मर्जी से जीने की अर्जी क्यों? / ममता व्यास

Gadya Kosh से
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सब अपनी मर्जी के मालिक हैं, कभी-कभी सोचती हूँ हम जि़न्दगी के सफर में चल रहे हैं तो क्या अपनी मर्जी से? या वो ऊपर बैठा जादूगर हमें चलाता है? उसकी मर्जी से वो जिधर हवा का रुख कर दे हम उसी तरफ बहने लगते हैं कितनी! अजीब-सी जि़न्दगी हमारी ना आये अपनी मर्जी से और ना रहते हैं यहाँ अपनी मर्जी से और जैसे तैसे इस जि़न्दगी को जीने लायक बनाते हैं रिश्तों के झुनझुनों से खुद को बहलाते हैं कि कुछ ही दिनों में ये रिश्ते हमें उनकी मर्जी से चलाने लगते हैं कब बोलना है, कितना बोलना है, क्या बोलना है, कब चुप हो जाना है, कब हँसना है और तो और कब रोना है ये भी दूसरे तय करते हैं, कौन कब आता है, कहाँ से तोड़ कर आपको ले जाता है कोई नहीं जानता ये भी तोडऩे वाले की मर्जी है।

जिस घर में जन्म लिया उसे अपना समझने ही लगे थे कि किसी ने, किसी दिन कहा ये घर पराया है उनकी मर्जी से मान ली ये बात चुपचाप कि फि र किसी दिन किसी की मर्जी हुई और कह दिया की अब ये नया घर तुम्हारा है खामोशी से मान लिया जी आपकी मर्जी। किसी ने कन्या का दान किया उनकी मर्जी। किसी ने दान ले लिया उनकी मर्जी। हम कहाँ? कहाँ हमारी मर्जी? किसी ने कहा तुम बेटी हो, पत्नी हो ये भी उनकी मर्जी। सीमेंट, पत्थर के मकान को हमने घर कहा। घर की हर चीज से रिश्ते बनाए और उन बेजान वस्तुओं में सांस चलने लगी। घर के कोने महकने लगे। निर्जीव वस्तुओं में भी दिल धड़कने लगे और हम पहली बार अपनी मर्जी से खुश होंने लगे और इक दिन हवा का रुख कुछ यूँ चला की, वो अपना घर फि र से सीमेंट, पत्थरों का मकान नजर आने लगा। बेजान वस्तुओं के साथ-साथ घर में रहने वाले भी वस्तु बन गए कहीं से किसी को उठाकर कहीं रख दिया सुन्दर दिखे इसलिए कहीं सजा दिया। सजा देने और सजा देने में ज्यादा अंतर नहीं है। किसी ने नियम बनाये हमने निभाए। किसी ने कहा यही है सही हमने हंस कर हामी भरी। वो जो कहे सच तो सच। उनके झूठ भी झूठ। उनकी हाँ में हाँ लेकिन मेरी मर्जी कहाँ?

पहले हर चीज थी अपनी मगर अब लगता है। अपने घर में किसी दूसरे घर के हैं हम। हाँ मुझे तो कभी-कभी लगता है हम कहाँ से आये और किस राह से चले जायेंगे ये भी हम तय नहीं करते। किस मिट्टी से हमारा कितना रिश्ता है। किसके पास हमारा कितना हिस्सा है। अपने अधूरे हिस्से की तलाश में सारी उम्र भटकते हम। कहीं जब कोई खुद के जैसा दिखा। उसी के साथ हो लिए पीछे-पीछे चल दिए उसकी मर्जी। किसी ने किसी दिन कह दिया तुम्हारा सफर अब खत्म चली जाओ। हमने मान ली हंस कर उसकी मर्जी। किसी ने काटा, किसी ने बांटा। हर सांस पर किसी की मर्जी हर धड़कन पे किसी का पहरा। जब दर्द से दिल भर जाये और कुछ कहना चाहे तो दुनिया कहती है। शख्स...चुप रहो। दुनिया की मर्जी। जब होंठ पार खामोशी के ताले चिपका लिए तो कहती है। अरे-आजकल बोलती नहीं कुछ बोलो ना ...उनकी मर्जी।

पिछले दिनों, किसी नदी किनारे बैठी थी अकेले, तो लहरों की बातें सुनी, उन्हें देखा अपनी मर्जी से जाते हुए बहते हुए खिलखिलाते हुए तो खुद के होने पर यकीन आया और अन्दर बहुत अन्दर से इक आवाज आई। ये आवाज अक्सर आती थी पर गौर अब किया मैंने उस मीठी आवाज ने कहा-बोल तेरी मर्जी क्या है? मेरी मर्जी? ये तो कभी सोचा ही नहीं मैंने, किसी ने कभी पूछा ही नहीं मुझसे, जीवन मेरा था बनाया दूसरों ने सपने मेरे थे तोड़े दूसरों ने मन मेरा था बसाया पराया दर्द क्यों? देह हमारी मालिक दूसरा क्यों? हमसे ज्यादा दूसरो का हक हम पर क्यों? अपने जीवन को जीने के लिए, अपने सपनों को पूरे करने के लिए हम दूसरों के ऊपर निर्भर क्यों?

अपनी मर्जी से जीने के लिए क्या इसको, उसको, सबको अर्जी देनी होगी? ये सब हैरानियाँ, बेचैनियाँ, बेकार सवालातों के बीच मन कितना दुखी हो जाता है। झट से टूट-टूट जाता है। उसकी मर्जी। तभी इक लहर ने आकर भिगो दिया, जाते-जाते कह गयी- इस गीलेपन को बनाये रखना, आँखों में ही सही इक झरना छुपाये रखना। अपनी मर्जी के रास्तों पर कड़ी धूप मिलेगी, इक पौधा जरूर उगाये रखना और वो लहर ये भी बता गयी कि ये जीवन बहुत सुन्दर है, इसे और सुन्दर बनाया जा सकता है। अपनी मर्जी से दूसरों की मर्जी से इसे ढोया जाता है। जिया नहीं जाता।