मोहेंजो दारो, मुर्दों का टीला और विक्की डोनर / जयप्रकाश चौकसे

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मोहेंजो दारो, मुर्दों का टीला और विक्की डोनर
प्रकाशन तिथि : 11 फरवरी 2020


लगान के लिए प्रसिद्ध आशुतोष गोवारीकर ने रितिक रोशन अभिनीत फिल्म ‘मोहेंजो दारो’ बनाई थी, जिसे दर्शकों ने स्वीकार नहीं किया। महान गैर हिंदी भाषी लेखक रांगेय राघव ने ‘मोहेंजो दारो सभ्यता’ पर ‘मुर्दों का टीला’ नामक उपन्यास लिखा है। संभवत: आशुतोष गोवारीकर के शोध में यह उपन्यास अनदेखा रह गया। आयुष्मान खुराना, यामी गौतम और अन्नू कपूर अभिनीत ‘विक्की डोनर’ सार्थक सफल फिल्म साबित हुई। इन फिल्मों का स्मरण इसलिए हुआ कि टोनी जोसफ की किताब ‘अर्ली इंडियंस’ हाल में जारी हुई है। दरअसल, लाखों वर्षों के मानव इतिहास में मानव समूह निरंतर यात्रा करते रहे हैं। इन्हीं यात्राओं ने सभ्यता व संस्कृति को प्रभावित किया है। रक्त की शुद्धता का गुब्बारा बहुत पहले फट चुका है। मिश्रित खून ही मानव शिराओं में प्रवाहित है। यह बदलाव की हद है कि रक्त की शुद्धता को आज भी परचम की तरह फहराया जा रहा है।

दुनिया के सभी देशों में यात्री गए और वहीं बस गए। मूल निवासियों से विवाह संबंध बने और पीढ़ियों का निर्माण हुआ। विज्ञान ने इस विषय के अध्ययन में बड़ी सहायता की है, जिसमें हजारों वर्ष पूर्व के मनुष्यों का डीएनए टेस्ट संभव हुआ। एक छोटी सी हड्‌डी के परीक्षण से भी डीएनए हासिल किया जा सकता है। यात्री भोजन बनाने के तरीके भी अपने साथ लाए। कोई आश्चर्य नहीं कि डोसे में कीमा भरकर भी बेचा जाता है। भाषाएं भी हमसफर रहीं और गलबहियां करती रहीं। शब्द का सफर अत्यंत रोचक विषय है। भोपाल के डॉ. शिवदत्त शुक्ला के पास इस विषय का विलक्षण ज्ञान है।

अधिकांश मनुष्य वर्तमान में जहां रहते हैं, यदि उनके माता-पिता, दादा-दादी भी वहीं रहते आए तो वे यह भरम पालते हैं कि उनके पुरखों का जन्म स्थान भी यहीं था। रक्त की शुद्धता का हौवा भी इसी भरम से जन्मा था। भारत आने वाले सबसे पहले मनुष्य अफ्रीका से आए थे। यह बात 65,000 वर्ष पूर्व की है। दूसरा यात्री दल ईरान से आया था। वह दल 12 हजार वर्ष पूर्व आया था। पहले और दूसरे यात्री समूह ने मिलकर खेती करना शुरू किया और इसी खेती क्रांति ने ‘हड़प्पा सभ्यता’ को जन्म दिया। तीसरे समूह ने ‘खासी’ और ‘मुंडारी’ भाषा को स्थापित किया। यह घटना भी चार हजार वर्ष पुरानी है। इसी तीसरे समूह को आर्य कहा गया और ये कजाकिस्तान से भारत आए थे।

पुरातन किताबों, दस्तावेजों और शिलाखंड का अध्ययन प्रोफेसर त्रिवेदी ने किया। उनका मत है कि महाभारत का युद्ध ईसा के जन्म के पहले 3317 वर्ष पूर्व 14 नवंबर मंगलवार को प्रारंभ हुआ था। प्रोफेसर त्रिवेदी ने वैशाली के प्राकृतिक शोध संस्थान में सारा शोध किया है। प्रोफेसर त्रिवेदी के शोध के आधार पर यह जानना रोचक होगा कि उस समय सौर मंडल में ग्रहों की दशा क्या थी और वैसी ही दशा अब भविष्य में कब बनेगी या बन चुकी है? शनिदेव किस राशि में विद्यमान थे या कहीं और प्रस्थान कर रहे थे। त्रिवेदी के कालखंड में हुड़दंगी नहीं थे, वरन् उनका यह शोध उन्हें महंगा पड़ जाता। जाति प्रथा आर्य आगमन के पूर्व भी भारत में मौजूद थी और वर्तमान में भी कहर ढा रही है। इसी विषय पर एक नाटक भी ‘टाटा स्काई’ पर प्रस्तुत किया गया था जिसका टाइटल ही था ‘टाइपकास्ट’। टोनी जोसफ यह मानते हैं कि वर्तमान भारत के 65 प्रतिशत लोगों पर पहले आए अफ्रीकी समूह का प्रभाव है।

‘विकी डोनर’ में अन्नू कपूर अभिनीत पात्र आयुुष्मान अभिनीत पात्र से कहता है कि वह आर्य जाति का है। इस तरह के लोग विरल होते हैं और इनका वीर्य उत्तम संतान उत्पत्ति में कारगर सिद्ध होता है। कथा का क्लाइमेक्स इस बात पर आधारित है कि नायिका के बच्चे नहीं हो सकते, अत: उसे ऐसे बच्चे को गोद लेना है, जिसका जन्म उसके पति के स्पर्म डोनेशन से हुआ हो। डॉ. अन्नू कपूर ने उन तमाम मता-पिता और बच्चों को आमंत्रित किया है, जिनसे उनका संपर्क रहा है। आर्य स्पर्म से जन्मे बच्चों में से कुछ अफ्रीकन भी हैं, क्योंकि गर्भधाररण करने वाली महिला अफ्रीकन है। पौधे का रोपा कहीं भी हो, वह उस धरती से भी रूप-रंग और खुशबू प्राप्त करता है, जहां रोपा गया है। स्पर्म विज्ञान के विकास से ही विकी डोनर जैसी फिल्म संभव हो पाई। मेडिकल शोध से भी कथाओं और फिल्मों का जन्म संभव है। फिल्म कथा का भी डीएनए होता है और ‘वर्ण संकर’ फिल्में प्रस्तुुत होती रही हैं। हिंदुस्तानी फिल्मों की कुंडली बनाना कठिन काम है। शांताराम ने फिल्म ‘आदमी’ में तवायफ और पुलिसवाले की प्रेमकथा प्रस्तुत की। 20 वर्ष बाद अमेरिका में ‘इरमा लॉ डूज’ बनी और शम्मी कपूर ने इसी कथा पर संजीव कुमार और जीनत अमान अभिनीत फिल्म ‘मनोरंजन’ विगत सदी के आठवें दशक में बनाई थी।