लड़कियाँ / मृणाल पांडे

Gadya Kosh से
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जिस दिन हम लोग माँ के साथ नानी के घर रवाना हुए, बाबू ने एक सुराही फोड़ी थी पता नहीं जान-बूझकर या अनजाने में। पचाक। तमाम पानी-ही-पानी कमरे में फैल गया था। माँ ने धोती ऊपर कर पैर रखते हुए, दूसरे कमरे से कान लगाये सुन रही सरू की माँ से कहा था कि जरा पोंछा ले आये, तमाम पानी-ही-पानी हो गया है और उनके पीछे पैर-वैर रपट कर किसी की हड्डी-पसली चटक गयी तो एक और मुसीबत।

माँ को वैसे भी हर चीज के अंत में मुसीबत ही नजर आती थी। हम लोग घर में होते तो मुसीबत, स्कूल में होते तो मुसीबत, बीमार होते तो मुसीबत, भले-चंगे उछलते-कूदते होते तो मुसीबत-पोंछा लगाती सरू की माँ ने सिर तनिक टेढ़ा करके माँ से पूछा था कि इस फेरे तो तीनेके महीने रहोगी-ही-रहोगी, न ! माँ ने, जैसा कि इन दिनों उसकी आदत हो गयी थी, जाँघों पर हाथ रख कर वजन तौला और काँख कर बैठते हुए कहा कि हाँ, उससे पहले वे लोग आने देंगे थोड़े ही ना, ‘‘जा बाहर खेल’’ यह अंतिम आदेश मेरे लिए था, जो हमेशा की तरह हर गलत मौकों पर हैरतअंगेज ढंग से किसी कोने में हाजिर पायी जाती थी।

कमरे से टूटी सुराही का एक टुकड़ा चूसने के लिए सफाई से उड़ा कर ले जाते मैंने सुना कि माँ, सरू की माँ, या जाले लगी छत से कह रही थी कि इस बार लड़का हो जाता तो उन्हें छुट्टी होती, बार-बार की मुसीबत....सरू की माँ हमेशा की तरह सिर हिला-हिला कर जरूर कहा होगा, ‘‘क्यों नहीं, क्यों नहीं।’’

ट्रेन में मैंने लड़-झगड़ कर खिड़की के पास की सीट हथिया ली थी और फिर दूसरों को जीभ बिराई--ईऽऽ, माँ की नजर अपनी ओर घूमती पा कर मैंने हिल-हिल कर जपा, ‘‘इ से इमली, ई से ईख !’’ पर माँ का ध्यान इस वक्त मुझ पर नहीं टिका। उस पर इस वक्त कई मुसीबतें थीं—बिखरा जाता सामान, डगमगाती सुराही, थकान, हम तीनों, एक स्टेशन पर खूब मिर्ची के समोसे खरीदे तभी एक औरत ने बगल कि खिड़की से अपने बच्चे को सू-सू करायी। मारे घिन के मुझसे समोसा नहीं खाया गया, मैंने माँ को दिया। उबले आलू का एक टुकड़ा सीट पर पड़ा था। उसे मसल कर जू-जू कीड़ा बना कर कुछ देर छोटी बहन को डराया। वह चीखी। माँ ने चिकोटी काटी, मैं रोयी। बड़ी बहन ने तब उकता कर कहा, ‘‘क्या मुसीबत है !’’ बड़ी बहन ज्यादा प्यार करती है। सिर्फ वही। बाकी सब गंदे हैं।

