विशिष्ट होने की आवश्यकता-1 / ओशो

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प्रवचनमाला

मैं अवसाद व आत्म-निंदा से भरा रहता हूं, हालांकि मुझे मालूम नहीं क्यों…?

वैसे ही बने रहने का तरीका है यह…यह मन की चालाकी है। बजाय इसके कि समझा जाये, ऊर्जा निंदा की ओर चलना प्रारंभ कर देती है…जबकि बदलाव समझ से आता है, निंदा से नहीं। तो मन अत्यंत चालाक है: जैसे ही तुम कोई सच्चाई देखना शुरू करते हो, मन इसपर हावी हो जाता है और निंदा करनी शुरू कर देता है। अब सपूर्ण ऊर्जा निंदा बन जाती है, समझ भूल जाती है, हट जाती है, और तुम्हारी ऊर्जा निंदा की ओर बहने लगती है…लेकिन निंदा सहायक नहीं होती। यह तुम्हें अवसाद से भर सकती है, यह तुम्हें क्रोध से भर सकती है, लेकिन अवसाद और क्रोध तुम्हें कभी बदल नहीं सकती। तुम वैसे ही रहते हो, उसी दुष्चक्र में घूमते।

समझ तुम्हें मुक्त करती है, तो जब भी तुम कोई सत्य देखो, उसकी निंदा करने की कोई आवश्यकता नहीं, उसके बारे में चिंतित होने की कोई आवश्यकता नहीं। आवश्यकता है तो इस बात की कि तुम उसमें गहरे जाओ और उसे समझने की कोशिश करो।

यदि मैं तुम्हें कुछ कहता हूं और वह तुम्हें चुभ जाता है- और वही मेरा उद्देश्य भी है कि यह तुमपर कहीं चोट करे- तो तुम्हें देखना है कि चोट क्यों लगती है, कहां लगती है और समस्या क्या है। तुम्हें इसके भीतर जाना है। इसे भीतर से देखना, इसे चारों ओर से समझना, सब पक्षों से जानना…यदि तुम निंदा करते हो तो देख नहीं पाते, इसे सब पक्षों से पढ़ नहीं पाते। तुमने पहले ही निर्णय कर लिया है कि यह बुरा है, इसे बिना कोई मौका दिये तुमने पहले ही निर्णय दे दिया है।

सत्य को सुनो, इसके भीतर जाओ, इसे गुनो, इसे भूल जाओ, और जितना तुम इसे पढ़ पाओगे, उतनी ही इससे मुक्त होने की तुममें क्षमता आयेगी। इसे समझने की क्षमता और इससे मुक्त होने की क्षमता एक ही घटना के दो नाम है।

यदि मुझे कोई बात समझ में आती है तो मुझमें इससे बाहर आने की क्षमता आती है, इसका अतिक्रमण करने की क्षमता आती है। यदि मुझे कोई बात समझ में नहीं आती तो मैं इससे बाहर नहीं आ सकता। तो मन सब के साथ यही करे चले जाता है, केवल तुम्हारे साथ ही नहीं। तत्क्षण तुम बीच में कूद जाते हो और वक्तव्य देते हो,’यह गलत है, यह मुझमें नहीं होना चाहिये, मैं योग्य नहीं हूं, मेरे संबंध गलत हैं, यह गलत है, वह गलत है।‘ और तुम अपराध-भाव से भर जाते हो। अब संपूर्ण ऊर्जा अपराध-भाव की ओर बह रही है, जबकि यहां मेरा कार्य है तुम्हें अपराध-भाव से जितना संभव है उतना मुक्त कर सकूं।

तो जो भी तुम देखो उसे निजी रूप में मत लो; इसका तुमसे विशेष कुछ लेना-देना नहीं; मन का यही ढंग है कार्य करने का। यदि ईर्ष्या है, मालकियत है, क्रोध है, मन इसी प्रकार कार्य करता है…लगभग सबका मन; अंतर केवल डिग्री का है।

मन की एक और प्रक्रिया है: या तो यह प्रशंसा करनी चाहता है या निंदा। यह मध्य में कभी नहीं रहता। प्रशंसा से तुम विशिष्ट हो जाते हो और तुम्हारा अहंकार की तृप्ति होती है; निंदा से भी तुम विशिष्ट होते हो। जरा चालाकी देखो: दोनो ओर से तुम विशिष्ट होते हो! वह विशिष्ट है: या तो वह संत है, एक महान संत, या फिर वह बहुत बड़ी पापिन है, लेकिन दोनों ओर से तुम्हारा अहंकार तृप्त होता है। हर प्रकार से तुम एक ही बात कह रहे हो- कि तुम विशिष्ट हो। मन यह नहीं सुनना चाहता कि वह साधारण मात्र है। यह ईर्ष्या, यह क्रोध, यह सबधों की और हमारे होने की समस्याएं। यह सब साधारण हैं, सब इन्हीं में फंसे हैं। वह उतने ही साधारण हैं जितने हमारे बाल। किसी के ज़्यादा हैं तो किसी के थोड़े, किसी के काले हैं तो किसी के लाल, लेकिन यह अधिक महत्वपूर्ण नहीं है- यह सब साधारण हैं, सब समस्याएं साधारण हैं। सब पाप साधारण हैं और सब पुण्य साधारण है, लेकिन अहंकार विशिष्ट महसूस करना चाहता है। या तो यह कहता है कि तुम श्रेष्टतम हो या निकृष्टतम।

तो बस देखो…यह सब साधारण समस्याएं हैं? क्या समस्याएं हैं, मुझे बताओ? तुम क्या समस्याएं अनुभव करती हो? बस उनके नाम लो।

(सौजन्‍य से- ओशो न्‍यूज लेटर)