रोशनी / सुकेश साहनी

Gadya Kosh से
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पलंग के पास बैठा दिवाकर सूनी-सूनी आँखों से पत्नी को देख रहा था। इंटराविनस ड्रिप से दवा बूँद-बूँद कर उसके शरीर में जा रही थी। पिछले पाँच दिनों से वह कोमा में थी। उसकी शक्ति बड़ी तेजी से क्षीण होती जा रही थी। अत्यधिक कष्ट उठाते हुए वह लगातार मौत की ओर बढ़ रही थी। उसके देखते-ही-देखते इन दो महीनों में पत्नी की खूबसूरत काया हड्डियों के ढाँचे में तबदील हो गई थी।

दीवाली वाला दिन था। हर कहीं गहमा-गहमी थी, पर पत्नी के सिर पर मँडराती मौत के कारण उसके घर में सन्नाटा छाया हुआ था। बीच-बीच में पास-पड़ोस के बच्चों द्वारा दागे जा रहे पटाखा बमों से उसका दिल काँप-काँप उठता था, मानो ऐसे ही किसी धमाके के साथ उसका सब कुछ बिखरने वाला हो ऐसे ही माहौल में एकाएक टेलीफोन की घंटी घनघना उठी।

"हैलो, क्या मैं नेत्र विशेषज्ञ डॉक्टर दिवाकर से बात कर सकता हूँ?" दूसरी ओर से आवाज में हड़बड़ाहट थी।

"स्पीकिंग।"

"डॉ.साहब...मेरे बेटे की एक्सीडेंट में..." काँपती आवाज में किसी ने कहना चाहा।

"सॉरी!" उसने बीच में ही बात काटते हुए कहा, "आजकल मैं कोई केस नहीं कर रहा।" और फोन रख दिया।

पिछले दो महीने से उसकी सारी दुनिया पत्नी के इर्द-गिर्द सिमट आई थी। क्लीनिक जाना उसने बंद कर दिया था। उसकी आँखों के आगे वह मनहूस दिन घूम गया, जब अपोलो अस्पताल में डॉक्टरों ने पत्नी को कैंसर का मरीज घोषित करते हुए इस दुनिया में चंद दिनों का मेहमान बताया था। सुनकर उसके पैरों के नीचे से जमीन ही निकल गई थी। विशेषज्ञों के अनुसार कैंसर की एडवांस स्टेज होने के कारण किसी प्रकार के इलाज की कोई गंुजाइश नहीं थी। डॉक्टरों की सलाह पर पत्नी को घर ले आया था और पेन किलर्स की मदद से उसके कष्ट को कम करने का असफल प्रयास करता रहा था। पिछले पाँच दिनों से वह क्रूर घड़ी उससे आँख मिचैली-सी खेल रही थी, जिसकी आज से दो महीने पहले तक उसने कल्पना भी नहीं की थी।

वह दीवार पर लगे पत्नी के फोटोग्राफ को देखते हुए यादों के पन्ने पलटने लगा...शादी...हनीमून ...शिमला की सैर...और भी न जाने क्या-क्या...उन दिनों पत्नी के चेहरे के सिवा उसे कुछ नजर नहीं आता था। पत्नी के साथ बिताए दिनों की याद से उसकी आँखें नम हो गईं।

तभी नौकर ने उसे बाहर किसी के आने की सूचना दी। उसकी किसी से मिलने की इच्छा नहीं थी। पिछले कई दिनों के जगराते से उसकी आँखें लाल सुर्ख हो रही थीं। नौकर की सूचना से वह बेमन से मुख्य द्वार की ओर बढ़ा, फिर कुछ सोचकर पहले खिड़की से झाँककर देखा-कोई नजर नहीं आया। तभी उसकी नजर सामने रहने वाली मिसेज सब्बरवाल पर पड़ी। ईष्र्या से उसका मन अजीब-सा हो गया, उसने तल्खी से सोचा-कौन-सा ऐसा नशा है, जो ये औरत नहीं करती! फिर भी कैसी हष्ट-पुष्ट है, इसे तो कुछ नहीं हुआ।

दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी। इस बार उसने दरवाजा खोलकर देखा।

आगंतुक एक बूढ़ा था...बिखरे हुए बाल...अफरा-तफरी में पहने गए कपड़े...सूजी हुई आँखें।

"डॉ.साहब, मैंने थोड़ी देर पहले आपको फोन किया था...कृपया थोड़ी देर के लिए मेरे साथ चलें...आपकी बहुत मेहरबानी होगी!" उसे देखते ही वह गिड़गिड़ाने लगा।

टेलीफोन करने वाला व्यक्ति ही घर आ पहुँचा है, जानकर उसे गुस्सा आ गया।

"सॉरी!" उसने रुखाई से कहा, "मैं आपकी कोई मदद नहीं कर सकता, मैंने फोन पर ही आपको बता दिया था, फिर भी।"

"हर तरफ से निराश होकर आपके पास आया हूँ...यदि आप मेरे साथ नहीं चलेंगे, तो मेरे बेटे की आँखें बेकार हो जाएंँगी। डाक्टर प्लीज ...मुझ पर दया करें!"