स्टेशन पर मामा लेने आए। मैं मामी की बगल में बैठी। मामी पान चबाती थीं तो उनके कान की लवों पर माणिक के बुंदे ऊपर-नीचे होते थे। ड्राइवर जितनी बार जीप का हार्न बजाता, हम तीनो बहनें मिल कर चीखतीं-पोंऽऽऽ। ड्राइवर, हँसा। घर पहुँच कर उसने मुझे और छोटी बहन को गोदी में लेकर जीप से उतरा। उससे चाय और बीड़ी की महक आती थी, उसकी मूँछें बड़ी-बड़ी थीं, और उसकी वर्दी का गरम कपड़ा चुभता था। नींद आती थी। उतारने में सुराही फिर लुढ़क गयी, पानी फैल गया, मुझे बाबू का याद आई। और मैंने छोटी बहन की चप्पल को ऐसे दबाया कि वह गिरते-गिरते बची। ‘‘मुसीबत की जड़ !’’ माँ ने दाँत भीच कर ऐसे कहा कि कोई और न सुने और मुझे हाथ से पकड़ कर औरों को ऐसे दिखाया, जैसे मुझे सँभाला हो, पर सचमुच में इतनी जोर से भींचा कि कंधा दुख गया। मुझे बाबू की याद आई। नानी के घर आने में हमेशा यही होता है। बाबू तो साथ आते नहीं, और यहाँ आते ही माँ भी मौसियों, मामियों, नानी और पुरानी नौकरानियों के बीच एकदम ही गुडुप। दिन में उसके पास भी जाना चाहें तो कोई-न-कोई टोक देता है, ‘‘यहाँ तो बेचारी को आराम करने दो।’’माँ भी कैसा बेचारी वाला चेहरा बना लेती है, जैसे वहाँ हम लोग उसे काट खाते हों ! धत् ! नानी के घर में घुसने से चिढ़ होने लगी, मैं झाड़ियों के पास जानबूझ कर ठिठकी। झबरा कुत्ता आया, उसने मुझे सूँघा, तभी भीतर से किसी ने मेरा नाम लेकर कहा, वह फिर कहाँ रह गयी ! मैं और कुत्ता साथ-साथ घर में घुसे।

नानी, मामा के लड़के को गोद में लिए बैठी थीं। उन्होंने कुत्ते को दुत्कारा। वे जानवरों को छूत मानती थीं। कुत्ता पूँछ नीची कर निकल गया। उसे दुत्कारे जाने की आदत थी। मुझसे कहा गया कि पैर छुओ, ऐसे नहीं, ऐऽ सेऽ। अरे, लड़की का जनम है और जिंदगी भर झुकना है तो सीऽख ही लो। नानी ने मेरी पीठ पर हाथ फेर कर कहा कि उहुंक, ये नहीं बढ़ी लंबाई में तनिक भी। आठ की कौन कहेगा इसे ? मैंने मामा के लड़के को चिकोटी भर ली। वह बेवकूफ-सा तब भी मेरे पीछे घूमता रहा। गोरा-गोरा, प्यारा-सा। वह उम्र के लिहाज से लंबा जा रहा था। पाँच का था, सात का लगता था। ‘‘कहानी सुनायेगी रात को ?’’ उसने मुझसे पूछा। ‘‘नहीं,’’ मैंने कहा और झूठ-मूठ अखबार पढ़ने लगी।

‘‘क्या मुसीबत है !’’ माँ कह रही थी और पड़ोसन नानी कह रही थी कि ‘‘लली की माँ, इस बार तो लली को लड़का ही होगा, चेहरा देखो, कैसा पीला पड़ गया है लली का, लड़कियों की बेर कैसी सुरख गुलाब लगती थी।’’ ‘‘क्याऽ पता, इस बार भी।’’ माँ ने कहा, और बेचारीवाला चेहरा बना कर नाखून खोटने लगीं। ‘‘वहाँ रोटी-पानी को कोई है तेरे कर्ता के !’’ पड़ोसन नानी पूछ रही थी। मुझे बाबू की बहुत याद आयी। बाबू से कितनी साफ खुशबू आती थी ना ! उनकी गोद गुलगुली थी। माँ इधर ज्यादे देर गोद में नहीं लेटने देती, कहती है--‘‘उफ् हाँटे-माँटे (??) एक कर डाले, साड़ी मुसड़ दी सो अलग, अब उठ भी, ढेरों काम पड़ा है मेरा। ऊपर से ये मुसीबत औऽऽर। उठ।’’ नानी ऊपर को हाथ जोड़ कर कहती है, ‘‘हे देवी, मेरी लाज रखना, इस बार ये मायके से बेटा लेकर जाये।’’ फिर वे आँखें पोछती हैं।

