे प्रेम को 'रूप का लोभ' भी कहते हैं। इधर उधर सुनाई भी पड़ता है कि 'वे उसके रूप पर लुभा गए'।

संसार में दु:ख की निवृत्ति की अधिक और चटपट आवश्यकता होती है इसी से उसका इतना स्पष्ट विश्लेषण हुआ है। आनंद के इतने स्पष्ट विभाग नहीं हुए हैं। संतोष, प्रसन्नता, उत्साह आदि के अनुभव प्राय: एक ही से जान पड़ते हैं। उनमें इतना भेद नहीं जान पड़ता जितना क्रोध, भय, करुणा, घृणा, ईर्ष्यान आदि में परस्पर मालूम होता है। इससे यह अनुमन होता है कि संसार में जितने रूपों में दु:ख की निवृत्ति की आवश्यकता पड़ती है उतने रूपों में प्राप्त सुख के उपभोग की नहीं। प्रकृति या नियामक आत्मा संसार मे जीवों के लिए कठिनाइयाँ अधिक समझती है इसी से उसने उनको दूर करने के लिए अधिक उग्र उपाय रखे हैं। सारांश यह कि सजीवता दु:ख निवृत्ति के लिए छटपटाने ही का नाम है, पड़े पड़े आनंद के चसक लेने का नहीं।

मनुष्य जिस समय होश सँभाल कर समाज में प्रवेश करता है वह अपने आनंद और दु:ख के बहुत से अंशों को क्रिया और दशा पर अवलंबित कर अपने जीवन को अधिक विस्तृत और व्यापक बनाता है। इस व्यापकत्व के लिए लालायित होना आत्मा का गुण है। समाज के संसर्ग से ही दु:ख और आनंद के अनेक मनोविकारों की सृष्टि होती है। क्रोध, करुणा, ईर्ष्याे, राग आदि के आधार के लिए दूसरे प्राणियों और वस्तुओं की अपेक्षा होती है।

दु:ख से निकले हुए मनोविकारों की ओर ध्यान देते हुए पहले हम उनको लेते हैं जो दु:ख से अपनी रक्षा के हेतु रखे गए हैं, जैसे-क्रोध और भय।


क्रोध

क्रोध दु:ख के कारण के साक्षात्कार वा अनुमन से उत्पन्न होता है। साक्षात्कार से मेरा अभिप्राय केवल इंद्रियों पर संघात से नहीं बल्कि दु:ख और उसके कारण के संबंध के परिज्ञान से है। जैसे 3-4 महीने के बच्चे को कोई हाथ उठाकर मार दे तो उसने हाथ उठाते तो देखा है पर अपनी पीड़ा और उस हाथ उठाने से क्या संबंध है यह वह नहीं जानता है। अत: वह केवल रोकर अपना दु:ख मात्र प्रकट कर देता है। दु:ख के कारण के साक्षात्कार के निश्चय के बिना क्रोध का उदय नहीं हो सकता। दु:ख के हेतु पर प्रबल प्रभाव डालने में प्रवृत्त करने की मनसिक क्रिया होने के कारण क्रोध का आविर्भाव बहुत पहले देखा जाता है। शिशु अपनी माता की आकृति से अभ्यस्त हो ज्यों ही यह जान जाता है कि दूध इसी से मिलता है, भूखा होने पर वह उसकी आहट या रोने में कुछ क्रोध के चिद्द दिखाने लगता है।

सामाजिक जीवन के लिए क्रोध की बड़ी आवश्यकता है। यदि क्रोध न हो तो जीव बहुत से दु:खों की चिर निवृत्ति के लिए यत्न ही न करे। कोई मनुष्य किसी दुष्ट के नित्य दो चार प्रहार सहता है। यदि उसमें क्रोध का विकास नहीं हुआ है तो वह केवल आह ऊह करेगा जिसका उस दुष्ट पर कोई प्रभाव नहीं। उस दुष्ट के हृदय में दया आदि उत्पन्न करने में बड़ी देर लगेगी। प्रकृति किसी को इतना समय ऐसे छोटे छोटे कामों के लिए नहीं दे सकती। भय के द्वारा भी प्राणी अपनी रक्षा करता है पर समाज में इस प्रकार की दु:ख निवृत्ति चिर स्थायिनी नहीं होती। मेरे कहने का यह अभिप्राय नहीं कि क्रोध के समय क्रोधकर्ता के हृदय में भावी दु:ख से बचने या औरों को बचाने की इच्छा ही रहती है बल्कि प्रकृति ने क्रोध को इसी अभिप्राय से रखा है।