"मुझे कसाई समझा है क्या?" वह झल्ला गया, "आपको क्या लगता है, हम डॉक्टरों को कोई तकलीफ नहीं हो सकती! भीतर मेरी पत्नी बीमार पड़ी है, किसी भी समय उसके प्राण-पखेरु उड़ सकते हैं और...और आपको लगता है मैं टाल रहा हूँ।"

सुनकर बूढ़े के मुँह से आह निकली, खड़े-खड़े वह डगमगाया, फिर सँभल गया, "मुझे माफ करें डॉक्टर! शायद मैंने आपका दिल दुखाया है, पर यकीन करें यह सब अनजाने में हुआ है। अपनी परेशानी में मेरी मति मारी गई है। मेरे इकलौते बेटे की लाश पोस्टमार्टम हाउस में पड़ी है। आज सुबह ही घर से भला-चंगा निकला था। ट्रक एक्सींडेंट में उसकी मौत हो गई. उसने नेत्रदान का संकल्प लिया था, यह रहा उसका सर्टीफिकेट ।"

बूढ़े की बात सुनकर डॉक्टर सकते में आ गया। वह बूढ़े के हाथ से नेत्रदान का प्रमाण-पत्र लेकर देखने लगा।

बूढ़ा कहे जा रहा था, "नौ बजे उसकी मौत हुई थी, चार घंटे बीत चुके हैं। जल्दी ही उसकी आँखें न निकाली गईं तो बेकार हो जाएँगी। मुझे बताया गया कि आँख निकालने का इंतजाम आप ही करेंगे...इसीलिए आपको तकलीफ दी। मुझे क्या पता था कि आप मुझसे भी बड़ी परेशानी में हैं।"

इस बार डॉक्टर ने ध्यान से बूढ़े की ओर देखा, "चार घंटे पहले ही इकलौते बेटे की मौत हुई है और ये उसके नेत्रदान के लिए मारा-मारा फिर रहा है, बहुत हिम्मत की बात है!" उसने सोचा।

वह शहर की नेत्रदान के लिए प्रेरित करने वाली संस्था का पदाधिकारी था। नेत्रदान के प्रति ऐसे सजग नागरिकों की वह बहुत कद्र करता था। संस्था ऐसे लोगों को सम्मानित भी करती थी, पर वर्तमान परिस्थितियों में जब उसकी पत्नी मृत्यु-शैया पर पड़ी थी।

बूढ़े को रुके रहने का संकेत कर वह भीतर आ गया। पत्नी के सिरहाने खड़ा सोचता रहा। डॉक्टर होने के नाते पत्नी के मुख पर मृत्यु की छाया को स्पष्ट देख रहा था। उसकी साँस बहुत कष्ट से चल रही थी। उसके माथे पर पसीने की असंख्य बूँदं चुहचुहा आई थीं..., उसने रुमाल से उसका पसीना पोंछ दिया। वह सोच में पड़ गया था। पोस्टमार्टम हाउस में दो आँखें उसकी राह देख रही थीं...और इधर उसकी पत्नी की हालत बहुत बिगड़ रही थी। जाने क्यों उस बूढ़े के सामने वह खुद को बहुत छोटा महसूस करने लगा था।

उसने फोन पर पत्नी की देखरेख के लिए नर्स को तुरंत घर आने को कहा और नौकर को आवश्यक निर्देश देकर बाहर आ गया। इन दो महीनों में पहली बार उसने गैराज से अपनी कार बाहर निकाली।

पोस्टमार्टम हाउस के बाहर भीड़ थी। कुछ औरतें एक शव को घेरे बैठी रो रही थीं, वहीं मर्डर केस से सम्बघित कुछ लोग डॉक्टरी जाँच को अपने पक्ष में करवाने के लिए रणनीति तय कर रहे थे।

कक्ष में घुसते ही बदबू का भभका उसके नथुनों से टकराया। हर कहीं गंदगी का साम्राज्य था। टेबल पर लड़के का शव सफेद कपड़े में सील पड़ा था, जिस पर मक्खियाँ भिनभिना रही थीं। बेटे के शव को देखते ही बूढ़े की आँखों में आँसू बहने लगे थे। शव पर से मक्खियाँ उड़ाता हुआ वह बहुत दयनीय लग रहा था। डॉक्टर को अपने पेशे से जुड़े दूसरे सरकारी डॉक्टरों पर गुस्सा आया-क्या कक्ष की सफाई रखवा पाना भी उनके बस में नहीं है?