मैंने कनखियों से बहनों को देखा, वे सो गयी थीं। जहाँ हम सोये थे, वहाँ काठ की दीवार से बड़े से कमरे के बीच में दो हिस्से किए गए थे। जहाँ मेरा तखत था, उसके ठीक ऊपर, एक बड़ी दीवाल घड़ी टिक-टिक कर रही थी, घंटे बजने से पहले उसमें एक गहरी सुरसुरी आवाज आती थी, जैसे छोटी बहन पुक्का फाड़ कर रोने से पहले ऊपर साँस खींचती है। सब बत्तियाँ बंद हैं, कमरे में बस चाँद का उजाला है। तुलसा बाई माँ के तलवों में तेल ठोंक रही है, और कह रही है, ‘‘इस बार लड़का होगा तो स्टेनलेस स्टील की जरीवाली साड़ी लूगी, हाँऽ।’’

चाँदनी में माँ का चेहरा नहीं दीखता, बस ढोल जैसा पेट दीखता है। माँ की साड़ी खिसक गयी है। तुलसा कोई दुखती रग छूती है तो माँ हल्के से गुँगुआती है। घर लौटती गायों की तरह ।‘‘अबकी लड़का हो जाता, तो छुट्टी होती।’’ वह फिर तुलसा से भी कहती है। और ये भी कहती है कि अब तू जा, तेरे बच्चे बैठे होंगे—तेल की कटोरी चारपाई के खूब नीचे खिसका दीजो, वरना सुबह बच्चे के पैरों से ठोकर लगी तो तमाम तेल-ही-तेल....खराब बात। माँ आधी छोड़ देती है तो देर तक कमरे में बात तैरती रहती है। घड़ी कि टिक-टिक की तरह । अच्छी बात हमेशा पूरी कहते हैं बड़े लोग, खराब बात आधी ही—ऐसा क्यों ? क्याऽ औरत का भाग्य....चुप्पी। अरे तीन लड़कियाँऽऽ चुप्पी। बाहर एक तारा खूब तेज चमक रहा हैं। क्या ध्रुवतारा होगा ! बाबू कहते हैं, मन लगा कर पढ़ोगी तो तुम भी, जो चाहो बन सकती हो, ध्रुवतारे की तरह। लड़का तो नहीं बन सकती पर ? मैं ढिठाई से कहती हूँ, तो बाबू पता नही क्यों धमका देते हैं कि बड़ों के मुँह लगती है । बड़े लोगों का कुछ भी नहीं समझ में आता। बड़ी बहन कहती है, बड़े लोगों का कभी भरोसा नहीं करना चाहिए, अपनी बात सब खोद-खोद कर पूछ लेते हैं, खुद कुछ नहीं बताते।

                                                                                                                              कोई हमें कुछ नहीं बताता। यहाँ खासकर रात को जब हम सो जाते हैं तब यहाँ बड़ों की दुनियाँ खुलती है, जैसे बंद पिटारा । मैं जाग कर सुनना चाहती हूँ, पर हर बार बीच में मुझे जाने क्यों नींद आ जाती है। ये आवाज किसकी है ? खाँसी दबाते कौन रो रहा है ? छोटी मौसी ? ‘‘कुत्ते जित्ती इज्जत मेरी नहीं उस घर में।’’ वह माँ के बगल में कह रही है। कहाँ ? हैं ? कहाँ ? मैं पूछना चाहती हूँ। माँ कह रही है कि जी तो उन सबका कलपता है पर उसे निभाना तो है ही। मेरी आँखें बंद होती हैं।

‘‘निभाना क्या होता है माँ !’’ मैं सुबह पूछती हूँ। सब लोग नाश्ता कर रहे हैं। मैं कहती हूँ कि वो वाला निभाना जो छोटी मौसी को चाहिए। मुझे एक तमाचा पड़ता है, फिर दूसरा; फिर मामी बचाती हैं, छोड़िए भी बच्चा है। ‘‘बच्चा—वच्चा नहीं, पुरखिन है,’’ माँ का पेट गुस्से से थिरकता है, ‘‘चोरी से बड़ों की बातें सुनती है ! जाने क्या होगा इसका !’’

‘‘तू भी....’ बाहर हौदी के पास बैठी बड़ी बहन बीने फूलों को औंधाती कहती है, ‘‘सौ बार कहा नहीं, कि चबर-चबर सवाल मत पूछ। पीट-पीट के मार डालेंगे वो लोग तुझे एक दिन, अगर बहुत पूछेगी तो।’’ मैं रोते-रोते कहती हूँ, ‘‘खूब पूछूँगी, खूब पूछूँगी।’’ ‘‘तो जा के मर फिर।’’ बड़ी बहन कहती



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