ऊपर कहा जा चुका है कि क्रोध दु:ख के कारण के परिज्ञान या साक्षात्कार से होता है। अत: एक तो जहाँ इस ज्ञान में त्रुटि हुई वहाँ क्रोध धोखा देता है। दूसरी बात यह है कि क्रोध जिस ओर से दु:ख आता है उसी ओर देखता है अपने धारणाकर्ता की ओर नहीं। जिससे दु:ख पहुँचा है या पहुँचेगा उसका नाश हो वा उसे दु:ख पहुँचे यही क्रोध का लक्ष्य है, जिसे दुख पहुँचा है उसका फिर क्या होगा इससे उसे कुछ सरोकार नहीं। इसी से एक तो मनोवेग ही एक दूसरे को परिमित किया करते हैं दूसरे विचारशक्ति भी उनपर अंकुश रखती है। यदि क्रोध इतना उग्र हुआ कि हृदय के दु:ख के कारण की अवरोधवरोधिनी शक्ति के रूप और परिमाण के विचार तथा भय आदि और विचारों के संचार के लिए जगह ही न रही तो बहुत हानि पहुँच जाती है। जैसे कोई सुने कि उसका शत्रु बीस आदमी लेकर उसे मारने आ रहा है। और वह चट क्रोध से व्याकुल होकर बिना शत्रु की शक्ति का विचार या भय किए उसे मारने के लिए अकेला दौड़े तो उसके मारे जाने में बहुत कम संदेह है। अत: कारण के यथार्थ निश्चय के उपरांत आवश्यक मात्रा में ही क्रोध वह काम दे सकता है जिसके लिए उसका विकास होता है।

कभी कभी लोग अपने कुटुम्बियों या स्नेहियों से झगड़कर उन्हें थोड़ा सा दु:ख पहुँचाने के अभिप्राय से अपना सिर तक पटक देते हैं। यह सिर पटकना अपने को दु:ख पहुँचाने के अभिप्राय से नहीं होता क्योंकि बिलकुल बेगानों के साथ कोई ऐसा नहीं करता। जब किसी को क्रोध में सिर पटकते देखें तो समझ लेना चाहिए कि उसका क्रोध ऐसे व्यक्ति के ऊपर है जिसे उसके सिर पटकने की परवाह है अर्थात् जिसे उसके सिर फूटने से यदि उस समय नहीं तो आगे चलकर दु:ख पहुँचेगा।

क्रोध का वेग इतना प्रबल होता है कि कभी कभी मनुष्य यह विचार नहीं करता कि जिसने दु:ख पहुँचाया है उसमें दु:ख पहुँचाने की इच्छा थी या नहीं। इसी से कभी तो वह अचानक पैर कुचल जाने पर किसी को मार बैठता है और कभी ठोकर खाकर कंकड़ पत्थर तोड़ने लगता है। चाणक्य ब्राह्मण अपना विवाह करने जाता था। मार्ग में कुश उसके पैर में गड़े। वह चट मट्ठा और कुदाली लेकर पहुँचा और कुशों को उखाड़ उखाड़ कर उनकी जड़ों में मट्ठा देने लगा। मैंने देखा कि एक ब्राह्मण देवता चूल्हा फूँकते फूँकते हैरान हो गए, जब आग नहीं जली, तब उस पर कोप करके चूल्हे में पानी डाल किनारे हो गए। इस प्रकार का क्रोध असंस्कृत है। यात्रियों ने बहुत सी ऐसी जंगली जातियों का हाल लिखा है जो रास्ते में पत्थर की ठोकर लगने पर बिना उसको चूर चूर किए आगे नहीं बढ़ते। इस प्रकार का क्रोध अपने दूसरे भाइयों के स्थान को दबाए हुए है। अधिक अभ्यास के कारणयदि कोई मनोवेग अधिक प्रबल पड़ गया तो वह ऊपर कहे हुए विश्लेषण को व्यर्थ कर मनुष्य को फिर बचपन से मिलती जुलती अवस्था में ले जाकर पटक देताहै।