"अभी डॉक्टर साहब नहीं आए हैं।" वहाँ उपस्थित जमादार ने बीड़ी का धुआँ उगलते हुए उन्हें बताया। स्वीपर के अलावा दूसरा कोई कर्मचारी वहांँ उपस्थित नहीं था।

दिवाकर के सामने सर्जन की प्रतीक्षा करने के अलावा कोई रास्ता नहीं था, क्योंकि जब तक वह आकर शव पर लगी सील नहीं तोड़ देता, दान की गई आंखें निकालने का कार्य वह प्रारंभ नहीं कर सकता था।

बूढ़ा अंदर-बाहर हो रहा था, उसके चेहरे पर पीड़ा के स्थान पर आक्रोश दिखाई देने लगा था। वह बुदबुदा रहा था, "मेरा बेटा मरा है..., मेरे कलेजे का टुकड़ा ...मेरा अपना खून...उसकी दान की आँखें निकलवाने के लिए मुझे भीख माँगनी पड़ रही है।" एकाएक उसकी मुट्ठियाँ भिंच गर्इं, गुस्से से चेहरा विकृत हो गया, वह डॉक्टर के पास आकर फूट पड़ा, "डॉक्टर आप आँखें निकालिए ...सील मैं तोड़ देता हूँ, मेरी जिम्मेदारी पर आप काम शुरू कीजिए...जो होगा मैं भुगत लूँगा, मेरे बेटे की आँखें किसी भी कीमत पर बेकार नहीं होनी चाहिए."

डॉक्टर ने प्रकट में बूढ़े को धैर्य बंधाया पर भीतर ही भीतर वह भी व्यग्र हो उठा था। समय तेजी से गुजरता जा रहा था। अगर जल्दी ही सर्जन नहीं आया तो? वह बूढ़े को किसी भी दशा में निराश नहीं देखना चाहता था। जाने क्यों अब वह बूढ़े के प्रति अपने दिल में बहुत लगाव महसूस करने लगा था। उसने इस बारे में सीएमओ से फोन पर बात कर लेना बेहतर समझा।

उसकी बात सुनकर सीएमओ ने लापरवाही से कहा, "अरे भाई, आज दीवाली है, कहीं मिलने-मिलाने लगे होंगे। अपना निश्चित रहें..., वे ड्यूटी पर पहुँच जाएँगे।"

दिवाकर की प्राइवेट प्रेक्टिस थी, फिर शहर में उसकी नेत्र विशेषज्ञ के रूप में अलग पहचान थी। सीएमओ की गैर जिम्मेदाराना टिप्पणी पर उससे चुप नहीं रहा गया, "जी हाँ, आज दीवाली है-रोशनी का त्यौहार और यहाँ एक अभागा बूढ़ा किसी की आँखों को रोशन करने के लिए गिड़गिड़ा रहा है। आधे घंटे के भीतर आपका डॉक्टर पोस्टमार्टम के लिए यहाँ नहीं पहंँचता है, तो लड़के की आँखें बेकार हो जाएँगी।" कहकर उसने फोन रख दिया।

उसके फोन का असर हुआ था। थोड़ी देर बाद ही सर्जन वहाँ पहुँच गया। बूढ़े को कक्ष से बाहर कर दिया गया। सर्जन थाने से प्राप्त पेपर्स को उलट-पलट रहा था, फिर वह शव की सील का निरीक्षण एवं मिलान बहुत बारीकी से करने लगा। दिवाकर जानता था कि ऐसे मौके पर इस तरह की औपचारिकताओं को कुछ शिथिल भी किया जा सकता था, पर सर्जन था कि अपनी पूरी अहमियत जता रहा था। काफी देर बाद उसने स्वीपर को सील तोड़ने का आदेश दिया।