जिससे एक बार दु:ख पहुँचा पर उसके दोहराए जाने की संभावना कुछ भी नहीं है उसको जो कष्ट पहुँचाया जाता है वह प्रतिकार कहलाता है। एक दूसरे से अपरिचित दो आदमी रेल पर चले जाते हैं। इनमें से एक को आगे ही के स्टेशन पर उतरना है। स्टेशन तक पहुँचते पहुँचते बात ही बात में एक ने दूसरे को एक तमाचा जड़ दिया और उतरने की तैयारी करने लगा। अब दूसरा मनुष्य भी यदि उतरते उतरते उसको एक तमाचा लगा दे तो यह उसका प्रतिकार या बदला कहा जायगा क्योंकि उसे फिर उसी व्यक्ति से तमाचे खाने की संभावना का कुछ भी निश्चय नहीं था। जहाँ और दु:ख पहुँचाने की कुछ भी संभावना होगी वहाँ शुद्ध प्रतिकार नहीं होगा। हमारा पड़ोसी कई दिनों से नित्य आकर हमें दो चार अंड बंड सुना जाता है। यदि हम उसको एक दिन पकड़ कर पीट दें तो हमारा यह कर्म शुद्ध प्रतिकार नहीं कहलावेगा क्योंकि नित्य गाली सुनने के दु:ख से बचने के परिणाम की ओर भी हमारी दृष्टि रही। इन दोनों अवस्थाओं को ध्यानपूर्वक देखने से पता लगेगा कि दु:ख से उद्विग्न होकर दु:खदाता को कष्ट पहुँचाने की प्रवृत्ति दोनों में है, पर एक में वह परिणाम इत्यादि के विचार को बिलकुल छोड़े हुए है और दूसरे में कुछ लिए हुए। इनमें से पहले प्रकार का क्रोध निष्फल समझा जाता है। पर थोड़े धैर्य के साथ सोचने पर जान पड़ेगा कि इस प्रकार के क्रोध से स्वार्थ साधन तो नहीं होता पर परोक्ष रूप में परमार्थ साधन अवश्य हो जाता है। दु:ख पहुँचानेवाले से हमें फिर दु:ख पहुँचने का डर न सही पर समाज को है। इससे उसे उचित दंड देने से पहले तो उसी की शिक्षा या भलाई हो जाती है फिर समाज के और लोगों का भी बचाव हो जाता है। क्रोधकर्ता की दृष्टि तो इन परिणामों की ओर नहीं रहती है पर सृष्टिविधान में इस प्रकार की क्रोध की नियुक्ति है इन्हीं परिणामों के लिए।

क्रोध सब मनोविकारों से फुरतीला है इसीलिए अवसर पड़ने पर यह और दूसरे भी मनोविकारों का साथ देकर उनकी सहायता करता है। कभी वह दया के साथ कूदता है कभी घृणा के। एक क्रूर कुमार्गी किसी अनाथ अबला पर अत्याचार कर रहा है। हमारे हृदय में इस अनाथ अबला के प्रति दया उमड़ रही है। पर दया की पहुँच तो आर्त ही तक है। यदि वह स्त्री भूखी होती तो हम उसे कुछ रुपया पैसा देकर अपने दया के वेग को शांत कर लेते। पर यहाँ तो उस दु:ख का हेतु मूर्तिमन तथा अपने विरुद्धा प्रयत्नों को ज्ञानपूर्वक व्यर्थ करने की शक्ति रखनेवाला है। ऐसी अवस्था में क्रोध ही उस अत्याचारी के दमन के लिए उत्तेकजित करता है जिसके बिना हमारी दया ही व्यर्थ जाती है। क्रोध अपनी इस सहायता के बदले में दया के यश को नहीं बाँटता। यद्यपि काम क्रोध करता है पर नाम दया का ही होता है। लोग यही कहते हैं उसने दया करके बचा लिया। क्रोध दया का साथ न दे तो दया अपने अनुकूल प्रमाण उपस्थित ही नहीं कर सकती। एक अघोरी हमारे सामने मक्खियाँ मार मारकर खा रहा है और हमें घिन लग रही है। हम उससे नम्रतापूर्वक हटने के लिए कह रहे हैं और वह नहीं सुन रहा है। चट हमें क्रोध आ जाता है और हम उसे बलात् हटाने में प्रवृत्त हो जाते हैं।

बैर क्रोध का अचार या मुरब्बा है। जिससे हमें दु:ख पहुँचा उसपर हमने जो क्रोध किया वह यदि हमारे हृदय में बहुत दिनों तक टिका रहा तो वह बैर कहलाता है। इस स्थायी रूप में टिक जाने के कारण क्रोध की क्षिप्रता और हड़बड़ी तो कम हो जाती है पर वह और धैर्य, विचार और युक्ति, के साथ दु:खदाता को पीड़ित करने की प्रेरणा बराबर बहुत काल तक किया करता है। क्रोध अपना बचाव करते हुए शत्रु को पीड़ित करने की युक्ति आदि सोचने का समय नहीं देता पर बैर इसके लिए बहुत समय देता है। वास्तव में क्रोध और बैर में केवल काल भेद है। दु:ख पहुँचने के साथ ही दु:खदाता को पीड़ित करने की प्रेरणा क्रोध और कुछ काल बीत जाने पर बैर है। किसी ने हमें गाली दी। यदि हमने उसी समय उसे मार दिया तो हमने क्रोध किया। अब मन लीजिए कि वह गाली देकर भाग गया और दो महीने बाद हमें कहीं मिला। अब यदि फिर बिना गाली दिए हमने उसे मिलने के साथ ही मार दिया तो यह हमारा बैर निकालना हुआ। इस विवरण से स्पष्ट है कि बैर उन्हीं प्राणियों में होता है जिनमें धारणा या भावों के संचय की शक्ति होती है। पशु और बच्चे किसी से बैर नहीं मनते। वे क्रोध करते हैं और थोड़ी देर के बाद भूल जाते हैं। क्रोध का यह स्थायी रूप भी आपदाओं की पहिचान करा कर उनसे बहुत काल तक बचाए रखने के लिए दिया गया है।


भय

क्रोध के समन भय भी दु:ख से बचाने के कार्य पर नियुक्त है। पर इन दोनों में अंतर यह है कि क्रोध दु:ख के निमित्त पर प्रभाव डालने के लिए आकुल करता है और भय उसकी पहुँच से अपने को बाहर करने के लिए। क्रोध का कार्य जैसा बड़ा और विचारापेक्ष है वैसे ही उसका फल भी अधिक स्थायी है अर्थात् वह क्रोध की स्थिति के अनंतर भी या तो बराबर या बहुत दिनों तक रहता है। पर ऐसे सज्ञान प्राणियों के बीच जिनमें भाव बहुत काल तक संचित रहते हैं और ऐसे उन्नत समाज में जहाँ एक व्यक्ति के पहुँच और परिचय का विस्तार बहुत बड़ा होता है प्राय: भय का फल भय के भोग काल तक ही रहता है। जहाँ वह भय भूला कि आफत आई। यदि कोई मनुष्य किसी बात पर आप से बुरा मन गया और आप को मारने के लिए दौड़ा तो उस समय भय के उद्वेग में आप भाग कर अपने को बचा लेंगे। पर संभव है कि उस मनुष्य का क्रोध जो आप पर है वह उसी समय दूर न हो जाय बल्कि कुछ दिन के लिए बैर के रूप में टिक जाय तो उसके लिए आपके सामने आना फिर कोई कठिन बात नहीं होगी। प्राणियों की अनुन्नत दशा ही में भय से अधिक काम निकलता है जबकि भावों के संचय की शक्ति नहीं होती और समाज का ऐसा उन्नत गठन नहीं होता कि बहुत से लोगों को एक दूसरे का पता और उनके विषय में जानकारी रहती हो। जंगली मनुष्यों के परिचय का विस्तार बहुत थोड़ा होता है। बहुत सी ऐसी जंगली जातियाँ हैं जिनमें कोई एक व्यक्ति बीस से अधिक आदमियों को नहीं जानता। अत: उसे दस या पन्द्रह कोस ही पर रहनेवाला यदि कोई दूसरा जंगली मिले और मारने दौड़े तो वह भागकर अपनी रक्षा उसी समय तक के लिए नहीं बल्कि सब दिन के लिए कर सकता है। पर सभ्य, उन्नत और विस्तृत समाज में भय के द्वारा स्थायी रक्षा की उतनी संभावना नहीं होती। इसी से जंगली और असभ्य जातियों में ही भय अधिक होता है। उनके देवी देवता भय द्वारा ही कल्पित हैं। किसी आपत्ति वा दु:ख से बचने के लिए ही वे उसकी पूजा करते हैं। अति भय असभ्यता का पहला लक्षण है। अशिक्षित होने के कारण अधिकांश भारतवासी भी भय के उपासक हैं। वे जितना सम्मान एक थानेदार या तहसीलदार का करते हैं उतना किसी विद्वान् या कॉलेज के अध्यापक का नहीं। जब तक यह दशा रहे तब तक भारत को असभ्य समझना चाहिए और जब इसका विपर्यय देख पड़े तब उसकी उन्नति में संदेह न करना चाहिए।

चलने फिरने वाले बच्चों में जिनमें भाव देर तक नहीं टिकते और दु:ख परिहारका ज्ञान वा बल नहीं होता भय अधिक होता है। बहुत से बच्चे तो किसी अपरिचित आदमी को देखते ही घर के भीतर भागते हैं। पशुओं में भी भय अधिक देखा जाताहै।