दिवाकर ने शव के मुख से कपड़ा हटाया, लड़के की उम्र सोलह-सत्रह साल के लगभग थी। इतनी कम उम्र में नेत्रदान का संकल्प! रास्ते में बूढ़े ने उसे बताया था कि उसके बेटे का चयन राष्ट्रीय जूनियर फुटबाल टीम में हो गया था। उसके दिल को धक्का-सा लगा। एक्सीडेंट के बावजूद उसके चेहरे पर पीड़ा के भाव नहीं थे। लड़के की आँखें पूरी तरह बंद नहीं थीं। उसे चिन्ता हुई. आँखें पूरी बंद न हों तो उनके जल्दी खराब हो जाने की आशँका रहती है। उसने टार्च की रोशनी में पुतलियों को ध्यान से देखा, दोनों आँखें सुरक्षित थीं। आँखों को निकालने में उसे मुश्किल से सात मिनट लगे। उसने एंटीसैप्टिक लोशन से आँखों को साफ कर कंटेनर में रख दिया। सावधानी बरती कि कार्निया पर कॉटन का को कोई रेशा लगा न रह जाए. 'आई कंटेनर' को बर्फ से भरे थर्मस फ्लास्क में रख दिया। इसके बाद उसने आँखें निकाल लेने से रिक्त हुए स्थान को गाज से भर दिया, ताकि चेहरा बिल्कुल पहले जैसा लगे। अमूमन इस कार्य को वह कुछ क्षणों में ही पूर्ण कर लेता था, पर इस केस में उसने इतनी देर लगाई कि पास खड़ा सर्जन भी ऊबने लगा था।

बाहर आते ही बूढ़े ने उसके थर्मस वाले हाथ को अपने बर्फ से ठंडे हाथों में ले लिया, "शुक्रिया डॉक्टर ...आपने जो भी मेरे लिए किया...अब मेरे बेटे की आँखों से किसी की अंधेरी दुनिया रोशन होगी।"

लौटते हुए उसके मन में किसी पवित्र मिशन को पूर्ण करने जैसा संतोष था, वह लगातार बूढ़े और उसके लड़के के बारे में ही सोच रहा था। घर पहुँचते ही उसे पत्नी का ध्यान आया। उसे हैरानी हुई, कुछ देर के लिए वह उसे बिल्कुल भूल गया था।

नर्स पत्नी की देख-रेख में लगी हुई थी। उसने पत्नी की नाड़ी देखी, ब्लड-प्रेशर नापा। सब कुछ सामान्य था। वह पहले से बेहतर नजर आ रही थी। उसने राहत की साँस ली।

दान की गई आँखों को अधिक समय तक स्टोर रखने की कोई व्यवस्था उसके पास नहीं थी। चैबीस घंटे के भीतर आँखें आल इंडिया इंस्टीट्यूट दिल्ली पहुँचनी ही चाहिए, जहाँ इन्हें तत्काल किसी प्रतीक्षारत अंधे व्यक्ति की आँखों में प्रतिरोपित कर दिया जाएगा। उसने कंपाउंडर को फोन किया, ताकि उसे दिल्ली भेज सके. उसने अपने नवजात बेटे की पहली दीवाली होने के कारण जाने में असमर्थता व्यक्त कर दी। उसने तीन जगह और संपर्क किया, पर त्यौहार की वजह से कोई भी दिल्ली जाने को राजी नहीं था। उसके माथे पर चिंता की लकीरें दिखाई देने लगीं। वह बेचैनी से कमरे में चहलकदमी करने लगा।

उसकी आँखों के सामने से अनगिनत आँखें गुजरने लगती हैं। बूढ़े जवान आदमी औरतों की आँखें...लड़के-लड़कियों और बच्चों की आँखें...मोतिया बिन्दु, काला मोतिया, जालेवाली आँखें...भैंगी आँखें...निर्दोष आँखें ...चमचम करती आँखें ...उदास आँखें...प्रतिरोपित आँखें ...बूढ़े की कृतज्ञ आँखें! सभी आँखें उसे ताक रही हैं। वह पोस्टमार्टम हाउस में तैयार खड़ा है। शव के मुख से कपड़ा हटाते ही उसके मुख से चीख निकल जाती है। शव तो पत्नी का है। ...ब्लड कैंसर से मरने वाले की आँखें प्रतिरोपित नहीं की जा सकतीं। वह परेशान हो उठता है। उसे कुछ करना होगा। कहीं दूर दो अंधी आँखों को उसका इंतजार है। क्या करे? वह दृढ़ निश्चय के साथ अपनी दोनों आँखें निकालकर दाहिनी हथेली पर रख लेता है। ...एकाएक उन दोनों आँखों से प्रकाश फूट पड़ता है। उन आँखों की रोशनी में सब कुछ देख पा रहा है।

ट्रेन के पटरियाँ बदलने से तेज शोर हुआ, उसने चैंककर उनींदी आँखों से देखा ट्रेन पूरी रफ्तार से दौड़े जा रही थी, दान की गई आँखों वाला थर्मस उसने किसी बेशकीमती वस्तु की भांति संभाल कर अपने पास रखा हुआ था। आतिशबाजी से पूरा आकाश जगमगा रहा था।

-(दूरदर्शन के लिए 'संकल्प' टेलीफ़िल्म निर्मित)