दु:ख के चेतन कारण का ज्ञान हुए बिना प्राय: क्रोध नहीं होता पर भय को कारण के निर्दिष्ट किए जाने की आवश्यकता नहीं है, इतना भर मालूम हो जाना चाहिए कि दु:ख पहुँचेगा। यदि कोई किसी से आकर कहे कि कल तुम्हारे हाथ पाँव टूट जाएँगे तो उसे क्रोध नहीं आवेगा पर भय हो सकता है। पर यदि उसी से कहा जाय कि 'कल दो एक आदमी (चाहे उनका नाम न भी लिया जाय) तुम्हारा हाथ पैर तोड़ देंगे तो वह तुरंत त्योरी बदल कर कहेगा कि 'कौन हैं हाथ पैर तोड़ने वाले, देखेंगे।'

क्लेश के कारण के ज्ञान होने पर जो भय होता है उसमें उस कारण पर प्रभाव डालने की अक्षमता का अवश्य निश्चय होता है। यदि यह निश्चय ठीक हुआ तब तो भय को अपने उचित स्थान पर समझना चाहिए। यदि यह निश्चय कठिनाइयों और आपत्तियों को दूर करने के अनभ्यास के कारण स्वभाव के अंतर्गत आ गया है तो उसे कायरता कहना चाहिए।

दु:ख के निश्चय के अभाव में केवल संभावना के अनुमन से जो भय होता है उसे आशंका कहते हैं। वह इतनी प्रबल नहीं होती। जैसे कोई जंगल में चला जाता है और रास्ते भर डरता है कि कहीं बाघ न मिल जाय। यदि उसे ठीक ठीक भय होता तो वह लौट जाता, आगे पैर ही न रखता। दु:ख की कोटि में जो स्थान भय का है आनंद के विभाग में वही उत्साह का है। भय के अनुग्र रूप आशंका का उलटा आशा है।

भय दो प्रकार का होता है, एक असाध्य और दूसरा साध्य। असाध्य भय वह है जिसमें यह पूरा निश्चय हो जाय कि चाहे हम किसी अवस्था में रहें दु:ख अवश्य ही पहुँचेगा।

साध्य भय वह है जिसमें जिस अवस्था में मनुष्य है उसी अवस्था में बने रहने से किसी ज्ञात कारण द्वारा दु:ख पहुँचने का निश्चय हो। इसमें मनुष्य को बचाव के लिए प्राप्त अवस्था से भिन्न अवस्था में होना पड़ता है, यद्यपि कभी कभी इस अवस्थांतर से भी उसकी रक्षा नहीं होती। दो मनुष्य एक पहाड़ी नदी के किनारे बैठे वा आनंद से बातचीत करते चले जा रहे हैं। इतने में सामने शेर की आहट मालूम हुई। अब इन दोनों व्यक्तियों को उसी अवस्था में रहने से अर्थात् बैठे ही रह जाने वा जिस ओर जिस प्रकार से जा रहे हैं उसी ओर उसी प्रकार चलते रहने से आपत्ति का निश्चय है। अत: यदि वे बैठै हैं तो उठकर भागने वा पेड़ इत्यादि पर चढ़ने का यत्न करेंगे और यदि चले जा रहे हैं तो जितने वेग से जा रहे हैंउससे अधिक वेग से किसी दूसरी ओर जिधर छिपने के लिए स्थान होगा उधर चलेंगे।

जिस कार्य के करने से मनुष्य को भय होगा उस कार्य के करने के पहले भी लोग कहते हैं कि उस कार्य से भय मालूम होता है। जैसे कोई किसी से कहे कि इस गङ्ढे को फाँद जाओ वा जिधर शेर बैठा है उधर से निकल जाओ और वह कहे कि डर मालूम होता है तो उसे यथार्थ में डर नहीं मालूम होता है बल्कि हिचक मालूम होती है। भय से उसका चित्त तो उस समय विचलित होगा जब वह कार्य को आरम्भ कर देगा वा करता होगा। हाँ, भय लगने का भय मालूम होता हो तो बात दूसरी है। जब तक दु:ख का उपादान अपनी क्रिया से हमारा सामीप्य लाभ करता न जान पड़ेगा तब तक यथार्थ में भय न जान पड़ेगा। जब तक कुएँ में गिरना वा न गिरना, शेर की माँद में जाना वा न जाना अपने हाथ में है तब तक भय कैसा। हिचक वह है जिससे लोग कोई काम करें ही नहीं और भय वह है जिससे लोग करते हुए काम ही छोड़ दें।

(नागरीप्रचारिणी पत्रिका, जुलाई 1912)